पड़ोस वालीं आंटी ने चूत चुदवा कर सेक्स करना सिखाया

Jan 17, 2026 - 12:09
Feb 18, 2026 - 19:24
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पड़ोस वालीं आंटी ने चूत चुदवा कर सेक्स करना सिखाया

एक दिन पड़ोस में रहने वाली महिला ने सेक्स के बारे में समझाया। उसने ऐसा करके अनुभव दिलाया। यह कहानी अविनाश सिन्हा ने 30 जून 2025 को लिखी। इसे अब तक 211,584 बार देखा गया है।

एक बार मैं पड़ोस की आंटी के घर गया। वह समय था जब वे नहा रही थीं। मुझे उनकी ओर आकर्षण हो चला था। फिर मैं धीरे से उनके बेडरूम में घुस गया। अंदर छिपकर बैठ गया, बस इतना कि उन्हें देख सकूं।.

अविनाश सिन्हा कहलाता हूँ मैं।

घर परिवार के साथ है, देहरादून में जहाँ मैं बसता हूँ।

पड़ोस में एक आंटी रहती हैं, उनका अंदाज़ कुछ खास है।

उम्र 45 के बाद भी वो तबीयत संभाले हुए हैं।

उनके आकार का हिसाब 36-25-36 था। एक ओर छाती खतरनाक सुंदर थी, वहीं पीछे कमर से नीचे चौड़े टखनों तक घूमते हुए मोटे कूल्हे धमाल मचा रहे थे!

तीन सदस्य ही हैं आंटी के परिवार में।

शहर के बाहर तबादला हुआ है, क्योंकि पति सरकारी नौकरी में हैं।

महीने में कभी-कभार ही वो घर आ पाते हैं, शायद एक या दो बार।

घर में तो सिर्फ़ आंटी हैं, उनके साथ बेटा भी रहता है।

उसकी उम्र करीब-करीब दो दशक है, घर से इधर-उधर रहने का सिलसिला कोचिंग और कॉलेज के चलते चल पड़ा है।

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अब मैं उस कहानी की तरफ बढ़ता हूँ, जहाँ आंटी नग्न होकर पोर्न देख रही थी।

उस दिन सुबह-सुबह घर में धूप की किरणें आईं, फिर पूजा की तैयारी शुरू हो गई।

उस दिन पूजा में आंटी का न आना हुआ तय।

थोड़ा बदशगुन हालत में दिख रहे थे वो।

दूध की तरह सफेद आसमान के नीचे, मैंने अपनी माँ की बात सुनी। उस दिन शाम होने से पहले, एक कटोरा हाथ में लेकर चल पड़ा। रास्ते में पत्ते सरसराए, जब मैं उनके घर की ओर बढ़ा। कदम धीमे थे, पर विचार तेज। गली के कोने पर खड़े एक कुत्ते ने आवाज निकाली। मैं आगे बढ़ा, बिना रुके। छाया लंबी हो चुकी थी, जब दरवाजे पर दस्तक दी।

घर पहुँचा मैं उनका।

खोला पड़ा था घर का गेट, मैंने नजर डाली।

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कुछ पल के लिए मैंने गेट पर धीमे स्वर में नोकझोंक की।

अचानक दरवाज़े के पीछे से आंटी का स्वर सुनाई दिया। उनके मुँह से निकला - “ये कौन है?”

मैंने बताया, “विशाल!”

आंटी ने बोला, “विशाल, प्रसाद लेकर आए हो?”

बोला, "सादर नमस्कार!"

उन्होंने कहा, “किचन में जाकर फ्रिज में रख दो! मैं बाथरूम में हूँ, नहा रही हूँ!”

किचन के अंदर पैर रखते ही प्रसाद वहाँ आ गया।

वापस जाने लगा.

फिर अचानक मेरे दिमाग में कोई उलझन खड़ी हो गई।

एक बार लगा कि ऐसा मौका शायद दोबारा नहीं आए। आंटी को देख पाऊँगा, तो हो गया अच्छा।!

असल में, कई महीनों से मेरी नज़र आंटी पर थी।

मैं हर बार उनकी तरफ़ देखे बिना नहीं रह पाता था।

देखने को मन किया, तो नज़र बाथरूम की ओर गई।.

फिर भी, वो कमरा अंदर से बंद मिला।

कहीं-कहीं तक एक भी छेद नज़र नहीं आया।

फिर मैं कमरे के एक साइड में सरक गया, वो जगह चुनी जहाँ आंटी की नजर न पड़े।

बस तभी मैंने सोचा, अब उनके बाहर आने का वक्त होगा।

थोड़ी देर के बाद, आंटी बाथरूम से बाहर आईं।

पानी से तरबतर हो चुकी थी आंटी की पूरी कलेज।

एक तौलिया सिर्फ पूरे शरीर में लिपटा हुआ था।

उसके बाद क्या हुआ, आंटी बेडरूम में घुस गईं, मेरे छिपे होने की जगह पर।

बिस्तर पर आंटी की ब्रा और पैंटी पड़ी थीं, मगर मेरी नजर सबसे पहले उन पर नहीं गई।

तभी आंटी ने तौलिया उतार लिया।

फिर वो मौजा उतारकर सब कुछ छोड़ चुकी थीं।

अरे भई, वो दृश्य इतना अजीब था कि मुझे अभी भी यकीन नहीं हो रहा।!

उसकी आंटी के स्तन पूरी तरह खुले हुए थे।.

मुझे जो चीज़ें देखने को सालों से इंतज़ार था।

उसके सामने होना आज कुछ अलग लगा।!

लंड मुझमें से ऊपर की ओर उठ आया।

उसके बाद मेरी नज़र आंटी की चूत पर पड़ी।

उसकी आंटी के प्राइवेट पार्ट में एक भी रोम नज़र नहीं आया।

शायद तुरंत पहले ही उसके चेहरे से बाल हटाए गए थे।

हवा में कुछ गड़बड़ सा महसूस होने लगा।

बाहर निकलने का मन कर रहा था, उधर चली जाऊँ तो आंटी को अचानक पकड़ लूँ।

फिर भी, काम आगे बढ़ा मैंने शांत होकर।

तौलिया हटाकर आंटी ने धीमे से ब्रा उठाई। फिर वो उसे पहनने में जुट गईं।

उसके बाद, वह पैंटी डाल चुकी थी।

फिर उसने सीधा बिस्तर की ओर कदम बढ़ाया।

दोस्तो, ऐसा लग रहा था जैसे सिर के अंदर कुछ उबल रहा हो - आंटी को ब्रा और पैंटी में देखकर।!

लंबा सा घटनाक्रम था, मेरे होश उड़ चुके थे।

इतना कुछ मैंने पहली बार आज देखा।!

अचानक आंटी अलमारी में से एक डिल्डो लाई, फिर वह सीधे पैंटी के ऊपर चूत पर घिसने लगी।

थोड़ी देर में, उनके हाथ धीमे से अपनी छातियों पर आए।

कुछ पल बाद आंटी के मुँह से ऐसी ध्वनियाँ निकलने लगीं, जैसे कोई रेडियो गड़बड़ा रहा हो।

इतना कुछ देखकर मेरा दिमाग सुन्न पड़ गया था।

मन में उठा, कहीं दूर चले जाऊँ। फिर वही हुआ - आंटी को पकड़कर सब कुछ भूल गया।!

उसी पल में कुछ गड़बड़ हो गया।

फोन की घंटी अचानक छेड़ने लगी।

फोन की घंटी बजते ही आंटी ने सुन लिया।

उन्होंने कहा, “कौन है? कौन है? सामने आओ!”

बाहर जाना ही पड़ा, कोई चारा नहीं था।

उस पल आंटी की नज़र मेरे ऊपर पड़ते ही सब कुछ ठहर सा गया।

उन्होंने कहा, “अविनाश! तुम! तुम मुझे इस तरह चुपके देख रहे थे?”

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आखिरकार उसकी नज़र गई मेरे पैंट की तरफ।

उसने मेरी पैंट पर उठे तंबू को देखा, फिर सब कुछ समझ गई।

मैंने कहा, “सॉरी आंटी! आप किसी से कहना नहीं, प्लीज़!”

उन्होंने कहा, “ठीक है, लेकिन एक शर्त पर!”

मैंने पूछा, “क्या?”

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उन्होंने कहा, “तुम्हें अपना लंड मुझे दिखाना पड़ेगा!”

मैंने तुरंत जवाब दिया, "बस ऐसा ही होगा।"

उसने मेरा हाथ पकड़ा, फिर बिस्तर की ओर खींचा।

उसने मेरी पैंट उतारी, फिर मेरा लंड बाहर आया।

उसकी मुट्ठी में सात इंच का डंडा था।

ख़ुशी का एहसास हो रहा था में।

लंड देखकर वे बहुत खुश हो गईं और बोलीं, “वाह! तुम्हारा लंड तो तुम्हारे अंकल से भी बहुत बड़ा है! इसे लेने में तो मज़ा आएगा!”

उसके हाथ मेरे लंड पर पहुँचे।

उसके ब्रा के ऊपर मेरा हाथ पड़ गया, धीरे-धीरे दबाव बढ़ने लगा।

उसके बूब्स कितने मुलायम थे, मैं इसे समझ ही नहीं पाया।!

उसके बाद आंटी ने पूछा - क्या तुम्हें दूध पीने का मन है?

मैंने कह दिया - “ऐसा क्यों न हो?”

उसकी ब्रा का हुक मेरे हाथ ने तोड़ दिया।

उसकी गहरी लालिमा वाली निपल्स खूबसूरत दिख रही थीं।

हवा के बीच में हल्का सा कंपन छा गया।

उनके स्तन इतने फैले हुए थे कि मेरी मुट्ठी से बाहर निकल जाते।

एक चाची मेरे लिंग को हाथ से छू रही थीं, उनका शरीर बिना कपड़ों के था।

उन्होंने मेरे लिंग पर होंठ फेरना शुरू कर दिया।

पहली बार कुछ ऐसा हुआ था कि मैं सिर्फ पाँच मिनट में खत्म हो चुका था।

अचानक आंटी बोली, “क्या तुम मुझसे सेक्स करोगे?”

मैंने कहा, “बिल्कुल! लेकिन मुझे आता नहीं!”

आंटी ने कहा, “कोई बात नहीं! मैं सब सिखा दूँगी!”

उसकी पैंटी मेरे हाथ से निकल गई।

उसकी नाज़ुक चूत को देख मेरा दिमाग सन्न हो गया।

सफेद-सफेद चूत, बाल रहित। ऐसी फूली हुई, मानो सजे हुए बनारसी कपड़े की तरह।!

आज के दिन, वो बात जो पहले सपनों में ही रहती थी, मेरे सामने मौजूद थी।

अचानक सब कुछ बदल गया।!

मैं धीरे से उनके चेहरे के पास पहुँचा, फिर अपने लंड को उनके होंठों तक ले गया। एक सेकंड बाद मैंने उसे उनके मुँह पर घसीटना शुरू कर दिया।

फिर वो धीरे से होठ अलग करते हुए चाटने लगा।

मेरे पास कुछ भी नहीं था, फिर भी सब कुछ लग रहा था।!

उस नग्न चाची ने हाथ फैला दिए, मेरी ओर बढ़ने को कहते हुए।

ऊपर से झुककर मैंने उसके होंठ छू लिए।

फिर आंटी ने मेरे लंड को हाथ में उठा लिया, धीमे से अपनी चूत पर घिसने लगीं।

वह उसकी चूत के ऊपर दब गया।

एक तेज़ धक्के के साथ मैंने धकेल दिया।

लंड का आधा हिस्सा चूत में समाया हुआ था।

उसकी चूत पूरी तरह से कसी हुई थी।

उसके मुँह से एक आह निकल पड़ी।

फिर वो मेरे होठों पर चुम्मे बरसाने लगीं, मानो सनकी हों।

इस बार मैंने एक साथ सारा लंड भीतर डाल दिया।

अब उन्होंने मुझे कसकर पकड़ लिया था।

दरवाज़े पर हथेली टिकी थी, मैं आगे बढ़ने को मजबूर हुआ।

वे बोल रही थीं, “उउउह! आआह! उम्म्म! अविनाश, धीरे-धीरे करो प्लीज़! आराम से करो!”

हवा में पत्तियाँ झूल रही थीं, धीरे-धीरे टूटकर ज़मीन पर आ गईं।

लोग मुझे धक्का दे रहे थे।

थोड़ी देर के बाद, जब मैं जा रहा था, तभी बोला - “अब मुझे निकलना पड़ेगा। लंड खींचकर बाहर कर रहा हूँ।”

मेरा हाथ उनकी मुट्ठी में जकड़ते हुए बोले, "इधर से ही खत्म कर।"

गर्म पानी का बहाव सीधा उसके भीतर तक पहुँच गया।

थोड़ी देर के लिए हम बस वहीं पड़े रहे।

कुछ समय के बाद वह टब में पहुंची, पानी के छींटे उड़ाए।

पीछे-पीछे मैं चल पड़ा।

मैंने देखा, वो मेरे लंड को धो रहे थे।

इसके बाद नहाते हुए वो मेरे पास आया। फिर धीरे-धीरे उसने मुझे चखना शुरू कर दिया।

फिर हम सोफ़े की तरफ बढ़े, आखिरकार स्क्रीन में जिंदगी फैल गई।

इस वक्त हमारे कपड़े पहने हुए थे।

उसके बाद सड़क पर कदम बढ़ाने लगा मैं।

फिर आंटी ने कहा - चाय का घूँट भरते हुए आगे बढ़ना।

चाय बनाने के लिए उसका पैर किचन की ओर बढ़ा।

पीछे-पीछे चल पड़ा था मैं। गर्दन पर होठ फेरते हुए खींच लिया उन्हें पास। छाती को धीरे से नचोड़ा, जैसे कोई गुलाब की पंखुड़ी टटोल रहा हो।

फिर से उनका मन बहलाने लगा था।

खड़े-खड़े ही उसकी मैक्सी ऊपर की ओर ठेलकर मैंने उसकी पीठ पर हाथ रखा। फिर धीरे से झुकाया गया, जब तक वो मुझसे टकराने लगी। अगले पल उसके भीतर प्रवेश हो गया, बिना कोई आवाज़ किए।

तभी मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

आगे-पीछे करते हुए उसके कूल्हों ने लय बाँध ली।

उसकी पीठ अचानक दीवार से टकरा गई। मैंने क़रीब होकर उसे चुम्मा दे दिया।

मैंने आगे की तरफ से अपना लंड उनकी चूत में घुसा दिया।

हम दोनों सीधे खड़े होकर तभी से जुड़े थे।

उसके स्तनों को दबाना जारी था मैं।

थोड़ी देर के बाद मैं एक बार फिर उसकी चूत में आ गिरा।

आंटी ने मुझे किस किया और बोलीं, “अविनाश, आज तुमने मेरे सारेचुदाई के सपनेपूरे कर दिए!”

उसके बाद मैंने भी हाथ फैलाए और वो क्षण में सब कुछ भुला दिया।

हर बार जब मौका मिलता है, तो सेक्स शुरू हो जाता है।!

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