बुर्का पहनी हुई भाभी की चूत चुदाई करके प्यास बुझायी

Jan 15, 2026 - 12:14
Jan 15, 2026 - 16:49
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बुर्का पहनी हुई भाभी की चूत चुदाई करके प्यास बुझायी

अँधेरे सिनेमाघर में पड़ोस में बैठी थीं एक बुर्का पहनी महिला। धीमे प्रकाश में उसने मेरे हाथ को छुआ। आखिरकार हम दोनों में जुड़ाव बढ़ गया। वो पर्दे में ढकी औरत, फिर उसके साथ मैंने कैसे संबंध बनाया?

हेलो, अन्तर्वासना में आप सबका स्वागत है।.

पहले मैं अरुण कहलाता था। लखनऊ में पला-बढ़ा हूँ मैं। उम्र चल रही है पच्चीस के पास। कद ऐसा है कि सात इंच के साथ सात फुट नहीं पहुँचता। चेहरे का रंग धूप में भी खिंचाव नहीं दिखाता। .

आज पहली बार कोई सेक्स स्टोरी लिख रहा हूँ। अगर कुछ गड़बड़ लगे, तो माफ़ कर देना।.

दो साल पहले की बात है। मेरी उम्र उस वक्त 23 साल थी। ये कहानी सच की है, कल्पना से कहीं अलग। लखनऊ में मेरा घर है, वहीं की हवा में पला हूँ। एक दिन दोस्तों के साथ मॉल गया था, शॉपिंग के चक्कर में। फिर धीरे-धीरे बात फिल्म देखने तक पहुँच गई। टिकट ली, और सीधे सिनेमाघर में चले गए। फिल्म डरावनी थी, ऐसी जिसमें रोंगटे खड़े होते हैं। अंदर पहुँचे तो फिल्म शुरू हो चुकी थी। सभी ने अपनी सीटों पर जगह ले ली। आखिरकार, ध्यान सब फिल्म पर केंद्रित हो गया।.

अँधेरा ऐसा था मानो कोई भूतिया फिल्म चल रही हो। हाथ को छू लिया किसी औरत ने, बिना ध्यान दिए। लगा जैसे पतझड़ में सूखी पत्ती छू गई हो। घूमकर देखा तो साइड में एक औरत बैठी थी, मुंह पर कपड़ा डाले। उसने चेहरा ढका नहीं रखा था, तो सब कुछ साफ दिख रहा था। आंखें टिकी थीं स्क्रीन पर, झपकी तक नहीं ले रही थी।.

उस औरत की आँखों पर नज़र पड़ी - बहुत साफ़ और गहरी। शायद कहीं से रिश्तेदार आई थी, कोई बचपन की सहेली हो सकती है। वहाँ बस दो ही चेहरे थे, जगह के एक कोने में खामोशी से बैठे।.

थोड़ी देर में स्क्रीन पर एक भयानक दृश्य छा गया। तभी उसने अचानक मेरे हाथ पर अपना हाथ रख दिया। मेरा हाथ उसी कुर्सी के हत्थे पर टिका था। उसने मेरे हाथ को जोर से दबा लिया। लगा जैसे वो डर गई हो। शायद उस दृश्य ने उसे सहमा दिया था।.

थोड़ी देर में उसकी मुट्ठी ढीली पड़ गई। मैंने आहिस्ता से पूछ लिया - तुम्हें डर लगा था?

वह मेरी ओर घूमे। आवाज़ कुछ लड़खड़ाई, पर हाँ कह दिया।.

उसकी उंगलियाँ मेरी हथेली पर समा रही थीं। वो खुद न हटे, तो मैंने भी कुछ नहीं किया।.

थोड़ी देर में फिल्म के बीच में रुकावट हुई। पास बैठी महिला नाश्ते की चीजें खरीदने बाहर चली गई। उधर मेरे साथ वाले दोस्त भी झट से उठ गए। उन्होंने मुझे बुलाया, पर मैं अंदर ही रह गया।.

फिर एक दिन मैंने उन भाभी से बातचीत शुरू कर दी। धीरे-धीरे वो भी मुझसे जवाब देने लगीं। ऐसे ही गपशप में हम एक-दूसरे को जानने लगे। मज़ेदार अंदाज़ वाली ये भाभी बहुत प्यारी थीं।.

उसी पल उनके मुँह से नंबर की बात निकली। मैं हतप्रभ खड़ा रह गया, पर थोड़ी देर बाद लिखकर दे दिया।.

अब ब्रेक का वक्त खत्म हो चुका था। पलट कर आए मेरे दोस्त, साथ में एक महिला भी थी। मैंने जैसे ही हाथ घुमाया, तो भाभी ने अपना हाथ झटक कर पीछे छुपा लिया। फिर हम सभी की नज़रें वापस स्क्रीन पर टिक गईं।.

हाथ के छूते ही एक सेकंड में भाभी ने वापस अपनी पकड़ बढ़ा दी। इस बार मेरी तलहथी उनकी तलहथी से सट गई, क्योंकि मैंने ऊँगलियाँ फैला रखी थीं। ठहरी हुई सांस के बीच मैंने हाथ आगे की ओर झुका दिया।.

अचानक से भाभी ने मेरी उंगलियों में अपनी उंगलियाँ डाल ली। मैंने आँख घुमाकर उनकी ओर देखा, तब वो टीवी की तरफ घूर रही थीं, पर उनकी उंगलियाँ मेरी उंगलियों को धीरे-धीरे निचोड़ रही थीं। मैंने झट से अपनी हथेली उनकी हथेली पर रख दी। एकदम साफ महसूस हुआ - उनकी हथेली मेरे हाथ के साथ छेड़छाड़ कर रही थी। फिल्म खत्म होने तक हम दोनों एकदम पटे हुए थे।.

उसके कानों में आवाज़ डाली, तुम्हारी हथेलियाँ कितनी नरम हैं।.

हल्के से मुस्कुराते हुए उनकी नज़र मेरे ऊपर पड़ी। फिर उन्होंने हथेली को धीमे से दबा लिया। शायद कुछ कहने का तरीका था वो।.

मेरा दूसरा हाथ भी उनके ऊपर आ गया। ऐसे ही हथेली के रगड़ से सुख मिलता गया, पलटकर देता रहा। मैंने कोहनी से उनकी चूची पर दबाव डाला, तो भाभी ने अपने आपको एक ओर झुका लिया। पता चल गया - तवा अभी तपा नहीं है। .

मैं चुपचाप उनके हाथ को महसूस करता रहा। फिर किसी पल मैंने दोबारा हिम्मत जुटाई, भाभी का हाथ अपनी जांघ पर ले आया। वो मेरी ओर झांकी, हल्के से हंसी, लंड को छूकर घबरा कर हाथ खींच लिया। मेरा दिल धड़क उठा।.

थोड़ी देर में फिल्म खत्म हुई, बाहर आए तो दोनों के चेहरे पर ओढ़नियाँ थीं। जल्दबाजी में बाहर निकलते हुए मैं हैरान रह गया - पता ही नहीं चला कि कौन सी भाभी मेरे पास बैठी थी। मैं उन्हें घूरता रहा, मन में उदासी छा गई, वो चुपचाप खड़ी रहीं, कोई हलचल नहीं।.

उसके साथ वो भी चली गईं, मैं तब घर की ओर लौट पड़ा। थोड़ी देर बाद, जैसे ही पहुंचा, फोन की घंटी बज उठी।.

एक अजनबी के नंबर से फोन आया था, मैंने देख लिया। किसकी तरफ से है यह, मैंने पूछ डाला।?

एक आवाज़ वहाँ से आई। पता चल गया, ये तो भाभी हैं।.

उनके मुँह से पहली बात थी उनका नाम।.

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उसने कहा - जैसा नाम, वैसी तस्वीर।.

बस इतना कहकर चली गई - ये मेरा व्हाट्सएप नंबर है। कोई जवाब नहीं दिया, सिर्फ आगे बढ़ गई। अभी संभाल लो, बात करेंगे कुछ देर बाद।.

बस इतना कहकर वो बहन ने फ़ोन रख लिया।.

उस नंबर को मैंने सहेज लिया, फिर व्हाट्सएप पर झांका। भाभी की तस्वीर देखने के लिए मन बेचैन था, मगर डीपी में कुछ ऐसा लिखा था जो धर्म से जुड़ा लगता था, और अरबी-फारसी में था।.

उन्हें संदेश भेजते हुए मैंने सिर्फ़ हाय टाइप किया।.

उस रात भाभी ने मेरा मैसेज देखा, तो जवाब आ गया। इधर-उधर की बातें शुरू हो गईं। अब ऐसे ही एक के बाद एक मैसेज चलते रहे।.

एक तसरे के करीब दिन में, सुबह के समय उनकी ओर से फ़ोन आ गया। माहौल ऐसा था मानो खुशियाँ कहीं दूर हो गई हों।.

क्या बात है? मैंने पूछ लिया।?

अगले दिन मिलने पर कहा जाएगा, ऐसा भाभी ने कहा।.

ठीक है, मैं आ रहा हूँ… आप बोलिए, कहाँ पर मिलना है?

सामने दिख जाऊँगी। ठीक समय पर पहुँचने को कहा, तब भाभी ने मिस कॉल करने बोला। जगह का पता उसने मुझे दिया।.

वो पता जहाँ मैं पहुँचा, समय के बिल्कुल ठीक था। सामने एक घर नज़र आया। थोड़ा सोचकर मैं पीछे हट गया, फिर मैंने उन्हें मिस कॉल कर दी। शायद तब वो मेरे फोन के लिए ही बैठी थीं।.

फिर अचानक दरवाजा खोलकर भाभी बाहर आईं। वाह, क्या ढंग से लग रही थीं देखते ही ऐसा लगा। उस पल चेहरे पर कोई घूघट नहीं था। तभी उनका 36-30-40 का आकार साफ झलक रहा था। भाभी के पास भरपूर तन था, जो सब कुछ छा रहा था।.

आँखें जमी रह गई उन पर। हाथ से इशारा करके भाभी ने अंदर बुला लिया, मुझे देख चुकी थी वो।.

एक पल में ही मैंने चारों तरफ नज़र डाली, फिर सीधे उनके घर के खुले दरवाज़े से अंदर घुस आया।.

अंदर कदम रखते ही मैंने सवाल किया - इतना शांत क्यों है, क्या तुम्हारे साथ कोई नहीं रहता?

शाम के समय भाभी ने कहा - उनके पति घर से बाहर हैं।.

बैठते-बैठे मैंने सोफे पर उनकी उदासी क्यों है, यह जानना चाहा।.

भाभी ने कहना शुरू किया - मेरे पति काम के चक्कर में ज्यादातर घर से बाहर रहते हैं। वक्त देने के लिए उनके पास खालीपन नहीं होता। फिर भी, अकेलापन मुझे धकेलता है आगे-आगे। इसी बात के चलते मन उदास हो जाता है।.

एकदम सुनते ही भाभी की आँखों से आंसू छलक पड़े। मैं खड़ा हुआ, धीरे से उनके गालों से नमी मिटा दी। जब मैंने उनके आंसू पोंछे, तभी कुछ फासला कम हो गया। ऐसे में उन्होंने बिना कुछ कहे मेरे छाती पर सिर टिका दिया। मैंने घटिया ख्याल से ऊपर उठकर उन्हें जकड़ लिया। अब वक्त था जब मैं उनकी पीठ पर हथेली चला रहा था। .

हल्के हाथों से उनकी पीठ पर हथेली फिराता गया। वो बस आवाज़ देती रहीं, एक नई सांस के साथ झटका देकर।.

चुप्पी छा गई थी, तभी उन्होंने मेरे होठों को अपने होठों से ढ़क लिया। मैंने धीमे से जवाब देना शुरू कर दिया, बस इतना ही हुआ।.

हथेली पर उसकी उंगलियाँ समा गईं। घर के भीतर वो मुझे खींच रही थीं। दिमाग में ख्याल आया - अब बिछौने की ओर जाएँगे। चलते-चलते पैर अपने आप उठने लगे।.

अंदर बेडरूम में घुसते ही हम दोनों बिस्तर पर जा बैठे। उनका सिर मेरे सीने पर आया, फिर मैं पीछे हटकर लेट गया, और वो मेरे साथ लिपट गईं। ठीक तभी उन्होंने मुझे चूमना शुरू कर दिया। मेरी उंगलियाँ उनके मोटे चुचों पर फिर गईं। एक छोटी सी आह उनके होंठों से निकली, फिर वो मेरा हाथ अपने हाथ से चुचे पर दबा दिया। धीरे-धीरे मैं उनके मम्मों को दबाने लगा, तो उनका शरीर गर्म होने लगा।.

बैठ गईं वो, मैंने संभलकर कमीज उतार दी। खुद ही धीरे-धीरे कुरता सरक गया, उन्होंने कुछ मदद की। सामने ब्रा में दिखीं, आँखें ठहर गईं एक पल को। पजामा भी नीचे उतार दिया मैंने, बिना किसी झिझक के। अंडरवियर का कोई अता-पता नहीं था नीचे।.

अचानक भाभी ने मेरे कपड़ों को हटा दिया। पल भर में मैं बिल्कुल खुला खड़ा था। उसी घंटे मैंने उनकी ब्रा से हाथ छुड़ा लिया।.

भाभी ने जैसे ही मेरी ओर नज़र डाली, उनकी आँखें फैल गईं। अचानक बोल पड़ीं - अरे यार, इतना बड़ा? मेरे पति का तो बिलकुल साधारण है। इसके आगे तो कुछ भी नहीं दिखता।.

एक बार उसने मेरा लंड देखा, तब से वही हाल है। ये सात इंच लंबा है, ऊपर से ढाई से तीन के आसपास मोटाई। फिर क्या था, बस बेहाल रहती है अब।.

उसे धक्का देकर वहाँ लिटा दिया। फिर मैंने भाभी के निप्पल पर ध्यान दिया, एक-एक कर चूसने लगा। तभी उनके होठों से ऐसी आवाजें निकलने लगीं, जिनमें इच्छा झलक रही थी।.

भाभी के शरीर पर मेरे होंठों का सफर जारी था। फिर आहिस्ता-आहिस्ता मैं उनकी जांघों के बीच अपना मुँह ले गया।.

अरे वाह, कितनी साफ चूत थी... बिलकुल बालरहित। छुआ तो ऐसा लगा जैसे मक्खन हो। जब मैंने पूछा, पता चला कि भाभी ने अभी-अभी साफ किया था।.

भाभी की चूत पर मेरा मुँह पड़ते ही उनका शरीर सख्त हो गया। फिर कुछ देर मैंने उनकी चूत चाटी। जैसे-जैसे उनसे पानी बहने लगा, वैसे-वैसे वो ढीली पड़ती गईं।.

मैं लगातार उसकी चूत चाटता रहा। कुछ ही पलों में वो फिर से गर्म हो उठी।.

भाभी ने अचानक कहा - जल्दी करो, अंदर कर दो।.

मैंने देर न की। लंड का सिरा उनकी चूत पर रखा, फिर एकदम भोंक दिया। अंदर जाते ही ‘करर…’ की आहट आई। वो रो पड़ीं। अब तक सिर्फ सिरा ही अंदर था।.

उसके बाद मैंने उनकी छाती के निपल्स को चूस लिया, साथ ही कान पर हल्के से चुम्मा दिया। दर्द में कुछ कमी आई, जैसे-जैसे वह सामान्य हो रही थीं, मैंने एक तेज धक्का और दे दिया। इस बार पूरा लिंग अंदर तक चला गया। ऐसा लगा जैसे झटके से उनकी आँखें डढ़क निकलने वाली हैं।.

रुकते हुए मैंने लंड पेलना छोड़ दिया, फिर भाभी को धीरे से छूने लगा। कुछ देर ऐसे ही ठहरकर, आहिस्ता-आहिस्ता अंदर-बाहर करने लगा।.

भाभी को लंड से आनंद महसूस होता रहा, तो धीरे-धीरे उनकी पीठ लचकने लगी। ऐसे में वो खुद भी अपने शरीर को ऊपर उठाकर जवाब देने लगीं।.

अब वो बोल पड़ीं - आह, तेज आवाज में करो।.

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तेज हो गया मेरा रफ्तार, फिर भाभी को झटके देते हुए चोदना शुरू कर दिया। कमरे में अब सिर्फ घसीट और चपके की आवाजें थीं। उन्हें खुशी महसूस हो रही थी, बार-बार कराहते हुए आवाजें छूट रही थीं।.

मैं लगभग दस मिनट तक भाभी को पेलता रहा। उधर, अचानक वो तन गईं और पूरी तरह ढीली पड़ गईं। उनकी चूत से गर्म पानी की धार छूट पड़ी, मानो कोई फव्वारा खुल गया हो। इससे मेरा लंड फिसलन में आकर तेजी से अंदर-बाहर होने लगा। फिर मैंने तेजी से उन्हें चोदना शुरू कर दिया।.

थोड़ी देर के बाद मैंने अपना लंड बाहर निकाल दिया। फिर भाभी से पूछ लिया - चूसोगी?

मानो वो सवाल सुनते ही तैयार खड़ी थीं। उनके होठों ने बिना देर किए मेरे लंड को अपने भीतर खींच लिया। फिर एकदम तेजी से चूसना शुरू कर दिया।.

अब मुझे ऐसा करने में अच्छा लगने लगा। वह मेरा लिंग चूस रही थी, साथ ही अपनी योनि में उंगली डाल चुकी थी। इसे देखकर हम दोनों तुरंत एक-दूसरे के नीचे-ऊपर हो गए।.

थोड़ी देर में मैंने भाभी के साथ फिर से जुड़ना शुरू कर दिया। लगभग दस मिनट पश्चात उनका शरीर हिलने लगा, और तब मेरे अंदर का भी छलकने को आतुर था।.

दूध सूंघते हुए मैंने पूछ लिया - कहाँ जाना है?

दूध के घूँट के बीच भाभी ने कहा, "ओह... मेरे प्यारे, सब कुछ अंदर ही छोड़ देना।".

कुछ ही पलों में, एक झटके के साथ, मैंने अपना सारा जमा-ठिकाना भाभी के अंदर छोड़ दिया।.

उस पल के बाद, हम आपस में भींचते हुए चुपचाप बिस्तर पर जमे रहे।.

अचानक मैंने पूछ दिया, जबकि उन्हें चूम रहा था - ये अहसास कैसा था?

उसकी भाभी मुस्कुराई। कहा, "इतना अच्छा पल मैंने कभी नहीं महसूस किया।" उसकी आवाज़ में खुशी थी। सच कहूँ, तुम बहुत अलग हो।".

थोड़ी देर में हमने वो काम फिर शुरू कर दिया। उसके बाद मैं कपड़े पहनता हुआ बाहर निकल आया। जब मैं बाहर था, तभी भाभी भी तैयार होकर मुझे रुकने को कहती हुई रसोई की ओर चली गईं।.

अब वो चाय बना लिए थे, फिर बाहर आए मेरे साथ। मैंने उनको चुम लिया, धीरे से वहाँ से हट गया।.

जब भी संधि मिल जाती है, फोन पर बहन के साथ बातचीत शुरू हो जाती है।.

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