पति आर्मी में और भाभी देवर से चुद गयी
Desisexkahaniya
प्रिया मेरा नाम है। खुद पर भरोसा रखने वाली एक साधारण औरत हूँ मैं। शादी के तीन साल बीत गए हैं। फौज में पति की नौकरी है, इसलिए घर आना-जाना कम रहता है। घर में सास, ससुर और छोटा देवर अंकित भी रहता है। अंकित सबसे ज्यादा उछल-कूद करता है। शुरू में लगता था, ऐसे ही छोटे भाई जैसा है। धीरे-धीरे उसकी नजरों में बदलाव आता दिखा।
जब अंकित मेरी ओर देखता है, समझ आ जाता है - उसकी नजरों में अब भाभी नहीं, कोई औरत छुपी है।
एक दिन की बात है, मैं बरामदे में बैठी थी। अंदर से फोन की घंटी बजी। जैसे ही मैं उठकर फोन लेने लगी, साड़ी का पल्लू ढीला हो गया। तभी नजर पड़ी अंकित पर। उसकी आंखें मेरी छाती पर टिक गई थीं। चेहरा बदल चुका था। एक झलक में समझ आ गया – वो अब बचपन से बाहर था। उसकी नजरों में भूख थी। वो भाव कुछ कह रहे थे।
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उस दिन मैं चुप क्यों रही, ये तो समझ नहीं आया। हो सकता है, वो घरवालों में से एक था। या फिर मेरे अंदर भी कुछ अजीब सा उमड़ रहा था। उसकी ऊभरी हुई गोलाई देखकर छाती में धक्धक् बढ़ गई।
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थोड़ी देर बाद, मन ही मन कई चीजें हिलने लगी थीं।
अगले दिन के बाद अंकित के ढंग और भी बदलने लगे। हमेशा कुछ न कुछ ऐसा करता, जिससे मुझे एहसास हो जाता - वो मेरी चूत या चूचियों पर ध्यान दे रहा है। कभी-कभी पास बैठ जाता, तो कभी जाने-अनजाने रसोई में टकरा जाता।
फिर भी मैंने यह खेल जारी रखा।
उस दिन घर में छोटी सी पार्टी थी। रसोई में मैं अकेले खाना बना रही थी। तभी अंकित वहाँ आ गया। उसने जानबूझकर फिसलने का ढोंग किया। धीरे-धीरे मेरे पास आ गया। उसने मेरे कंधे को हाथ से छुआ। उसकी उंगलियाँ मेरी चूचियों को छू गईं। मैं शांत रही। कुछ भी नहीं बोली।
शांति से मैंने पूछ लिया - कोई चोट तो नहीं आयी? पर भीतर, मेरा खून जल रहा था।
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उसके स्पर्श में कहीं खोया हुआ सन्नाटा बसा था।
थोड़े दिन सब हमदम चला, पर मैं समझ रही थी कि अंकित एक झटके के लिए टटोल रहा है - कब फिर पास घुस आए।
एक दिन बैटरी खत्म हो गई, इनवर्टर फेल हो गया। गर्मी बहुत थी, मैं छत पर चली गई सोने। ऊपर अंकित पहले से पड़ा था। उधर मम्मी और बहन भी आ चुकी थीं, कोई झिझक महसूस नहीं हुई।
अँधियारा घिर चुका था, सभी की नींद पूरी हो गई। मेरे पेट पर किसी के हाथ की गर्माहट आई। वानगी से कोई हलचल नहीं की मैंने।
उसकी उँगलियों का मेरे स्तनों पर दबाव पड़ते ही मेरे मुँह से एक सिसकी छूट गई, फिर भी चुप रही मैं।
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उसके हाथ मेरी छाती पर पहुँचे, दबाव डाला, तो रीढ़ से झुरझुरी दौड़ गई। आंखें बंद किए रखी, भले ही मन चाहे, सांसें फिर भी तेज हो उठी। छूने का अंदाज़ धीमा था, फिर भी इश्क़ की गहराई छिपी थी।
ख़ामोश रहने पर उसे हौसला मिल गया। धीरे-धीरे उसके होंठ मेरे गाल के पास पहुँच गए, फिर एक सेकंड में मेरे होंठों को छू लिया।
फिर अचानक आँख खुल गई मेरी।
डर के मारे अंकित सिमट गया, आँखें बंद करके लेट गया मानो गहरी नींद में हो। चेहरे पर डर छलक रहा था। मैं ठिठककर खड़ी रही, उसे देखती रही कुछ पलों तक। एक तरफ उसकी मासूम सूरत, दूसरी ओर नजरों में आए बदलाव - दोनों मेरे भीतर हलचल पैदा कर गए।
उठकर मैं पेशाब के लिए पास की ओर चल दी। साड़ी ऊपर उठाई, मूत्र छोड़ा, तभी ध्यान गया कि अंकित अब भी मेरी ओर घूर रहा है। उसके चेहरे पर इच्छा और लालसा का रंग छाया हुआ था।
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लेटते ही पता चला कि अंकित की चटाई धीरे से मेरी तरफ बढ़ गई थी।
अब तक मैं पक्का जान चुका था, उसके भीतर हार मानने की बिलकुल जगह नहीं थी।
थोड़ी देर बाद मुझे एहसास हुआ कि वो फिर से मेरी जांघ पर हाथ रख चुका था। उसकी उंगलियां आगे बढ़ने लगीं, साड़ी के किनारे को धीमे से खींचते हुए। मैं समझ गई थी, रुकवाने से कुछ नहीं बदलेगा। इसे भी पढ़ें: पड़ोसन भाभी के साथ अफेयर
फिर उसका हाथ मेरी चूची पर आया। दबाव बढ़ते ही सांस का घटना शुरू हो गया। एक सीटी जैसी आवाज़ मेरे मुंह से छूट गई।
“आह… अंकित…”
वह मेरी सांसों की गर्माहट पकड़ता हुआ कान के पास झुका, धीमे स्वर में बोला।
“भाभी… मुझे आपकी चूचियां पीनी हैं। आप जाग रही हैं ना?”
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मौन रहा मैं। कोई हां नहीं कही, न ही ना कही।
चुप रहना ही मेरी हाँ का मतलब था।
बिना डरे अंकित ने मेरा ब्लाउज ढीला करने की कोशिश की। मैंने आहिस्ता से उसकी उंगलियां पकड़ लीं, फिर मुंह खोला।
“अभी नहीं… कल पी लेना।”
मुड़ते हुए उसके चेहरे पर खामोश सी छा गई, फिर भी मैं समझ चुकी थी - इस आग के ठंडी होने का कोई डर नहीं था।
अचानक अंकित ने मुझे अपनी बाहों में खींच लिया। उसके होंठ मेरे होंठों पर आए, फिर से। छूने का अहसास कुछ ऐसा था, जैसे लंबे समय बाद बारिश हो रही हो। मैं भी इतनी तलब में डूबी थी कि खुद नहीं जानती थी। पति के न रहने से ये तड़प और भी गहरी हो गई थी।
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उसके सिर पर हल्के से हाथ फेरते हुए मैंने धीरे से खींच लिया अपनी ओर।
उसके हाथ जब मेरी पेंटी के अंदर सरके, मेरा शरीर लड़खड़ा गया। उंगलियों का स्पर्श पाकर मैंने आवाज छुपाने की कोशिश की। फिर भी, एक सांस के साथ शब्द बाहर आ गए –
“अपना लंड निकालो।”
मुस्कान उसके चेहरे पर आई, फिर वह बोला।
“आप ही निकाल दो, भाभी।”
उसकी बातें सादगी से भरी थीं, मन को छू लेने वाली। हर शब्द में इतना प्यार था कि डूब सा जाता था मैं।
उसके अंदर हाथ फिसलाते हुए मैंने धीरे-धीरे छेड़ना शुरू किया। एक बार पकड़ते ही वह सीधा खड़ा हो गया। त्वचा के नीचे की गर्मी मेरी उंगलियों तक पहुंच रही थी।
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मैंने धीरे से पेंटी उतारी, फिर अंकित के ऊपर आकर लेट गई। वह मेरी साड़ी सरकाकर मेरे जघन पर अपना लिंग घसीटने लगा।
मेरी चूत कई महीनों से खाली पड़ी थी, जैसे कुछ होने का इंतजार कर रही हो। धीरे-धीरे जब वह अपना लंड अंदर डालने लगा, तो टीस सी महसूस हुई। फिर भी ये टीस घटने के बजाय एक अजीब आनंद में ढल गई।
मेरी ओर देखते हुए अंकित की नज़रों में एक गहरी लालसा साफ़ झलक रही थी।
वह मेरी चूत में अपना लंड आहिस्ता से डालने लगा। हर बार जब वो भीतर घुसा, मेरी साँसें छूटती गईं।
“आह… अंकित… धीरे…”
फिर अंकित का जोश बढ़ने लगा। उसकी गर्माहट मेरे भीतर धीमे-धीमे घुल रही थी। मैं उसके सारे दबाव में डूबी हुई थी। खुद को उसी के सपुर्द कर चुकी थी।
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हर बार जब वह आगे बढ़ता, मैं काँप उठता।
लगभग दस मिनट तक वह मेरे अंदर धकेलता रहा, फिर उसने मेरी चूची में ही सब कुछ खाली कर दिया।
ख़ुशी महसूस हो रही थी मेरे अंदर।
नीचे आकर मैंने चुदाई के बाद पेंटी उठाई। अंकित भी तभी पीछे से आकर मेरे शरीर से चिपक गया।
उसने आहिस्ता से कान में कुछ कहा।
“भाभी, अगली बार आपकी गांड मारूंगा।”
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मुस्कान छलक पड़ी। होंठ हिले, आवाज़ निकली - धीमी-धीमी।
“पहले मेरी चूत को अच्छे से चूसना सीखो, फिर गांड की बात करना।”
अगली सुबह के वक्त, जब मैं रसोई में खड़ी थी, अचानक अंकित पीछे से आया। उसने मेरे कमर के नीचे हाथ घुमाया।
“भाभी, आज आपकी गांड पेलूंगा।”
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हल्के से मुस्कुराकर मैंने हाँ कह दिया।
“ठीक है… लेकिन मम्मी और दीदी को पता न चले।”
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अगली सुबह, जब अंकित रसोईघर में दाखिल हुआ, तभी उसने पीछे से मेरी कमर पकड़ ली। मेरे भीतर एक झनझनाहट-सी दौड़ गई। उसकी उंगलियाँ धीमे-धीमे मेरे नितंबों पर घूम रही थीं। मैंने बस इतना किया - थोड़ा सा झटका देकर हटने की कोशिश की, वह भी ऐसे जैसे मन नहीं था वाकई में।
“अंकित… कोई देख लेगा,” मैंने आवाज़ कम करते हुए कहा।
हल्की सी हँसी के साथ उसके मुँह से आवाज़ निकली –
“भाभी, अब आप मेरी हैं। जब मन करेगा, तब चोदूंगा।”
मैं उसकी बात सुनकर एकदम पिघल गया।
खाना बनाते समय मुझे उसकी नज़रों का एहसास हुआ। वो मेरे शरीर पर टिकी हुई थीं, हर जगह घूर रहा था वो आदमी। उसकी आँखें सिर्फ मेरी छाती और पिछवाड़े पर ठहर रही थीं। मैंने धीरे से कमर हिलाकर चलना शुरू कर दिया। ऐसा करने से वो और बढ़ जाएगा उत्तेजित, यही सोचकर।
अब तो मैं इस खेल को जीतने लगा था।
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अंकित उस वक्त मेरे कमरे में घुसा, जब मम्मी झपकी ले रही थीं। दीदी अपनी चारदीवारी में बंद थी। मैं कपड़ों को अलमारी में ठूंस ही रही थी।
मुड़ी मैं जब आवाज उसकी सुनी… “भाभी...” दरवाजे के पास खड़ा था वह, नजरों में वही बात थी जो पहले थी।
मुस्कान के साथ मैंने वो सवाल किया।
कमर पर हाथ पड़ते ही मैंने अंकित को पीछे महसूस किया।
“भाभी, कल रात आपने कहा था कि चूत चूसूंगा… तो आज मौका दीजिए।”
थोड़ा सा झटका देकर मैंने कहा,
“नहीं, पहले अपनी बहन को निहारना छोड़ दो।”
लालिमा उसके गालों पर फैल गई।
“भाभी… वो बस यूं ही…”
“अच्छा?” मैंने उसके गाल थपथपाते हुए कहा, “अब मैं तुम्हारी हूं, लेकिन उसकी तरफ आंख उठाकर भी देखा तो…”
मैंने साफ़ कह दिया, "भाभी को नहीं देखूंगा", इसके बावजूद वह मेरे ब्लाउज के बटन खोलने लगा।
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उसकी बेचैनी मुझमें कहीं गहराई तक उतर रही थी।
मैंने उसकी सहायता की, फिर धीरे से अपना ब्लाउज उतार दिया। मेरे स्तन सीधे उसकी ओर थे। वह आगे झुका, मेरे ऊपर मुंह ले गया। जैसे ही उसकी जीभ ने मेरे निपल को छुआ, मेरे मुंह से एक कोमल आवाज़ निकल पड़ी।
“अंकित… जोर से चूसो…”
उसका मुँह एक चूची पर था, फिर धीमे से दूसरी की ओर बढ़ गया। मेरी उंगलियाँ उसके बालों में खिसकती रहीं।
थोड़ी देर के बाद मैंने उसे पलंग पर घसीटा, फिर उसके सिरहाने जमकर बैठ गई।
“आज तुम्हें पूरी तरह से चूसने दूंगी, लेकिन बदले में तुम्हें मेरी चूत को भी अच्छा से चोदना होगा।”
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उसके मुँह से निकला, "अभी करता हूं, भाभी," फिर वो मेरी पेंटी धीरे से नीचे खींचने लगा।
लंड पूरा सख्त हो चुका था। पेंटी धीरे से नीचे खिसकाई, फिर चूत को उसके होठों के पास ले जाया।
जीभ से चखो… मैंने कहा।
अंकित ने सीधा मुँह मेरी चूत पर लगा दिया। उसकी जीभ अंदर घूमने लगी, मानो कई दिनों का इंतज़ार खत्म हुआ हो। हर ओर छू रही थी, धीमे-धीमे फिर तेज़। आवाज़ें मेरे गले से निकलकर दीवारों से टकराने लगीं।
“आह… अंकित… और अंदर डालो जीभ… हां, वहीं…”
थोड़ी देर उसने मेरी चूत चखी, इसके बाद मैंने उसे खींचकर ऊपर किया और मुंह से उसका लंड घेर लिया।
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मेरे भीतर वो दर्द उतर चुका था।
“भाभी… आपका मुंह बहुत गर्म है… आह…”
उसका लंड मैंने पूरा चूस लिया, इसके बाद वो मेरे नीचे हो गया।
“अब मैं तुम्हें अपनी चूत में लूंगी।”
उसकी आँखों में झांकते हुए मैंने धीरे से उसका लंड अपनी चूत के भीतर सरकाया। वो मोटापा मेरे अंदर फैलता जा रहा था।
“आह… अंकित… तुम्हारा लंड बहुत मोटा है…”
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“भाभी, आपकी चूत बहुत गर्म है…”
तब तक हमारे शरीर पसीने में डूब गए थे।
ऊपर-नीचे की गति में मेरा शरीर तेज़ी से हिल रहा था। बैठने पर हर बार वो घुटनों तक झुकती, और उसका लंड चूत के भीतर तक पहुँच जाता।
लगभग पंद्रह मिनट तक के बाद अंकित ने मेरी तरफ मुड़कर कहा -
“भाभी… अब मैं झड़ने वाला हूं!”
मैंने कहा, "बस छोड़ दो... मुझमें ही आ जाओ!" फिर मैंने गति और तेज कर ली।
उसकी गर्मी मेरे भीतर फैल गई, और हम दोनों बिस्तर पर ढह गए।
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मैं संतुष्ट थी।
हथेलियों के बीच उनकी उँगलियाँ फिसलती रहीं, आवाज़ ने कहा।
“भाभी, अब आपकी गांड कब मारूं?”
उसकी ओर नज़र गड़ाए, मैं हंस पड़ा और बोला –
“जब तुम और मजबूत हो जाओगे, तब… अभी चूत से ही संतुष्ट रहो!”
तभी हमारे मुँह से हँसी छूट गई।
अगले दिन से लेकर मेरी और अंकित की ज़िंदगी टटोलने लगी। उसने मेरे शरीर में जो आग छोड़ी, वो हर पल के साथ बढ़ रही थी। जब भी वह पास आया, तो उसकी मासूम नज़र और तड़प ने मुझे धीरे-धीरे ढला दिया।
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मुझे एहसास होने लगा था - अब मैं सिर्फ भाभी नहीं रही, मैं उसकी पसंद बन गई थी।
उस दिन वो मेरे पास आया, चेहरे पर कुछ अजीब तनाव था।
बालों को हाथ से छेड़ते हुए मैं बोला, "क्या चल रहा है, अंकित?"
थोड़ी देर को सन्नाटा पसर गया। उसके बाद वह बोला –
“भाभी, आप मुझे दीदी को देखता हुआ मना करती हो, लेकिन वो भी बहुत सुंदर हैं। कभी-कभी मेरा मन होता है…”
अचानक मुझे झुंझलाहट होने लगी। इस कहानी पर भी नजर डालिए - जब जंगल में बाबा ने सब कुछ छोड़ दिया, तो पीछे खड़ा बॉयफ्रेंड सब देखता रह गया।
मेरी मुट्ठी ने उसकी बाँह को समेट लिया।
“तुम मेरी हो चुके हो। अब तुम्हारी नजरें किसी और पर नहीं जानी चाहिए, चाहे वह प्रीति हो या कोई और।”
थोड़ी देर को उसका हौसला डगमगा गया।
“भाभी, मैं तो बस… माफ कर दो।”
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उसके होंठों पर चुम्बन देते हुए मैं बोला।
“अगर तुम्हारा मन कहीं और गया, तो मैं तुम्हारी चूत के दरवाजे बंद कर दूंगी।”
उसने मेरी बात सुनते ही अंकित ने चूचियों पर हाथ रख दिया।
“नहीं भाभी, ऐसा कभी नहीं होगा। आप ही मेरी सबकुछ हो।”
इस बात को समझते ही मन शांत हो गया।
थोड़े दिन बाद, मम्मी-दीदी बाजार चली गईं। घर में कोई नहीं था। कमरे में कपड़े बदलते हुए मुझे एहसास हुआ - अंकित पीछे से आ गया था।
उसने कहा - "भाभी..." और स्वर में बची हुई थी वो अधूरी तड़प।
उसकी ओर नज़र गड़ाए, मैंने साड़ी का पल्लू धीरे से छोड़ दिया।
उसकी तरफ मुड़कर मैंने पूछ लिया - "क्या चाहिए?"
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“भाभी, आज आपकी गांड मारनी है। आपने वादा किया था।”
हल्के से होठ खिंच गए, जब उसने कहा।
“ठीक है, लेकिन पहले तुम्हें मेरी चूत को फिर से चाटना होगा।”
आँखों में एकाएक चमक आ गई।
अचानक वो मेरे पास आ गया, फिर मुझे बिस्तर पर धकेल दिया। साड़ी ढीली हुई, अंडरवियर नीचे खिसकी। उसकी जीभ ने मेरी चूत को छू लिया, फिर घिसटने लगी।
“आह… अंकित… यही… हां…”
मेरी जांघें अलग हो गईं, ताकि उसकी जीभ हर ओर घूम सके। वह मेरे भोसड़े पर झुका था, मानो कल कोई मौका न मिले।
तुम अभी ये कहानी पढ़ रहे हो, जो मिली है एक ऐसी जगह से जहाँ सेक्स स्टोरीज़ मिलती हैं बिना किसी चार्ज के।
पानी में डूबी हुई, मैंने उससे बस इतना कहा - अब बस करो।
“अब मेरी गांड के लिए तैयार हो जाओ।”
हवा उसके नथुनों से तेजी से बाहर आने लगी।
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उसके लिए मैंने कहा कि कंडोम लगाए। बिना देर किए, वो अपनी जांघों के बीच से उठाकर लंबे हाथों से खुद पर चढ़ा लिया।
मेरी जांघें बिस्तर पर टिक गई थीं, पीछे का हिस्सा सीधा उसकी तरफ।
“धीरे करना, अंकित। पहली बार है।”
वह मेरी पीठ के निचले हिस्से पर तेल लगाने लगा, फिर आहिस्ता से अपना हिस्सा अंदर सरकोसा।
“आह… अंकित… थोड़ा धीरे…”
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हर बार जब वह धक्का देता, तभी मुझे झनझनी सी महसूस होती। कुछ अजीब ख़ुशी भी छुपी हुई थी उसमें।
“भाभी, आपकी गांड बहुत टाइट है…”
“हां… बस ऐसे ही… और अंदर…”
तेज होते कदमों के साथ, वो मुझ पर हावी हो गया। कमरे में फैल गई मेरी सांसों की धड़कन।
“आह… अंकित… तुम्हारा लंड… मेरी गांड…”
लगभग पंद्रह मिनट तक वो मेरे साथ सेक्स करता रहा। जैसे ही उसने कहा कि अब खत्म करना चाहता है, मैंने उसे ऐसा करने से रोक दिया।
“झड़ जाओ, अंकित… मेरी गांड में ही…”
वह सारा जोश मेरे पिछले हिस्से में उतार गया।
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थकान से लदकर हम दोनों बिस्तर पर जा गिरे। मैं उसकी छाती में सिमटती चली गई।
उस दिन के बाद जैसे हम दोनों के रास्ते और मिलने लगे। अब अंकित मेरा सिर्फ देवर नहीं रहा, बल्कि प्रेमी भी हो चुका था। हमारा रिश्ता धीरे-धीरे उस हद तक पहुँच गया था जहाँ इश्क से ज्यादा घनिष्ठता का एहसास होने लगा।
मैंने बोला, तुम्हें सुनना है।
“अंकित, अब तुम मेरी हो। जब चाहो, मेरी चूत और गांड तुम्हारी है। लेकिन मेरी एक शर्त है।”
उसने सिर झुकाकर कहा - "भाभी, क्या हुआ?"
“तुम सिर्फ मेरे रहोगे। चाहे कुछ भी हो जाए।”
तुम्हारे हाथों में ये कहानी है, देवर-भाभी का संबंध जिसे तुम पल-पल आगे बढ़ा रहे हो। ये पन्ना एक सामान्य साइट का हिस्सा है, फ्री सेक्स कहानी डॉट इन। यहीं से तुम ऐसी कहानियों को समय-समय पर खोजते रहते हो।
चूमते हुए उसके होठों ने मेरी चूचियों पर शब्द छोड़े।
“आपके सिवा किसी और की तरफ देखूंगा भी नहीं।”ं
ं
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