दो लंड से गांड का कुंआ बनवा लिया

Jan 13, 2026 - 11:42
Jan 13, 2026 - 19:35
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दो लंड से गांड का कुंआ बनवा लिया

मेरी एकमात्र गांड में कोई लंड घुसा। दोनों टॉप्स ने इतना मारा कि छेद फैल गया। हालांकि सब कुछ हुआ, मज़ा तो आया।.
हेल्लो यार, काफी दिनों बाद फिर से बात कर रहा हूँ मैं, अजीत।.
तुमने मेरी पिछली कहानी पढ़ी थी, जहाँ दो अजनबियों ने मेरी गांड फाड़ दी।
पढ़ी.
एक बार फिर से पढ़ने पर सब कुछ याद आ जाएगा।.
कई बार मैंने तुम्हारी ओर से प्रतिक्रिया पाई।.
मैंने समझा, तुम्हें मेरी कहानियाँ अच्छी लग रही हैं।.
फिर भी, उस सेक्स कहानी के बाद मौका ही नहीं मिला। काम इतना बढ़ गया कि समय निकालना मुश्किल हो गया। एक ओर ईमेल आईडी में खराबी शुरू हो चुकी थी। बस, अगला हिस्सा टालता चला गया।.
एक समय के बीचोबीच, कुछ पांच महीने बाद ईमेल देखने को मिला। व्यस्तता ने जगह घेर ली थी। ऐसे में आपके संदेशों पर ध्यान नहीं गया। माफ़ी चाहूंगा इस बात के लिए।.
अब सुनिए, मैं आपको बताता हूँ कि उस रात घटने के बाद क्या हुआ।.
तभी सबके पैर लड़खड़ाने लगे थे।.
थोड़ी देर बाद, शराब के नशे में मैं वहीं गिर पड़ा था। एक जर्जर गद्दे पर लुढ़कता हुआ, आधा बेहोश सा लग रहा था मुझे।.
थोड़े देर के लिए, शायद पच्चीस-तीस मिनट, आँख बंद हुई रही।.
थोड़ी देर बाद मेरे नंगे पैर के बीच से एक हलचल गुजरी।.
जब मैंने आँखें खोलीं, तो देखा कि रमेश मेरे छेद पर जीभ घुमा रहा है। कभी-कभी वह अपनी उंगली भी अंदर डाल देता।.
मुझे काफी सुख मिल रहा था, क्योंकि वह मेरे अनावृत शरीर पर अपनी जीभ घुमा रहा था।.
गर्म जीभ का नरम स्पर्श पूरे शरीर में बिखर रहा था। फटी चमड़ी पर एक सुकून सा छा गया। वो छुआई ऐसी लगी, मानो धूप में सूखते कपड़े की तरह कोमलता हवा में झूल रही हो।.
गांड चटवाने का सिलसिला जारी रखता हुआ मज़े करता रहा।.
उस रोज अखिलेश ने मुझे इतना ज़ोर से चूसा कि बाद में पीठ के नीचे वाला छेद ढीला हो गया।.
अब मुझे वहाँ दर्द नहीं, बल्कि खजखजाहट सी महसूस होने लगी।.
तब मुँह सूखा, जैसे किसी ने पानी की याद दिला दी।.
उसी पल रमेश ने मेरी गांड चूसना छोड़ दिया। फिर वह अपना लंड मेरे होंठों के पास ले आया।.
उसकी नज़रें मेरे प्रति उस तरफ खिंची जा रही थीं।.
पानी की ज़रूरत है, मैंने रमेश से बोला। गला सूख चुका था, इसलिए प्यास लग रही थी। कहीं से पानी ले आने को कहा।!
मैंने पानी की बोतल की ओर झांका, हालांकि उसमें कुछ नहीं था।.
बात को रमेश ने समझ लिया, फिर धीरे से दरवाज़े की ओर बढ़ गया।.
बाहर कदम रखते ही उसकी नज़र चारों तरफ भागी। सन्नाटा था, मगर कहीं आवाज़ नहीं।.
रात के इस समय कौन सी दुकान खुली होगी।.
वो लौटकर बोला - अब पानी मिलने की संभावना कम है।.
इसे कहकर उसका हाथ लंबे पैरों पर फिसल गया।.
अब उसकी मोटी लंबाई सख्त हो गई थी।.
अब तो मुझे भी धीरे-धीरे कुछ एहसास होने लगा था, फिर भी प्यास ने ऐसा सताया कि गला सूखने लगा।.
उसकी ओर मुड़कर मैंने सवाल किया - अब पेशाब आ रही है तुझे?
उसने आँखों के इशारे पर जवाब दिया - अभी कुछ नहीं हो रहा, फिर भी मूतने की कोशिश कर सकता हूँ।.
उसने कहा, इतना ही। मैंने मुँह खोला। वो सामने आया। धक्का दिया। लंबा पल था।.
थोड़ी देर बाद उसके लौड़े से मूत्र की एक-दो बूंदें टपक पड़ीं।.
मेरा गला जरा सूखा हुआ था। उसके मूत का स्वाद नमकीन लगा, फिर भी मैंने उसी में अपना मुँह डाल दिया।.

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फिर मैंने उसके लिंग पर अपना मुँह ले जाना शुरू कर दिया।.
अब तक उसके मुंह में घटिया स्राव कम हो चुका था।.
तभी मुझे लगा कि पलटकर देखूँ। पीछे अखिलेश सोया हुआ था, घोड़े की बिक्री के बाद की नींद में डूबा।.
तभी मन में ख्याल आया, रमेश पर क्या बीत रही है। उसके चेहरे पर अचानक उत्साह छा गया।.
उसने मेरे सिर को झटकते हुए अपनी चीज़ आगे-पीछे करनी शुरू कर दी।.
कभी-कभी मैं सोचता था कि अगर किसी तरह वो ढीला पड़ जाए, तो शायद थोड़ा सा वीर्य ही काम आ जाए।.
फिर भी अब उतरने की जल्दी में वो हुआ ही नहीं।.
लगभग बीस मिनट तक मुँह से खेलने के बाद वह मुझे पलट लाया। मेरे पीछे हो गया, मेरी कमर ऊपर उठा ली।.
शुरू में वो मेरी पिछली ओर जीभ से हर तरफ फिरने लगा। इसके बाद उसने अपनी जोड़ी उंगलियों को धीमे से भीतर घुसा दिया।.
कभी वो एक उँगली से नंगी गांड में खुरचता। कई बार दो उँगलियां अंदर जातीं। इधर-उधर करते हुए किसी पल हाथ पूरा भीतर चला गया। मैंने देर तक कुछ समझा ही नहीं।.
दर्द बढ़ चला था। मेरे पिछवाड़े के टुकड़े-टुकड़े हो गए हों, ऐसा एहसास होने लगा।.
उसने मुझे बताया कि वो अब नहीं चलेगा।.
फिर भी उसने स्वीकार करने से इंकार कर दिया।.
मुझे तो हैरानी हुई, क्योंकि वह बजाय समझदारी से बात करने के अचानक चिल्लाने लगा।.
उसने कहा – आज तू मेरी गुलाम है, समझा कमबख्त… बिना आवाज के यूँही पड़ा रह, जो कुछ मैं करूँगा, उसका आनंद लेना।!
उसने जम कर थूक दिया मेरी गांड पर, कुछ चेहरे पर भी डाला। बाद में वो अपना लंड धीरे से अंदर ले गया।.
उसकी चीखें हवा में गूंजने लगीं, ऐसा लग रहा था जैसे सिर पर शराब का असर छाया हो।.
रुकने की बात सिर्फ उड़ती रही।.
आधे घंटे तक वो मेरे पीछे लगा रहा। कुछ ड्रिप्स सीधे अंदर जमा हुईं।.
फिर से उसने मेरी नंगी गांड को चाटना शुरू कर दिया।.
तब तक वो करीब हो चुका था, मेरे सिर पर हल्का सा हाथ टिकाए।.
एक पैर सिर के ऊपर ठहरा हुआ था। दूसरा पैर जांघों के बीच फँसा आया। ऐसे हुई तिरछी चढ़ाई।.
एक वक्त था जब मेरी कमर बस इतनी हिलती-डुलती कि कहीं टेढ़ी न हो जाए।.
अब तक ऐसी ही जगह पर ठहरे रहने से मेरा शरीर धीरे-धीरे सख्त होने लगा।.
थोड़ी देर के बाद थककर उसने मुझे जमीन पर डाल दिया।.
उसका शरीर मेरे ऊपर आ गया। धीमे स्पर्श के साथ अपना लंड मेरी गांड में घुसा दिया। हल्के-हल्के झटकों से पेलने लगा।.
थोड़ी देर के बाद उसका गर्म, घना स्राव मेरे अंदर छूट गया। फिर वह पूरी तरह थक चुका था।.
मैं जिस स्थिति में पहुँच चुका था, वह किसी भयानक सपने जैसी थी।.
पेट तो सिकुड़ रहा था, उसके बाद गांड में चुभन ने घेर लिया।.
चार बजकर तीस मिनट हो गए थे।.
पैर उठाने में डर लग रहा था।.
अरे भई, इस रमेश ने तो कम जगह में खूब गुदगुदी मचा दी।.
अबे, तभी उठ बैठा अखिलेश - वो मुंहफट जिसकी गाली सुनते ही मन घबरा जाए। मैंने झट से कमर कसी, धप्पड़ खाए बगैर निकलने की कोशिश की। ठीक तब आवाज़ आई - उसकी, सुबह की नींद में भी चीखती हुई।.
अब भी उसकी आँखों पर नींद का साया था।.
क्या कहना है, उस आदमी ने तो सारा डंठल साफ़ कर दिया था।.
अचानक वह मेरी तरफ देखने लगा, मैं कपड़े पहन ही रहा था। फिर बिना देर किए, उसका हाथ मेरी गर्दन पर पहुँच गया। मेरे चेहरे को घुमाकर उसने मेरे मुँह को अपने लंड के पास धकेल दिया।.
लंबाई में कमी दिख रही थी उसके लिंग पर।.
वह मेरे होंठों के बीच से अपना लंड आगे धकेलता गया। फिर एकदम झटके के साथ मैंने मुँह में उसकी गर्म पेशाब महसूस की।.
मूत का स्वाद न तेज़ न घटिया था। पल भर में प्यासे हो गए थे मैं, धीमे से चखकर लगा ठीक है। आगे बढ़कर पीने लगा।.
पानी के कई गिलास पीने के बाद हल्कापन महसूस होने लगा।.
पेशाब करके वो मेरा मुँह अपने जन्हों से दूर ले गया, फिर वहीं नीचे लेट गया।.
बस इतना ही, मैंने कपड़े चढ़ाए फिर सीधे बाहर निकल पड़ा।.
दोनों के पेशाब तथा वीर्य की गंध मेरे शरीर से फैल रही थी। मुँह से भी वही सुगंध छलकती हुई महसूस हो रही थी।.
नम कपड़े सूख रहे थे।.
लगभग पांच-तीस पर दरवाज़ा खोला, फिर नहाकर बिस्तर में लेट गया।.
सौभाग्य से घर में कोई नहीं था। वैसे तो आज परिवार को एहसास हो जाता कि चिराग कहाँ से जलकर लौटा है।.
लेकिन जो भी हुआ, मेरी टाइट पॉपी अच्छे से चली, मज़ा भी पूरा आया।.
एक बार में दो लड़कों के साथ सेक्स करने का सपना भी पूरा हो चुका था।.
उस हादसे के बाद से मैं फिर कुछ और चीज पकड़ने लगा।.
अगली गे सेक्स कहानी में वो जिसके बारे में है, उस पर चर्चा मैं आपके साथ करूँगा।.
अगली बार जब मिलेंगे, तो वो हिस्सा आपको कैसा लगा, मुझे डाक से पता करवा देना।.
धन्यवाद, आपके इस कहानी में रुचि लेने पर। मैं खुद को समझा पाऊँ, जब आपने पढ़ा वो हर शब्द।.

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