गांड में लंबे लंड से चोदने का अहसास था।

JaiJai
Jan 2, 2026 - 20:31
Jan 21, 2026 - 22:22
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गांड में लंबे लंड से चोदने का अहसास था।

ट्रेन के टिकट घर पर एक युवक से दोस्ती हुई। उसकी जांघों के बीच छिपा लंड मेरे पिछवाड़े में कैसे घुसा? धमाकेदार झटकों ने शरीर को झकझोर दिया।?

अब एक बात बता दूँ - मेरा नाम राज है। उम्र के हिसाब से छह और बीस साल के पास हूँ, ऊंचाई आठ इंच वाले पाँच फुट के करीब। शारीरिक रूप से मध्यम और पतला, चेहरे पर गोरापन झलकता है।.

पिछली कहानी

मुझे मिले एक साथ दो लंड

तुम्हारी तरफ से मिला प्यार काफी गहरा था

फिर एक असली वाकया सुनाने आया हूँ, इस बार भी। ऐस्सहोल में सेक्स की कहानी के जरिये पेश है।!

एक वक्त था, मैं मुंबई गया हुआ था काम के चलते। यह सब कोविड से बहुत पहले की बात है।!

सुबह के चार बजे ट्रेन उतरकर मैं दादर स्टेशन पर खड़ा हुआ।.

पैर खींचता हुआ मैं लोकल ट्रेन के प्लेटफॉर्म की तरफ बढ़ गया, बोरीवली जाना था। मुंबई में काम के सिलसिले में घूमना-फिरना आम बात थी, तो स्टेशन पर किसी से रास्ता पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ी।.

सीधे चलता हुआ मैं दादर के पश्चिमी हिस्से की तरफ पहुँच गया।.

अचानक लगा किसी के पीछे-पीछे चलने का।.

तब सुबह के चार बजने को आए। कम लोग देखे गए, जिसकी वजह से स्पष्ट हुआ - कोई मेरे पीछे आ रहा है।.

बिना किसी सोचे-समझे मैंने सिर हिलाया, फिर धीरे-धीरे लोकल ट्रेन के टिकट काउंटर की तरफ चल पड़ा।.

लाइन में खड़ा हो गया, बोरीवली के टिकट के लिए।.

सब कुछ तभी घूमने लगा, जब टिकट की बारी आई।.

थोड़ी देर में एहसास हुआ, कोई सीधे मेरे पीठ के पीछे खड़ा है।.

पलटकर नज़र डाली, तो शायद वही आदमी था जो मेरे पीछे-पीछे चल रहा था।.

थोड़ा सा गुस्सा आ गया। उधर, मैंने उसकी ओर ताका - ऊपर से लेकर नीचे तक।.

मगर जैसे ही मैंने उसे देखा, तो लार थूकने लगी।.

मेरा गला सूख रहा था, फिर भी मैंने वो सारा पानी एक ही घूँट में पी लिया।.

उसकी नज़र मेरे ही ऊपर टिकी थी, पलक झपकने का इंतज़ार कर रही थी।.

फिर अचानक उस आदमी ने बोल दिया - अरे, पलट के क्या झांक रहा है? तेरा नंबर आ चुका… जल्दी से टिकट ले ले!

आँख खुली तो सीधे काउंटर की ओर मुड़कर बोला - बोरीवली, वापसी का टिकट चाहिए।!

पैसे जमा करके मैंने टिकट ले लिया। फिर वहीं किनारे पर खड़ा हो गया।.

फोन पर नज़र डालने लगा मैं, ताकि पता चले वो आदमी किधर निकल पड़ा।.

उसकी नज़रें मेरी ओर घूम गईं, एकदम चिपक गईं। फिर खिड़की पर ध्यान जाते ही आवाज़ आई - बोरीवली का टिकट चाहिए।!

जब मैं कुछ समझ ही रहा था, तभी उसकी निगाहें मेरे ऊपर टिक गईं।.

मैंने जब उसे देखा, स्थिति और भी ख़राब होती गई।.

लंबाई उसकी छह फुट से भी आगे की। गोरा-सा नहीं, धुंधले सियाही में झुका हुआ रंगत। चेहरे पर तिरछी कतरी दाढ़ी। ऊपर सफेद हाफ शर्ट, जिसमें बांहों का घनापन अचानक खिंच गया था। नीचे काली पैंट, शर्ट के अंदर ठीक से डाली हुई, जिससे वजन एकदम ताकतवर लग रहा था। छाती ऐंठी हुई, जांघें भारी, जैसे किसी भारोत्तोलन के बाद का जोश अभी शरीर में भरा हो।.

सब कुछ मिलाकर तो वो सब पर भारी पड़ रहा था।.

अभी भी वो मेरी तरफ़ टकटकी लगाए हुए था।.

तबियत साथ नहीं दे रही थी।.

उल्टे पैरों वह मुड़ा, टिकट हाथ में था। मैं बीच रास्ते में खड़ा हो गया। आवाज़ छोटी थी, सवाल फिर भी ऊपर उठा - क्या हम कहीं मिले हैं?

उसके चेहरे पर मुस्कान आई, फिर वह बोला - नहीं!

अरे... यार! मन में कुछ बज रहा।!

शायद तुम्हें पता चल जाएगा कि वहीं है।!

धीमे स्वर में ये शब्द उसके होंठों से निकले।.

तूने क्या बोला? मैं समझ नहीं पाया।?

वह- कुछ नहीं!

अचानक लगा, कहीं पर तुम्हें देखा था। शायद इधर-उधर के चलते मिल गया होऊंगा। वैसे, तुम्हारा नाम क्या है?

वह- इमरान!

मेरा नाम सुनकर किसी को याद आता है पुराना दोस्त। कॉलेज के वक्त एक यार मिला था, उसका भी ठीक ऐसा ही नाम था।.

उसने हँसते हुए कहा - क्या वो मुझ जैसा लगता है?

अचानक से मन में आया… नहीं, बिल्कुल नहीं, तुम इतनी गर्म लग रही हो।!

उसके बारे में कुछ पल तो सोच ही लिया।?

मैं चुप रहा.

फिर वो मुस्कुराया। हां, वही मैं हूँ, कहकर आवाज़ उठी।!

उसने धीमे से निचले होंठ को दांतों में दबा लिया। फिर बोला - ह्म्म… मेरे पास… और भी कुछ गर्म है!

मेरी तरफ उसकी नज़रें सीधी थीं।.

कहा मैंने - इमरान, तुमने क्या कहा?

बस इतना कहूँगा… कुछ भी नहीं।!

सुनो... शायद तुम्हारा मतलब कुछ और था।!

इमरान – क्या बात है? हाँ… अगर दिमाग में कुछ और चल रहा है, तब ज़रूर!

उसने आंख मारते हुए ये कहा।.

एक कोने में आँखें झुकी, हल्की सिर हिल गई।.

ह्म्म… इतना झेंपते हो तुम? इमरान।!

शायद मैं और तुम, दोनों कुछ ऐसा समझ पा रहे हैं।.

हाँ, बात तो सच है… पर फिर भी क्यों घबरा रहे हो? जो मन में है, वही बोल दो।!

ठीक है, अगर तुम्हें कुछ कहना है तो कह लो। मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। हो सकता है, मैं हां कर दूँ… वैसे भी, इसमें गलत क्या है?

इमरान बोला - अच्छा… हम्म… क्या बात है? घर पर आना होगा तुम्हें। वहाँ मैं अकेला रहता हूँ। रात गुज़ारनी हो, तो साथ भी रह सकते हो।!

वो बोला, तो ऐसा लगा जैसे मेरे अंदर की सच्चाई बाहर आ गई हो।.

सचमुच? मैं तेरे घर पर रात भर ठहर सकता हूँ… तूने कहा, मैं आऊँ?

इमरान – हां, क्यों नहीं… ठहर जाओ। मैं तो अकेले रहता हूँ, ऐसे में कोई दिक्कत नहीं। सच बताऊँ, तुम्हारे लिए रातभर ठहरना थोड़ा मुश्किल हो सकता है!

मुस्कान के साथ उसने ये शब्द कहे।.

क्या बात है… मेरी समझ में कुछ नहीं आया?

उसके चेहरे पर मुस्कान आई, फिर वह बोला - अभी मैंने कहा था कि मेरे पास कुछ और भी गरम है!

उसने कहा, हाथ लौड़े पर घुमाया, फिर जोर से हंस पड़ा। इमरान बोला - आज बोरीवली में काम है, पूरा दिन खत्म हो जाएगा वहीं…शाम को नागपुर लौटना है…ट्रेन की टिकट तैयार है!

इमरान – हेरा, पता है ट्रेन की टिकट मनमानी से रद्द करवाई जा सकती है। बस, इच्छा हो तो कल सुबह की योजना मैं ठीक करके तुझे सौंप दूँगा। !

खुद से – अरे नहीं, क्योंकि तुमने कहा, तो मैं कल सुबह की टिकटें ऑनलाइन बना लूँगा!

शाम को बोरीवली में मिलने का प्लान है। इमरान, यह सुनकर अच्छा लगा। दफ़्तर का काम आज खत्म कर लेना।!

ठीक है, ऐसा करना बेहतर होगा।!

वो आएगा, है न? मेरी उम्मीदें तुम्हारे साथ जुड़ी रहेंगी।!

सच कहूं तो, मेरी इच्छा है कि मैं तुझसे जुड़ा रहूँ।.

अचानक बोरीवली से ट्रेन पहुँच गई।.

ट्रेन के अंदर हम दोनों पहुँच चुके थे।.

अचानक से बात चलते-चलते वो मुझे अपना नंबर थम गया। कुछ देर बाद हम दोनों बोरीवली में थे।.

उतरा ट्रेन से वो, फिर गले लगा मुझे। बोला - जो मेरा हॉट है, ठीक वो, आठ इंच लंबा है।.

उसने कहा, फिर धीरे से गाल पर छुआ, एक बाय बोला, वैसे ही चला गया।.

बोलने के पहले ही वह लोगों के बीच गुम हो चुका था।.

बिना किसी रुकावट के मैं वहाँ से ऑफिस पहुँच गया।.

उसी बात की आवाज़ मेरे सिर में चल रही थी। कानों तक वही लफ्ज पहुँच रहा था।.

गर्म हवा के झोंके। 20 सेंटीमीटर का रास्ता पहले से ही चिपचिपा महसूस होता है।

मेरे दिमाग में एक ही बात कई बार धमाके की तरह आई। पूरा दिन काम करता रहा, फिर भी मन डगमगाता रहा।.

आंखों में कुछ नहीं, सिर्फ़ वो एक इमरान।.

कई सपने दिल के कोने में धीरे-धीरे उठने लगे।.

दोस्तों, मैं कुछ कहने से चूक रहा हूँ - आप खुद ही अब समझ लेना।.

छह बजकर कुछ मिनट हो गए थे, तभी काम समाप्त हुआ।.

बाहर निकलते ही सूरज की रोशनी में चमक उठा पथ।.

पहली बात, मैंने फोन उठाया और इमरान को डायल किया।.

इमरान बोला - अरे राज, तेरा फोन आएगा सोचकर बैठा था। अब तू कहाँ अटक गया?

काम तभी-तभी ख़त्म हुआ मेरा … हाँ।.

दिन भर के अंत तक, मन में तुम्हारी याद आती रही।.

उस गर्म-गर्म बात का ज़िक्र और आठ इंच की चर्चा – दिमाग में घूमते रहे।!

इमरान – अच्छा हाँ भई, ठहर थोड़ा। सबसे पहले एक बात बता, तू किधर है?

हाँ, मैं चामुंडा सर्कल के आसपास हूँ, जो बोरीवली वेस्ट में है।!

ठीक है, वहीं खड़े रहना। तुम मेरे काफी दूर नहीं हो, मैं तुम्हें लेने आ रहा हूँ। अभी सिर्फ पांच मिनट इंतजार कर लेना।!

फोन काटते हुए उसने यहीं कहा।.

ठहर गया मैं, उसके आने का समय बीतता देखते हुए।.

बस तभी वो बात याद आई… आठ इंच। सांस रुक गई, क्योंकि पिछले कई महीने से कोई तगड़ा अनुभव नहीं हुआ था।.

पहले से ही मेरी ऐनस कसकर बंध गई थी।.

आगे कहीं नज़र आया एक मेडिकल स्टोर।.

एक दिन मैं वहाँ पहुँचा। तब जैली को खरीदा, फिर सामान के बीच छुपा लिया।.

उसी पल आगे सड़क किनारे वो लड़का, जिसे मैं हीरो समझती थी, चलता हुआ दिखा।.

दरवाज़े से अंदर कदम रखते ही वह मेरे पास आया। फिर उसने मुझे गले लगा लिया। मेरे गाल पर किस किया, बस ऐसे ही।.

वह बोला- चलो!

बाइक के पीछे जगह लेते हुए मैंने उसके साथ रवाना होने का फैसला किया।.

शरीर से आती मर्दों जैसी खुशबू उसे हवा में छोड़ रही थी।.

घर उसका पाँच मिनट दूर था।.

जैसे ही घर में कदम रखा, बोला - पहले आराम से नहा लो।.

बस हो गया मेरा सहन।.

जैसे ही मैं उसके बेडरूम में घुसा, सामने खड़े रहते हुए मेरे कपड़े धरे रह गए।.

वो लड़का मेरी तरफ़ देखता ही जा रहा था।.

ठीक है... मैं थोड़ी देर के लिए बाहर चला जाऊँगा।?

हां, क्या मैं भी आ जाऊँ? अभी मेरी बारी है। तुम पहले चलो, तेजी से तैयार हो लो!

बाथरूम के अंदर पैर पड़े, गुस्से से भीगता हुआ।.

आँखों से उसकी नजर मेरे ऊपर टिकी हुई थी।.

शायद उसे एहसास हो गया था कि मैं उसे अपने साथ चाहता हूँ।.

पानी गर्म होता देखा, फिर मैं शौचालय के पास वाले नल से तुरंत जुड़ गया।.

पानी के पाइप को पीछे के छेद में डालकर ऐनस साफ़ करने के बाद, साबुन शरीर और चेहरे पर लगाने लगा।.

फिसल गया साबुन, मैंने पकड़ा नहीं।.

दरवाजा बाथरूम का टटोलता हुआ खिसक गया। नजर साबुन पर जाते ही झपकी में बैठ गए नीचे। आंखों में छलांग लगा गया साबुन, धधक उठी रोशनी अंदर।.

थोड़ी खोज के बाद हाथ लगा साबुन।.

खड़े होते ही एक चीज़ सिर से जा लगी।.

पानी के झरने में आंखों में सनसनी थी। धीमे से दरवाजा खोलकर शौचालय के पास बैठ गया, तभी पलकों पर ठंडक महसूस हुई।.

आंखें साफ़ करते ही एक छवि तैर गई… इमरान बिल्कुल नंगा मेरे सामने।.

आधा उठा हुआ लंड उसका मेरी नज़रों के सामने था।.

आँखें जब उस पर टिक गईं, तो मैं स्थिर हो गया।.

उठा हुआ तो बिल्कुल नहीं था, पर फिर भी आठ इंच से ज़्यादा का था।.

आसमान की ओर नज़र उठाई मैंने, तभी इमरान ने कहा - माफ़ करना।.

अब मुझे पता चल गया था कि वो अपनी गर्म लंड के बारे में बात कर रहा था।.

वो मेरे हाथ पकड़ता हुआ आया, मुझे सीधा खड़ा किया। फिर शौचालय के पास वाले शॉवर में गले लगा लिया।.

चुपचाप वो मेरे होठों पर अपने होठ ले आया, फिर जैसे समझ खो चुका हो, तेजी से चूमता रहा।.

आग की तरह जल रहा था मैं भी, इसलिए पीछे नहीं हटा।.

दो प्राण अब एक ही सांस में समा गए।.

ऐसा लगा, मानो प्यार के सात जनम पलक झपकते मुझे मिल चुके हों।.

हथेली फिसलती रही पीठ से लेकर कमर तक। साबुन का घोल धीरे-धीरे टपकने लगा गर्दन से नीचे। उसकी उंगलियां चलती रहीं, जैसे कोई खजाना ढूंढ रहा हो। एक कोने से शुरू कर दूसरे छोर तक सब छूआ। पानी के बीच में भी वो रुका नहीं।.

कभी-कभी वह मेरा होंठ छू लेता, कई बार स्तन के नुकीले हिस्से पर मुँह फेर देता।.

पागलपन की तरफ बढ़ रहा था मैं।.

पानी के साथ-साथ हवा भी गर्म हो गई थी। शायद वहीं खो गए थे हम दोनों।.

कौन जानता था कि चंद पलों में मेरी उम्मीदों पर बाढ़ आ जाएगी।.

अब उसकी नज़रों में प्यार की बजाय लालच साफ़ झलकता था, ऐसा मैंने तभी समझा।.

भूखे पशु की आँखों से इमरान ने मेरी ओर देखा।.

हाथों ने मेरा चेहरा समेट लिया… धीरे से नीचे की ओर ठेलते हुए। सामने उभरा एक ऊर्ध्व शरीर-अंग, जो अब तन गया था - 9 इंच से भी आगे, घना और मज़बूत।.

इमरान की त्वचा गहरे रंग की थी। उसका हथियार भी काला था, जैसे किसी काले घोड़े की चामड़ी से निकला हो।.

आंखों के सामने वो मूसल लटक रहा था।.

इमरान - माफ़ करना। मैंने तुझसे थोड़ा सच छुपाया था, कहा था कि मेरा लंड 8 इंच का है… पर अगर सच बोलता, कि वो 9 इंच से भी ऊपर, घोड़े की तरह मोटा और काला है, तो शायद तू आता ही नहीं।!

वह झूठ बोला, इसके बाद उसका असली चेहरा सामने आया।.

उसकी जांघों के बीच हाथ डालते हुए मैंने कहा - बढ़िया।.

उसने घिसी-पिटी धमकी भरे स्वर में कहा - तू तो हर पल बेकाबू रहती है, अब ये गर्म छेड़छाड़ बंद कर।!

अचानक वो शब्द उसकी जुबान पर आते देख मैं स्तब्ध रह गया।

इमरान – सोचा था तूने, मैं तुझपर मर मिटूँगा? गलत। मेरी जान, आज ऐसा करूँगा कि पता चलेगा असली ताकत क्या होती है। पूरी रात… चाहे रोए तू, चाहे चिल्लाए, मेरी मर्जी हर पल तेरे शरीर में घर कर जाएगी।.

फिर तुरंत उसने अपनी उंगलियां मेरे मुख में घुसा दिया। हाथों से मेरे मुँह के ऊपर-नीचे को खींचकर फैलाया। धीमे से उसका केला मेरे भीतर चला गया।.

जैसे ही मैंने उसके लौड़े को मुँह में महसूस किया, सिर्फ हल्की सी मुस्कान आई। घबराहट भी साथ चली आई।.

ह्म्म… इमरान बोला। क्या तू झेंपती भी है, मेरी प्यारी?

थोड़ी देर लंड चूसने के बाद हम दोनों की हवस इतनी बढ़ गई कि चुदाई शुरू करने का मन किया।.

एक डर सा मेरे भीतर फैल रहा था। उसका काला, मोटा, नौ इंच का अरबी घोड़े जैसा लिंग अंदर था। सिहरन सी महसूस हो रही थी मुझे।.

अब कुछ भी नहीं हो पाता … शायद बस इतना ही संभव था

अब तय हो चुका था। मन-ही-मन बोला, "राज, आज खुद को धत्ते पर बैठाने के लिए तैयार रहना।" ये एक ऐसा मज़ेदार पल होगा, जो पूरी उम्र याद रहेगा।.

एक नहीं सोचा, मैं सीधे बिस्तर पर गिर पड़ा। दोनों पैर हवा में चढ़ गए।.

मैंने इमरान के सामने अपनी गांड खोलकर पेश कर दी।.

थोड़ी देर बाद इमरान ने हथेली में जमा थूक को मेरे पिछवाड़े के ऊपर फैलाना शुरू कर दिया।.

लग रहा था कि डर तो है, फिर भी सवाल दिमाग में घूम रहा था - क्या वो बड़ा काला लंड मेरी गांड में समा पाएगा?

बस यही सोच रहा था मैं, अचानक इमरान ने अपना लंड मेरी गांड के ऊपर टिका दिया। फिर एकदम से पूरे ज़ोर से धक्का देकर भीतर घुसा दिया।.

उसने धक्का दिया और वो लगभग छह इंच का, मोटे सिर वाला लंड मेरी गांड के अंदर आधे से भी ज़्यादा घुस गया।.

एकाएक मुझे चक्कर आया।.

एकदम अचानक लगा कि इमरान का वो 9 इंच से ज्यादा लंबा लौहा मेरी गधे में पूरा घुस चुका है। धीरे-धीरे आगे-पीछे होने लगा था वो अंदर।.

हो सकता है बिस्तर के पार खून फैल गया था।.

जब मैं बेहोश था, तभी उसे समझ आया।.

तब भी वो मेरी पीठ के नीचे से हाथ फैलाए जा रहा था।.

खून से तरबतर उसका लंड मेरी गांड से बाहर आया।.

वो धीमे से लंड को बाहर खींचता, फिर एकदम तेजी से उसे पूरा-पूरा भीतर ठोंस देता।.

हो सकता है वो लंड मेरी पीठ के बल चढ़कर छाती तक आ गया था।.

मैं होश खोए पड़ा था, तभी उसने भूखे सांप की तरह मेरी पीठ पर हमला कर दिया।.

आधे घंटे के बाद आँख खुली।.

एकदम अचानक समझ में आया कि मेरी गांड में 9 इंच से ज्यादा लंबी चीज घुस रही है। खून की लकीर गांड से बिना रुके टपकती जा रही थी।.

उसकी आँख खुलते ही इमरान बोला - अबे राज... होश तो आ गया। सुन, आधे घंटे से मैं तेरी पिटाई कर रहा हूँ... अभी तक महसूस हुआ क्या? अच्छा लग रहा है या फिर भी झेल रहा है?

कैसा लग रहा था, ये सोच-सोचकर मन में ही उठता था।.

ऐसा लग रहा था, मानो पीछे से किसी ने आकर धमाका कर दिया हो।.

पलटकर जब हाथ लगाया, तो उसमें खून था।.

मैं डर गया.

इमरान हंसते हुए बोला - जान, घबरा मत। आज तेरी गांड का पेट खिंच गया है… तू मेरे साथ चढ़ गया है। अब तू एक साथ तीन लंड भी सह लेगा… इतना फैला दिया है मैंने तेरा! शायद तू मुझे धन्यवाद देने वाला होगा!

उसका बोलना लगातार चल ही रहा था, इधर-उधर से मेरी पिटाई करता जा रहा था।.

थोड़ी देर में तकलीफ कमजोर पड़ने लगी।.

थोड़ा रुकने को मैंने कहा, इमरान।!

वह रुका.

उसके मुँह से आवाज़ निकली, तभी मैंने कहा - अपना लंड बाहर निकाल। फिर धीमे स्वर में बोला, पीठ के बल लेट जा।!

बिस्तर पर जाकर इमरान सीधे लेट गया।.

मेरे सामने उसका लंड सलाम कर रहा था।.

खड़ा होते ही मैं सीधा उसके लंड की तरफ बढ़ा।.

हाथ ने पीछे के हिस्से को छू लिया।.

अचानक तुम्हारे हाथ में कौन सी बात हो गई… चारों उँगलियाँ आपने खुद को सीधे अंदर धकेल लिया।.

सोच में पड़ गया - आजकल राज कुछ ज्यादा ही घमंडी हो गया है।!

एक हाथ से इमरान का लंड पकड़ते ही मैं बिना रुके ऊपर बैठ गया।.

मैंने आंखें बंद कर लीं, फिर धीरे-धीरे सारा लंड भीतर तक समा लियa। ऊपर-नीचे होते हुए मेरा मुँह उसके लंड पर जोरदार चलने लगा।.

कभी ऐसा लगा, जैसे दर्द रुकने का नाम नहीं ले रहा। पर फिर मैं धीरे-धीरे उठने लगा।.

थोड़ी देर तक कुछ और सोचता रहा, फिर मैंने खुद पर हाथ डालना शुरू कर दिया।.

दर्द कम हुआ.

इसके बाद मैंने इमरान की ओर देखा, फिर धीरे से बोला - चलो, अब जगह बदल लेते हैं।!

पलंग के पास एक छोटी मेज़ रखी हुई थी।.

एक पैर फर्श पर था, दूसरा सामने की मेज़ पर टिका हुआ। इस तरह ऊपर उठते ही सब ठीक हो गया।.

मैंने कहा, चल इमरान, पूरा घोंप अपना लंड मेरी गांड में।!

एकदम अचानक, उसने कुछ सोचे बिना मेरी गांड में पूरा लंड डाल दिया। फिर बिना ठहराव के आगे-पीछे हिलने लगा।.

तभी मेरे अंदर भी उमड़ उठा कुछ, धीमे स्वर में फूट पड़ा – आह… तेज़ करो, और तेज़… यूँ ही चलता रहे ये झटका… आह, मेरी पीठ टूट जाए इसी में… ऐसे ही डालते रहो, बस डालते रहो।!

हर कोने में मेरी सांसों की तेज़ आवाज़ फैल गई।.

घिसटती आवाज़ें … हल्का सा कंपन … अब तेज़, थोड़ा और गहरा।

खून मेरी लताड़ से होकर पैर के अंगूठे तक फिसल रहा था।.

उस पल मेरी नज़र सिर्फ उस किनारे पर थी।.

गुनगुनाहट भरी सांसें छोड़ते हुए बोली, "इमरान... ऐसे ही जारी रख।" किसी कोने से एक धीमी चीख निकली। शरीर पर गर्मी तेज हो गई। हवा में खुशबू के साथ तनाव घुल गया।

आज कुछ भी हो, मैंने तय कर लिया था – पल-पल का आनंद उठाऊँगा।.

उसने कहा - राज, थोड़ी देर रुको। पलंग पर पीठ के बल लेट जाओ।.

पीठ के बल लेटने पर मैंने कहा - आओ ना, तुम्हारा हुक्म।!

उसने मुझ पर धीरे से शरीर ढाल दियa। फिर एकदम बिना ठहराव के अपना पूरा लंड मेरी गांड में डाल दिया।.

सिसकी भरी। कोई सुनता नहीं। फिर चुप्पी छा गई।

उसका पूरा लंबा हथियार मेरे अंदर जा धँसा, फिर वो पीछे से आगे की तरफ बढ़ने लगा। ऐसे लगा जैसे भीतर कोई मशीन चल रही हो।.

शुरू हुआ इमरान का बोलना - हाँ… हाय… चिल्लाओ सीधे, पूरे दम से।!

उसका सिर हल्के से झुकता, फिर पीछे हटता।.

आँखों से पानी झलक रहा था, तब भी मैं वही शब्द बोलता जा रहा था - पीटो, लगातार पीटो… इस भूख को चुप करा दो।!

इमरान बस जोर-जोर से सांस लेता जा रहा था। हर धक्के के साथ मेरी पीठ दीवार से टकरा रही थी। कभी-कभी उसकी आवाज़ भदक उठती, जैसे किसी चीज़ से झिड़की जा रहा हो। वो एकदम खुलकर आगे बढ़ रहा था। मेरे अंदर का हर हिस्सा उसके हिलने से डोल उठता।.

एक लंबे वक्त से उसकी गांड मारी जा रही थी।.

नौ बजे का समय हो गया था, शाम के।.

उसने कहा - राज, अब तो मेरा पानी छूटने ही वाला है… जल्दी से बता… कहाँ उतारू?

अचानक मैंने कहा - सुनो, राजा, अपना हाथ मेरे मुँह से हटा दो।!

थोड़े और झटके दिए उसने, फिर लंबी सांस के साथ अपना लंड मेरे होंठों पर टिका दिया।.

उसने मेरे होंठों पर अपना मुँह धकेल दिया, साथ में बड़बड़ाया - अभी गन्ने का रस छलकने वाला है… खुद को समेट ले, मेरी तरफ से एक झलक पी लेने के लिए।!

इतना कहते ही मेरे गले में पूरा लंड धँस गया।.

पिचकारी का पानी उसके हाथ से फिसल गया। वो मेरे गले से लगकर पेट तक जा पहुँचा।.

हल्के से नमक के साथ एक झलक खटास भी तैर रही थी पानी में।.

उसका लंड मेरे मुँह में था, मैंने हर कोने को जीभ से साफ कियa।.

उसके लंड की हालत ढीली से भी वो 7-8 इंच में नजर आ रहा था।.

थकान उसके हड्डियों में घर कर चुकी थी।.

इसके बाद हम दोनों बाथरूम में लौटे, नहाकर ताजगी महसूस की। भोजन करने के बाद नींद आई।.

सुबह-सुबह फिर से बात आई मेरी बजाई पर। एक दिन वो कहानी जरूर लिखूंगा।.

धन्यवाद.

इस कहानी पर तुम्हारा क्या ख़्याल है, जो ऐस्सहोल सेक्स के बारे में है?

मेल के ज़रिए हो सकता है, कभी-कभी कमेंट में भी।.

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