कुंवारी लड़की की कमसिन जवानी की शुरुआत

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Jan 7, 2026 - 11:32
Jan 21, 2026 - 15:30
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कुंवारी लड़की की कमसिन जवानी की शुरुआत

ताराक्षी मैं हूं, उम्र के हिसाब से छहबीस साल की। परिचय शुरू करना चाहूं तो यही कहूंगी।
उत्तर प्रदेश में मेरा घर है।
ऊँचाई मेरी पांच फुट तीन इंच के आसपास है।
करीब पौने पचास किलो का दायरा में हूँ मैं।
मेरा फिगर 34B-30-34 है, तो सामने से लेकर पीछे तक ध्यान खींचना मुश्किल नहीं होता। चाहे वो छोटे उम्र के हों या बुजुर्ग, नज़रें टिक जाती हैं।
बाल मेरे कंधों तक पहुँचते हैं, स्वभाव से चमकीले। गोरी त्वचा मेरे चेहरे पर खुद को दिखाती है, धीरे-धीरे गर्दन तक फैलती।
अगर सब कुछ जोड़कर देखा जाए, तो लगता है मैं किसी मॉडल जैसी नजर आती हूं।
अब मैं घर पर रहती हूं। पढ़ाई खत्म हो गई है मेरी।
अभी तक कोई शादीशुदा जिंदगी में प्रवेश नहीं किया है।
घर से बाहर पापा का काम दुबई में चल रहा है, माँ क्लास में बच्चों को पढ़ाती हैं।
एक बड़ी बहन मेरी है, उनकी शादी पिछले साल हो गई थी।
ज़िन्दगी के एक पड़ाव पर, मैं इस कहानी में वो सब बयाँ कर रही हूँ जो मेरे साथ हुआ।
गांव में जन्म लिया मैंने, वो बहुत छोटा था।
मेरा बचप काफी संतोष से भरा रहा।
उम्र के उस पड़ाव पर पहुंचते ही शरीर बदलने लगा।
बचपन के पढ़ाई के दिनों में ही मेरी छातियां बढ़ने लगी थीं, जैसे कोई सवाल उठता है आदतों के बीच।
अच्छा हुआ कि मेरे दोनों निप्पल्स काफी लंबे हैं, इस बात पर मुझे खुशी महसूस होती है।
मेरी गुदा का भी पल-पल बढ़ना अच्छे से हुआ।
मेरी जान की तंग झलकें पूरी तरह सटी रहती थीं, वहीं मेरा क्लिट खासा उभरा हुआ था।
हाल में मैंने यह बात पकड़ी कि जब मैं टांगें फैलाती, तो मेरी ग्रोइन की दोनों स्लिट्स चिपकी रहती थीं। वहीं, दीदी और कजिन के ये हिस्से अलग-थलग दिखते थे।
उस वक्त मैं जितना बड़ा होता गया, उतना ही वो मेरे करीब आती गई।
माँ का बर्ताव हमसे हमेशा नरमी भरा रहता था, फिर भी दीदी मेरे सबसे ज़्यादा पास थी।
कभी सुबह के उठते एक साथ, तो कभी नाश्ता बिस्तर पर लेटकर। स्कूल के रास्ते में गपशप चलती रहती। कई बार घंटों बाद भी आवाज़ सुनाई देती।
घर पर डैड का होना इतना कम होता कि साल में सिर्फ एक-दो बार दिखाई देते। कुछ दिन ठहरकर फिर चले जाते।
एक छोटी सी झलक में, वो नमाज़ पढ़ते हुए खड़ी रहती थीं - शांति से भरा चेहरा। उस घर में हम दो बहनें बड़ी हुईं, जैसे कोई गीत धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा हो।
उसने हम दोनों बहनों की पढ़ाई गर्ल्स स्कूल से शुरू करवाई, फिर कॉलेज तक जारी रखी।
थोड़ी बड़ी हुई तभी सही वक्त पर दीदी ने पैड का इस्तेमाल सिखाया, उंगलियों से कैसे साफ रखना भी बताया।
रात में दो-तीन बार ऐसा हो जाता था कि वो खुद को छू लेती। उसके पास कोई नामी लड़का नहीं था, फिर भी गर्माहट उसमें झलकती थी। एक समय आता था जब अकेलापन धीमे से चढ़ जाता, फिर वो शुरू कर देती। जिस तरह बारिश बिना बुलाए आ जाती है, उस तरह उसके हाथ अपने आप घूमने लगते। थोड़ी देर बाद सांसें तेज हो जाती, फिर सब ठंडा पड़ जाता।
एक दौर में वो हमारी कजिन के साथ-साथ अपनी दोस्त से भी लेस्बियन रिश्ते में थी।
हर बार जब वो कजिन या उसकी दोस्त घर आती, मुझे एक अलग कमरे में जगह मिलती। रातभर वो दोनों साथ बिताती, शाम से लेकर सुबह तक एक-दूसरे के साथ रहने का आनंद लेती।
जब माँ को इस बात का पता चला, तो ख़ामोशी से रहीं।
माँ ने तब दीदी की शादी का फैसला किया, जब वह बीए में फेल हो गई। पति एक इंजीनियर थे, उम्र में थोड़े बड़े, चश्मा पहनते थे।
अब उसकी दीदी, जीजा के साथ वह भी परिवार समेत विदेश में बस गई है।
शादी के बाद दीदी के, मैंने BA गर्ल्स कॉलेज से किया। पढ़ाई में डूबे रहने के चलते MA के लिए दिल्ली के अच्छे कॉलेज में जगह मिल गई।
ख़ुशी के साथ मैं दिल्ली पहुँची थी।
हवा में दिल्ली की खुली छानबीन थी, वैसे ही एक कॉलेज भी ऐसा था जो किसी तरह सबको पीछे छोड़ गया।
अब रहने की जगह मिल चुकी है।
एक दिन मैंने साक्षी को अपना रूममेट बनते देखा।
उसका घर भी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से नगर में था। वो किसी चमकती सुबह जैसी लगती थी। खूबसूरती में मुझसे कई गुना आगे थी वो। उसका शरीर मेरे से ज्यादा मजबूत भी था, मानो धूप में ढला हो।
एक-दूसरे के करीब आने में हमारा ज़्यादा वक्त नहीं लगा।
स्कूल के बाद कॉलेज का सिलसिला शुरू हो चुका था। हम दोनों का फोकस अब सिर्फ किताबों पर टिक गया था।
थोड़े समय बाद, साक्षी की भाभी हॉस्टल पहुंची। वो लड़की से मिलना चाहती थी।
एक दिन साक्षी ने मुझे अपनी भाभी से मिलवाया। उनका नाम था नीलू। खैर, वो साक्षी से कहीं ज़्यादा आकर्षक लगीं।
कुछ पल मैं सिर्फ भाभी की ओर घूरती रही।
इसके बाद भाभी से अभिवादन किया, फिर दिल्ली के काम में उलझ गई।
चाय के दौरान भाभी ने मज़ाक में ताश की बात छेड़ी। फिर वहीं बैठकर हमने अगले दिन के लिए समय तय कर लिया।
ताश का खेल मेरी समझ में नहीं आया, तो मैंने हाँ में सिर हिलाने से पहले रुक गई।.
थोड़ी देर बाद साक्षी की जिद पर, फिर भाभी के साथ, मैं हाँ कर बैठी।
खेलते हुए भाभी ने पहली बार ताश के चाल समझाए, साक्षी ने बीच में कुछ टिप्स दी। धीरे-धीरे मैं उनके साथ बैठकर चाल चलने लगी।
खेलते समय भाभी ने हमें "स्ट्रिप पोकर" खेलने की बात कही।.
इसके बारे में मेरी समझ में कुछ नहीं आया था।.
साक्षी ने कहा, हारने वाले को धीरे-धीरे सारे कपड़े उतारने पड़ते हैं।
मैंने मना कर दिया, बस इतना ही नहीं पता था कि वो खेल कैसे चलता है।.
फिर भी साक्षी ने अड़ियल होकर कहा – ऐसा नहीं होगा।
कौन जाने, क्यों मैं भाभी की बात पर विश्वास कर बैठी।
अचानक मुझे साक्षी के आगे खुली होना सहज लगता था। वैसे भी, पहले कई बार उसकी मौजूदगी में कपड़े बदलते हुए मैं ऐसे ही खुली रह चुकी थी। ओर वो भी, मेरे सामने शरीर दिखाने में कभी झिझकती नहीं थी।
शुरुआत में खेल आहिस्ता से चलने लगा।
खेलने के बारे में मुझे सही से पता नहीं था, इसलिए पहले दौर में हार गई।
कमीज निकालनी पड़ी मेरे हाथ से।
भाभी के सामने मुझे लज्जा महसूस हो रही थी।
उस दौरान साक्षी आगे बढ़ी, तब भाभी ने इशारा किया। पल भर में सब कुछ बदल गया, जब वो मेरे पास खड़ी हुई।
बार इसमें साक्षी ने खुद को हरा लिया।
गिरते ही वो अपनी कमीज उतारकर ज़मीन पर डाल दिया।
साक्षी ने अगले चरण में भी सहायता की, बावजूद इसके कि उसने जानबूझकर हार स्वीकार कर ली।
बार इस पे उसने शलवार सरका के किनारे डाल दिया।
साक्षी के ऊपर अब सिर्फ एक ब्रा थी, नीचे पैंटी। मेरे ऊपर कुछ भी नहीं था, शरीर खुला हुआ था।
अगले दौरों में साक्षी का साथ खत्म हुआ, मैं धीरे-धीरे पूरी तरह बिना कवच के हो गई।
कुछ दौर बाद मैंने सब कपड़े उतार लिए थे। साक्षी के पास अभी भी ब्रा और अंडरवियर था। भाभी ने एक तुकड़ा भी नहीं खोया, जैसे उन्होंने हर छोर पकड़ रखा हो।
एकदम अचानक भाभी ने मुझसे कहा - तुम दोनों ने मिलकर भी मुझे एक राउंड में नहीं हराया, इसलिए आज रात तुम्हें मेरी गुलाम बनकर बितानी पड़ेगी।!
साक्षी ने जवाब दिया, तभी मैं मना करने लगी।
साक्षी को मनाने की कोशिश मैंने आँखें घुमाते हुए शुरू की।.
फिर उसने कहा - तुम्हें डर लगा?
फिर भी मुझे इस बात को समझना पड़ा।?
बस मैंने भाभी से हामी भर ली।
तब भाभी ने कहा, हर बात माननी पड़ेगी - सुबह तक। ठीक है? तो खेल आगे जाएगा। वर्ण घर लौट देंगी, सीधे कार में बैठकर।
उस पल हम तय कर चुके थे - भाभी की सुबह तक हम गुलाम बने रहेंगे।
उस दिन भाभी ने हमें स्कर्ट और ऊपर का कपड़ा पहनने को कहा।
नीले रंग की ब्रा थी, पैंटी भी नीली। ऊपर की ओर एक जींस वाला टॉप चुना। नीचे स्कर्ट, जो गहरे नीले रंग की थी, घुटनों तक पहुँचती थी।
कपड़ों में साक्षी का रुख बिल्कुल वैसा ही था।
बाथरूम से तुरंत बाद, भाभी ने पहनी एक नीली सलवार सूट। फिर वो धीरे-धीरे बाहर कदम रख दिया।
बाद में वह तैयार होकर बाहर आई, फिर हम सभी लोग नीचे गए। कार में बैठे, और खाना खाने के लिए चल पड़े।
तभी हम लोग पहुँचे एक साफ-सुथरे ढाबे पर। खाना खूब चखा, किसी ने कमी नहीं महसूस की।
उसके बाद भाभी ने आइसक्रीम मंगवाई।
उसी वक्त, भोजन करते ही मुझे लगा कि अब पेशाब रोकना मुश्किल है।
जब मैं उठकर स्नानघर की ओर बढ़ी, तभी भाभी ने आवाज देकर पूछ लिया - तुझे कुछ चाहिए?
बात मैंने कही - तेज़ धड़क रही है, सचमुच!
ताराक्षी की भाभी बोली, "चलो जल्दी। मैं तुम्हें सुसु करवा देती हूँ, वरना ये चेयर गिली हो जाएगी।"!
ऐसा लगा, सबकी नजरें हम पर आ गईं जब भाभी ने ऊँची आवाज में बात की।
खाना खा रही महिला की ओर देखकर भाभी बोली – अफ्रा! इस लड़की को किडनी में पत्थर हो गए हैं। पेशाब संभाल नहीं पाती है वो। जल्दी अस्पताल ले चलूंगी, वरना यहीं झाग छोड़ देगी!

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खड़ी थी लोगों के बीच, भाभी के शब्द सुनते हुए। घबरा उठी थी, जैसे पानी हो गई हवा में।
अब साक्षी को अपनी सास के हर क़दम का पता चल चुका था, धीरे-धीरे उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
हाथ को उसने अपनी मुट्ठी में बंद किया, फिर साथ लेकर नंगे पैर टाइल्स पर चलते हुए वो बाथरूम के अंदर हो गई।
अचानक से वहाँ पहुँच गए थे, दोनों एक साथ।
एकदम अचानक भाभी ने कहा - तुम्हारी चड्डी दो।
जब मैंने इनकार कर दिया, तो भाभी की नज़रों में गुस्सा झलकने लगा।
चड्डी सरकाता हुआ मैंने वह भाभी के हाथ में रख दी।
पेशाब का झटका इतना तेज़ था कि शर्मिंदगी कुछ लेन-देन नहीं रखती थी।
जब मैं बाथरूम के स्टाल की ओर बढ़ी, तभी भाभी ने रोक दिया। उन्होंने कहा, "ताराक्षी, पेशाब करना हो तो इधर ही बाहर कर लेना।" अंदर जाने पर मना कर दिया गया था।!
मैंने भाभी से कहा, छोड़ दो न। पेट में तेज दबाव है। बस अभी जाना है।!
फिर भी वो हाँ न कही।
उसने कहा - पेशाब की जरूरत है? फिर इधर बाहर ही कर दो। वरना मैं तुझे अभी हॉस्टल छोड़ आऊंगी!
इतनी तेज़ पेशाब का झटका लगा कि गुस्सा आ गया। भाभी की ओर घूरते हुए मैंने स्कर्ट को दोनों हाथों से समेट लिया। फिर उनकी आँखों में आँखें डालकर चड्डी को धीरे से नीचे खिसका दिया।
एकदम तभी, मेरी बुर मेरी झांटों के पीछे से निकलकर भाभी की आँखों के सामने आ गई।.
थोड़ी सी खिंची हंसी उनके चेहरे पर तैर रही थी।
आंखें बंद करके मैंने सिर्फ उनकी ओर देखा, धीरे से मुस्कान छलक पड़ी।
अब मेरी चड्डी घुटनों तक सिमट चुकी थी।
हवा में स्कर्ट के किनारे लहराए, दोनों हाथ कमर पर जमे रहे। आँखें बस इतनी देर के लिए बंद हुईं, जितने में साँस अटक जाए। फिर धीरे-धीरे नीचे की ओर झुकती गई, भारतीय ढंग से जमीन को छू लिया।
अचानक मैं उसके सामने हो गई, धीमे पैरों से खिसकते हुए।
नीचे जमीन पर भारतीय ढंग से बैठने पर मेरी चोटी के दोनों छोर, भाभी के सामने, खुले पड़ गए।
वो धीमे से मुस्कुरा रही थीं, भाभी मेरे चेहरे की ओर टकटकी लगाए हुए। उनकी नज़रें मेरी ताज़ा बिस्तर वाली जांघों पर ठहर गई थीं।
सांस नीचे की ओर उतरी, फिर मैंने पेशाब छोड़ दी।
जैसे ही मूत्रमार्ग ढीला पड़ा, पेशाब बहने लगी। आंखों को बंद किए, मैंने छोड़ दिया सब कुछ।
एकदम अचानक, मैं सोचने लगी कि शायद यही तो है वो जगह।
इस तरह से पेशाब करने में मौज आ गई थी।
पेशाब करते-करते मुझे ऐसा लगा, जैसे सब कुछ खत्म हो गया हो।
उड़ान के बीच में मैं लटकती जा रही थी।
हालाँकि मैं स्वर्ग के अंदर थी, पीछे की तरफ बाथरूम का दरवाज़ा टटोला जा रहा था। इसी बीच तीन औरतें धीरे-धीरे अंदर घुस आईं।
उन तीनों का हैरान रह जाना था, जब मैं स्टाल्स के बाहर ही पेशाब करता हुआ उनकी नज़र में आया।
थोड़ी देर बाद भाभी ने कहा - किडनी में तकलीफ है। कई बार सुसु करने में तकलीफ होती होगी, ऐसे में थोड़ा आराम अच्छा लगता होगा।!
एक की नज़र में तसल्ली थी, दूसरी ने चुपचाप सिर हिला दिया, तीसरी के होंठ हिले बिना आवाज़ निकल पड़ी।
एक समय के बाद मैंने महसूस किया कि पेशाब कम हो रही है।
एक कदम में हल्का बोझ था, जैसे बादल नीचे उतर रहे हों।
उस पल में तीनों औरतों को सामने देखकर मैं जमीन से चिपक गई, हिल नहीं पा रही थी।
क्या करना चाहिए, इसका फैसला नहीं हो पा रहा था।?
थोड़ा-थोड़ा करके पेशाब अब भी मेरे लिए आ रहा था।
अब पेशाब कम होकर बंद हो गई।
बस इतना ही था - मैं वहीं बैठी रही, स्कर्ट कमर पर लिपटी, जैसे कोई पुरानी आदत चिपकी हो। भाभी के सामने, उन तीन औरतों के बीच, मेरी झांटों भरी बुर खोल फैली पड़ी थी।
जब मैं ऐसे ही दो मिनट तक बैठी रही, तभी भाभी आगे आई। उन्होंने मेरी चड्डी खींचना शुरू कर दियa।
हर कदम पर मैंने धीरे से पैर उठाया, फिर भाभी की चड्ड़ी नीचे लाई।
चढ़ी पड़ी थी भाभी मेरे ऊपर, चड्डी निकालकर साफ किया मेरा झनझनाता हिस्सा। फिर खड़ा कर दिया मुझे, जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
उसके बाद वो मेरी स्कर्ट नीचे करता हुआ आगे बढ़ा। फिर धीरे-धीरे मुझे बाथरूम के पास ले गया।
सिर्फ चल रही थी मैं, सोचने की जगह कुछ भी नहीं बचा था।
उल्टा मैं भी उतना ही कर रही थी, जितना मेरे साथ भाभी कर रही थी।
मेरी भाभी के साथ मैं वहाँ पहुँची, साक्षी के पास जगह हो चुकी थी।
सन्नाटे में डूबा जहन था मेरा।
उसी पल नौकरशाही से मुक्त होकर वेटर वहाँ खड़ा था, आइसक्रीम का इरादा अपने हाथ में लिए।
वो जैसे ही आइसक्रीम को टेबल पर रखता, भाभी ने मेरी गीली नीली चड्डी - पेशाब से तर - उसकी प्लेट में डाल दिया। फिर उसे घर के बाहर फेंकने के लिए कह दिया।
खाने के बाद वेटर मेरी गंदी चड्डी उठाकर खड़ा हो गया। आँखें मेरे ऊपर, फिर भाभी पर घूमीं। कुछ पल ऐसे ही ठिठका रहा। अचानक उसने चड्डी हवा में लहराई। सबकी नजरें उस पर जम गईं। बिना कुछ बोले वो पीछे की ओट लेकर गायब हो गया।
डूबती हुई थी मैं, शर्म के कीचड़ में पूरी तरह।
आँखों से पानी का बहना शुरू हो गया था मेरी।
सारा सिर मेज़ के तख्ते तक खींच लिया गया था मेरा।
हथेलियाँ जांघों पर पड़ीं, साक्षी का छूना था। धीमे-धीमे सांस सीधी होने लगी।
थोड़ी देर बाद, मैं लगभग सब कुछ भूलकर आम सी हो गई थी।
उधर, आइसक्रीम का पूरा सामना हो चुका था।.
बाहर आते ही वो हमें पीछे की सीट पर ले गईं।
भाभी गाड़ी चला रही थीं, साक्षी मेरे पास खामोशी से बैठी रही।
अँधेरा छा चुका था, पर दिल्ली की सतह पर बिखरी रोशनी झलक रही थी।
रेडियो चलता हुआ, तब भाभी ने स्विच पर हाथ फेरा। धुन आई मस्ती भरी, लय में कहीं छुपा था जज़्बा।
“अब तभी सब कुछ बदलने वाला है, मेरे प्यारे,” भाभी ने कहा, आईने में हमारी ओर झाँकते हुए।
फिर हम वो तय करके चले पड़े जहां भाभी रहती थी।
एक शानदार फ्लैट में वो अकेले रहती थीं, पति के बाहर देश होने की वजह से।
जैसे ही अंदर कदम रखा, भाभी ने मुड़कर लाइटें कम कर दीं। फिर सोफे पर बैठने को कहा।
“अब स्ट्रिप करो, दोनों! पूरी तरह!” भाभी ने ऑर्डर दिया।
बिना कुछ सोचे, साक्षी ने अपने कपड़े धीरे से नीचे उतार दिए।
डर के मारे मैंने आहिस्ता से कपड़े उतारे, भाभी की नजरें चुभ रही थीं।
अब हम दोनों कुछ भी नहीं पहने हुए थे।
सलवार-कमीज को धीरे से पलंग पर डालते हुए भाभी अब सिर्फ लेसदार ब्रा और पैंटी में थीं।
शरीर पर धड़कनेवाली सिहरन अब और तेज हो गई थी।
ग्लास में लाल शराब का रंग फैलता देख चुपचाप पीने लगी। उधर, भाभी ने बोतल से धीमे हाथ से तीसरा गिलास भर दिया। एक कोने में खड़ी वह छवि अब आराम से सांस ले रही थी।
हमने पी।
शराब पीते-पीते मस्ती धीरे-धीरे बढ़ने लगी।
अचानक भाभी ने साक्षी को पास खींचा। फिर बिना कुछ कहे उसके होठों पर मुँह लगा दिया।
उसने मुंह नहीं मोड़ा, साक्षी ने भी पलटकर किस किया।
आँखें ठिठक गईं मेरी।
फिर भाभी ने मुझे बुलाया, “आओ ताराक्षी, अपनी मालकिन को खुश करो!”
वो मुझे दिखाई दिए, तब मैं आगे बढ़ी।
उसकी भाभी ने उसके निप्पल्स पर चुटकी ली। हाथ सीधा जाकर बैठा उसकी अभी-अभी विकसित हुई गर्लफ्रेंड के प्राइवेट पार्ट पर। "इतनी टाइट है यह," धीमे स्वर में बोली वो, "आज रात इसे खोलने का मेरा है।"
पीछे से आई साक्षी ने मेरे छाती को हल्के से दबा लिया।
तीनों को बिस्तर पर जगह मिली, साथ-साथ।
साक्षी की चूत में भाभी ने वाइब्रेटर डाला, उससे पहले वो खुद हाथ में ले चुकी थी।
साक्षी चीखने लगी, “आह भाभी! और जोर से!”
अब लगा कि मैंने चुपचाप कदम आगे बढ़ाया।
कमरे में सन्नाटा था, तभी उसने आगे बढ़कर वह चीज़ मेरी छोटी सी उभरी हुई जगह पर रख दी। धीमी गति से कंपन शुरू हुआ, बिल्कुल अचानक।
मैं तड़प उठी, “ओह गॉड! भाभी, मैं मर जाऊंगी!”
हमारी नींद उस रात जागते-जागते बीत गई, एक के बाद एक खेलते रहे।
एक शाम भाभी ने हम दोनों को साथ उलझा दिया। वह चुपचाप मेरी तरफ झुकी, फिर पड़ोस वाली की ओर बढ़ गई। उसकी उंगलियाँ धीमे-धीमे अंदर घुसीं। इस बीच मैंने महसूस किया - उसकी जीभ मेरे पास भी है।
पहली बार मुझे एक लड़की की चूत चखने का मौका मिला – साक्षी की, उसके बाद घर में ही भाभी की आई नजर।
मीठापन उनके रस में साफ़ झलक रहा था।
थकान इतनी थी कि सूरज उगते-उगते हम पलट गए।
भाभी ने कहा, “ये सिर्फ शुरुआत है, ताराक्षी। अब तुम मेरी परमानेंट स्लेव हो!”
उसके बाद जब हॉस्टल पहुँची, तो कुछ अलग सा हो चुकी थी मैं।
अब साक्षी के साथ रातें ऐसी आदत बन गई हैं - हल्का स्पर्श, फिर धीमे हाथों का खेल।
हर छुट्टियों के दिन भाभी घर आतीं। फिर कुछ अनोखा सिखाना शुरू कर देतीं - जैसे बॉन्डेज का तरीका, स्पैंकिंग के नियम, या लोगों के बीच में खुद को दिखाना।
मेरे MA समाप्त करने के बाद वापसी हुई घर की ओर, पर ये पल अब मेरे जीवन में रच गए हैं।
घर बैठकर हवस पर काबू रखने की कोशिश करती हूँ, फिर भी डेढ़ महीने बाद दिल्ली चली जाती हूँ - या तो भाभी से मिलने या फिर साक्षी के पास।
शादी?
अब समझ आया, पहले कभी नहीं। मेरी बॉडी, मेरी ख्वाहिशों को मैंने अपने रूप में ढाल लिया है।
इस कहानी में ताज़ा अनुभव कैसे छिपा है, क्या आपने महसूस किया?
ई-मेल के ज़रिए आपके पास सकारात्मक सुझाव भेजे जा सकते हैं।
धन्यवाद.

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