उस दिन खान अंकल के हाथ से मुझे तमाचा पड़ गया
एक दिन पुताईवाला हमारे घर आया। मैं उसके घर गया, तभी अब्बू को वहाँ देखा। फिर वो मुझसे जुड़ गए, प्यार से भर गए। धीरे-धीरे हम दोस्त बन गए। एक बार उन्होंने मेरी गांड मारी।.
अहान कहते हैं मुझे। उम्र तेइस साल से थोड़ा ज्यादा है। चेहरे पर गोरापन है, कद छोटा-सा, बदन ढीला। लोगों को मेरी आवाज़ भाती है।.
आवाज़ कहीं न कहीं लड़कियों जैसी साफ़ और मीठी लगती है।.
अब तक कितना कुछ समझ लिया होगा तुम।!
अब बारी है मेरी नई कहानी पर चलने की…
एक बार की बात है, मैं उस वक्त 19 साल का था।.
उस वक्त दिवाली के दिन चल रहे थे।.
सफ़ेदी का वक्त आ गया था, इमरान भाई को बुला लिया गया।.
रंग तो कर दिया, हालाँकि पेंट वाला सामान घर पर ही रह गया।.
मेरे घर में ही उनका सारा सामान पड़ा रहा।.
एक महीने तक दिवाली के बाद इमरान भैया के घर न आने पर मेरे पिताजी ने कहा। बेटा, कॉलेज जाते वक्त उनके यहां रुक लेना। अपना सामान ले जाने को कह देना।.
ठीक है, मैंने कहा, पापा।.
घर पहुँचा था मैं इमरान भाई का, वहीं सामने हुए उनके पिता।.
अब पता चला कि इमरान भाई की शादी हो गई है। घर जाने की वजह से वो अपने गाँव में हैं।.
बातचीत के दौरान यह भी पता चला कि इमरान भाई सिर्फ पापा के साथ रहते थे।.
बहुत समय पहले उसकी माँ नहीं रही।.
चाय पीने का सवाल अंकल ने मुझसे किया - बेटा, तुम्हें चाय चाहिए?
अब सुनकर वो बोले - हां, मैं पीता हूँ, चाचा!
चाय बन गई थी, फिर वो दोपहर में हल्के से उबली। एक के बाद एक कप में डाली गई, धीमे हाथ से। खिड़की के पास बैठे, भाप छोड़ते कप के साथ शब्द निकले। कभी ठहराव, कभी तेज़ आवाज़ में बोलचाल चली।.
उसने मुझसे पूछा, चाचा उस चीज़ को क्या करेगा?
अगली बार वो सामान ले लेंगे, ऐसा चाचा ने कहा। इमरान के आने का समय किसी को नहीं मालूम!
बस मैंने कह दिया - हां, सही कहा आपने, चाचा।.
थोड़ी देर के बाद मैं कॉलेज की ओर निकल पड़ा।.
अब सुनिए, वो शख्स जिन्हें आप अंकल कहते हैं, पचास से थोड़ा ज्यादा के हो चुके हैं। उनकी दाढ़ी में धारीदार रंग आ गया है, कहीं सफेद, कहीं गहरा।.
लगता है जैसे उनका बदन गानेवाले बादशाह जैसा हो। कभी कमीज़-धोती में भी नजर आ जाते हैं।.
घर के अंदर कदम रखते ही एक ओर झूठा छप्पर नज़र आता। वहाँ पर पर्दे से ढकी जगह है, जिसका इस्तेमाल पेशाब के लिए किया जाता। ऊपर कोई कमरा नहीं, सब कुछ सीधे धरती पर टिका हुआ।.
खाली आंगन आगे है। उसके पास दो कमरे हैं। तिरपाल से आंगन पूरा ढका हुआ है।.
एक कुर्सी वहाँ पड़ी है, उस पर अंकल कई बार आकर टिक जाते हैं।.
लोग पड़ोस में उन्हें खान साहब कहकर बुलाते हैं।.
मगर फिर भी, दीपों की रौशनी के पीछे छुपा दिसंबर धीरे-धीरे सामने आया।.
घर में कोई नहीं रहा, सबके पैरों ने गाँव की ओर चलना शुरू किया था।.
तब मेरे पास काम का बहुत दौर था। इसीलिए वहाँ जाना संभव नहीं हुआ।.
बरसात के बाद हवा में सर्दी चढ़ गई थी।.
घर की ओर चलते हुए कॉलेज से, खान अंकल का सामना हुआ।.
फिर वो बोल पड़े - मैंने सामान क्यों नहीं दिया।?
बोला था मैंने – माफ़ करना चाचा, मुझे याद ही नहीं रहा… घर पर कोई भी नहीं था, किसी ने टोका भी नहीं। इस वक्त मेरे एग्जाम चल रहे हैं, तभी तो ध्यान भी नहीं रहा।.
बुज़ुर्ग ने कहा, "ठीक है, ध्यान से सुन लेना।"!
अब मैंने कहा - थोड़ी देर में सौप दूंगा।.
ऐसा कहकर वापसी की मेरी राह।.
खाना तैयार हुआ। फिर मैंने वो गरम-गरम खाया। जैसे ही प्लेट साफ हुई, कार्टून शुरू हो गए।.
अचानक बत्ती जाने पर स्क्रीन अँधेरी हो गई।.
दस बजने को था, मैंने मोबाइल पर नज़र डाली।.
सोचा, तुरंत चल पड़ूँगा। अबी चाचा को सामान पहुँचा देना है।.
एक सिरे से दूसरे तक काले मखमल की चादर में लिपटा हुआ था मैं। पसीने से भीग रहा था, बावजूद इसके कि हवा ठंडी चल रही थी।.
सामान उठाकर मैंने दरवाज़े पर ताला डाल दिया, फिर चल पड़ा अंकल के घर।
जब मैं चाचा के घर पहुँचा, तो मैंने बुलाया। ठीक उसी पल रोशनी हो गई।.
बोला मैंने – सामान उठा लो, इमरान का, अंकल।!
आवाज़ आई अंदर से - बेटा, चौकी के नीचे डाल देना।.
सुनते ही मैं अंदर भागा। कोने में अंकल पेशाब कर रहे थे, जब मैंने देखा।.
उन्होंने कहा, पुत्र, चीज़ें वहाँ तले डाल दो।.
बोला मैंने - जी, अंकल।.
जब मैं सामान रखकर वापस जाने लगा, तभी अंकल ने पूछ लिया - बेटा, क्या तुमने खाना खाया?
बोला मैंने – सर, वो खाया गया है।!
आँख उठाकर जब उस तरफ देखा, पेशाब करते हुए वो खड़े थे।.
नजर जब नीचे गई, तो देखा कि चाचा अपनी लुंगी ऊपर किए हुए थे। हाथ में लंड पकड़े हुए थे वो।.
इस नजारे को देखते ही मेरे भीतर एक सिहरन-सी फैल गई। तन पूरा जगमगा उठा।.
मामा के पास एक आठ इंच लंबी चीज़ थी, जिसकी मोटाई तीन इं थी।.
उसके लंड के आसपास बढ़े हुए बाल थे।.
अचानक चाचा बोल पड़े - कैसी लग रही है तुम्हें बात?
उधर देखते ही चाचा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।.
वह लुंगी समेटे मेरे पास आए। उन्होंने कहा - बेटा, इतनी ठंड है कि मैंने अंदर आग जला रखी है। तुम भी थोड़ी देर बैठ जाओ।!
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ठीक है, मैंने कहा, अब चलता हूँ।.
कमरे का ढक्कन रुख से बंद हुआ, फिर वो अपनी पहचान की तरह ओढ़ने में लिपटकर चौकी पर लेट गए।.
आग के पास चौकी के सिरे पर मैं वहीं जम गया।.
बुज़ुर्ग ने कहा - वहाँ कंबल में घिर जाओ। सर्दी होने लगे।.
बिना कुछ कहे, मैं चुपचाप अंकल के पास कम्बल में समा गया।.
अचानक रोशनी वापस आ गई। मैंने फोन पर नजर डाली, घड़ी में एक बज चुके थे।.
अब समय हो गया है, मैं वापस चला।.
बुज़ुर्ग आदमी ने कहा – छोड़ इसे, बेटा, सर्दी में थकने की क्या ज़रूरत? फिलहाल तो यहीं डेरा डाल।!
अच्छा, मैंने कहा – सुनिए अंकल।.
पास ही चादर बिछाकर मैंने अंकल के पास जगह बना ली।.
थोड़ी देर के बाद जब नजर उठी, पता चला कि अंकल कंबल से बाहर हैं।.
हवा चिलचिला रही थी, मैंने उसकी तरफ देखा। कम्बल सावधानी से फैलाया। ऊपर तक पहुँचते-पहुँचते हाथ रुके। ठंड धीरे से कम होने लगी।.
फिर मैंने ध्यान दिया – अंकल के शरीर पर बनियान थी, वहीं लुंगी ढीली पड़ी थी।.
सिर्फ एक कपड़ा था उनके पास - सूती धागों का बना हुआ।.
वो पापा के भाई होने से ज़्यादा, मेरे एक अच्छे दोस्त लगते थे।.
सांसों का बहाव धीमा हो गया था।.
हवा जैसे तभी ठहर सी गई। मेरा शरीर उनके पास आकर चिपक गया। एक हाथ धीरे से उनके ऊपर आ गया। गर्दन के पास लगकर मैं वहीं अटक गया।.
अंकल के कंधे पर सिर टिका लिया मैंने।.
गर्म हवा की तरह अंकल की सांसें मुझ पर पड़ने लगी थीं।.
कुछ समय पश्चात मैंने धीरे से हाथ नीचे किया। उसके बाद अंकल के लंड पर हाथ रख दिया।.
तभी मौसा का लंड आराम कर रहा था।.
बस इतना ही किया - शरीर फैलाकर पड़ा रहा, ऊपर से कम्बल खींच लिया।.
थोड़ी देर बाद पता चला कि अंकल का लंड सख्त हो गया। मैंने उसकी ओर नजर डाली।.
आँखें उसकी खुली रह गई थीं।.
थोड़ा सहम तो गया पर जैसे का तैसे वहीं पड़ा रहा।.
हाथ में आठ इंच का लंड खड़ा हुआ था, चाचा का।.
मोड़ते हुए चेहरा, चाचा ने पकड़ लिया मुझे आलिंगन में।.
मैं जब वहाँ खड़ा था, उसने पकड़ कर खींच लिया। फिर सामने से हटाकर अपने नीचे ले आया।.
उसकी बाँहें मेरे कंधों पर पड़ीं, एक पल में ही सब कुछ बदल गया।.
गले में सांस का घबराया हुआ बहाव था। हाथों ने कसकर जकड़ रखा था, एक पल को भी छूटने नहीं देने वाला।.
एक तरफ का पैर दूसरे से अलग हो गया था।.
उस वक्त चाचा का हाथ मेरी जांघों के बीच पड़ा था। धीमे से दबाव डालते जा रहे थे।.
हाथ मेरा अंकल की कमर पर पड़ा, दूसरा सिर के नीचे आया। धीरे से खींचा मैंने उन्हें अपनी तरफ। समझ गए वो बिना शब्द कहे।.
उसके होंठ मेरी गर्दन पर आए।.
उसके बाद वो मेरे होंठों पर झुका। फिर कुछ सेकंड में ही उनकी जीभ मेरे मुँह के भीतर थी।.
मैंने उसकी तरफ़ ध्यान देना शुरू किया।.
इसके बाद मैंने भी उनके साथ कदम मिलाना शुरू कर दिया।.
मेरी जांघों के बीच चाचा का लिंग सरक रहा था।.
इसके बाद कुछ ही पलों में, चाचा ने धीरे से मेरी टी-शर्ट ऊपर उठाई। एक के बाद एक, पजामा भी नीचे आया। फिर वो मेरे सीने के छोटे हिस्से पर मुँह ले गए।.
पेट में खिंचाव सा महसूस होने लगा।.
अचानक चाचा ऊपर उठे, धीरे से बैठ गए। कहा - उठ जा, प्यारे… सुनो मेरी बात।!
बैठते हुए मैं ऊपर उठा।.
बूढ़े आदमी ने पूछा - अब तूने सोचा है क्या करेगा?
मैंने पूछा- क्या?
चाचा लेट पड़े, फिर धीरे से अपने लिंग की ओर हाथ बढ़ाया।.
अब मुझे समझ आ चुका था। फिर मैंने अंकल की नाड़ी छेड़नी शुरू कर दी।.
उस दिन सुबह-सुबह अंकल का लंड मेरी आँखों के सामने था। हैरान रह गया।.
उसकी गर्दन पकड़ में आई।.
फिर भी, एक हाथ से पकड़ना मुश्किल हो गया।.
उतना ही मोटा था वो, मेरी कलाई जैसा।
उसका लंड मेरे हाथ में आया, धीरे से हिलने लगा। नज़र उठाकर मैंने चाचा के चेहरे को देखा।.
चाचा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।.
अचानक से मैंने चाचा के लिंग पर जीभ फेर दी। उनके शरीर में एक सिहरन दौड़ गई।.
अब मेरे होंठों ने उसके लिंग के सिर पर जगह बना ली, धीमे-धीमे चूसने लगे।.
मुस्कान फैलने लगी थी चेहरे पर, धीमी-धीमी आवाज़ छलक रही थी होंठों से।.
उसके मुँह से निकला - जमाओ... हां, पूरा कमर तक खींच लो।!
जैसे ही मैंने चाचा के पूरे लिंग को भीतर उतारने की कोशिश की, वो खुशी से कराहते हुए बोले - हाँ… आह, ठीक इसी तरह ओह्ह्ह!
उसके बाद चाचा ने मेरे सिर को अपनी गोद में ले लिया, फिर धीरे-धीरे उसे नीचे की ओर खींचने लगे।.
अब चाचा की पूरी लंबाई मेरे गले तक पहुँचने लगी।.
आवाज़ें छुपकर निकल पड़ीं - हम्म्, उम्म्ह, आह्ह्ह, गम्म्।.
आँखों से पानी बहने लगा।.
अचानक चाचा जी धीरे से घुटनों के बल बैठ गए। फिर उन्होंने मेरे होंठों के पास अपनी चीज़ ले आए।.
उसने मेरे सिर के बालों को पकड़ लिया। फिर मेरे मुँह में अपना लंड आगे-पीछे करने लगा।.
अंकल के लंड से मुझे खट्टापन सा महसूस हो रहा था। गले तक आते-जाते वो चिपचिपेपन जैसा लगने लगा।.
थोड़ी देर में वह बूढ़ा आदमी खड़ा हो गया। फिर नीचे उतरकर कमरे के भीतर चला गया।.
उन्होंने वहाँ से सरसों के तेल से भरी हुई कटोरी निकाल ली।.
बुज़ुर्ग आदमी कपड़े से मुक्त था।.
एक गीला आठ इंच का लंबा धर्म उसके होंठों पर चमक रहा था।.
मुस्कान बिखेरते हुए अंकल पास आए। मेरे सिर पर हाथ फेरा, फिर धीरे से लिटा दिया।.
उसके हाथ मेरी जांघों पर आए, कंधे पर उठा लिया। सरसों का तेल धीरे से गुद में डाला, चमकती नई छाप बन गई।.
थोड़ी देर के बाद उसने मेरी गांड को अपने हाथों से खोला, फिर लंड पर तेल डाल दिया।.
उसने मेरी गांड में थूक दिया। फिर अपने मोटे लंड को हथेली से पकड़कर आगे-पीछे चलाने लगा।.
उसके बाद चाचा ने मेरी गुदा पर अपनी मोटी लौंड़ की नोक समाया।.
तब मेरे दोनों पैर उनकी कमर पर टिके हुए थे।.
फिर वो आगे बढ़ा, धीमे से अपना लंड मेरी गांड में डालते हुए। उसके होंठ मेरे होंठों पर आए, चूम लिया।.
अंकल की जीभ मेरे मुँह में थी। उसका मोटा लंड मेरी गांड में धँसा हुआ था।.
जब वह सुपारा मेरे पिछवाड़े में घुसा, तभी चिल्लाने का मन किया।.
तेल के अधिक होने पर सुपारा भीतर चला गया।.
मौसा कई साल पहले के खेल चुके थे, इसलिए वो मेरे दूध वाली बाल निचोड़ते हुए मेरे आगे-पीछे जीभ घुमाते रहे।.
दर्द कम होने लगा, मुझे ऐसा लगा।
गांड में लौड़ा जाने लगा, अंकल के हाथ से। थोड़ा दर्द हुआ, फिर आदत सी होने लगी। वो धीमे-धीमे चल रहे थे, लय में। मैं ढीला पड़ गया, तनाव घटा। उनकी छाती से सिसकी आवाज आई। एक बार रुके, फिर बढ़े। मैंने आँखें बंद कर लीं। गर्मी महसूस हुई, पीठ पर पसीना। वो तेज हो गए, फिर धीमे। मेरे होंठ हिले, बिना आवाज के।.
अंकल के साथ मेरा भी होठों से उबलता लगातार निकल रहा था।.
थोड़ी देर के बाद चाचा ने मेरे कान के पास होंठ रखकर फुसफुसाया - उम्म, जीते … पूरा लंबा डंडा भीतर उतार ले!
उन्होंने कहा और मेरी टांगें ऊपर कर दीं, फिर लंड मेरी गांड में धंस गया। मेरे मुँह से आह्ह की आवाज़ निकल पड़ी।.
थोड़ी देर बाद चाचा का लिंग तेजी से मेरी गधे में घुसने लगा।.
जांघों पर गोलियों के वार से थप-थप-थप-थप की ध्वनि निकलने लगी। मैं भी बेसुध होकर कराह उठा - हम्म, उम्म्ह्ह, उह्म्म, आह्ह्ह, आह्ह्ह, आई आह… अंकल, इतना ही काफी है, उम्म्ह्ह, उम्म्ह्हा।.
चाचा उस पल बहुत उत्साहित हो उठे, धीमेपन से निकलकर ज़ोर-ज़ोर से मेरी गांड में अपना लंड घुसाने लगे।.
उसकी मोटी लंबाई मेरे पिछवाड़े में आगे-पीछे सरक रही थी।.
अंकल जोर-जोर से मेरी पीठ पर हाथ मार रहे थे। मेरी उंगलियां उनकी कमर पर तंग थीं।.
ग़ुस्से में चीखने लगा था - उफ़, उफ़, चाचा… इतना काफ़ी है, अब बंद करो, ये बस!
फिर भी चाचा ने रुकना नहीं समझा, धीरे-धीरे मेरे अंदर उतरते गए।.
आह... मैंने दर्द से कराहते हुए अंकल को बोला - अब बस कर दीजिए।!
चाचा बोले - मैं जानता हूँ तुम मीठे हो… तुम्हें मेरी लंबाई पसंद आ रही है। फिर क्यों झिझक रहे हो? खुशी से ले लो, हिजड़े की तरह अभिनय क्यों कर रहे हो? मेरे जैसा घरेलू आदमी फिर नहीं मिलेगा। ओह, तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो, इसलिए धीरे-धीरे चोद रहा हूँ, ढोंग मत करो। कोई और होता तो उसकी गांड फाड़ देता। वो बातें सुनकर मैं शांत हो गया।.
मज़े का अहसास मुझे भी हो रहा था।.
लेकिन जो पीछे से मुश्किल झेलते हैं, उन्हें एहसास होता है कि इसमें दर्द भी होता है।.
तेज हो गई चाल, उसकी ओर से कोई रुकावट नहीं।.
हल्की हल्की धड़कन सी आवाज़ कमरे में फैल गई।.
उस कमरे में सिर्फ दादा की हांफती सांसों का शोर था। मेरे मुंह से निकले अजीब लयबद्ध उच्छ्वास भी बिखरे पड़े थे।.
अचानक चाचा ने मेरे होंठों पर अपनी जीभ ठूस दी। उधर उनका लिंग मेरी गुदा में तेजी से आ-जा रहा था।.
चाचा ने धीमे स्वर में कहा, मीठे... मैं उतरने वाला हूँ। सब कुछ तुझमें ही समा जाएगा। आज तो तुझे सचमुच घटिया बनाऊंगा।!
बस इतना कहते ही अंकल के होठों से उम्म्म्म… उम्म्म्म… हाएई निकल पड़ी। मेरे पीछे के हिस्से में गरजती धधकती तरल चीज़ का एहसास छा गया।.
चाचा ने मेरी गुद में पाँच-छह लंबी-लंबी धारें डाली। कुछ छोटी पिचकारियाँ भी उसी जगह आई। थोड़े देर बाद, वो अपना गाढ़ा लंड वहीं छोड़कर रुक गया। अंदर हल्का भारीपन सा महसूस होने लगा।.
थक कर भी वो मुझे छोड़ने को तैयार नहीं थे।.
उसके बाद चाचा ने मेरी जांघों को अपने कंधों से हटा दिया।.
फिर भी, वो हिस्सा मेरे अंदर ही धँसा रहा।.
उस पल मेरी नज़र चाचा की ओर गई। वो मेरी आंखों में झांक रहे थे, सिलेंट।.
उस क्षण अंकल ने मुझे समेट लियa, फिर धीरे से कहा - बेटा, मैं जब बुलाऊँगा... तब आओगे?
सुनकर मैंने कहा - जी, अंकल!
चुपके से आसपास झांकते हुए अंकल बोले - तुम्हें फ़िक्र नहीं करनी चाहिए, ये बात सिर्फ़ मैं और तुम जानेंगे।.
उस पल चुपचाप उनका हाथ मेरे चेहरे पर पहुँच गया।.
इस वक्त चाचा का लिंग ढीला पड़ चुका था, मेरी गधे से बाहर निकल आया।.
पीछे हाथ डाला तो पता चला, अंकल का सामान मेरी गधे से बाहर आ रहा था।.
हाथ से छेड़कर देखा, तो पता चला कि मेरे गुदे का आकार तीन उंगलियों बराबर हो चुका था।.
उन्होंने मुस्काइश के साथ कहा - आरंभ में पीड़ा रहती है, कुछ समय बाद सब सही हो जाएगा।.
मैंने हम्म कहा.
बच्चे ने सुना, फिर आवाज़ की तरफ मुड़ा। उसके चेहरे पर हैरानी थी। कमरे में सन्नाटा छा गया। पहले वो हंसा, बाद में खामोश हो गया। सवाल ऐसा था, जिसका जवाब कोई नहीं चाहता।?
अंकल से मैंने कह दिया - इतना मोटापा क्यों है आपके पेट में? जबसे देखा, नजर चिपकी रह गई।!
फिर चाचा हँस पड़े और बोले - बच्चा, असली आदमी की गुड़िया ऐसी ही होती है। तुझमें मिठास है, यही वजह है तेरी छोटी सी लकड़ी है।.
मैं चुप रहा.
चाचा ने प्यार से कहा, जब वो मुझे थपथपा रहे थे - इतना चूसोगी तो चेहरा उतना ही खिलेगा।!
बातें होती रहीं, फिर कभी एक दूसरे से लिपटकर नींद में चले गए।.
अगली सुबह करीब-करीब जल्दी ही मैंने फिर से चाचा के लिए अपने मुँह का इस्तेमाल किया। इस बार भी जो हुआ था, उसमें कोई खास फर्क नहीं आया।.
फिर मैं वापस घर पहुँचा।
उस रात के बाद से अंकल मेरी गांड मारने लगे थे और मैं हमेशा गांड चुदाई का रसिया बन गया था.
उस दिन मैंने मामू के बेटे की ज़ंजीरें साफ़ की थी, धीरे से लंबे हिस्से पर हाथ फेरा। फिर वैसे ही चूसना शुरू कर दिया, जैसे कुछ हो नहीं रहा। आवाज़ें अभी भी सुनाई देती हैं, कभी-कभी रात में खड़खड़ाहट सी लगती है।.
तुम्हारा दिमाग इस नई कहानी पे क्या कहता है, सच-सच बोलना।.
ें.
ा.
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