दो से बेहतर चार
Lesbian Sex Stories
दो धमाकेदार यार। कॉलेज के डंग में भी घुटनों तक मस्ती। लड़कों के साथ कभी आगे नहीं बढ़ीं, सिर्फ झूठे-झूठे इशारे। छातर में रहते हुए भी सब कुछ ठीक। शादी के बाद पहली मुलाकात…
अभी-अभी खबर आई है कि सब कुछ फिर से चलने लगा है। आप सब कहाँ हैं, ये जानकर अच्छा लगेगा।
कई बार तुम्हारे मेल पढ़ने के बाद समझ आता है - मेरी कहानियों का असर तुम पर पड़ रहा है।
एक कहानी थी मेरी, जो योग से शुरू हुई। कुछ पल बाद वह धीरे-धीरे भोग में बदल गई।
एक सुबह शुरू हुई थी वो कहानी, जिसमें Xxx के कदम पुरानी यादों पर धीमे पड़ गए। कभी-कभी चुप्पी भी बोल उठती है, मन की तरफ से। रास्ते बदलते रहे, लगा जैसे घटनाएँ खुद को ढूँढ रही हैं। कविता की तरह अधूरी लगी वो बात, जो छात्रावास की दीवारों में समा गई।
शिखा तब भी याद करती है वो पहली बार जब दीपा उसके कमरे में आई थी। छोटी सी झलक थी उस दिन, लेकिन बातचीत फैल गई घंटों तक। दोनों के बीच बातें हुईं, फिर धीरे-धीरे बदलाव आया रिश्ते में। बचपन की यादें ताज़ा हो उठीं, जब दोनों एक ही हॉस्टल में ठहरीं। ग्रेड के अंक नहीं, बल्कि बातें चढ़ गईं ऊपर।
उसी पल से सब कुछ गड़बड़ होने लगा।
कोई पैसे की तंगी नहीं थी, फिर दिल्ली के हॉस्टल में बुरा हाल होने में समय क्यों लगता।
अच्छा हुआ वो दोनों लड़कियाँ हॉस्टल में रहती थीं, जहाँ पर नियम बहुत कड़े होते थे। फिर भी, कमरे के अंदर जो होता था, उसमें वो औरत क्या बिगाड़ सकती थी।
दीपा पहले ऐसी नहीं थी, मगर शिखा के चलते सब कुछ बदल गया।
सिगरेट भी चुपचाप हड़प लेती, पैक में छिपी रहती। एक के बाद एक बीयर की खाली बोतलें निकल आतीं, अलमारी के पीछे से।
शिखा की कोई सहेली थी, जिससे उसने दोनों तरफ फिट होने वाला डिल्डो ले लिया था। हर रात पॉर्न देखने के बाद वो अपनी चूत में उंगली घुसाती या डिल्डो चलाती, तभी आराम मिलता।
सच में... उन दोनों ने खुद को लड़कों से अलग रखा था।
उसकी माँ ने सिर पर सवाल उठते हुए हॉस्टल भेजा, बस इतना कहा - लड़कों से दूर रखना।
शिखा वह थीं जिन्होंने अपना हिस्सा पूरा किया, दीपा आगे बढ़कर सामने आईं।
शादी के बाद उनमें से हर एक का यही ख्वाब था कि पति को किसी और के साथ न जुड़ी हुई चूत मिले।
फ्रेंच किस के बारे में दीपा और शिखा को पता चला, सीखा उन्होंने इसे एक फिल्म देखकर।!
एक के होंठ दूसरे पर धीमे-धीमे फिसल रहे थे, जीभ के स्पर्श से ताप बढ़ने लगा।
हर रात हॉस्टल में कुछ न कुछ होता रहता। दीपा के मम्मे शिखा से लंबे थे, इसलिए शायद बात बढ़ जाती। कभी-कभी छोटी बात पर भी झगड़ा शुरू हो जाता।
शिखा को जहाँ दीपा से ज़्यादा खुजली रहती, वहीं उसकी चूत से पानी निकालने के लिए दीपा सिर्फ़ वाइब्रेटर ही नहीं, बल्कि अपनी जीभ का भी इस्तेमाल करती।
दीपा को चुसाने में ऐसी आदत हो गई थी कि हर बार सही ढंग से हो जाता।
शिखा मुस्कुराते हुए बोली - वो तेरे स्पर्श पर मूर्छित हो उठेगा।
दीपा मुस्कुराई, फिर बोली - हम तो सिर्फ 69 करते रहेंगे, क्योंकि मम्मे के बिना मेरी नींद गायब है, वहीं उसकी नींद लंड के बिना जागती रहती है।
शिखा ने कहा - मेरे पति का साथ देगा, तो मैं तेरी माँ के साथ होने का इंतज़ाम कर दूँगी।!
दीपा मुस्कुराते हुए बोली- अगर तू सिर्फ मम्मे चूसेगी, तब भी चूत की खुजली शांत नहीं होगी। मैं अपने पति को बुला लूँगी, वो भी तेरे मियां के साथ ही सब कुछ करवाएगा।
उन दोनों ने एक-दूसरे से यह सहमति बनाई थी कि जब भी मौका मिले, अपने पति के साथ होने वाले पल को दूसरी के साथ भी साझा करेंगी।
अलग-अलग हो सकता है वो, मगर तीसरे के साथ दोनों लड़कियों का होना तय है।
वक्त ने पंख खोले, फिर वो उड़ गया। शादी का बंधन भी दोनों के सिर पर आ गया।
शादी हो चुकी है दीपा की, जयपु में। लखनऊ में हुई थी शिखा की बात।
मनीष, जो शिखा के साथ हैं, उनके पड़ोस में रहते थे अनिल - वही, जिन्होंने दीपा के साथ जीवन बिताया।
अकेले रहने की आदत थी मनीष को, फिर भी वह बड़ी जिम्मेदारी संभाले हुए था। अनिल की बात करें तो उसकी नौकरी भी चौंकाने वाली थी, घर भी खाली रहता था उसका।
हर रोज़ शिखा की दीपा से फ़ोन पर बात होती। गपशप में कहीं न कहीं सेक्स की बात भी छूट जाती।
शिखा के दिमाग में बस इतना घूम रहा था - क्यों नहीं आया? मनीष उसे ठीक ऐसा ही मिला जैसी वो अपने भीतर थी। चटख रंगों वाला, तेज़-तर्रार।
उड़ान भरते हुए वो दोनों जमकर मस्ती करते। सालों में दो-तीन बार विदेश घूमने निकल पड़े शिखा और मनीष।
थाइलैंड में शिखा-मनीष के साथ जो मस्ती हुई, वही दीपा-अनिल के सफर में सिंगापुर के बाद क्रूज़ पर भी घटित हुई।
शिखा के बताए हुए हिसाब से, अनिल पर दीपा के मम्मों का जादू छाया रहता था। वो उसका लंड चूस-चूस कर इतना बेकाबू कर देती कि मौका मिलते ही अनिल उन पर झपट पड़ता।
मनीष हैरान रह गया, क्योंकि शिखा के किस करने का तरीका बहुत अलग था। जबकि दीपा भी उसमें माहिर थी। एक बार वो ऐसे चुंबन करने लगी कि मनीष सोचने पर मजबूर हो गया। शिखा ने कैसे ये कला इतनी अच्छी सीख ली, ये उसकी समझ से परे था।?
शिखा बोली, तुम्हारे होंठ इतने मीठे हैं कि प्यार खुद-ब-खुद दिल में उमड़ जाता है।
इस तरह दीपा ने अनिल को चूत चूसने की आदत डाल दी थी। हर वक्त वो अपनी चूत को चमकदार बनाए रखती, सुगंध से भरी रहती वो।
बिस्तर में आते ही वो सीधा अनिल का लंड मुँह में ले लेती। फिर पैर फैलाकर नीचे बैठ जाती, उसके सिर को पकड़कर धीमे से अपने ऊपर खींच लेती।
दीपा कई बार अपने शरीर पर मीठे पदार्थ - चॉकलेट, शहद, कभी-कभी कुछ और - लगाकर बिस्तर पर आती। अनिल को चखने का स्वाद फिर गहरा लगने लगता।
थोड़ी देर का मौका होता, फिर भी अनिल का जोश कम नहीं पड़ता।
थोड़ी देर में ही वह खत्म कर लेता। इधर, दीपा के शरीर का हर हिस्सा चढ़ाई के आनंद में भीगने लगता। फिर वह संतुष्टि से अनिल से चिपक जाती, बेल की तरह।!
उसे यह ख्वाहिश थी कि दीपा होठों से उसकी बरछी पूरी तरह साफ़ कर डाले।
दीपा को पहली बार में कुछ खास सुख नहीं आया… फिर भी पति के लिए, उसने अनिल के लिंग से निकली धार को मुँह से ग्रहण कर लिया।
अब धीरे-धीरे ऐसा होने लगा था कि उसे यह सब सहज लगने लगा। पीरियड्स के दिनों में अनिल चुपचाप उसके मम्मों पर गंदगी निकाल देता, वैसे ही जैसे दीपा जीभ से साफ कर देती थी।
दीपा ने पॉर्न देख-देखकर मूठ मारना सीख लिया। कभी हाथ में क्रीम लगाकर, कभी बिना कुछ लगाए वो अनिल के लंड को झाड़ती। तब अनिल की सीधी सीत्कार आवाज़ आती।
मनीष के सपनों में हल्के-फुल्के रंग हमेशा घूमते।
कभी-कभी वह तथा शिखा अश्लील फ़िल्में देखने में समय बिता देते।
कई बार मनीष शिखा को कार में नंगा कर देता। वहीं शिखा उसके लिए सब कुछ कर देती।
उस वक्त दोनों के बीच बातें होतीं, पॉर्न फिल्मों के बारे में भी ज़ुबान चलती।
तीनों के साथ शारीरिक संबंध का उन्हें बहुत आकर्षण महसूस होता था, मगर न तो कभी अवसर आया, न ही दिल हारा।
शिखा ने दीपा को फोन पर साफ-साफ कह दिया था - ये मेरा वाला तो थ्रीसम के लिए बेकरार है। आ जा, तेरी चूत की गर्मी मैं सुलझा देती हूँ।
हँसी में ही बात खत्म हो गई।
लंबी चुदाई में शिखा को फोरप्ले का आनंद लेने का पूरा मौका मिलता। हर तरह की मुद्रा में वो अपनी चुदाई जारी रखती, मनीष के साथ।
थोड़ी देर बाद शिखा ने यह भी बता दिया कि उसके हॉस्टल में ज्यादातर लड़कियां एक-दूसरे को पसंद करती थीं।
मनीष जब दीपा के बारे में पूछता, तो शिखा चुपचाप कहीं और चली जाती।
सिगरेट के धुएं में घिरे मनीष-अनिल, लड़कियों को बची हुई चुस्कियाँ दे देते।
आजकल सिगरेट पीना, बीयर पीना - ये दोनों आधुनिक संस्कृति का हिस्सा बन चुके हैं।
दुबई में अनिल की कंपनी का मुख्यालय था। साल में कभी-कभी, एक या दो दिन के लिए, उसे वहाँ जाना पड़ता था। किसी मौके पर उसने दीपा को भी साथ ले जाकर घुमाया था।
हेड ऑफिस से इस बार प्रशिक्षण का समय मिल गया, और अब अनिल को कुछ दिनों के लिए वहीं जाना था।
एक दिन शिखा के घर जाने के बजाय, तय हुआ कि दीपा मायके में थोड़े समय रहेगी।
गए अनिल के बाद दीपा मायके में ही ठहर गई। उसके बाद वो लखनऊ की ओर चल पड़ी, शताब्दी में सवार होकर वहाँ पहुँची।
दो साल बाद मुलाक़ात होने वाली थी, शिखा के चेहरे पर उमंग थी। दीपा के जज़्बात भी कम नहीं - आख़िरकार इतने अरसे बाद मिलने का मौक़ा आया था।
मनीष के साथ दीपा की मुलाकात सिर्फ़ शादी में हुई थी, कभी-कभी बातचीत व्हाट्सएप कॉल पर हो जाती।
स्टेशन पर उतरते ही दीपा ने पूछ लिया - मनीष कहीं नज़र नहीं आ रहा।
शिखा ने कहा - डरकर वो दिल्ली चला गया है, रात तक वापस पहुँच जाएगा।
शिखा ने अपनी कार से आने का इंतजाम किया था, तो वो दोनों लखनऊ घूमते हुए लंच करके दोपहर में उसके फ्लेट पर पहुंच गई।
अंदर कदम रखते ही दीपा ने शिखा को पकड़ लिया, उनके मुँह एक हो गए।
एक-दूसरे से चिपकी हुई थीं वो, मानो कहीं बीती शाम की यादें समेट रही हों।
आँखों में पानी आ गया था दीपा के। उसके मुँह से निकला - तू तो दो साल में एक बार भी ख्याल नहीं आया मेरा।
शिखा के अंदर एक उठाव था। उसने कहा - जब भी तुम्हारी याद सताती है… मनीष के निप्पल चूस लेती हूँ, फिर उसी से चूत चुसवा लेती हूँ। पर तुम्हारे मम्मे चूसने का अहसास, तुमसे चूत चुसवाने का अनुभव… वो कहीं और ही है।!
दोनों हंस पड़ीं।
तेज धूप में लखनऊ सुलग रहा था, अचानक दीपा ने कहा - अब तो नहाना ही पड़ेगा।
उसके पीछे हाथ धोने की जगह कहाँ मिलेगी, शिखा ने समझाया।
दीपा बोली, तू भी चल आ। आज कभी पुरानी बातें याद आएंगी। देखना पड़ेगा कि हमारे लोगों ने छेद कितना फैला दिया है!
दीपा ने कुछ कहा उससे पहले ही अंदर आ गई, फिर शावर चालू कर दिया।
तभी शिखा ने कपड़े उतारे, वो पहुंच गई।
उसकी माँ के दिल तक मनीष ने घर कर लिया था, जबकि दीपा के मन की बातें तो पहले ही उसके चुरा चुके थे।
पानी के तले दोनों खड़ी हुई थी। उनके हाथ धीरे से एक-दूसरे के स्तनों पर फिरने लगे।
शिखा को नीचे बैठाते हुए दीपा बोली - मेरी चूत से पहले। जल रही हूँ अंदर से।!
बैठकर सीधा शिखा ने दीपा के योनि पर जीभ घुमाई।.
कई साल बाद उन्हें फिर कुछ हँसी-मजाक वाला पल मिला।
दीपा के आने पर शिखा ने सबकुछ संभाल लिया।
दीपा की माँ के होठों पर उसकी माँ ने जोर से अपने होठ घिस डाले। फिर वही होठ चूसते हुए उन्हें गहरा लाल कर दिया।
बूंद-बूंद पानी ऊपर से टपकता, मगर नीचे आग लगी रहती। हर छींटे के बाद वो और तेज़ हो उठती।
शिखा ने कहा - आओ, बिस्तर पर घूमते हैं।
बाहर आते ही वो सीधे बेड पर लेट गईं, नमस्ते कपड़े अभी भी शरीर पर थे।
बीच के हैंडल पकड़कर शिखा ने फ्रिज खोला। अंदर से दो ठंडी बीयर की बोतलें उठाईं।
ठंड के चलते कमरा सुनसान-सा लग रहा था। बीयर की बोतल खोलकर शिखा ने उसे दीपा की ओर बढ़ा दिया। धीमे स्वर में बातें होती रहीं, घूँट भरते हुए वो दोनों बिस्तर पर जा बैठीं।
शिखा के होंठों पर दीपा के होंठ आ टकराए।
उसके शरीर को छूते ही सारा संयम गायब हो गया।
उंगली सावधानी से अंदर गई, फिर शिखा ने धीमे हलचल शुरू कर दी।
दीपा लेट गयी।
उसने माँ की तरफ मुड़कर मुंह में डाल दिया, फिर हाथ के नखरों से दीपा की जांघों के बीच उभरे हिस्से पर दबाव डाला।
शिखा को भी तेज महसूस होने लगा था, इसलिए उसने अपने आपको दीपा के साथ ऐंठ लिया।
उनमें से एक की जीभ दूसरे के अंदर थी, वहीं दूसरे की भी उल्टा तरीके से घुसी हुई थी।
थोड़ी देर तक साथ में रहने के बाद शिखा ने अलग होने का फैसला किया, उसके बाद दोनों ने बीयर पीना शुरू कर दिया।
ख़ुशी से वो दोनों के चेहरे चमक उठे। आज पहली बार फिर मनभावना घड़ी मिली थी।
आज शाम मनीष के साथ होगा क्या, ऐसा पूछते हुए शिखा ने दीपा की ओर आँख मारी।?
दीपा ने कहा - अरे नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं होगा, किसी फायदे की बात नहीं… मनीष कुछ गलत समझे, शायद दोस्ती डगमगा जाए।
शिखा ने कहा - यार, मनीष सचमुच घटिया है, उसे कभी एतराज नहीं होगा, बल्कि वो पूरा आनंद लेगा। पूरी रात इस्तेमाल करेगा, फिर भी थकान नहीं महसूस करेगा।
दीपा ने मना कर दिया, कहा - अभी तो नहीं हो पाएगा, समय आने पर फैसला होगा। जब अनिल भी पहुँचेगा, तब सब मिलकर कुछ करेंगे।
शिखा पक्की गंदी हरकत करने वाली थी। बोली, कोई बात नहीं… जब भी मैं तेरे पास आऊँगी, अनिल के साथ ऐसा करूंगी। उसकी इजाजत? तेरी मंजूरी? जरूरत नहीं।
भूख भी सताने लगी थी। पकोड़े बनाकर शिखा ने मामला संभाला। फिर दोनों हजरतगं की ओर चहलकदमी पर उतर गईं।
उस रात मनीष का भी पहुँचना तय था। फिर बात बनी कि स्टेशन से उसे लेंगे, खाना खाएंगे, और घर जाएंगे।
जींस में शिखा कदम रखती है, साथ में एक छोटा-सा टॉप जो तन जाता है। दीपा के कंधों पर फैला एक लंबा फ्रॉक, हवा में लहराता।
एक तस्वीर में दोनों का अंदाज़ सचमुच कॉलेज की छात्राओं जैसा था।
दोनों हजरतगंज पहुंची, गाड़ी में बैठकर सिगरेट के धुएं के छल्ले बनाते हुए।
शिखा के पास कॉपर टी थी। दीपा के पास भी वही था। फिर भी बातचीत में जब आई गुजर, तो शिखा ने सवाल उठा दिया - क्या कोंडोम का इस्तेमाल नहीं होगा?
हंसते हुए दीपा ने कहा - कमीनी, कंडोम पहनकर मनीष अनिल के साथ ऐसा करेगा?
दीपा ने कहा - उसके सेक्स के हिसाब से अगर कंडोम पर पैसा लगाया जाए, तो अब तक लाखों रुपये सिर्फ कंडोम में उड़ चुके होते।
फिर दुकानों के सामने खड़े हो गए, तभी ट्रेन छूटने का वक्त हो पहुँचा।
गाड़ी को चारबाग स्टेशन पर रखकर शिखा ने दीपा से कहा – तुम यही बैठो, मैं मनीष को लेकर वापस आऊँगी।
कुछ समय बाद, शिखा मनीष के साथ पहुँच गई।
गले मिलते ही दीपा ने मनीष की बांहों में खुद को भर लिया। साँस थमी, जैसे सब कुछ रुक गया हो।
गालों पर किस करते हुए मनीष सचमुच बहुत घटिया था। दीपा के चेहरे पर वो छू गया, जिससे वो और भी नीच लगने लगा।
गाड़ी के पास पहुंचकर सबने खिलखिलाते हुए दरवाजा खोला।
सड़क पर गाड़ी के स्टीयरिंग के पीछे मनीष था। उसके अगले सीट पर दीपा जगह लेती हुई बैठ गई। पीछे की सीट पर शिखा को भेज दिया गया।
शिखा ने हंसते हुए कहा – मनीष, याद रखना, तेरी पत्नी पीछे बैठी है, कोई गलती से उसकी फ्रॉक उठा ले।
मनीष ने मुस्कुराते हुए कहा - कोई बात नहीं, घर की औरतें तो सब ऐसी ही होती हैं।
कभी कोई सब कुछ नहीं बदल पाता। दीपा ने उसे छेड़ा, समेटा थोड़ा। आधा हिस्सा वैसे ही रहा, जैसे घर में अटका कोई फैसला।
मनीष ने कहा - आधा ही सही। ऊपर-नीचे में बाट लो, या फिर आगे-पीछे, जैसे मन लगे।
लाल हो उठी दीपा शर्मा।
गालों पर मनीष के हाथ से चिकोटी पड़ गई।
मनीष ने कार को सिर्फ उसी पल एक रेस्तरां के बाहर खड़ा कर दिया।
खाने के वक्त मनीष ने फिर लड़कियों को छेड़ा, इस बीच दीपा और मनीष के बीच की दूरियाँ भी घट गईं।
गाड़ी में वापसी के दौरान कुछ नॉन-वेज चुटकुले भी शामिल हो चुके थे।
दस बजने को हुआ जब घर पहुँचे।
दोस्तों, ये कॉलेज के दिनों की कहानी सुनकर मज़ा आ रहा है न? Xxx के साथ वो पल याद है?
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