मौज-तमाशे के ढेर सारे अंदाज़ आज़माए मैंने।
एक दिन क्लासमेट के साथ उसके दोस्त के कमरे में गई। वहाँ पहुँचते ही कुछ पल बाद सब कुछ बदल गया। उसके दोस्त की गर्लफ्रेंड भी वहीं थी। चारों के बीच बातें धीमे-धीमे घुलने लगीं। फिर एक झटके में माहौल बदल गया। हवा में एक अजीब सी खामोशी छा गई। किसी ने कुछ कहा नहीं, पर सब कुछ आगे बढ़ गया। शुरुआत धीमी थी, पर फिर रफ्तार बढ़ गई। एक के बाद एक चीजें घटित होती रहीं। कभी कोई ठिठक रहा था, तो कभी कोई आगे बढ़ रहा था। अंत में सब कुछ इतना उलझ गया कि अलग करना मुश्किल लगा।?
अरे भई, सबका कैसा चल रहा है!
अंकिता मैं हूँ।
पढ़ाई का बहाना बनाकर मैं दीपक के साथ ऐसा कर बैठी थी, जो क्लास में मेरे पास बैठता था।
जब भी हमें सेक्स करना होता, दीपक के साथ प्रकाश के दोस्त के फ्लैट पर चले जाते। वहाँ कोई नहीं होता था, सिर्फ एक आदमी अकेले में रहता था।
वो ज्यादातर समय ऑफिस के काम से घर से बाहर ही रहता।
वहाँ पर कोई भी हमें रोकने वाला नहीं था।
घर के मालिक का ठिकाना वहीं नहीं था।
हर बार जब प्रकाश का साथी घर से बाहर निकलता, उसने प्रकाश को चाबी सौंप देता।
वहाँ प्रकाश अपनी गर्लफ्रेंड सपना के साथ जुड़ता।
कहीं और जगह होती तो शायद वहाँ भी कर लेते।
तब वो लड़की, जो प्रकाश के सपने में आया करती थी, हमारे ठहरने का इंतजाम किसी और रास्ते से ले आई।
एक पुरानी बात का हिस्सा था ये कहानी।.
सूरज के चढ़ने के बाद एक हल्की सी धूप में आखिरकार वो दिन शुरू हुआ।
बाहर कदम रखते हुए मैंने आवाज दी थी - सपना के यहाँ चल रही हूँ।
मैं वहाँ पहुँचा था, दीपक पहले से मौजूद था। प्रकाश के दोस्त के फ्लैट में हम आमने-सामने हुए।
वहाँ मिला सपना, तो प्रकाश भी कहीं उधर से आ गया।
ठीक उसी जगह हमने मुलाकात करने की सोची थी।
बातें होने लगीं फ्लैट में थोड़ी देर तक।
थोड़ी देर बाद हंसी-ठिठोली का वक्त आया।
फिर प्रकाश और दीपक कुछ चखने-पीने के लिए घर से बाहर हो लिए, समोसे के साथ कोल्ड्रिंक भी मंगा लाए।
दोस्तों के साथ आते हुए दीपक ने बोतल छिपा रखी थी। प्रकाश चुपचाप पीछे खड़ा था, उसके हाथ में गिलास थे।
कई बार वो शख्स उस जगह पीने के लिए अकेला ही होता।
एक क्लास में दोस्ती हुई, फिर वो बाहर भी साथ घूमने लगे।!
अब तो बस इतना समझ आया कि उसके पास पीने की चीज़ होनी थी।
कुछ ही समय बाद, एक के चलते दूसरा भी शराब में डूब गया।
सुबह हमने थोड़ा सा खाया, उसके बाद कोल्डड्रिंक ली।
अचानक प्रकाश ने सपना से कहा – अब समय है, संभोग करते हैं।!
फिर अचानक दीपक ने एक गोली निकाली, सेक्स से जुड़ी थी, मुंह में डाल ली।
गोली लगने पर प्रकाश को भी चोट आई।
उसी पल, सपना के पीछे-पीछे प्रकाश भी कमरे में घुस गया।
हॉल के भीतर सिर्फ मेरा और दीपक का होना था।
अब दीपक का भी मन सेक्स में करने को हो गया था।
दीपक ने कहा, आज मैं बहुत उत्साहित हूँ। कुछ अलग आजमाऊँगा।
मैंने पूछा– क्या?
दीपक के मन में ख्याल आया, तो मोबाइल पर एक फिल्म चल पड़ी।
बैठते ही शुरू कर दिया पोर्न फिल्म देखना, दोनों मिलकर।
थोड़ी देर बाद मेरी चूत को नमी सताने लगी।
तभी दीपक के पैरों में भी हलचल सी आई।
इसके बाद हल्के-हल्के से मेरा हाथ पूरे शरीर पर फिरने लगा।
थोड़ी देर बाद मेरा हाथ आराम से चूत तक जा पहुंचा, फिर वहीं से उसे छूने लगा।
थोड़ी देर में वह मेरे साथ खड़ा था। फिर उसने बाहें फैलाईं, मुझे चिपका लिया।
फिर मैंने उसके साथ गले लगने का फैसला कर लिया।
इसके बाद स्मूथी तैयार की गई।
होंठों पर दीपक का स्पर्श था, मेरे अंदर।
मेरे होंठों पर उसका मुँह था, सांसें तेज हो गई थीं।
मेरा मुँह धीरे से उसके होंठों पर आ गया।
उसकी छाती पर मेरी चूचियों का ठहरना जैसे कोई गदगदी भरी साँस थी।
मेरी तबियत जैसे रोंदी सी गई, इतने ज़ोर से उसने गले लगाया।
थोड़ी देर में ही दीपक के चलते मेरी हालत खराब हो गई थी।
दर्द ने होंठों पर कब्जा कर लिया था।
कभी-कभी दीपक के हाथ मेरी छाती पर पहुँच गए।
उसके बाद वो सीधा ऊपर से दबाव डालने लगा।
थोड़ी-थोड़ी खुद में हलचल सी महसूस करने लगी थी।
अचानक दीपक ने सभी कपड़ों को शरीर से हटा दिया।
उसने कमर से पट्टा निकालकर मेरे हाथ पीछे की ओर बांध दिए।
मैं घबरा गई।
मैंने दीपक से कहा, ऐसा मत करो।!
फिर उसने कहा - ऐसा लगेगा, मस्ती होगी इसमें!
दीपक ने मेरे हाथ पट्टे से बांधे, फिर जीन्स का बटन खोल दिया।
उसने बिना पैंटी उतारे, सिर्फ ऊपर से ही चूत को जीभ से छुआ।
हाथ पीछे कसकर बांधे गए थे।
उस पल दीपक ने कमरे के पलंग की धातु की पाइप में मेरे हाथों को कपड़े की रस्सी से जोड़ दिया।
जैसे मेरी कलाइयों पर बेड़ियाँ चढ़ गई हों, वैसा एहसास होने लगा था।
दीपक के हाथ ने धीरे से पैंटी के भीतर जगह बना ली।
उसके होंठ मेरे ऊपर थे, तभी उसने मेरे स्तनों को पकड़ लिया। धीमे-धीमे दबाव बढ़ाते हुए दीपक ने छू लिया।
उसके हाथ मेरे ऊपर से फिसल गए, कपड़ा धीमे से नीचे आया।
अंदर में काले रंग की ब्रा मेरे शरीर पर तब थी।
मेरी पैंटी को दीपक ने धीरे से नीचे खींचा।
उसने मुझे छूकर शुरू किया, धीमे से। फिर हल्के-हल्के स्पर्श के साथ नीचे आया। अब उसकी जीभ वहाँ घूम रही थी।
फिर वहीं पल के लिए ठिठका, और मेरी ब्रा सरपट छीन ली।
हमारी उम्र तब साठ नौ की हो चुकी थी।
मुझे याद है, धीरे-धीरे उसकी छड़ मेरे होंठों के बीच सरक गई।
कुछ भी कर पाना मेरे बस में नहीं था।
एक तरफ़ वो मेरी चूत पर जीभ फिरा रहा था।
दीपक ऊपर आ बैठा मेरे।
फिर वह मेरी छाती पर हथेलियों का दबाव डालता गया।
दीपक ने धीमे से मेरे होंठों पर अपना लंड टिकाया। फिर बोला - इसे मुंह में लो।!
थकान महसूस होने लगी थी, उसका लंड चूसते-चूसते मेरी।
मैंने कहा - दीपक, मुझे छू लेना।!
कौन मानता उसे।
वह ने वो सब पिया जो मौजूद था।
मुझे पलक झपकते ही दीपक ने मजबूर कर दिया, उसका लंड मेरे मुंह में फिसल गया। बार-बार वो धक्के देता रहा, एक नहीं कई बार।
क्या हो रहा था मेरे साथ, इस पर मेरा दिमाग़ अटका हुआ था।
हवा मेरे फेफड़ों तक पहुँच ही नहीं पा रही थी।
कभी-कभी ऐसा मानो पेट के अंदर सब ऊपर आने लगता था।
थोड़ी देर बाद, दीपक ने पानी मेरे मुँह में डाल दिया।
एक बार भी मैंने वीर्य का सेवन नहीं किया है।
पहली बार में तो कुछ हद तक अस्पष्ट सा लगना समझ में आता है।
मेरी चूत में भी पानी आ गया था।
उसने कहा, आज अंकिता की चूत पूरी तरह फाड़ दी जाएगी।
अचानक डर लगने लगा। मन में खयाल आया - आज ये क्या कुछ कर दे?
थोड़ी देर बाद गोली काम करने लगी, फिर दीपक का लंड खड़ा होकर तम्बू-सा लगने लगा।
फिर उसने मेरे लिए चाटना शुरू कर दिया।
वह मेरे शरीर के हर हिस्से पर होंठ फेरता गया, सिर से पैर तक कुछ नहीं छोड़ा। निप्पल पर दाँत पड़े, तेज। उसके बाद चूचियों पर भी दबे दाँत, लाल निशान छोड़ गए वो।
फिर उसने मेरी चुदाई पर तेज़ हलचल शुरू कर दी।
एक बार मैंने पूरी तरह हार मान लिया था।
लौट आई थी उसकी पुरानी शरारत।
उसके होंठ मेरी चुत से टकराए, धीमे-धीमे गहरा होते स्पर्श।
सांसें तेजी से आ रही थीं, मेरे होठों से आवाजें फूट पड़ीं।
उसने मेरे पैर ऊपर उठा दिए, जब चाटते हुए लगभग सात मिनट बीत गए थे।
दीपक धीमे से बैठा, उसका लंड मेरी चूत के ऊपर आ गयa।
मैं सिहर गई।
जब लंड अचानक चूत में घुसा, मेरे होठों से ऊपर की ओर बढ़ती सिसकी छूट गई।
मैंने उसे बोला, ठहरो।!
अब तो उसके मन में यह बात जगह ही नहीं बन पा रही थी।
उसका लंड मेरी चूत के भीतर आ-जा रहा था, धमाकेदार तेजी से।
हल्की सी आह मेरे होंठों से फिसल रही थी।
अचानक से झटका लगा, और दीपक का पूरा हथियार मेरे भीतर उतर गया।
उसकी तेज़ सांसें मेरे कान में गूंजने लगीं।
अब खुशी से मेरा कराहना शुरू हो गया।
एक बार फिसल कर नीचे गिर पड़ी।
उसी पल वो दोनों वहाँ से निकले, हमें एक-दूसरे के साथ जुड़े देखकर रुक गए।
शर्म से लाल हो रही थी मैं, उस पल में सपना और प्रकाश के सामने बिल्कुल खुली थी।
फिर भी दीपक पर ये सब कुछ कोई असर नहीं डाल रहा था।
मुझे देखते ही वो दोनों किसी बात पर हँसने लगे।
उस वक्त मैंने दीपक की ओर देखा, बोला – पहले हाथ छोड़ दे।!
फिर भी वो मेरी बात पर कान नहीं देता।
आँखों से बातें हुईं, प्रकाश और दीपक के बीच कुछ लम्हों में।
उस वक्त प्रकाश मेरे पास आ बैठा, सपने की बात लिए हुए।
एक पल को सपने ने भी हिचकिचाहट में झुक लिया, ऐसा क्यों?
अचानक रोशनी में सपने के कपड़े ढीले होने लगे।
जैसे-तैसे होश आया सपना को, तब तक उसके कपड़े बस एक ब्रा तक रह गए थे।
दीपक ने अचानक उसके हाथ छू लिए।
उसके कपड़े धीरे-धीरे फर्श पर बिखर गए, प्रकाश के हाथों से।
उस वक्त उन दोनों ने हमारी ओर देखा और बोले - यह सब हमारी मर्ज़ी से हुआ, हम तुम दोनों के साथ यही करना चाहते थे।
आँखों से उसकी मुझ पर नजर पड़ी।
खुशी से उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई, क्योंकि अब वह एक नया घर पाने वाली थी।
उसने बिना देर किए दीपक का लंड मुँह में ले लिया।
हाथ फैले करते ही प्रकाश ने मुझे गाल पर चूम लिया।
उसके होंठ मेरी त्वचा पर सरकने लगे।
अब मुझे यह काम पसंद आने लगा है।
फिर वो खुद भी सारे कपड़े उतारकर बाहर आया।
उस वक्त प्रकाश ने कहा, "मेरी गाँड सहला दो।"
मैंने उसका लंड मुँह में लिया।
उसके हाथों ने मुझे सहलाया, फिर वो प्रकाश की बाँहों में आ गया।
अचानक वो मेरी गुदा में अपना घटिया पैठा ले गया।
उसकी छाती पर मेरी चूचियों का दबाव महसूस हो रहा था।
मेरी त्वचा पर उसकी सांसें भारी होती जा रही थीं।
थोड़ी देर आराम के बाद वह लौटा, मुझे पेट के बल झुकाकर डॉगी स्टाइल में ले गया।
एक बार फिर उसने मेरे साथ संभोग करना शुरू कर दिया।
दीपक, सपना के साथ खेलते हुए मस्त था।
दीपक कहीं से आकर मेरे पास खड़ा हो गया। उसने मेरे मुंह में अपना लंड धकेल दिया।
अंधेरे से ऊपर की ओर एक रोशनी धीमे-धीमे मेरी तरफ बढ़ रही थी।
एक के बाद एक दोनों ने मुझे पूरा समय दियa। करीब पच्चीस मिनट तक वो लगातार आगे-पीछे होते रहे। मेरे ऊपर उनका हर हरकत था। घंटे के आधे से ज़्यादा हलचल ऐसे ही चलती रही। खत्म होने तक दोनों ने अपना हिस्सा निभाया।
उस समय में पहले ही दो बार गिर चुकी थी।
दोनों ने मेरी चूचियों पर अपना वीर्य छिड़क दिया। फिर बोले - अब सपना की बारी है, तुम जाओ।!
अब मैं वहाँ थी, नमक के इस छोटे स्पेस में।
अब वो खुद को साफ करने लगी, तभी बाहर निकली और कपड़े ओढ़ने में जुट गई।
उस वक्त तक दोनों लगातार सपना के साथ शारीरिक संबंध में थे।
आधा घंटा बीत गया, सेक्स के बाद वो ताज़ा होकर बाहर आई। कपड़े पहनने लगी।
उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गई, सपना देखते ही।
खुशी से दोनों लड़कों के चेहरे चमक रहे थे।
तभी उनके दिमाग में ख्याल आया - सपना वो मिलकर कुछ हटके करें।
इस कदर जुड़ चुके थे कि लज्जा कहीं पीछे छूट गई थी।
थोड़ी देर बाद कुछ चखकर हमने एक ऐसी फिल्म देखी, जिसमें दो पुरुषों के बीच संबंध दिखाए गए थे।
इसके बाद, एक साथ हम तैयार थीं।
फिर हम दोनों पलंग पर लेट गए। मेरा मुँह उसके होठों की तरफ बढ़ा, वो भी आगे झुकी।
थोड़ी देर के लिए सब कुछ इसी तरह चलता रहा।
अचानक मेरा पसीना छूटने लगा, उधर वो भी बुखार से तपने लगी।
उसका होंठ मेरे पास आया, फिर जोश के साथ चूम लिया।
इस तरह कई घंटों तक लगातार जारी रहा सब कुछ।
उसकी चोटी पर हाथ फिरा, नीचे सरका दिया।
अब सिर्फ पारदर्शी ब्रा पहने हुए थी वो।
उसके भूरे निप्पल को साफ देख पाने की वजह यह थी।
मुझे ऐसा लग रहा था, सिर्फ इसकी ब्रा हटाकर उस पर झपट जाऊँ।
अचानक, मैंने सपना की नाभि को छुआ।
उसके सिर चकरा रहे थे, पैर लड़खड़ाने लगे।
वो बस सिसकती रही - अंकिता… फिर धीमे से चूसने लगी, हाँ… हाँ।
अचानक ही मैंने जीन्स का बटन खोल दिया, पहने से उतार फेंका।
उसके अंडरवियर में काला रंग था, साफ़-साफ़ दिखने वाला।
उसकी ब्रा तथा पैंटी देखते ही मेरे ज़हन में वो रात तैर आई, जब मैंने उसे चूमा था।
दीपक के साथ प्रकाश भी बिल्कुल नंगा था, अपने लंड को हाथ में लिए हुए।
दोनों के बीच सेक्स में एक अजीब-सा समलैंगिक आनंद था।
सपना ने आहिस्ता-आहिस्ता मेरे कपड़े उतार लिए।
इस वक्त हम दोनों के कपड़े उतर चुके थे।
उसके हाथ मेरे स्तनों पर थे, दबाव डालते हुए।
उसके मुँह में चूची थी, सिसकते हुए निगल रही थी।
थोड़ी देर के बाद मेरा होश उसके स्तनों पर आ गया।
अभी उसके चूचे कुंवारी लड़क की तरह ही थे, ठोस और तने हुए।
हम दोनों ने पंद्रह से बीस मिनट तक आपस में चूचियाँ चूसी।
इसके बाद हम दोनों ने 69 का अंदाज़ अपना लिया, और वह मेरी चूत चूसने लगी, मैंने उसकी।
मुझे ऐसा लग रहा था जैसे सब कुछ गर्म हो रहा है। धीरे-धीरे मेरी त्वचा पर सिहरन दौड़ गई।
वो मेरे होंठों पर था, मैंने धीमे से अपनी जीभ आगे बढ़ाई।
उसकी चूत से निकला रस कमाल का स्वाद लिए हुए था।
उसके होंठ मेरी चुदाई पर इतनी तेज़ी से आगे-पीछे हो रहे थे, मानो बारिश के बाद निकला अमरूद हो।
इतना सब कुछ 15 मिनट तक जारी रहा।
मुझे एहसास हुआ, उसकी जीभ मेरे भग पर लगातार घूम रही थी।
अचानक वो मेरी चूत में तेजी से उंगली डालने लगी, इसके बाद चाटना शुरू कर दिया।
उसकी जीभ धीमे-धीमे मेरे भीतर सरक रही थी।
इस कारण मैं बहुत उत्साहित महसूस कर रहा था, साथ ही लगातार मनोरंजन भी हो रहा था।
गिरती हुई, मैंने उसके होंठों पर सांस छोड़ दी - ओह…उफ्फ…अच्छा…हम्म…लगा कि सब ख़त्म हो गया।!
उसके मुँह में मैंने अपना सब कुछ उंडेल दिया। हाथों से मेरी चूत को भरकर वो खुशी से पी गई।
एक बार फिर सपने में मैंने उसकी चूत को होठों से छुआ। जीभ ने आगे-पीछे का रास्ता लिया। धीरे से दाँत पड़ गए, थोड़ा दबाव डाला, बस।
मज़े के बाद वो धीरे से नीचे गिर पड़ी।
उसके रस को मैंने पूरा-पूरा पी जाया।
तब तक उन दोनों के पास लंबा खड़ा था।
एक दिन, जब हम दोनों साथ चल रहे थे, तभी वो दोनों आगे बढ़े।
अब शाम हो गई थी।
हम सभी ने कई बार संबोग किया, फिर घर की ओर चल पड़े।
इसके बाद भी हम लोग वैसे ही मिलना जारी रखते थे।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0