पड़ोसी भैया ने खोला मेरी गांड का यौवन

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JaiJai
Jan 19, 2026 - 11:44
Jan 21, 2026 - 19:39
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पड़ोसी भैया ने खोला मेरी गांड का यौवन

एक कहानी में ऐसा हुआ कि गांड मरवाने का मजा चढ़ गया। पिछले कई दिनों से मेरे साथी ने वो नहीं किया था। फिर उसने एक अजनबी आदमी से मेरी मुलाकात करवाई। उसके बड़े लिंग ने मेरी गुदा फाड़ दी।.
नमस्ते, जो लोग लंड, चूत या गांड के मजे में विश्वास रखते हैं। पिछली बार मैंने अपने सहपाठी के साथ ऐसा कुछ किया, जिसमें गांड भी शामिल थी।
मेरी पहली बार ऐसा हो रहा था।.
फिर आशीष हर रोज़ मुझे तीन महीने तक चोदता रहा, धीरे-धीरे मेरी गांड के साथ-साथ मेरा डर भी खोलता गया।.
तीन महीने लगातार ऐसा होने के बावजूद, पिछवाड़े के गड्ढे की सूरत में खास बदलाव नहीं आया।.
फिर से बस के छेद में फैलाव आया, एकदम तंग नहीं रहा। उधर भीतर तक पहुँचने की दूरी पहले से कई गुना अधिक हो गई।.
जैसे-जैसे घटनाएँ आगे बढ़ीं, मेरा रूप धीरे-धीरे बदलने लगा। शुरू की सफेद कली जैसी छवि गायब होती गई। उसकी जगह कुछ अलग सा भाव आ गया। अब मैं खुद को पहचान पाना मुश्किल कर रही थी।.
इसका हर हिस्सा मेरे शरीर से परे, आत्मा से भी ऊपर उठने लगा।.
अब तक ऐसा कोई ख्याल दिमाग में नहीं आया था। तीन महीने से वही आदमी है, जिसके साथ ये होता रहा।.
उसके बाद जो हुआ, पूरा मामला इतना घटिया है कि सीधे-सीधे एक्सएक्स फ़िल्म जैसा लग रहा।
परीक्षा के बाद सब शांत हो गया था।.
अब तक आशीष का वो हमला जारी था।.
कई बार सप्ताह में दो दिन ऐसा होता कि वह मेरी बजा देता। पूरी रात तक यही चलता - गांड फाड़ने का सिलसिला, बस दोनों के बीच।.
दो हफ़्ते तक, एग्जाम खत्म होने के बाद, मेरी पिछवाड़ी से कोई वैसा घटनाक्रम नहीं घटा।.
गर्लफ्रेंड के साथ समय बिताने में आशीष इतना उलझ गया।.
दो सप्ताह बाद फोन आया। कहने लगा, "अब कैसी हो मेरी जान, मुझे पहचान भी लिया?"?
मूंछें सिकोड़कर मैंने कहा - हां, अच्छा होता अगर मुझे भी कोई प्रेमी मिल जाता।!
कभी-कभी बस इतना होता है... गुस्सा छोड़ दे मेरी जान, आज सिर्फ तुझे याद करके फोन उठाया।.
मैंने कहा- मतलब?
जान, सुना तुम्हें? पीयूष भैया मिलने के बारे में कह रहे थे।!
पीयूष भैया वो हैं जो आशीष के पास रहते हैं। उन्होंने पिछली बार मेरी चुदाई देख ली थी।
बस देखना है तुम्हें या कुछ साथ में करने का भी मन है?
हाँ, तुम्हें उनसे खुद बात करनी चाहिए। मैं तुम्हें नंबर भेज रहा हूँ। इस वक्त उनके ऑफिस में छुट्टियाँ चल रही हैं। घर पर रहने के लिए वे तुम्हें दो दिन के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। !
लंबे समय बाद दिमाग में ख्याल आया - कहीं और कदम रखने का।.
मैंने धीरे से कमर हिलाकर पूछा - तभी क्यों?
दोस्त, तेरा दिमाग अब तनख्वाह के बाद निकल रहा है… क्या अब भी समझ नहीं आएगा कि वो तुझसे क्या उम्मीदें लगाए बैठे हैं? चलकर देख ले, वो तेरे लिए कुछ ऐसा सजा चुके हैं जो तू सोच भी नहीं पाएगा। .
ठीक है, मैंने कहा, तुम नंबर भेज दो। फिर मैं खुद उनसे बात कर लूंगा।.
जैसे ही आशीष का कॉल खत्म हुआ, नंबर मेरे पास पहुँच गया। फिर बिना समय गवाए, मैंने डायल कर लिया।.
पीयूष जी की तरफ से कोई बातचीत चल रही है? मैंने कहा - हैलो।?
सुनो... पीयूष जी... इतनी जल्दी मेहरबान हो गईं क्या?
गुस्सा तो मन में था ही, पर चेहरे पर लालिमा छा गई।.
उसके बाद वो बोला - आशीष ने कहा था कि तुम मेरे से मिलने की इच्छा जता रहे हो।!
पीयूष ने कहा - हाँ, मुलाक़ात करने की इच्छा बहुत पहले से थी। अभी वक्त मिल गया है।.
मैंने पूछ लिया - आगे क्या हो रहा है?
शाम को पानी की तलाश में हो? पीयूष के घर चलिए।!
मैं चुप रहा.
थोड़ी देर ठहरकर पीयूष भैया बोले - सुनिए बेगम, हम जब वाद्य छेड़ते हैं, चाहे मर्द हो या औरत, जवानी खुद-ब-खुद हमारी तरफ झुक जाती है। इसके बाद उसका बजा हुआ शरीर कई सप्ताह तक किसी के लिंग की मांग नहीं करता।.
एक लड़का हूँ मैं, पर कल रात से मन में बस इतना है - चाहे जवान लड़की न हो, प्यासी घोड़ी की तरह भी चलेगा, बस चुदने का मन है।.
चलो पगड़ी का सवाल है। अब तो बस यही रह गया - चांद तक जाकर इस घोड़ी की बानगी दिखाऊं। वरना फिर क्या मर्द हूं मैं? ऐसे भी तो नहीं छोड़ूंगा रानी।!
कहा था मैंने – लिल्लाह… सच कहूँ, तो पैर ही पैर में चाँद नजर आने लगा है।.
पीयूष ने कहा, सिर्फ अपने पैर ऊपर करके रख। मैं आऊंगा और तुझे मारूंगा।.
बात समाप्त होते ही, मैं उसके घर की ओर चल पड़ा। दस बजे के लगभग पहुंच गया।.
तीसरी मंज़िल पर सिर्फ आशीष और पीयूष भईया के फ्लैट थे। जहाँ वो रहते थे, उसी इमारत में ये दोनों मिलकर अपना घर संभालते थे।.
वहां एक बड़ी सी छत पर खुली जगह भी थी। कुछ पौधों के साथ उसे छोटा सा बगीचा जैसा बना दिया गया था।.
वहाँ एक सोफे के पास झूला लटक रहा था।.
तीन दिन में आएंगे उसके घरवाले, यह बात आशीष ने पीयूष भैया से कही थी।.
आखिरकार, वे तब जा सकेंगे जब परिवार का काम खत्म हो जाए।.
एक छोटा भाई है आशीष के परिवार में, नाम जिसका विशेष सुनाई देता है।.
सुबह-सुबह आने के बाद वो सीधे जिम पहुंचेगा, इस बात की जानकारी आशीष ने दी। उम्र अभी कम है, ये भी उसने कहा। जिम से लौटकर घर जाएगा वो।.
सुबह ग्यारह बजे तक आशीष के मतलब था कि फ्लोर पर किसी के होने की संभावना नहीं।.
अँधेरा छा चुका था, मैं पीयूष के दरवाज़े पर खड़ा हुआ।.
फिर वो बोला, "अंदर चली आओ, गेट तो खुला पड़ा है।".
अंदर कदम रखते ही एक सुगंध ने घेर लिया।.
सोफे के किनारे जगह लेकर पीयूष वहीं बैठ गया।.
उम्र में आठ साल आगे था वो मेरे।.
तभी उसके हाथ में रिमोट आया, फिर अचानक सुरीली धुन सुनाई देने लगी।.
उस पल सुनाई दिया एक गीत - दिल की धड़कनें तेज हो उठीं।.
मैं गाना सुनते ही महसूस करने लगा, जैसे कोई बदलाव चेहरे पर उभर रहा हो।.
दाँतों से होंठ पर निशान पड़ गया।.
पीयूष ने कहा - तुम्हारे ऊपर ये मर्दों के कपड़े फबते नहीं, तुम बस ऐसे ही झूठे ढंग अपनाओ। उधर ले लो ब्रा और पैंटी… ये वो है जो मेरी मंगेतर छोड़ गई, तुम्हारे साइज के आदमी जैसी। अब डाल लो इन्हें पहनकर… खासकर तुम्हारे लिए ही छोड़ी थी वो चीजें, तुम तो उसी तरह की बनी हो।.
हिलते हुए बोला मैं - आशीष से तो सुना था कि आप मर्दों जैसे मेरे पर, और उन औरतों पर भी, ऐसा सख्त ढंग से सेक्स करते हैं। फिर मुझे खुद नंगा करके ये सब कपड़े पहना दीजिए!
अचानक पीयूष बोला – अरे पगली, क्या तुझे पता भी नहीं कि तू एक शेर के सामने खड़ी हो गई है। इतनी घमंडी हैसियत हो तो कोई और होता… तुझ जैसी धूल में मिल जाएगी, दो मिनट की बात है। .
अच्छा मैंने कहा – चलो प्रभाव देखते हैं सुबह तक किसका शरीर अधिक डगमगाता है।!

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अंदर तक महसूस हो रहा था - इस खेल का अंत मेरी हार से ही होगा। पीयूष भैया के सामने टिक पाना मुश्किल था, वो बहुत अनुभवी थे।.
सुबह तक तेरी दोनों टांगें ढीली कर दूंगा, पीयूष भैया ने कहा। अगर साली को मुर्गी की तरह उल्टा न लटकाओ तो बस इतना कहना।.
इस वक्त मुझे एहसास हो चुका था कि रात भर के लिए मेरे सामने एक ऐसा आदमी था, जो सवारी करते-करते मुझे अंतिम सीमा पर ले जाने वाला था। उसकी वजह से प्यास और गहरी हो जाएगी, ऐसा लग रहा था।.
पीयूष सोफे से उठा। ब्रा पैंटी हाथ में लेकर आगे बढ़ा। अचानक, शेर की तरह वह मेरी ओर झपट पड़ा।.
पीयूष - मैं हर उतार-चढ़ाव में तेरे साथ चलने को बरसों से तैयार था। आज शाम, इमारत के हर कोने में तेरी आवाज़ सुनाई देनी चाहिए।.
वह मेरी बाँह पकड़कर खींचने लगा। कपड़ों को हटाने में देर नहीं लगी।.
थोड़ी देर में, सोफे पर कपड़े बिखरे पड़े थे।.
वो मुझे मोड़ चुका था, फिर सीने पर ब्रा डालकर हुक लगा दिया।.
उसने मेरी जांघों को अलग किया, फिर पैंटी डाल दी।.
थोड़ी सी तंग महसूस हो रही थी पैंटी।.
दिमाग में ख्याल आया, उनकी वो औरत जिससे शादी करने वाले हैं… मेरी गांड से कहीं बड़ी है।!
तू यहाँ आकर खड़ा हो जा… पैंट नीचे कर दे!
जब मैंने अपनी पैंट नीचे की, एक काला सांप सीधे मेरे मुँह पर आ धमका। वो आठ इंच का था, और खड़ा हुआ था।.
हवा में जैसे कुछ रुक सा गया, जब उसे देखा।.
भैया ने थोड़ा सा रुककर मेरे नाजुक होंठों पर हल्का सा झटका दिया। फिर बिना कुछ कहे मेरे मुँह में वो चीज डाल दी।.
अब तक तो आशीष के सात इंच के लौड़े ने मेरे मुँह में लंबे लौड़े चढ़ाने की आदत डाल दी थी।.
पीयूष का आठ इंच का लौड़ा मेरे होंठों पर उस तरह सवार था, मानो कुछ ही देर में मेरे होंठ फूलकर बड़े हो जाए।.
उसने मुझे लौड़ा मुँह में डालते हुए इधर-उधर घुमा दिया था।.
फिर उसने मेरी छाती पर हाथ फेरना शुरू कर दिया। किचन में हम दोनों खड़े थे।.
उसने मेरे स्तनों पर शहद डाल दिया। फिर धीमे स्वर में बोला - तुम हो मेरी मधुमक्खियों की राजकुमारी। आज इस उभरे हुए शरीरवाले आदमी को छेड़कर उसका सारा शहद चूस लूंगी।.
फिर मैंने कहा - चलो, अब मेरी बारी है।!
उसने सुनते ही मेरी पैंटी पकड़ कर फाड़ दी, फिर गांड में शहद भरना शुरू कर दिया।.
उसके हाथ से लंबे बालों की तरह छनता मधु धीमे-धीमे नीचे गिरा।.
उसने कमर पकड़ी तभी। मानो हवा में उड़ते फूल को छुआ हो। ऐसे घसीटा, जैसे भार नहीं, सपना हो। हॉल तक पहुँच गए, मुझे झूलते हुए।.
गाना टीवी पर बज रहा था, हॉल के अंदर सामने की दीवार पर।.
उसके मुँह से दूध की बूँद टपक रही थी। फिर वो चीज़ धीमे से भीतर घुस गई। क्या हुआ, समझ ही नहीं आया।.
मैंने अपने आप को चिल्लाते हुए पाया, वो शोर उस म्यूज़िक से ऊपर था जो टीवी पर बज रहा था।.
गप-सप के बीच अचानक चीख निकल पड़ी… हल्का सा झटका लगा, फिर धीमे स्वर में कुछ बड़बड़ाया… एक पल को सन्नाटा छा गया।
उसके हंसने की आवाज़ फैल गई, धमाकेदार ठहाका पड़ा - एह, सुन, अब तो बस इतना ही कहूंगा: तेरी और भाभी की गप्पों का अभी शुरू हुआ है पास। चल, देखते हैं कैसे टिकता है सामना।.
उसने कहा, और मेरे होंठ पर हथेली रखकर बंद कर दिए।.
मेरी चीख उसकी सख्त मुट्ठी के सामने बस गले में ही अटक गई।.
उसने मेरी त्वचा पर हथेली रख दी, एक ओर से।.
फिर उसने अपना लौड़ा गांड से बाहर खींच लिया। दूसरा शॉट तैयार करने लगा।.
आवाज़ निकलते ही वो मेरे पीछे आ गया। फिर बिना रुके, धक्का देकर हथियार भीतर तक पहुंचा दिया। मैं सिसक उठी, मुँह खुला का खुला रह गया।!
दर्द के साथ-साथ मज़े भी इस बार महसूस हुए।.
आज जो मुझे ख़ुशी मिल रही थी, वो सब तब की मेहनत का असर था। हरजाई खसम आशीष ने उस दिन मेरी गांड पर अपने मोटे लौड़े से जिस तरह काम किया था, बस इतना ही कहूंगी।.
जीभ मेरे होंठों के बाहर निकल आई। गले में अटकी एक ध्वनि छूट गई - ‘ऊऊह, उफ, यार इस बदमाश ने तोड़ दिया… पीयूष, ओ मेरे दिल के साथी, ऐसा क्या झेला तूने?’
उसने एक और गोली चलाई, मुस्कुराते हुए कहा - अब ठीक बोल रही है धत्ते। ओय, भइया की छोड़, लंड पे झपट!
सांस थम गई, बस दो हिलोरों में वो जन्नत के पास पहुँच गया। हवा ने कहा, अब इस घोड़े को चाँद तक ले चल।
एकाएक वो मेरे स्तन को निचोड़ते हुए, आहिस्ता-आहिस्ता मुझे प्रेम करने लगा।.
बोला मैंने, "क्या बात है जानी… ऊब तो नहीं गए?" - गुस्सा आए इसलिए।!
पीयूष ने कहा - थकना नहीं पड़ता, रानी, थकान खुद चली आती है। जहां गड्ढा मिला, वहीं अपना लंड उतार दिया। आज रात तो तू घोड़ी बनेगी, और मैं तेरी गांड का बवाल मचा दूंगा, साली रंडी!
थोड़ा सा कहकर वह तुरंत तेजी से हिल गया।.
दर्द के बीच से मीठी आवाज़ें फूट पड़ीं - ‘वाआह्हह आह हाय हुउई उम्ममा … आई।’
खुला हुआ मुँह मेरा, और अंगड़ाई... वो बढ़ता गया। झटकों की तेजी से पता चल रहा था - उसका उत्साह और भी तेज हो रहा था।.
धक्के की आवाज हर तरफ फैली हुई थी।.
उसके हाथ मेरी छातियों पर थे, धीरे-धीरे मेरे साथ चल रहे थे।.
हर एक धक्के के साथ मेरी कमर हवा में उछलने लगती। लंड पूरी तरह से गांड के भीतर घुस जाता।.
आशीष की लंबाई होते हुए भी, मेरे अंदर उसका सिरा एक खास जगह तक ही पहुँच पाया।.
कुछ पल के लिए मैं हंसते-हंसते अपनी आवाज़ बदल रहा था।.
उसने बहुत देर तक मारा, कम से कम तीस मिनट तो होगा।.
तब तक सोफे पर बैठा आदमी मेरे पीछे हंस रहा था। वहीं दीवार के सामने टीवी में सलमान खान धीमे स्वर में गाना गा रहे थे।.
उस आधे घंटे ने, जब पीयूष ने खेल को बदल दिया, मैं सीधा स्वर्ग पहुंच गया।.
अब पता चल गया था, मेरी जवानी किसके क़ब्ज़े में है।.
मेरे सांड के धक्के तेज हो गए थे, ऐसा लग रहा था जैसे वह अपना रस छोड़ने वाला हो।.
पेट तक गर्माहट का अहसास तब हुआ, जब कुछ पल में ही तीखी लहर सिकुड़ती हुई।.
एक बजा था रात के समय। उसकी जाँघें मेरे हाथों का इंतज़ार कर रही थीं, फिर से तैयार खड़ी।.
उस वक्त मेरे अंदर भी काफी उत्साह था।.
वह मुझे घोड़ी बना दिया, फिर अपनी पूरी लंबाई मेरी गांड में उतार दी। धीमे हलचल के साथ वो भीतर तक पहुंच गया।.
अचानक ही उसने खींचना शुरू कर दिया।.
मुझे अब उसकी बातों पर हंसी छूटने लगती थी।.
काँप रहा था मेरा पूरा शरीर।.
उसके कंधे पर सवार होते ही वह मुझे उठा कर सोफे तक ले गया।.
तब तक आधे घंटे में वो बमपिलाट हिला चुका था। सामान उलट कर वो सब मेरे ऊपर डाल गया, छाती पर फैल गया सब कुछ।.
तीन बजकर कुछ मिनट पर, सब कुछ दोहराया गया। हमले की शुरुआत उल्टी लेटकर की गई थी।.
मसलने के बाद से पूरी तरह घबरा चुका था।.
पेट में उसका वीर्य भरा पड़ा था, सूजा हुआ सा अहसास हो रहा था। खाली करने का मौका बिल्कुल नहीं दे रहा था वो।.
उसने मुझे देखा। किताब के पन्ने पलटते हुए बोला - जितने सवाल तुमने पूछे, उतनी बार मैंने सच छुपाया।?
फिर उसने तेजी से कहा - जवानी में पहले मौके पर इसी मकान की एक लड़की के साथ संबंध बने थे, आज वो यहाँ नहीं टिकी। उसके ठीक बाद, घर में काम करने वाली चपल औरत के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।.
उसने कहा ये सब, मुझे दीवार के सहारे खड़ा करके पीछे से समेटना शुरू कर दिया।.
फिर वो बोलने लगा। पास के स्कूल की एक महिला शिक्षिका के साथ मेरा संबंध हुआ, वो काफी उत्तेजित करने वाली थी। इसके बाद लड़कों की ओर भी मेरा झुकाव हुआ। एक कॉलेज के साथी को मैंने समलैंगिक गतिविधि करते देख लिया, फिर उसी जगह उसके साथ शारीरिक संबंध बनाया। धीरे-धीरे वो मेरा साथी बन गया। उसके बाद मैंने कई बच्चों के माँ-बाप, पुरुष, महिलाओं के साथ संबंध बनाए। पर उस लड़के को छोड़कर किसी के साथ दोबारा नहीं हुआ।.
इतने सारे? मैंने पूछा।?
उसने घमंड से कहा - इसे तो अलग ही रख... पर जो बात अब बताऊँगी, सुनकर शायद यकीन न हो, पर मैंने अपने लड़के की माँ को भी थप्पड़ मारा था, वो भी उसके बोलने पर।!
सिर हिलाते हुए मैं पीछे हट गया, उधर वो बेसुध होकर धीमे से कुछ बड़बड़ाने लगा।.
उसने आगे कहा - फिर मैंने अपनी लड़की की बात मान ली। अब शादी के बाद ही कुछ करूंगा, इसके बजाय मैंने उसकी माँ के साथ भी वैसा ही किया।.
सुनकर मैं बोल पड़ा - अच्छा, इतने में सासूजी को भी तंग किया?
हाँ, उसकी माँ को गाँव वालों ने सबसे शिष्ट महिला घोषित कर दिया था… बहन के बच्चे की तरफ़। मगर मुझे पता था - अक्सर जो सबसे ज़्यादा ढकी-ढँकी रहती हैं, उन्हीं के भीतर सबसे गहरी तड़प होती है। इसलिए जब अवसर आया तो मैंने कोई देर नहीं की, धीरे से उसकी चोली खोली और उसकी चुत को अपने लंड से भर दिया।.
छह बजे सुबह पीयूष मेरे ऊपर चढ़ गया। उसके अंदर अभी भी ताकत थी, मगर मैं हार चुका था।.
वो यह भी कहता गया कि दो चचेरे भाइयों के साथ तमाम मौके बने। फिर एक बड़े चाचा पर भी ऐसा ही हुआ जो कभी-कभी घर आते थे।.
इतना सुनकर मन खुश हो गया।.
वो बोली, मेरा बॉयफ्रेंड है। तुम हो। इनके सिवा किसी और के साथ पूरी रात नहीं गुज़ारी मैंने।.
बस इतना कहकर वो सीधे मेरे पिछवाड़े में उतर गया।.
आज इतना सब हो चुका कि अब थोड़ी छुट्टी मिल गई।.
फिर वो बोला - चलते हैं, बाहर ठंडी हवा में कुछ देर गुज़ारें।.
बेहोशी के अंधेरे में, वो मेरे साथ आगे बढ़ गई। फिर मेरे घुटने उस झूले पर टिक गए, जो बालकनी में लटक रहा था। हाथ धीरे से नीचे आकर जमीन को छू गए।.
उसने खुद को झूले पर बैठाया, फिर मेरी तरफ बढ़ गया।.
उसने मेरे पिछवाड़े पर तेजी से धक्के देते हुए कहा - अब बता, मेरी लड़की, आज किसकी जीत हुई?
अब मैंने हार मान ली। मैंने कहा - तुम्हारे सामने तो संस्कारी पर भूखी औरतें भी झुक जाएँगी, चाहे वो कितना भी भूखा मर्द क्यों न हो।.
अचानक पीयूष के दिमाग में बात आई - कोई हमारी ओर घूर रहा है।.
थोड़ा सा सिर हिलाया उसने, पकड़ में आया नजर आशीष के भाई विशेष का, जिम से बच निकला था वो।.
वो मुझे झूले पर लड़की के साथ होते देख गया।.
मेरे जानकारी में यह बात नहीं थी। पीयूष भैया ने कुछ नहीं कहा, सोचा होगा कि मन खराब न हो।.
पीयूष ने देखा कि मेरी टांगें सूज चुकी हैं। फिर वह मुझे उठाकर कमरे में ले गया। थोड़े झटके लगे। दोनों एक साथ लुढ़क पड़े।.
ग्यारह बजे के आसपास हम दोनों ने आखिरकार आँखें खोलीं। तब धीरे-धीरे तैयारी शुरू की।.
कॉफी का स्वाद था पीयूष के हाथों का।.
इसके बाद, पानी की धारा में खड़े होकर वह और मैंने शुरू किया।.
तभी उसके दिमाग में यह ख्याल आया कि वह मुझे नहलाएगा, इतने में फोन पर मैसेज पड़ा - उसकी मंगेतर बता रही थी कि घर आने में अब एक घंटे का वक्त है।.
मैंने पूछा - तो क्या अगली घटना हुई रद्द?
आशीष अब दस मिनट में पहुँच जाएगा, पीयूष – बचा हुआ वक्त उसके साथ कटेगा।.
मैं मान गया.
फिर आशीष वहाँ पहुँचा। नहाने के दौरान उसने मेरे साथ जुड़ाव बनाया।.
अगली बार जब सेक्स कहानी आएगी, तो पता चलेगा कि सब कुछ कैसे हुआ।.
उस दिन पीयूष जी ने मुझे प्यासी रांड कहा। वादा किया कि फिर से मेरे अंदर तक जाएंगे।.
इसके बाद वाले हिस्से में जो हुआ, उसे पढ़ना होगा। आशीष के साथ एक और आदमी था, जिसने मेरे ऊपर अपनी ताकत का एहसास करवाया। वो मेरे ऊपर बैठ गया, लौड़े पर डूबी मैं। धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ - अब मैं चुदासी हूँ।.
इतने पर मैं अलविदा कहकर चलता हूँ।.
इस बार कुछ अलग होने वाला है। जब तक Xx कहानी खत्म न हो, तुम चूत और गांड में मस्त रहो।.

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