ऊपर की मंजिल पर देवर-भाभी के बीच एक गुप्त शारिरिक संबंध था।
एक दिन ऐसी कहानी पढ़ी जिसमें देवर और भाभी के बीच कुछ होता था। फिर खयाल आया कि शायद मैं भी कुछ ऐसा कर सकता हूँ। भाई तो घर से बाहर रहते हैं, इसलिए भाभी अकेली पड़ती होंगी। उनकी ज़रूरतें पूरी करने वाला कोई नहीं था।.
अंकित नाम मेरा है। उत्तर प्रदेश में रहता हूँ मैं। घर में कुल छह लोग हैं। पिताजी का काम बैंक में है। दो भाई, दो बहनें - उनसे छोटा मैं।.
मेरे सबसे बड़े भाई की शादी हो चुकी है। वो सेना में तैनात हैं। प्रिया उनकी पत्नी का नाम है। वो लगभग हमेशा खामोश रहती हैं। उनकी छवि काफी आकर्षक है। कुछ पढ़ने के बाद मन में ख्याल आया कि परिवार में किसी के साथ संबंध बना लूँ। .
फिर से घरवालों को देखने का तरीका ही बदल चुका था। माँ, भाभी, बहन - एक-एक करके सभी ऐसे लगने लगे, जैसे कोई चीज़ हों।.
एक साल पहले की बात है। चंदन मेरा दोस्त है। उस वक्त उसने मज़ाक में कुछ कह दिया था। उसने कहा था कि भाभी को तुम आसानी से पटा सकते हो… फिर जब मन करे, जैसे चाहो, ऐसे चोद सकते हो।.
अचानक ख्याल आया कि बड़े भैया काम के चलते घर नहीं रहते। प्रिया भाभी को उनकी तलाश रहती होगी। ऐसा लगा कि वो किसी सहारे की तलाश में हैं। फिर धीरे-धीरे मन में एक अजीब इच्छा जाग उठी।.
एक बात जो मैं साझा करना चाहता हूँ, वो है मेरी प्यारी भाभी के बारे में। खूबसूरती उनके चेहरे पर छाई रहती है। उनकी छाती के निपल्स ऐसे खड़े रहते हैं, मानो किसी गर्मियों के आम में रस भरा हो।.
एक दिन की बात है। भाभी बरामदे में कुर्सी पर बैठी थीं…तभी फोन की घंटी बजी। जैसे ही वो उठीं, साड़ी का पल्लू छूटकर नीचे आ गया। उस पल मैंने उनकी चूची का किनारा देख लिया। शरीर में झनझनाहट सी दौड़ गई। मन में इच्छा उठी - प्रिया भाभी की चूचियां हाथों में लेकर दबाऊं, मुंह से चूसूं।.
रूम के पास रखा फोन उठाकर वो चली गईं, मुझे ऐसे देखते हुए। घर में सबसे छोटा होने की वजह से भाभी की नजर में मेरा अलग ही दर्जा था। आज जब उन्होंने मेरी नजर अपनी छाती पर टिकी देखी, तो शायद एहसास हुआ कि मैं बड़ा हो रहा हूं।.
अब तो सिर्फ भाभी के साथ कैसे हो, यही दिमाग में घूम रहा था। बार-बार वही खयाल आता - उनके साथ कुछ ऐसा करना। पर कदम बढ़ाने की हिम्मत जवानी में नहीं थी।.
उसकी गोल-मटोल छाती और कमर का घुमाव मुझे सबसे ज्यादा पसंद था। कई बार मन किया कि उन छातियों को हाथ से छू लूँ, पर डर लगा, मौका नहीं आया, फिर भी कभी कुछ नहीं हुआ।.
तीन महीने बाद फिर कोई काम हो गया। घर पर इसलिए थोड़ी सी धूमधाम हुई। रिश्तेदार आए, वो भी कुछ अपने घरवाले लेकर।.
उस दिन भाभी के पास रसोई में अकेले ही खाना बनाने का समय था। तब मेरे ज़हन में आया - अब वक्त है कुछ ऐसा करने का जिससे उन्हें तकलीफ़ न हो… और गपशप भी चल पड़े।.
अचानक रसोई में जाते हुए मैंने जानबूझकर पैर फिसलाया। देखते ही भाभी आगे आईं, मेरा सहारा लिया और उठाने लगीं। आगे झुकते हुए मैंने उनके कंधे पर हाथ डाला। फिर बिना सोचे एक हाथ से उनकी चूची को छूकर दबा दिया।.
भाभी ने मेरी हरकत पर कुछ कहा नहीं। सिर्फ़ इतना पूछ लिया - घाव तो नहीं हुआ?
बाहर निकलते हुए मैंने कहा - ‘नहीं…’।.
उसकी चूची के स्पर्श ने मुझे खुश कर दिया। हौसला जमाने में भी थोड़ा साथ दिया।.
दो दिन बाद, जब भाभी नींद में थीं, तभी इनवर्टर की बैटरी खत्म हो गई। गर्मियों का समय था, इसलिए तापमान बहुत ऊँचा था। लेकिन उस घर के अंदर ठहरना मुश्किल हो रहा था, ऐसे में वो छत पर आ गईं। फिर मेरे पास चटाई बिछाकर लेट गईं, और धीरे-धीरे नींद में डूब गईं।.
तभी लगा कि ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा। पास में ही मम्मी सो रही थीं, उनके पास बहन भी थी।.
थोड़ी देर बाद सबके सो जाने पर मैंने अपनी चटाई खिसकाकर भाभी के पास ले जाया। उनके पेट पर हाथ रखते ही मैं ठहर गया। कोई आवाज़ न आने पर मिनटों बाद मेरी उंगलियाँ उनकी छाती पर सरक गईं। धीमे-धीमे दबाव डालने लगा।.
मुझे तो लगा, जैसे सॉफ्ट पेड़ की पत्तियां हों।.
थोड़ी देर उनके स्तन दबाने के बाद मैंने उनके मुँह पर किस किया। तभी आँख खुल गई उनकी, मैं घबरा गया, फौरन लेट गया जैसे नींद में हूँ।.
आंख खोलते ही मैंने देख लिया। भाभी ने मुझे तब देखा, फिर कुछ बोले बिना बगल में पेशाब करने चली गईं।.
भाभी ने साड़ी ऊपर की, पिस्सू करने जा रही थीं। उनकी चमकीली गांड देख मैं हैरान रह गया।.
सुबह की तरफ बढ़ते सूरज के साथ भाभी वापस आईं, नींद में डूब गईं। मगर मेरी हालत बिगड़ चुकी थी।.
एक बजने पर फोन की ओर निगाह पड़ी। चाहे जो हो, आज कुछ तय करना था।.
थोड़ी देर में मैंने हाथ उनके पेट पर रख दिया। ऐसा लगा, वो धीरे-धीरे आँखें खोलने वाली थीं।.
मैंने हल्का सा झुककर उसकी जांघ पर हाथ रख दिया। फिर, धीरे-धीरे, साड़ी को ऊपर की तरफ खींचने लगा।.
फिर भाभी वहीं बैठ गईं। मेरा हाथ उस जगह से हटा तो एकदम खामोशी छा गई। डर लगने लगा - अब क्या होगा, कुछ नहीं पता।.
फिर भाभी ने कुछ शब्द नहीं कहे, सिर्फ़ बिस्तर पर आकर लेट गईं। उस वक्त मेरा घबराहट गायब हो चुका था। जैसे ही उन्होंने पीठ झुकाई, मेरा हाथ सीधे छाती की ओर बढ़ गया। अगले ही पल मैं उसे मजबूती से दबाने लगा।.
सास के मुंह से एक छोटी सी आवाज़ निकल पड़ी। उनके कान के पास बोला – तुम्हारा दूध पीने का मन कर रहा है… हालाँकि तुम खुद को सोया हुआ झूठी ढंग से दिखा रही हो।.
जवाब न मिलने पर, मैंने समझ लिया कि वो हाँ कह रहे हैं।.
इसके बाद मैंने हिम्मत करके भाभी के ब्लाउज का पहला बटन खोल डाला।.
धीरे से आवाज़ आई - अभी नहीं, कल पीना।.
अच्छा, मैंने कहा।.
मेरा शरीर भाभी से जुड़ गया। धीमे-धीमे मैंने उनके होंठ छुए, फिर चूसने लगा। वो खुद भी इस क्रिया में घुलने लगी। लगभग दस मिनट बाद मेरा हाथ उनकी पैंटी के अंदर सरक गया। एक उंगली आहिस्ता से उनकी चुत में घुस गई।.
भाभी ने सांस रोकते हुए कहा - उसे बाहर निकाल दो।.
बस मैंने कहा, तुम्हीं हटा दो।.
उसी पल भाभी ने मेरे कपड़ों के नीचे हाथ घुमाकर मेरी अंडरवियर में छुआ। छूते ही मेरा लंबाई में छह इंच का लंड सीधा हो गया।.
मैंने धीरे से भाभी की पेटिकोट नीचे खींच दिया। फिर मैं उनके ऊपर आ गया। वो बहुत तड़प चुकी थीं। उन्होंने साड़ी को ऊपर ठेला। अब वो चाहती थीं कि मैं जल्दी करूँ।.
मैंने जल्दी से अपना लंड उसकी चुत में डाल दिया। हाथ से लंड पकड़ कर भाभी ने छेद में सटाकर रखा। धीरे-धीरे मैं आगे की ओर बढ़ा।.
कई महीने से भाभी को किसी ने छुआ तक नहीं था। मेरे मोटे लंड से उन्हें तकलीफ हो रही थी, फिर भी वो आवाज़ दबाकर सह रही थीं। मैं बार-बार पास झांकता रहा - शायद माँ कभी उठ न जाएँ।.
बहुत उत्तेजना में आकर मैंने भाभी को दस मिनट चोदने के बाद उनके अंदर ही सब कुछ छोड़ दिया।.
पैंटी उठाकर वो नीचे जाने लगीं। मैं तुरंत उनके पीछे हो लिया।.
अब तक सौर रोशनी खिड़की से होकर अंदर घुल चुकी थी। मैं भाभी के कमरे की ओर बढ़ा, धीरे-धीरे पास जाकर उन्हें छू लिया। वो मेरी आँखों में देखने से बच रही थीं।.
एक बार मैंने भाभी से बोल दिया - तुम्हारी गांड मारने का मन है।.
शब्द मेरे मुँह से निकले, तो उसके चेहरे पर लालिमा छा गई।.
उसके कपड़े धीरे-धीरे नीचे सरक गए।.
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एक बात सुनो - पहले मेरी चूत चूसो, फिर गांड मारना।.
ठीक है, मैंने कहा।.
भाभी ने पहले ही अपनी चुत छोड़ दी थी। मैंने धीमे से उसे चूसना शुरू किया, फिर तेजी से।.
फिर मैंने धीमे-धीमे भाभी की एक चुची को मुँह में लिया। दूसरी पर हाथ से दबाव डाला। जैसे-जैसे वक्त बीता, उनकी गोरी चमड़ी पर लाल निशान पड़ गए। कभी झटके से, कभी आराम से मैंने निप्पल पर चाट लगाई।.
फिर मैंने अपना लंड भाभी के होठों तक ले जाकर पहुँचा दिया। उसने इसे धीमे से चूसते हुए नम कर दिया। जैसे-जैसे मुझे छूटने का एहसास हुआ, मैंने इसे उसके मुँह से बाहर खींच लिया।.
इसके बाद मैंने भाभी की चूत पर जमकर हलचल की।.
खेल खत्म होने पर मैंने उनसे कहा - अब से हर बार जब मन करेगा, तब आपको चढ़ाऊँगा, छाती भी अच्छी तरह नोचूँगा।.
फिर वो मुस्कुराईं और बोलीं - अच्छा।.
सुबह होने वाली थी। मैं फिर भी कमरे में दाखिल हुआ बिना देर किए।.
आठ बजे उठा था। भाभी कमरे में आईं, तो मैंने बिना सोचे उनकी छाती पर हाथ रख दिया, कपड़े के ऊपर से दबाव डालते हुए।.
उसने मुझे रोकते हुए कहा - इतना ही काफी है… किसी की नज़र पड़ जाएगी।.
तब तैयार होकर मैं रसोईघर की ओर चल पड़ा, जहाँ भाभी पीठ के पीछे खड़े होकर धीमे स्पर्श से छेड़ने लगे।.
भाभी के मन में यह सवाल कब से था, मैंने उनसे पूछ ही लिया।.
वो बोली, जिस दिन तुमने ठपके से खिसककर मेरे स्तन दबाए थे, उसी पल कहीं अंदर एहसास हो गया था - इस छोटे भाई को मेरे शरीर में घुसने की इच्छा है।.
मैं हंस दिया.
भाभी को मैंने बताया, आज तुम्हारी पिटाई होगी।.
हँसते हुए उन्होंने सहमति जता दी।.
उस दिन के बाद मैं कभी-कभी आयोजन पर भाभी को छेड़ने लगा। हालाँकि, उनकी पिटवाने का अवसर फिर नहीं मिला।.
एक शाम ऐसा हुआ कि मेरी दीदी जब नहाकर बाथरूम से बाहर आईं, मैं सीधे ठिठक गया। गर्मी की वजह से उनका चेहरा लाल था। खड़े-खड़े मैंने देखा, उनकी छवि कुछ अलग लग रही थी। पानी से भीगे बाल कंधे पर लटके हुए थे।.
एक दिन फिर मेरी नज़र उस पर पड़ी।.
शुरू करने से पहले, बहन के बारे में कुछ शब्द। प्रीति नाम है उसका। पढ़ाई में तीसरे साल चल रहा है। रंग गोरा है बिलकुल।.
उस शाम को, जब वो चूल्हे के पास हाथ साफ कर रही थीं, मैं धीमे कदमों से पीछे आ गया। एक सेकंड बाद, कमर से सटा कर मैंने छुआ उन्हें - ठीक नीचे की ओर।.
भाभी मैंने कहा था - बस एक झलक दिखा दो।.
फिर भाभी बोल पड़ीं - इतने सामने नहीं होगा, कौन देख लेगा।.
मैंने धीरे से कहा - मम्मी वो दीदी अभी अपने कमरे में हैं। पापा तो बाहर चले गए हैं। किसी के आने की कोई संभावना नहीं।.
उसने कह दिया - चलो, समझ में आया… पर ध्यान से ताकना, ज़्यादा हरकत नहीं।.
ठीक है, मैंने कहा।.
उसकी साड़ी ऊपर उठी तो मक्खन जैसी चमकदार गांड नजर आई। दृश्य ने मेरे शरीर में बिजली दौड़ा दी। लंबाई में खड़ा हुआ लंड बिना सोचे उसकी ओर बढ़ा। धीमे स्पर्श के बाद वह अंदर घुस गया। .
कमरे में जाकर सब कुछ कर लेना, यहाँ तो कुछ नहीं होगा।.
लेकिन सच मानने को तैयार ही नहीं था।.
मैंने झट से उसकी पीठ पर कई जोरदार थप्पड़ मारे। गुस्से में भरकर बोला - अब से तुम मेरी हो। जब मैं चाहूँगा, तुम्हारे साथ संबंध बनाऊँगा। मना करने की तुम्हें इजाजत नहीं। अगर ऐसा किया, तो जान लेना कि तुम्हारे शरीर तक मेरी पहुँच खत्म हो जाएगी।.
पता था कि भाभी अब मेरे लंड के बिना परेशान रहने लगी थी। जब भैया घर पर नहीं होते, तो उसकी नज़र हमेशा मेरे ऊपर ही टिक जाती।.
उसने मेरे शब्द सुने, फिर कुछ नहीं बोली। मैं वहाँ से चल पड़ा।.
सीधा बाथरूम के अंदर हो गया, वहाँ खड़े-खड़े भाभी की गांड के ध्यान में मुट्ठी झाड़ ली। इसके बाद कमरे में लौटकर बिस्तर पर जा लेटा।.
शाम को बैठकर मन में आया कि जो बात भाभी से कह दी, वो गलत थी। उस तरह बोलना मुझे नहीं चाहिए था। फिर ख्याल आया - अब तो ऐसा करना ही पड़ेगा जिससे वो मेरी बात माने। बिना इसके जो चाहिए, मिल ही नहीं पाएगा।.
अभी मैं इसी बारे में सोच रहा था कि कमरे में दीदी घुस आईं। उन्होंने कहा, अंकित, मेरे हवाले वो इयरफोन दे दो।.
एक कान का हेडफोन मैंने उसकी ओर बढ़ा दिया।.
एक पतली साड़ी में दीदी के कपड़े का फैब्रिक इतना हल्का था कि आंख वहीं ठहर गई। उधर, छोटे भाई की नज़र सीधे ऊपर जा अटकी। फिर वो बिना कुछ कहे, ऑडिओ प्लग लगाती हुई कमरे से बाहर निकल गईं।.
एक विचार आया – अगर बहन भी मेरे साथ जुड़ जाए, तो घर में दोनों मिलकर उपलब्ध होंगी। जब मन करे, कभी भी किसी एक को चुन लूंगा।.
अचानक भाभी घर में दिखाई दीं, मैं हाथ से लंड पर उठाव लगा रहा था। उन्होंने आवाज़ सुनाई, हंसी के साथ कहा - थोड़ा तो मैं भी इस छोटे बाबू को देख लूँ।.
ख़ुशी का एहसास हुआ, जब पता चला कि भाभी नाराज़ नहीं थी।.
उसकी उंगलियाँ मेरे लिंग पर फिसल रही थीं। वो धीमे से बोली - तुम्हारी हूँ, जैसे चाहो सताओ। रोक नहीं सकती।.
उसने कहा - तुम्हें भाभी नहीं, नाम लेकर पुकारूँगा।.
ठीक है, हां बोली भाभी।.
मैंने पूछा था - तो बताओ ना, प्रिया… क्या शादी से पहले तुम्हारी कोई रिश्तेदारी हुई थी या नहीं?
उसने कहा, हाँ, एक लड़का था। वो मुझे सोएगा तो बस, पर कभी पूरा नहीं हो पाया। फिर भी, मेरी जवानी में उसका हाथ खूब चला। छाती देखकर वो घंटों टिक जाता। मैंने साफ कह दिया था - जो करना है कर ले, बस अंदर नहीं।.
अगली कहानी में तुम्हें पता चलेगा कि कैसे मैंने भाभी के साथ संबंध बनाया, फिर वो मेरी मदद करने लगी। इसी दौरान मैंने अपनी छोटी बहन के साथ भी ऐसा ही किया।.
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