सास बहू की रंगरेलियां
हैलो सबको। मयूरा बोल रही हूँ, उम्र तीड़वन के पास है। शादीशुदा जिंदगी चल रही है, घर मुंबई में है।.
मेरी सास और मैं - इस बात पर कई रातें बीत गई। वो शुरूआत धीमी थी, फिर भी अजीब तरह से घनघोर। उनका हाथ मेरी कमर पर आया, ऐसे नहीं, बल्कि बिना कुछ कहे। मैं डर गई, पर रुकी नहीं। उनकी साँसें गर्म थीं, मेरे कान के पास। एक दिन के बाद दूसरा दिन आया। कभी चाय ठंडी हो गई, कभी खाना जल गया। इशारों में बातें होने लगीं। वो रातें छुपी-छिपी नहीं, बस बिना नाम की थीं।.
माफ़ी माँगना ज़रूरी है, इस हिस्से को इतनी देर से लिखने पर।.
एक शाम फिर वो मुड़ी। पलंग पर टूटे सपने धूप में सूखते हुए दिखे। अचानक हवा चली, परदे हिले, आवाज़ें उठीं। कहीं बहू ने चश्मा उतारा, कहीं सास ने डोरी संभाली। दोनों ने एक-दूसरे को तब समझा जब घड़ी ने गुजरते पल को रोक दिया।
तुमने जिस खुली मस्ती को पढ़ा था, वह हम दोनों के बीच हुआ था।.
एक बार मैंने अपनी सास को वो लाइव दिखा दिया, जब मेरा पति उसके साथ सेक्स में था।.
इस कहानी का अगला हिस्सा यहीं से शुरू होता है।.
वो दिन तनाव में ढल गया।.
उसकी मुस्कान देखकर पता चल गया था। फिर वो चुपचाप ज़्यादा करीब आ गया। अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ था।.
मन में क्या चल रहा है मांजी के, इसे जानने को बेचैन थी मैं।.
सोचते-सोचते इतना पक्का हो गया कि सीधे कहने पर मांजी नाराज हो जाएंगी।.
फिर मैंने ठान लिया - कोई फर्क नहीं पड़ता कि क्या होगा, ऐसा कुछ करूँगा कि मांजी को अपने बेटे का लंड चखने की इच्छा पैदा हो जाए।.
मांजी के मन में सेक्स को लेकर जो ख्वाहिश है, उसे और गहरा करना पड़ेगा।.
तब मैंने तय कर लिया कि मांजी के साथ जितना हो सके उतना लेस्बियन सेक्स करूंगी।.
मांजी के साथ मेरा रिश्ता उस दिन के बाद अचानक गहरा हो उठा।.
हर बार मौका पड़ने पर, हम आपस में कहीं गुम हो जाते।.
उस पल के आगे सब कुछ धुंधला-सा लगने लगा। मैंने कभी ऐसी हल्कापन अपने भीतर नहीं महसूस किया था।.
मुझे अब अपनी सेक्स ज़रूरतों की बात मांजी से करने में कोई हिचक नहीं लगती थी। वो भी खुलकर अपनी इच्छाओं का ज़िक्र करती, कभी पीछे नहीं हटती थी।.
हर बार मन किया, सीधे मांजी के पास। जब शरीर लड़खड़ाया, तो बस इशारा कर दियa।.
मेरी सास से पहले, किसी ने मेरी चुत नहीं चूसी थी।.
उसकी सास को उसकी जांघों के बीच मुँह छिपाना काफी पसंद था।.
एक वक्त था जब मेरी गुदा हमेशा साफ रहती।.
मैं हर बात को लेकर तैयार थी, सिर्फ इसलिए कि वे खुश रहें। कभी-कभी मैं उनकी चुत भी चूस लेती थी।.
उसकी जांघों के बीच जाने पर मन खिंचता था।.
कभी सोचा था, मेरी मर्जी से कोई मेरी चुत चूसे। रुकने का संकेत देने पर भी वो बस ऐसे ही जारी रखे।.
उस दिन, मेरी बात सुनकर सास ने कुछ ऐसा किया।.
इस समय मैं उसी घटना को पेपर पर उतार रही हूँ।.
सुबह का वक्त था। लंच बनाने की शुरुआत में ही मांजी आईं। उन्होंने अचानक गैस बंद कर दी।.
जैसे ही मैंने बोलना शुरू किया, वो पलटकर सीधा मेरे होठों पर होंठ लगाने लगी।.
अचानक मांजी ने जब मुझे चूम लिया, तो मैं पूरी तरह हैरान रह गई।.
पहले कुछ नहीं था। मांजी, तुम्हें क्या हो गया? मैंने पूछ लिया।?
पैर उठा कर रसोई में खड़े रहने पर माँ को लगा, थोड़ा सा स्वाद चख लेने का।.
ठहरो पल भर, मांजी, रसोई का सब कुछ समाप्त होने देते हैं।.
काम चलता रहेगा, बेटा। पर मेरा सुकून उड़ा देने की ज़रूरत नहीं है।.
घुटनों पर बैठते ही मांजी का चेहरा मेरी चुत के ठीक सामने था।.
धीमें से साड़ी का पल्लू ऊपर हुआ, फिर वह अंदर समा गई।.
उसकी उंगलियाँ मेरी जांघों के बीच सरकने लगीं।.
उस दिन मैं सोच भी नहीं रहा था कि कुछ होगा। फिर अचानक एक उंगली पहली बार खिसकी। शरीर तन गया, मन नहीं चाह रहा था। वो छूना ऐसे आया जैसे किसी ने सब कुछ तय कर लिया हो। मैं ठहर गया, बस।.
थोड़ा सा झुककर माँ ने अपनी जीभ से चुत के ऊपरी हिस्से को छू लिया।.
उसकी उस हरकत ने मेरे अंदर कंपकंपी छोड़ दी, मैं बिना रुके कराहने लगी।.
मांजी ने सांस तेज की। उसके होठों ने धीमे दबाव से काम किया। एक झटके में गर्मी फैल गई। शरीर ने थरथराहट में जवाब दिया। हवा में तनाव रह गया। पल भर में फिर चुप्पी छा गई।.
मांजी ने मेरी चुत पर जीभ से ऊपर से नीचे तक घिसटना शुरू कर दिया। साड़ी के किनारे में फंसकर उन्हें झंझट हो रहा था।.
मैंने अपने हाथों से साड़ी उतार ली, फिर पेटीकोट का धागा ढीला कर दिया।.
मेरी त्वचा पर कुछ नहीं था, सांसें भारी हो चली थीं।.
वो बोला - मांजी, धीरे नहीं, तेज करो… आह हाँ, वैसे ही जारी रखो… स्सस्स स्स स्स।.
पैर हिलने लगे, जब मैंने इतना तेज़ चूसा।.
पैर जवाब नहीं दे रहे थे। फिर भी, मैंने चुपचाप धीमे से अपने शरीर को झुकाया, मांजी के आसपास की चुप्पी छेड़े बिना।.
थोड़ी देर में मांजी पीछे हटीं। मैंने झट से जमीन पर बैठ लिया।.
पैरों के पीछे हाथ डालकर मैंने सिर तक उन्हें खींच लिया। ऐसे बैठने पर घुटने ऊपर उठ गए, तब मांजी की नजर सीधे मेरी चुत पर पड़ी।.
फिर मांजी ने सिर को धीरे-धीरे मेरी जांघों के बीच चलाया।.
मैं - आह हाँ मांजी… गहरे तक जीभ सरका दो मांजी… ऐसा लग रहा है कि खुशी छलक पड़ेगी।.
सिर पर, मैंने धीरे से हाथ रख लिया।.
उस दिन मांजी को देखकर दिल भर आया।.
मुझे उम्मीद थी कि मांजी मेरा चुत ज़ोर से चूस लेंगे।.
मैंने आहिस्ता से मांजी के सिर को अपनी गर्म चुत पर जमाया।.
चुत फैली, मांजी की जीभ भीतर तक पहुँच गई। उन्होंने तेजी से हिलाना शुरू कर दिया, एकदम अंदर-बाहर।.
ठंड से मेरी हड्डियाँ तक काँप उठी थीं। धीरे-धीरे जैसे खुद पत्थर बनती जा रही थी।.
मेरे हाथ ने मांजी के सिर को कसकर पकड़ लिया। वह मेरी चुत पर दब गया। मैं तेजी से काँपने लगी।.
पानी धीरे-धीरे बहने लगा चुत से, मांजी के होंठों तक पहुँच गया सब।.
पानी सबके हिस्से का वो भी पी गया, मुझे ख़ुशी हुई।.
पानी को खत्म कर देने के बाद मांजी के होंठ तरबतर थे।.
पैर हटा लिए मैंने, फिर मांजी पर इतना प्यार बरसाया।.
मैंने उसके होंठों से छलकता पानी जीभ से लपलपा लिया।.
मैंने आगे बढ़कर उसके होंठों पर अपना मुँह रख दिया। धीरे से जीभ उसके मुँह के भीतर घुस गई।.
मांजी के हाथ ने फिर मेरे होंठों पर दबाव बना दिया। दो उंगलियां सावधानी से अंदर चली गईं। जीभ तक पहुंचते-पहुंचते शरीर ढीला पड़ गया।.
मुँह में उंगलियां डालकर चूसने लगी, जैसे कोई पुरानी आदत दोबारा जाग उठी हो।.
एक बार फिर मांजी के हाथ में हाथ डाल लिया, फिर धीरे से उसके होंठों पर होंठ रख दिए।.
बस इतना हुआ कि मांजी मेरी बाँहों में आ गई। मैं उन पर ऐसे चढ़ गई, मानो कभी छोड़ने वाली नहीं।.
उसकी उंगलियाँ धीरे से मेरे भीतर घूमने लगीं, वहीं की वहीं।.
तब भी मैंने मांजी को रोकना नहीं समझा, आगे की ओर ध्यान बनाए रखा।.
अब मांजी ने पहले से एक उंगली ज्यादा धकेल दी।.
खड़ी हो गई मैं, मांजी के होंठों को वापस अपनी जांघ पर महसूस किया।.
थकावट से भरा हुआ था मन, मांजी के चलते।.
उसकी जीभ मेरे चुत के छोटे हिस्से पर घूम रही थी। वहीं नीचे, उसकी उंगलियाँ धीरे-धीरे गहराई में जा रही थीं।.
इसलिए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही थी।.
पीछे हटते हुए मैंने पैर खींच लिए, इससे मांजी को चुत में उंगलियां धकेलने का मौका मिला।.
हाँ मांजी, तुम्हारे कहने पर अब मैं खुद को छोड़ता हूँ। उंगलियों में आग भर दो, जैसे बचपन में डालती थीं। फक मी… घटा नहीं रहा कुछ। स्सा… स्साह… स्सास्स… धुआं निकल रहा है शरीर से।.
हाथ आगे बढ़ते ही उसने मेरे चुचे को पकड़ लिया। दोनों उंगलियों ने निप्पल पर रगड़ शुरू कर दी।.
हवा में पैर उठाए, मैंने स्तनों पर हाथ रख लिया। धीरे-धीरे दबाव बढ़ाया, जैसे कोई गुप्त लय ढूंढ रही हो।.
फिर मैं बिखरने लगी। कमर ऊपर थी पूरी, हालाँकि माँजी अचानक चुत चूसना बंद कर देती बीच में।.
इसी बात ने मुझे काफी परेशान कर दिया।.
बीच-बचाव में, मांजी कभी-कभी चुत पर जोर से हाथ भी मार देती थी।.
आह, मैं तुमसे कह रही हूँ… बीच में न छोड़ना अब। धमाके से ठोको इस बेहयाओ चुत को… तुम्हारे ख्याल भीग जाएंगे। हर घड़ी तर रहती है ये। आज से ये तुम्हारे हाथ में… और तुम्हारे बेटे के। पूरी की पूरी निगल जाना। आखिरी बूंद तक निचोड़ डालना।.
मैंने मांजी के हाथ को धकेल दिया। फिर मैंने खुद अपनी चुत पर जितनी तेज़ी से हो सका, वैसे ही चमाट मारना शुरू कर दिया।.
मैं - बस मांजी, मेरी चुत में कुछ डाल दो… ये बहनचोद बहुत खिंच रही है… उफ़, प्लीज कुछ भी अंदर ठूस दो!
मांजी ने मुँह तेजी से खोला, उसकी जीभ भीतर की ओर बढ़ गई।.
उसकी जीभ मेरे योनि पर रेंग गई।.
उसके सिर को पकड़ते ही मेरी कमर धीरे-धीरे हिल उठी।.
मांजी ने जहाँ तक हो सका, अपनी जीभ बाहर रख दी। मैंने फिर अपनी चुत को धीरे-धीरे उस पर घिसना शुरू कर दिया।.
मैं तब लगातार गहरी आहें छोड़ रही थी।.
ओह हाँ, बस मुझे छू लो… वो तरीका… सिर्फ तुम्हारी जीभ का। मत रुको मांजी… आगे बढ़ो… धीरे नहीं। बस ऐसे ही… ओह… और… बस ऐसे ही चलते रहो। .
अब तो कुछ नया सा लगने लगा।.
कभी-कभी मेरी कमर हल्के से ऊपर उठ जाती।.
लहरों की तरह मेरी मांसपेशियाँ ट्विस्ट हो रही थीं।.
काफी तेज़ी से मांजी ने यह सब किया।.
मैं - हाँ हाँ कर दो बस मुझे… उफ़ उफ़।.
तभी मांजी ने झट से तीन उँगलियाँ अंदर डाल दिया। फिर वह जोर-जोर से हिलाने लगीं।.
हवा ने सांसों के बीच खींच लिया।.
उसकी माँ के हाथ तेजी से आगे-पीछे जा रहे थे, वहीं नीचे मेरी चूत पर दबाव डाल रही थी।.
अरे बाप रे... हे भगवान।.
थर-थर काँपने लगा था मेरा पूरा शरीर। ऐसे हिल रही थी मैं, मानो ज़ोर का झटका देता कोई भूचाल।.
मेरी चुत में से तरल बाहर आने लगा।.
एक लंबे वक्त तक मेरी गांड से नमी का स्राव होता रहा।.
पानी की तरह बहता हुआ महसूस हो रहा था।.
रसोई भर में उसकी सुगंध घुल गई।.
मांजी के मुँह पर पानी आ गया, जो चुत से बहकर निकला था।.
ऊपर उठी मांजी, धीरे-धीरे बहता हुआ लार का पानी उनके होंठों से निकलकर पूरे शरीर पर फैल गया।.
लाल हो चुका था मांजी का पूरा मुँह, मेरी चुत को घिसते-घिसते।.
पलक झपकते ही मैंने मांजी के पैरों पर प्यार जता दिया। फिर आगे बढ़कर उनकी चुत पर धीरे से चुम्मी कर दी, एक के बाद एक।.
उसकी जांघों के बीच मेरा स्वाद एक मोती-सा चमक रहा था।.
उसे चूसते हुए मैं सीधी खड़ी हो गई। मांजी के होठों पर प्यार बरसाना शुरू कर दिया।.
मेरा मुँह उनकी जीभ पर चिपका हुआ था, धीरे-धीरे होंठों को खींचते हुए।.
इस लिपकिस में सास-बहू की जोड़ी ने ऐसा कमाल दिखाया।.
एकदम अचानक, मुझे आज कुछ पलों के लिए सास-बहू की बातचीत ऐसी लगी, जैसे कहीं स्वर्ग में हो।.
मुझे एक सास मिली जो हर किसी से अलग थी।.
आंखों से नमी छलक पड़ी, मानो दिल की बाढ़ चेहरे पर उतर आई हो।.
दस मिनट तक उन्हें छाती से लगाकर रखा।.
ऊपर वाले को धन्यवाद, मुझे तुम जैसी सासू माँ मिली। लव यू मांजी… तुम्हारे बाद ही दुनिया की सभी चीजें आती हैं।.
वो दिन याद है, मांजी को संभालते हुए मैं घर के मंदिर के पास खड़ी थी।.
पैरों को धीरे से छुआ, जब मांजी वहीं खड़ी थी। फिर झुककर चूमा, प्यार आ गया सामने। माथा टेकते हुए सब कुछ शांत हो गया।.
हज़ारों बार धन्यवाद है तुझे, प्रभु, कि तूने मुझे इस माँ की गोद में समा दिया।.
मैं हॉल में आई, मांजी के साथ। सोफे पर उन्हें बैठा दिया गया।.
उसे इतना थकान महसूस हो रहा था कि पैरों में जवाब नहीं था।.
मांजी के माथे पर मेरा होंठ छू गया। मैंने कहा, बस इतना समय ले लीजिए, यहीं टिक जाइए। थकावट उतर जाएगी। किचन की सफाई मेरे हवाले छोड़िए। उधर नहाने का पानी भी गर्म कर रखूंगी - आपके लिए और मेरे लिए दोनों के लिए। आज तो दोनों एक साथ धुलेंगी, ऐसा होगा शाम का नजारा।.
मांजी- ओके बेटा!
सोफे के पीछे हाथ रखकर मांजी ने पैर अलग किए।.
अब मैं रसोई में आई, सभी गंदे बर्तन सिंक में डाले। फिर उस कपड़े से जमीन पर बिखरा कचरा साफ करने लगी।.
मैं बिल्कुल नंगी थी, ऐसे में सब कुछ हो रहा था। काम करते-करते मेरे स्तन हिल रहे थे। जब मैंने उन्हें देखा, तभी एक ठंढी हवा सी छू गई।.
अचानक मेरे बदन में ठिठुरन सी आ गई। फिर मेरे छाती के छोर भी जम गए।.
खुद से कहते हुए मैंने उन दोनों चूचों पर ज़ोरदार थप्पड़ मारे।.
मुझे ऐसा लग रहा - किस्मत वाली है तू मयूरा… पर धीरे-धीरे घटिया बनती जा रही है। कभी भी झाँको, सिर्फ तेरे ख़्वाबों में जिन्स का भूचाल छाया रहता है।.
पीछे सिर पर थपकी मारते हुए मैं हंसने लगी।.
सच में ऐसा हुआ था, ये कहानी सास और बहू के बीच पल भर के संबंधों की।.
सच कहूं तो, आपके इस सुनने पर मन खुश हो गया।.
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