पहली बार हॉट GF को कार में नंगी करके खूब पेला

Jan 3, 2026 - 12:20
Jan 13, 2026 - 19:41
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पहली बार हॉट GF को कार में नंगी करके खूब पेला

नमस्ते, मैं हूँ यश। रहता दिल्ली में हूँ, ऊँचाई पाँच फुट नौ इंच। लिंग सामान्य आकार का, पर धीरज बढ़िया। 2019 की बात है, पोस्ट ग्रेजुएशन चल रही थी। अब तक किसी लड़की के साथ कुछ नहीं हुआ था। लेकिन लड़कियों के स्तन देखते ही लिंग खड़ा हो जाता। कॉलेज कनॉट प्लेस के पास था। कक्षा में एक लड़की थी - नाम अर्चना रख लेता हूँ। ऊँचाई पाँच फुट तीन इंच, शरीर का घेराव 34-28-36। बड़े और भारी स्तन, पतली कमर, गोल और ठाढ़नदार नितंब। थिएटर में काम करती थी - बेहद आकर्षक, हर लड़के के ख्वाब में। वो अपनी कार से आती थी।

एक दिन, फ्रेंच की कक्षा में मैंने मस्ती में कह दिया - "सर, फ्रेंच किस के लिए इतना मशहूर है!" पूरी क्लास ठहाके लगाकर हँस पड़ी। ऐसा लगता है, यह बात अर्चना के दिमाग में जा बैठी।

एक दिन कार घर पर ही रह गई। अर्चना ने सवारी में जगह दे दी। मैं उसमें आराम से बैठ गया। रास्ते भर बातें चलती रहीं, फिर मैंने फ्रेंच किस के बारे में पूछ लिया। वो मुस्कुराई और बोली – “तुम्हें ऐसे किस के बारे में क्या मालूम?” मैंने कहा – “देखा तो फिल्मों में है, खुद से कभी नहीं किया।” वो ठहाका लगाकर बोली – “अब कर लो न!”

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गाड़ी किनारे खड़ी हुई। उसका चेहरा धीरे से आगे झुका। मेरे होंठ उसके गुलाबी, नम होंठों पर आ टिके। पहला चुंबन - आधे मिनट तक बना रहा। जीभ भीतर घुसी, साँसों का एहसास हुआ। अलग हुए तो साँसें तेज, आँखों में लालिमा। बोली, "तूने कहा था गाल पर!" पर मुस्कान छिपा नहीं पा रही थी खुशी। मेरा लिंग पत्थर की तरह सख्त हो उठा।

रातभर फोन पर बातचीत चली। उसने पूछा, "इसका एहसास कैसा था?" मैंने जवाब दिया, "स्वर्ग जैसा। अब और भी चाहिए।" वो ठहाके मारकर हँस पड़ी। कोई ऐतराज़ नहीं आया – समझ लिया, हरे झंडे का संकेत मिल गया।

अगले दिन से मैं कार लाना छोड़ दिया। हर रोज वो आकर मुझे उठाती। सुनसान जगह पर गाड़ी रोककर चुम्मे शुरू कर देती। होंठ चूसती, जीभ घुमाती। कॉलेज में एक साथ बैठते। लौटते वक्त फिर वही - गाड़ी ठहराकर चाहत भरे पल। कभी मैं उसके स्तन दबाता, वो मेरे लिंग पर हाथ फेरती। ऐसे ही दिन बीतने लगे।

अब कार के अंदर हर चीज़ छुप गई, शेड्स लगा लिए थे मैंने। उसकी आँखों में शरारत तैर रही थी, बोली, "यश, तेरे इरादे साफ़ नहीं लग रहे।"

एक दिन वो छोटी स्कर्ट पहनकर आई। ऊपर के कपड़े उतारे, ब्रा सरकाई – गोरे, तने हुए स्तन बाहर आ गए। चूमा, चखा, निप्पल दबाए, काटे भी धीरे से। वो बस आहें भरती रही – "यश... और ज़ोर से... दबाओ..." उसकी निप्पल्स सख्त हो चुकी थीं। मैंने नीचे हाथ फैलाया – पैंटी नम थी। लेकिन कॉलेज का समय नजदीक था, तो ठहर गए।

उसका हाथ क्लास में मेरे लंड पर था, चलता रहा बिना रुके। धीरे से बोली, "आज तो मैं पूरा उठाऊँगी तन-मन।" वापसी के रास्ते मैंने उसके स्तनों को जकड़ लिया, दबाव डाला इतना कि वो कराह उठी। घर पहुँचकर फोन पर आवाज़ काँप गई - "इतने बेरहमी से दबाया तुमने... दर्द झेल रही हूँ, पर खुशी भी है। सोने लगी तो तुम्हारा स्पर्श याद आया।"

आगे बढ़ दिए। एक समय उसने कहा - “तुम्हारी बारी है गाड़ी चलाने की।” मैं सीट पर आराम कर रहा था कि अचानक उसने अपनी जींस का बटन खोल दिया, लंड बाहर निकाला। हिलाने लगी, टिप पर चुंबन दिया, जीभ से फेरा, मुँह में ले लिया – ग्ग्ग्ग... गी गी... गों गों... गाड़ी चलाते हुए मुँह से खेल! गर्म साँसें, जीभ का स्पर्श - मैं लड़खड़ा रहा था। कॉलेज पहुँचते-पहुँचते बाहर निकाल दिया। वो देखती रही, आँखों में भूख थी - “अगली बार खत्म तक चखूँगी।”

मैंने बदला लिया। वापसी के दौरान उसकी स्कर्ट ऊपर खिसकाई, पैंटी नीचे उतार दी। चूत पर हाथ फिराया - गीली थी पूरी। अंदर डालीं दो उँगलियाँ। वो सिसकने लगी - "आह्ह यश... और भीतर..." कार किनारे खड़ी थी। उसने मेरा चेहरा पकड़ लिया, होंठों को दाँतों से दबाया। मैंने चूत चखी - क्लिट को चूसा, जीभ घुसाई। वो तड़फने लगी - "आह्ह... आ रहा है..." झुर्र हो गई, पानी मेरे मुँह में छलक गया।

हवस बढ़ने लगी। छुट्टियों से पहले का आखिरी दिन था। जल्दी ऑफिस से निकल गए। कार लेकर नेताजी सुभाष पैलेस की पार्किंग में पहुँच गई। गार्ड को घुस देकर रास्ता साफ कर लिया। शाम के छह बजे, अंधेरा छाया, हवा में सर्दी। कार में एक-दूसरे को चाहने लगे। होंठों को चूसा, जीभों ने खेल शुरू किया। मैंने ऊपर का कपड़ा उतारा, ब्रा फेंक दी – छाती बाहर आ गई। चूसा, दाँतों से काटा। वो बोली – “आह्ह... खा जाओ...” स्कर्ट और पैंटी नीचे उतारी – योनि गीली, क्लिट निकली हुई। जीभ से चाटा – वो कमर उठाई – “आह्ह यश... और भीतर...” दो उँगलियाँ अंदर डालीं, वो काँप उठी।

मैं बिना कपड़ों के था। उसने लंड देखा, तो बोली - "आज पूरा भीतर चाहिए।" ड्राइविंग सीट से सीधे मेरी गोद में आ बैठी। लंड को चूत के ऊपर ठीक किया, फिर धीरे से नीचे बैठ गई। मैंने धक्का दिया - सिरा अंदर चला गया। उसने नाखून मेरी पीठ में गाड़ दिए, कहा - "आह्ह्ह... रुक जा... महसूस करने दे..." एक मिनट तक ऐसे ही रही। बाद में खुद तेजी से ऊपर-नीचे होने लगी। मैं नीचे से झटके देता रहा, एक छाती चूसता रहा, दूसरी को दबाता रहा।

उसने ऊपर-नीचे हिलना शुरू किया - अपनी गांड उसके लंड पर घिसने लगी। गाड़ी डगमगा रही थी। मैंने तेजी से धक्के देना शुरू कियa। अब बस एक क्षण की बात थी, तो मैंने खींच लिया - पूरा आलू उसके स्तनों और पेट पर फैल गया। वो भी चौतरफा ढह चुकी थी, उसकी चूत से तरल बूँद-बूँद टपक रहा था।

थोड़ी देर तक लिपटे रहने के बाद साँसें समान हो गईं। सफाई के बाद कपड़े धारण किए। मुझे मेट्रो पर छोड़कर वह अपने घर चली गई।

भूख लगी, मैंने दो बर्गर खाए फिर सीधे घर की ओर चल पड़ा।

फिर कई बार कार में मजा आया। कहीं पार्किंग में, तो कहीं खाली सड़क पर। अर्चना के साथ वो हर बार ऐसा करते। उस वक्त की याद आए, तो शरीर भी जवाब नहीं देता।

अगर तुमने ये कहानी पढ़ ली है, तो फिर क्या मन में आया जब वो दोनों कार में एक-दूसरे के साथ घंटों अकेले थे? शायद तुम भी कभी ऐसा मौका पाना चाहते हो। हल्के से मुस्कुरा दिया होगा। कमेंट में लिख दो कि तुम्हें ये घटना कैसी लगी। 😈

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