गाँव की जंगली चुदाई – खेतों से जंगल और फिर उसके घर में रात भर पेला

Jan 3, 2026 - 12:30
Jan 13, 2026 - 19:41
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गाँव की जंगली चुदाई – खेतों से जंगल और फिर उसके घर में रात भर पेला

हैलो दोस्तों, मेरा नाम राजेश है। उस वक्त उम्र 28 साल थी। मैं सिविल इंजीनियर हूँ, शहर में अच्छी जॉब। एक प्रोजेक्ट के लिए गाँव में सड़क का काम सुपरवाइज करने आया। रहने का इंतजाम गाँव के ही एक घर में था। तंदरुस्त बदन, जिम जाता था, लंड मोटा-लंबा – लड़कियाँ देखकर मुस्कुराती थीं। लेकिन गाँव में आकर सोचा था – काम पर फोकस, कोई चक्कर नहीं।

गाँव छोटा सा, चारों तरफ खेत, जंगल, नदी। काम शुरू हुआ तो एक लड़की से मुलाकात हुई – नाम प्रिया। उम्र 21-22 साल। गोरी-चिट्टी, जैसे दूध में नहाई हो। फिगर कमाल – 34 के रसीले चुचे, पतली कमर, 38 की भरी हुई गोल गांड। साड़ी या सलवार-सूट में क्या कयामत लगती थी। आँखें बड़ी-बड़ी, लंबे बाल, हँसते वक्त डिंपल। पहली बार खेत के पास देखा – पानी का घड़ा लेकर जा रही थी। नजरें मिलीं, मुस्कुराई। मेरा दिल धक से रह गया।

धीरे-धीरे रोज मिलने लगे। शाम को काम खत्म करके लौटता तो प्रिया खेत में पानी भरती या कुछ काम करती दिखती। बातें शुरू हुईं। वो बोली – “शहर से आए हो, गाँव कैसा लग रहा?” मैंने कहा – “तुम जैसी लड़की देखकर तो जन्नत लग रहा है।” वो शर्मा गई, लेकिन आँखों में शरारत। मैंने मजाक किया – “प्रिया, तुम्हारी मुस्कान तो दिल चुरा लेती है।” वो हँसकर – “जीजा जी जैसे बोल रहे हो।” मैंने कहा – “जीजा जी नहीं, कुछ और बन जाऊँ?” वो लजा गई।

एक दिन खेत में अकेले मिले। सुनसान जगह। प्रिया पास आई – “राजेश, तुम्हें देखकर अच्छा लगता है।” मैंने हाथ पकड़ा। वो नहीं हटाई। किस किया। उसके रसीले होंठ – मीठे जैसे शहद। वो भी साथ देने लगी। मैंने साड़ी का पल्लू साइड किया, बूब्स दबाए। वो सिसकारी – “आह्ह... राजेश... क्या कर रहे हो...” मैंने ब्लाउज में हाथ डाला – ब्रा के ऊपर से मसला। वो गर्म हो गई। लेकिन आगे नहीं बढ़े। वो बोली – “कोई देख लेगा।” मैंने कहा – “अगली बार अकेले में।”

अगली मुलाकात खेत में ही। प्रिया पहले से इंतजार कर रही थी। बिना बोले लिपट गई। मैंने साड़ी ऊपर की, पेटीकोट नीचे। पैंटी उतारी – चूत पर हल्के बाल, गुलाबी। चाटी तो वो तड़प उठी – “आह्ह... पहली बार... मजा आ रहा...” मैंने जीभ अंदर डाली। वो झड़ गई, पानी पी लिया।

लंड बाहर निकाला। वो घबरा गई – “इतना मोटा?” लेकिन खुद चूत पर रगड़ने लगी। मैंने धीरे घुसाया। टाइट चूत। एक झटका – आधा अंदर। वो चीखी – “आह्ह... फट गई...” मैं रुका, बूब्स चूसे। फिर पूरा पेला। खून निकला। वो रोने लगी, लेकिन बोली – “मत रुकना... चोदो...” मैंने स्पीड पकड़ी। वो गांड उछालने लगी – “फाड़ दो... भोसड़ा बना दो...” 15 मिनट तक चोदा। वो दो बार झड़ी। मैं बाहर झड़ा।

उसके बाद प्रिया को चुदाई की लत लग गई। रोज मौका ढूँढती। एक दिन लकड़ी लेने जंगल गई। फोन किया – “आ जाओ, सब लड़कियाँ हैं, लेकिन मैं अलग हो जाऊँगी।” मैं पहुँचा। नदी पार की (सूखी थी), काँटेदार तार के घेरे में घुसा। घना जंगल, कोई नहीं दिखता। प्रिया वहाँ। नजरें मिलीं तो बिना बोले कपड़े उतारने लगी। शॉल बिछाई, नंगी लेट गई।

मैं उसके ऊपर। होंठ चूसे, जीभ अंदर। पूरे बदन पर जीभ फेरी – गर्दन चाटी, बूब्स चूसे, निप्पल काटे, नाभि में जीभ डाली, जाँघें चाटी। वो बेकाबू – “जल्दी लंड डालो... फाड़ दो चूत...” मैंने लोवर उतारा। मोटा लंड बाहर। वो घोड़ी बनी। थूक लगाया, लंड सेट किया। जोर का धक्का – आधा अंदर। वो चीखी – “आह्ह... दर्द...” मैं रुका, बूब्स चूसे। फिर पूरा पेला। चप-चप की आवाजें जंगल में गूँज रही थीं। वो गांड उछालकर साथ दे रही थी – “और जोर से... चीथड़े कर दो...” चुचे लाल हो गए मेरे मसलने से। 10 मिनट बाद मैं झड़ा – लंड निकालकर गांड-पीठ पर। वो लंड चाटकर साफ करने लगी।

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20 मिनट बाद दूसरा राउंड। वो मेरे ऊपर चढ़ी, लंड पर कूदने लगी – “आह्ह... राजा... फाड़ दो...” उसकी गांड थप्पड़ों से लाल। फिर मैंने गांड मारी। पहले उंगली, फिर लंड। वो चीखी लेकिन बोली – “मत रोकना... गांड भी फाड़ दो...” खूब पेला। दोनों झड़े।

कपड़े पहने। उसे तार पार करवाया। झाड़ी टूटी, वो गिर पड़ी – हाथ-घुटने में चोट। मैंने सहारा देकर पहुँचाया।

रात 11 बजे बाद वीडियो कॉल। माँ-बाप सोते तो कैमरा ऑन – पूरी नंगी। उंगली करती, मैं लंड हिलाता। दो दिन बाद बर्दाश्त नहीं। रात में उसके घर गया। दरवाजा खुला। रजाई में घुसा। लिपट गए। किस से शुरू। कपड़े उतारे।

चुचे चूसे – 15 मिनट तक। निप्पल काटे। नीचे नाभि, जाँघें। चूत चाटी – हल्के बाल। दो उँगलियाँ अंदर – वो तड़पी – “आह्ह... पूरा अंदर...” खुद चुचे दबाने लगी। फिर उसने लंड चूसा – “नीली फिल्म से सीखा।” ग्ग्ग्ग... गी गी... गले तक। मैं मुँह में झड़ा।

फिर चूत चाटी। वो बोली – “चोद डालो...” लंड ठूँसा। पहले आधा, फिर पूरा। वो चीखी लेकिन – “मत रुकना...” तेज पेला। घोड़ी बनाकर गांड मारी। 10 मिनट तक। अंदर झड़ा। दो राउंड और। तीन बार तक चुदाई। सुबह 2 बजे निकला।

हफ्ते में 2-3 बार उसके घर। कभी जंगल, कभी खेत। उसकी तलब इतनी कि रोज बुलाती। डर लगता – पकड़े गए तो जान जाएगी। लेकिन मजा ऐसा कि रुक नहीं पाता।

आज भी याद करके लंड खड़ा हो जाता है।

दोस्तों, कैसी लगी गाँव की जंगली चुदाई की सच्ची कहानी? और चाहिए तो बोलो... 🔥



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