मक्खन सी चिकनी कुंवारी गांड मारी

JaiJai
Jan 12, 2026 - 12:23
Jan 21, 2026 - 15:31
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मक्खन सी चिकनी कुंवारी गांड मारी

एक शाम को मेरे कमरे में वो नया लड़का जो गोरा और चिकना था, मेरी तरफ बढ़ा। दफ्तर में उसका पहला दिन था। हम दोनों अकेले थे। धीरे से उसने मेरे लिंग को छुआ। रहने के लिए उसे मेरे साथ ही ठहरना पड़ रहा था। इस घटना के बाद सब कुछ बदल गया।.
अरे भई, मैं करण हूँ, दिल्ली के मयूर विहार का रहने वाला। काम के सिलसिले में अहमदाबाद, गुजरात पहुँच गया हूँ। वहाँ फिलहाल किराए के घर में ठिकाना डाल रखा है।.
एक वक्त पर, मैं काम की तलाश में अहमदाबाद पहुँचा।.
तीन साल तक हर महीने एक युवक के साथ संबंध बनता रहा।.
तीन साल तक, 2017 से लेकर 2020 तक, हर बार जब मौका मिला, वो मेरे आगे झुकती। कभी छुपकर, कभी डरते-डरते, पर हमेशा तैयार। एक दफा शुरू हुआ तो फिर रुक नहीं पाया कोई। धीरे-धीरे सब कुछ ऐसे घटित हुआ जैसे खुद-ब-खुद होना था।.
उस वक्त मेरी उम्र लगभग 34 साल के आसपास हुआ करती थी। शरीर पहले से ही अच्छा था, घना और ऊँचा भी।.
एक कमरे के किराए के फ्लैट में मैं अकेला ही ठहरा हुआ था।.
यहाँ कोई पुराना वाला संबंध नहीं था मेरा, इसलिए अकेलेपन के साथ गुज़ारा होता रहा और किराए का बोझ पूरा मेरे कंधों पर।.
लगभग एक हफ्ते बाद मुझे खयाल आया - क्यों न किसी को साथ रख लूँ। कमरे का भाड़ा फिर आधा-आधा हो जाएगा। पैसे की बचत होगी, वैसे भी अकेले रहना थोड़ा उबाऊ लगने लगा था। किसी के साथ बैठकर बातें करने से मन भी लगेगा।.
एक दिन मैंने सोचा, कमरे में कोई और होता तो बढ़िया होता।.
फिर भी, तीन महीने हो गए। कोई सही साथी नज़र नहीं आया।.
बढ़ता हुआ खर्च मेरे काबू से बाहर होता जा रहा था।.
खाने का समय था, मैं कंपनी के कैंटीन में दोस्तों के साथ बैठा हुआ था।.
अचानक से एक दोस्त ने कहा कि उसके ऑफिस में एक नए आदमी ने काम शुरू किया है। वो अपने लिए किराए पर कमरा खोज रहा है।.
एक दिन मेरा दोस्त लाया एक लड़के को। मैंने उससे बात की, वो खच्चर जैसा था। हम दोनों बैठे पेड़ के नीचे। धूप छन रही थी पत्तों से। उसने मुझे चाय पिलाई, मैंने किताब दिखाई। बादल गए, फिर भी हम बैठे रहे।.
एक लड़का था, साहिल नाम। पूर्व में हिंदुओं की पवित्र नगरी, इलाहाबाद में रहता था वो।.
उसकी नौकरी पहले हिमाचल में थी। अब तो सैलरी बढ़ी, पैकेज भी बेहतर मिला, इसलिए अहमदाबाद आ गया।.
उम्र तकरीबन पच्चीस के आसपास होगी साहिल की। एकदम फुर्तीला गोरा रंग, कमर इतनी पतली जैसे किसी लड़की की हो। बाल सुनहरे-सुनहे लगते थे, आंखें दोनों ओर नीली झील जैसी।.
सच कहूं, साहिल के आगे कई खूबसूरत लड़कियों का रंग उड़ जाता है।!
शाम को ड्यूटी समाप्त होते ही मैंने साहिल को अपना कमरा दिखा दिया।.
सातवीं मंज़िल पर मेरा फ्लैट था। नगर का हर कोना वहाँ से आँखों में समा जाता।.
रूम में नज़र पड़ते ही साहिल को वह अच्छा लगने लगा।.
हाँ कर दिया उसने साथ रहने की बात पर।.
अब किराए को दो हिस्सों में बाँट लिया गया।.
अगली सुबह होते-होते साहिल बस इतना समान उठाए आ पहुंचा कि जितने में कपड़े भी समा गए।.
फ्लैट में सिर्फ एक कमरा था। हॉल के पास छोटी जगह थी। वहाँ खाना बनता था।.
बिस्तर काफी चौड़ा हुआ करता था, वह मकान मालिक की संपत्ति में आता था।.
उस कमरे में रातें गुज़रती थीं, जहाँ आवाज़ें हल्की हो जाती थीं।.
अभी-अभी साहिल आया था। कोई बिछौना नहीं मिला, कुछ तकिया भी नहीं था।.
जब तनख्वाह मिलेगी, तो वो हॉल में गद्दा खरीदकर सोएगा।.
उस समय उसका मन धरती के हिसाब से ढलने को था।.
पर मैंने झट से कह दिया - नहीं-नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा। तुम फर्श पर सोओगे, मैं बिस्तर पर? बिलकुल ग़लत बात है! असल में मेरा बिस्तर काफी चौड़ा है, दोनों आराम से समा जाएंगे। तुम्हारी तो अभी ताज़ा नौकरी लगी है, नए गद्दे का क्या मतलब। दोस्ती है न, हर चीज़ बाँट लेंगे।.
सुनते ही साहिल गले लग आया, धन्यवाद का एहसास उसकी आवाज़ में तैर रहा था।.
उसने बिस्तर पर मेरे पास लेटने का फैसला कर लिया।.
सच कहूँ तो… जैसे ही साहिल ने मुझे पकड़ा, उसकी छाती का ठंडापन मेरी खाल पर फैल गया। वो पल था जब मेरे अंदर कुछ धीमे से भाग गया, बस।!
ख़ुशी इतनी थी कि लग रहा था, जैसे हवा में उड़ जाऊँगा।.
एक ही ऑफिस में काम करते थे वो। अब घर भी एक साथ चल रहा है।.
खाने की सुविधा दिन में कंपनी कैंटीन से मिलती थी, जबकि शाम को टिफिन वाले भैया कमरे तक पहुँचा देते थे।.
दिनभर की ड्यूटी समाप्त होने के बाद, हम लोग रूम पर भोजन करके थोड़ा समय एक-दूसरे के साथ गुज़ारते। बातें होतीं, मज़ाक उड़ता, कहीं-कहीं से विचार आपस में बँटते।.
बड़ा होने पर साहिल ने मुझे भैया कहना शुरू कर दिया।.
कभी-कभी बातें चलती रहतीं, फिर आखिर में वही बिस्तर साझा हो जाता।.
इतने में लगभग पंद्रह दिन बीत चुके थे।.
शायद किसी रात साहिल को एक डरावना सपना आया।.
उसके हाथ कांपने लगे, सिर्फ एक पल में। पसीना छाती से टपकने लगा, जैसे बारिश की बूंद।.
पानी देकर मैंने उसे सँभाला, फिर पूछ लिया - क्या बात है?
रात को डर लगा उसे, क्योंकि दिनभर में किसी ने उसके ऑफिस में भूत-प्रेत की बातें सुनाई थी।.
बस मैंने कहा, ऐसा कभी नहीं होता।!
उसका डर इतना गहरा था। मैंने धीमे से उसे अपने पास खींच लिया, छाती से चिपका दिया। आखिरकार वह शांत होने लगा।.
लेटते ही साहिल ने मेरे शरीर से ऐसे चिपकना शुरू कर दिया, जैसे पत्नी हो।.
उसकी त्वचा पर एक सिहरन-सी दौड़ गई। कैसे समेटूँ अपने आप को? मगर होश नहीं थे… कुछ भी सूझ नहीं रहा था।.
अचानक से पसीना छूटने लगा।.
उसका हर हिस्सा मेरे ऊपर ऐसे टिका था, मानो कोई ज़मीन से जलवा।.
उसके पास खड़े होने पर मेरा छाती तक फैला हुआ शरीर उसके करीब आ गया।.
अब मैं खुद को एक पल भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था।.
थोड़ी देर मैंने उसे सीने से चिपकाकर सुलाने की कोशिश की, हालांकि।.
थोड़े वक्त बाद, साहिल मेरे सीने पर सिमटा हुआ था। फिर अचानक उसकी आँखें भारी हो गईं।.
उसकी सांसों के बीच मैं फंसा हुआ था।.
मेरी छाती पर उसका हाथ पड़ा रहा, क्योंकि जगाना नहीं चाहता था।.
थोड़ी देर बाद मैं भी उसके पास जाकर कंबल में सिमट गया। आंखें बंद कर लेटा रहा, हालाँकि नींद नहीं आई।.
आधी रात के करीब, कुछ पल बाद, साहिल का हाथ मेरी छाती से हटते हुए धीमे-धीमे लोअर के ऊपर से मेरी चड्डी तक पहुंच गया।.
हो सकता है नींद के बीच वो अपना हाथ घसीट रही थी… मैंने छेड़ा नहीं, क्योंकि जाग न जाए।.
थोड़ी देर बाद, साहिल का हाथ मेरे लंड को छूने लगा।.
सोने का अभिनय मैंने शुरू कर दिया।.
शायद साहिल अभी-अभी आँखें मलकर बैठा हो… मुझे एहसास हुआ, मन की तलहटी में डूबा पड़ा हूँ।.
साहिल ने आहिस्ता से मेरी चड्डी के अंदर हाथ घुमाया। फिर लंड को पकड़े रहने लगा, जैसे सोया हुआ हो।.
सपने में खोया हुआ, मैं भी पलकें बंद किए पड़ा था।.
थोड़ी देर में सोहिल खड़ा हुआ… बिना मुझे एहसास हो, वो धीमे से मेरी चड्डी को नीचे खींचने लगा।.
उसकी नजर जैसे ही मेरे 8 इंच लंबे घटिया पर पड़ी, समझौता भूल गया।.
अब समझ में आया कि साहिल बेवकूफ है। उसके दिमाग में सिर्फ़ नशे की तलब है।.
उसी पल उस साले ने कोई भूत-प्रेत की कहानी शुरू कर दी। मेरे सीने से चिपका हुआ था बहन का लौड़ा।.
मैं सब कुछ देखता तो गया, पर कुछ बोला नहीं।.
थोड़ी देर तक मेरे लंड को हाथ से छेड़ते-छेड़ते साहिल को ऐसा लगा कि मैं पूरी तरह खो चुका हूँ। उसके बाद उसने धीमे से मेरे लंड को मुँह में लेने की कोशिश की, जैसे कुछ हो नहीं रहा हो।.
अचानक से वो गर्मजोशी महसूस हुई, जब लंड साहिल के होठों के पास पहुँचा।.
मुझे याद है, पाँच मिनट से ज्यादा समय हो गया था, साहिल मेरा लंड मुँह में लिए हुए।.
मेरे अंदर का सब्र खत्म हो चुका था। तभी मैंने साहिल के सिर को दोनों हाथों से पकड़ लिया। फिर धीरे से, लेकिन पूरी ताकत से, अपना पूरा लंड उसके गले तक ठूंस दिया।.
उसके होंठों पर मेरी सांसें भारी पड़ने लगीं।.
थोड़ी देर को साहिल हिचकिचाया, मैं वैसे ही उसे उठा लाया। फिर बिना कुछ कहे उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।

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एक दम बाद मैंने उसकी ओर घूमकर कहा - अब तू सिर्फ़ मेरा है। मेरी पत्नी, समझ लिया? कह, मेरी होगी तू?
फिर साहिल ने तुरंत हां कर दी। मैं पलक झपकते में महसूस करने लगा - उसके होठ मेरे मुँह पर थे।.
एक अच्छा सामान मिल गया था, जिससे मैं ऐसे-वैसे ढंग से खेल पाया।.
ख़ुशी का पल था मेरे लिए।.
सारा रास्ता अब साफ़ हो चुका था।.
उसके चेहरे से शुरू करते हुए मैंने साहिल के शरीर पर होंठ फेरे। धीरे-धीरे, त्वचा के हर कोने को छूते हुए, कपड़े एक-एक करके दूर हो गए। अब वह पूरी तरह खुला पड़ा था, जैसे कोई बिना लपेटा रेशम।.
गांड उसकी इतनी मुलायम थी, मानो सौंफ के ऊपर रखा बादाम। किसी औरत के पास भी ऐसी नहीं होती।.
उसकी पीठ पर हाथ फिराते हुए दिमाग में ख्याल आया - इसे छूने का अहसास कैसा होगा।.
मेरे लंबे बालों को मिली किस्मत सच में कमाल है।.
साहिल मेरी चड्डी पहले ही नीचे कर चुका था। फिर मैंने अपना लंड उसके मुँह में धकेल दिया। उसके छाती पर हाथ फेरते हुए मैंने उसके मुँह से जबरदस्ती गति शुरू कर दी।.
उसके आँकड़ों से तो मेरा लंड काफी बड़ा था, पतलूदगी का नामोनिशान नहीं।.
अभी तक साहिल के पास गांड में कोई नहीं घुसा था।.
फिर मन में ख्याल आया - अगर मैं ऐसा करूँगा, तो पहली बार में दर्द जरूर होगा, साथ ही शायद रोना भी शुरू कर दे।!
उस पल साहिल मेरे लंड को गहरा उठाकर चूस रहा था।.
गरमागरम लौंड़ पकड़े हुए करीब पंद्रह मिनट बाद स्खलन हो गया।.
वीर्य बाहर आते ही, मेरा लंड साहिल के गले तक जा पहुँचा।.
शायद साहिल को मेरा वीर्य पीने का मन था। इसलिए उसने मेरे लंड को अपने मुँह में इतनी देर तक रखा, जब तक कि हर बूंद बाहर नहीं आ गई।!
थोड़ी देर में लंड का तापमान कम हो गया, उसके बाद वीर्य छूटने से वह ढीला पड़ चुका था।.
दस मिनट के लिए साहिल को थोड़ी छुट्टी दी।.
फिर मैंने उसे लंड चूसने को कहा। जैसे ही बोला, वह तुरंत चूसने लगा।.
एक बार फिर खड़ा हो गया मेरा, पांच मिनट बाद।.
मैंने साहिल को बिस्तर पर पलटकर लिटा दिया, फिर उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगा।.
ओह, वो पलसूत्र-जैसी सफेद, हमवार त्वचा कितनी नरम थी।!
उसकी गांड पर मेरा मुँह था, फिर आँखें उसके छेद में जम गई।.
साहिल अभी शादीशुदा नहीं था, इसलिए उसके पिछवाड़े का हिस्सा कसा हुआ था। वो चाहता था कि कोई बड़े लंबाई वाला आदमी उसे पीछे से धकेले।.
उसकी पीठ के बल लिटाकर मैंने नारियल का तेल हल्के हाथ से छेद के आसपास फैला दिया। धीमे स्पर्श के साथ तेल अंदर भी उतर गया।.
उसके बाद मैंने अपने मोटे-तगड़े 8 इंच के लंबे धम्मू पर नारियल का तेल लगा लिया।.
उसके बाद मैंने साहिल के छाती पर हाथ रखा, फिर धीमे से उसके पिछवाड़े के ऊपर अपना काला, मोटा घंटा टिका दियa।.
उसे एहसास हुआ, मैंने झटके के साथ लगभग पांच इंच लंबा लंड, साहिल के गुदे में घुसा दिया।.
उसकी मूंछें कांप रही थीं, जब मेरा पिंड उसके पिछवाड़े में धंसने लगा।.
अचानक साहिल की चीख निकल पड़ी - उई मां, हो गया खत्म... उफ्फ, बस! हवा में दर्द ठहर गया।!
उसके मुँह से कराहती हुई आवाजें निकलने लगीं।.
उसके होंठों पर गीलापन महसूस करते ही मैंने वो चड्डी आगे धकेल दी, जिसमें मेरा पेशाब अभी ताज़ा था।!
अब साहिल को मेरी चड्डी की गंध पसंद आने लगी थी।.
उसके पीछे में आधा लंबा धरातल मेरा फ़ैला हुआ था।.
थोड़ी देर के लिए, मैंने साहिल के पीछे अपना लंबा धर दिया। इस तरह वो महसूस कर सके कि मौजूद हूं।.
थोड़ी देर बाद, जब साहिल का धुंधलापन कम हुआ, मैंने उसके गालों से नमी हटाई। उसके बाद मैं खुद उसके पास झुका और हल्के से उसके माथे पर छुआ।.
थोड़ी देर में सात या आठ बार लंड अंदर-बाहर हुआ।.
गांड में फटने से साहिल को चीरा आ गया, खू.न बहुत कम मात्रा में निकला।.
फिर भी, इस वक्त कोई और ही बात मन में चल रही थी।.
अंत में बताने का इरादा था, वर्ना शुरूआत में ही मना कर देता।.
मेरा लंड का पाँच इंच हिस्सा साहिल की गांड में जा चुका था। अब आठ इंच को पूरा धँसाने का वक्त था।!
लंड का सिरा अंदर रखकर मैंने बाकी हिस्से को धीरे से बाहर खींच लिया।.
तब लंड को छोड़कर साहिल के ऊपर नारियल का तेल उंडेल दिया।.
मेरी चड्डी वापस साहिल के मुँह में जा पहुँची। उसे एहसास हो चुका था, अब उसकी तगड़ी मुश्किल में है।!
उसकी जांघें मेरे हाथों में आईं।.
लंड का सिरा अब भी साहिल के पिछवाड़े में धंसा हुआ था।.
एकदम अचानक मैंने फिर से हिलते हुए 6 इंच तक लंड भीतर डाल दिया।.
साहिल के पीछे का हिस्सा इतना सख्त था कि लंबाई वाली चीज़ पूरी तरह भीतर नहीं उतर पा रही थी।.
अब तो मैं पीछे हटने का सोच भी नहीं रहा था।!
एकदम अचानक, तीसरे ही झटके में साहिल के पिछवाड़े में 8 इंच का मोटा लंड पूरा उतर गया।.
आंसू छलक पड़े, साहिल की आवाज़ फंस गई। चुपचाप खड़ा वो, अपने दर्द को आंखों से समझा रहा था।.
उसकी आँखों से बहते पानी को देखकर मैंने रुकने की जगह धक्के देना चालू कर दिया।.
फिर मैंने धीमे-धीमे लंड अंदर व बाहर हिलाना शुरू किया।.
साहिल के मुलायम पेट में मेरी सख्त छड़ी धँसती जा रही थी।!
उसने दर्द से छुटकारा पाने के लिए झटका दिया, मगर मैंने तब भी उसे बचपन के आकार को देखते हुए कसकर पकड़ रखा।.
उसके नरम शरीर को देख मेरे भीतर की तपिश बढ़ रही थी।.
लगातार मैं उसकी पिछवाड़ को धक्के देता रहा।.
अब उसकी मलद्वार से धीरे-धीरे खून की बूँदें टपकने लगीं।.
उसकी पीठ के बल लेटने पर मैंने अपना लंड उसकी गांड में घुसा दिया। करीब 25 मिनट तक मैं वहीं रहा, हर धक्के के साथ थोड़ा और भीतर।.
तभी जब वीर्य बाहर आने वाला था, मुझमें फिर से ताकत भर गई। पंद्रह से बीस तक ऐसे झटके दिए, मानो कोई बकरे का मांस काट रहा हो!
अब तक साहिल की तबीयत इतनी खराब हो गई थी। मगर मैं क्या कर पाता, मुझे झड़प के लिए उकसाने वाला खुद साहिल था!
उसकी गांड मेरे लंड को सहन नहीं कर पा रही थी, फिर भी मैंने एकदम से पूरा लंड अंदर धकेल दिया और वीर्य छोड़ दिया।!
खू.न लंड पर था, चादर पर भी। बाहर निकलते ही यही देखा गया।.
खून से तरबतर, साहिल की पूरी गांड सूज चुकी थी।.
जब मैंने साहिल के होंठों से अपनी चड्डी खींची, तभी वह बुदबुदाने लगा।.
ऊँचाई से गिरा दबंगपन, एक ही झटके में कसरत खत्म।
थोड़ी देर को मैंने उसे गले से लगा लिया, फिर होठों से छुआ।.
तबीयत खराब होने पर उसे दवा देनी पड़ी, बुखार कम हो जाए इसलिए।.
साहिल के बटन में दर्ज हो चुकी थी तकलीफ, आगे बढ़ पाना मुश्किल हो गया।.
उसकी कमजोर पीठ पर हाथ रखते हुए मैंने कदम आगे बढ़ाया।.
जब बाथरूम में झांका, तो पता चला कि उसकी गांड़ बिल्कुल फटी हुई थी। अंदर खू.न ही खू.न था।.
पानी में धोकर हम दोनों ने सब कुछ साफ़ किया, उसके बाद साहिल को आराम करने के लिए लगा दिया।.
अगली सुबह साहिल काम पर नहीं पहुँचा। उसकी पीठ के नीचे तेज दर्द था, इसलिए कदम बढ़ाना मुश्किल हो गया था।.
हवा थोड़ी सर्द हो चली थी, मैंने कमरे में कदम रखते ही उसके लिए फल और ठंढा डिश निकाला।.
उसकी ओर झुका मैं, आलिंगन में ले लिया। एक चुंबन दिया। फिर बोला - तुम सही हो न, मेरे छोटे?
बस इतना कहते ही साहिल मेरे से चिपक गया। उसकी आवाज़ काँप रही थी - मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा, बस मुझे अकेला न छोड़ना।!
मैंने कहा था - साहिल, हम अलग नहीं होंगे, जब तक खुद न बोलो।!
इसके बाद, एक और चुम्मा लिया गया - उसकी बाहों में खो जाने के साथ।.
दिन भर विश्राम करने के बाद साहिल को पहले जैसा तकलीफ महसूस नहीं हो रही थी। उसके पेट का दर्द भी खत्म हो गया था।.
खाना खाते-खाते हम टीवी के सामने हॉल में पहुँच गए। करीब 11 बजे दोनों बेडरूम में जा पहुँचे, नींद के लिए तैयार होकर।.
अचानक मैंने साहिल से कह दिया - अगले दो दिन कोई सेक्स नहीं, कोई तड़खेल भी नहीं।!
साहिल ने जवाब दिया, ठीक है, तुम चढ़ाई न करो, पर मैं तुम्हारा लंड चूसे बिना सोऊंगा नहीं। अब ये मुझे रोज चाहिए।!
ख़ुशी ने ऐसे घेर लिया कि संभलना मुश्किल हो गया।!
उसके बाद साहिल वापस आया, घड़ी में ग्यारह बजकर तईस मिनट थे। उसने मेरे लिंग पर ध्यान दिया, मुंह से छेड़ना शुरू कर दिया।.
थोड़ी देर मैं संभला रहा, पांच से दस मिनट बाद साहिल को बिना कपड़ों के उल्टा कर चढ़ाई शुरू कर दी।.
दर्द कम हुआ, इस बार साहिल के होंठों पर मुस्कान थी।.
उस रात मैंने साहिल को फिर चोदा, पहली बार के बाद भी नहीं रुका। उसकी गांड ऐसी लगी जैसे रुई का टुकड़ा हो, इतनी सफेद और मुलायम। दोबारा घुसा, फिर तीसरी बार भी नहीं रोक पाया। हर बार अंदर जाते हुए लगा कि यही सही जगह है।.
उस रात के बाद, जब मैंने तीन बार उसकी गांड फाड़ी, साहिल का होल मेरे लंड के साथ ढीला पड़ गया।.
हर रात, अब हम दोनों मिलकर सोते समय एक-दूसरे के साथ शारीरिक संबंध बनाने लगे।.
शनिवार की रात से लेकर रविवार की रात तक, छुट्टी के दो दिन पूरे ज़ोर-आज़माइश में बीतते। हर घंटा एक साथ जुड़ा रहता, ऐसे जैसे समय थम गया हो। रविवार खास होता, लेकिन पूरी लय सबसे अलग चलती।.
अब तो हिंदी में गे सेक्स की वजह से घर का ख्याल ही नहीं आता था। फिर जाने का इरादा भी धीमा पड़ चुका था।.
उस वक्त से लगभग तीन साल तक मैंने साहिल के साथ संबंध बनाए।.
उसके साथ मेरी हर छुअन में गहराई थी।.
साहिल की गांड हर बार चुदाई के बाद मेरे बड़े लंड को समेटने लगी।.
एक दिन साहिल के पिता की मृत्यु हो गई। घर में कोई वयस्क नहीं रहा। फिर साहिल को नौकरी छोड़कर इलाहाबाद लौटना पड़ा।.
उसके चले जाने पर लगा, जैसे मेरी रूह भी साथ उठ गई हो। मन में यही धधक थी।.
एक तरफ़ मैं, दूसरी ओर वो - अलग धर्म के। पर ज़िदगी ने हमें एक सुर में बाँध दिया था।.
कभी-कभी प्यार के लिए छोड़ना पड़ता है, दोस्ती में झटका सहना पड़ सकता है।.
फिर साहिल को घरवालों के पास जाना पड़ा।.
हमारी मुलाक़ातें अब पुरानी बात लगने लगी हैं। कभी-कभी ख़्याल आ जाता है।.
जब साहिल फ़ोन करता है, रो पड़ता है - मेरी याद आ जाती है।.
फिर भी मैं उसके बारे में सोचता हूँ। फोन उठाने से पहले रुक जाता हूँ, खतरा महसूस होता है। कहीं ऐसा न हो दिल कमजोर पड़ जाए। शायद सब कुछ बिगाड़ बैठूँ, साहिल चला जाए।.
ख़ुशी से भरा है साहिल का सफ़र, परिवार के साथ जुड़ाव में। बातचीत कम हो गई है मेरी उससे, ऐसे चल रहा है सिलसिला।.
जो हिंदी में गे सेक्स कहानियाँ पढ़ना पसंद करते हैं, उनका ख्याल जरूर आगे बढ़े।.
धन्यवाद.लिटाकर

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