पड़ोस की शादीशुदा भाभी को घर बेचने के बहाने चोद डाला

Desisexkahaniya

Jan 3, 2026 - 17:22
Jan 9, 2026 - 17:16
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पड़ोस की शादीशुदा भाभी को घर बेचने के बहाने चोद डाला

धीरपाल मैं, गाजियाबाद में बसा हुआ। ऊंचाई छह फुट की, शरीर पर चौड़ी छाती, चेहरे पर बचपन से खूबसूरती। सत्ताईस साल की उम्र में नौकरी यहीं की, घर तो गोरखपुर में है। इधर, दो दोस्तों के साथ कमरा साझा करता हूं - उन्होंने एक औरत के पास जाने में मदद की थी। कहानी शुरू होती है वहाँ से, जहाँ बातें बिना लपेट के सीधी हो जाती हैं। एक साल से यहीं ठिकाना, पर घटना दो महीने पुरानी है।.

खड़ा था बालकनी में, तभी नीचे एक औरत दिखाई दी। उसके अंदाज में कुछ ऐसी चमक थी, समझ नहीं पा रहा था क्या कहूँ। फिर तुरंत उतर गया मैं, बस उसे देखने के लिए। पहने हुए थे गुलाबी सूट, काली लेगिंग, चेहरा छोटा-सा गोल, गाल गुलाबी, लाल लिपस्टिक, बाल हवा में उड़ रहे थे। मैं तो ठिठक गया वहीं खड़ा। अचानक ध्यान गया सिंदूर पर, मांग में लगा हुआ। दिल टूट गया, गुस्सा आने लगा उस आदमी पर जिसने उससे विवाह किया था। .

एक शाम वो और उसका पति साथ टहलने निकले। देखते ही लगा, ये आदमी बहुत ऊँचा-ऊँचा बोलता है। मेरे भीतर धीरज आया, एक झनझनाहट सी महसूस हुई। तय कर लिया - अब कोई फर्क नहीं पड़ता, बस इस तक पहुँचना है। दोस्तों ने कई बातें सुझाईं, पर सब बातें आधी-अधूरी थीं। कुछ दिन तक बस चुपचाप देखता रहा, नज़रें मिलाता रहा। कभी-कभी वो भी मेरी ओर देख लेती। .

एक दिन मैं उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। घर के बाहर एक तख्ती लगी थी - ‘घर बिक्री के लिए’। ऐसे में मेरे दिमाग में ख्याल आया। अगले दिन सुबह-सुबह मैं सीधे वहाँ पहुँच गया। दरवाजा खुला, और उसने पूछा कि क्या चाहिए। मैंने कहा कि बाहर लगे बोर्ड ने मुझे यहाँ लाया है। फिर वह मुझे अंदर ले गया। बैठकर हम ढेर सारी बातें करने लगे। कुछ देर बाद उसने कहा - आपको तो मैंने पहले भी देखा है, क्या आप इसी ओर रहते हैं?

कमल ने अपनी माँ के साथ संबंध बनाया। इस घटना को पढ़ें।

उसने पूछा, कहीं रहने में कोई दिक्कत तो नहीं? मैंने जवाब दिया, ऐसा कुछ नहीं, बस अपनी छत होनी चाहिए। फिर वो बोली, ठीक है, चाय बनाकर लाती हूँ। थोड़ी देर बाद चाय पी, फिर मैं वहाँ से निकल गया। मैंने उसके पति के बारे में भी बात की। उनकी खुद की दुकान थी, घर से बहुत दूर, इसलिए घर बेचने की तैयारी थी। धीरे-धीरे शाम को बातचीत आम हो गई। मैंने कहा था, दो महीने में घर ले लूँगा, हालाँकि मन में कुछ और ही था।.

शाम के उजाले में एक दिन मैंने दोस्तों से कहा था कि आओगे तो संदेश भेजना। फिर एक साथी से गाड़ी माँगी। जैसे ही वो पास आई, मैं बाहर खड़ा था। गाड़ी रोकी, पास लाकर खड़ी की। बोला, सुनो, मैं भी उधर जा रहा हूँ, तुम्हें छोड़ देता हूँ। वो चढ़ गई अंदर। घर तक पहुँचा दिया। रास्ते में उसने पूछा, ये गाड़ी तुम्हारी है? मैंने कहा, हाँ, मेरी ही है। इतना सुनते ही बोली, चलो, चाय पी लो। पहले मैंने टाल दिया। पर जब दोबारा बुलाया, तो चल दिया उधर।.

अंदर चाय के साथ वक्त बीता, पर इस बार माहौल हल्का फुल्का-सा लगा, मानो वो मेरी तरफ़ झुक रही हो। उसके मुंह से निकला – "ठीक है, तुम्हारी आय कितनी है?" मैंने जवाब दिया – एक लाख रुपए हर महीने, हालांकि सच तो ये था कि पच्चीस हजार कमाता था। शब्द अभी जलवे में थे कि उसकी आंखों में चमक भड़क उठी। वो बोली – "आओ, घर तो देखा ही नहीं, मैं दिखा देती हूं," और बाद में वो हर कोना दिखा चुकी थी। थोड़ी देर बाद बोली – "अपना नंबर दे दो," मैंने बिना रोक टोक दे दिया।.

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उस रात उसका फोन आया। बोली, "आप क्या कर रहे हैं?" मैंने जवाब दिया, महज़ ऑफिस का काम चल रहा था। वो बोली, ठीक है, कोई काम हो तो संपर्क कर लेना। उसका पति एक सप्ताह के लिए शहर से बाहर जा रहा है। इस दौरान जरूरत हो तो वो मुझे बुला सकती है। शुरू में उसकी बात का मतलब समझ नहीं आया। कुछ देर बाद दरवाज़े पर घंटी बजी। मैंने दोस्तों को सारा हाल सुनाया। पूछा कि कहीं वो मानसिक स्थिति में तो नहीं खो गई। उन्होंने कहा, ऐसा कुछ नहीं है।.

एक किताब में यह भी लिखा है। जब सामने वाले ने ऐसा कहा, तो मन में कई बातें आईं। किसी ने शादी के बाद ऐसा माहौल बनाया था। फिर एक दिन उसने ठाकुर के पास जाकर कुछ और कह दिया।

अगले दिन मैंने उसे व्हाट्सएप पर संदेश भेजा, कल मेरे घर आ जाओ, पेपर्स के बारे में बात करनी है। उसने जवाब दिया, ठीक है, आऊंगी। सुबह-सुबह उसकी तरफ से मैसेज आया - एक काम करो, तुम मेरे घर आ जाओ। मैंने कोई सवाल नहीं किया, सीधे वहाँ पहुँच गया। घर में कदम रखते ही माहौल ऐसा लगा, जैसे कोई खास दिन हो। हवा में एक मीठी खुशबू तैर रही थी। मैंने नाश्ता किया। इसके बाद उसने कहा, आज तो तुम कहीं खाना खाकर जाना। और फिर वो रसोई की ओर चली गई। .

हिम्मत जुटाकर मैं भी किचन के अंदर पहुँच गया, धीरे से उसके पीछे आकर उसे कसकर पकड़ लिया। कान के पास बोला - घर लेना तो बहाना था, असल में तुम चाहिए थी। वह बोली, मैं शादीशुदा हूँ, फिर खुद को छुड़ा लिया। मैंने कहा, ठीक है, पति से भी बात कर लेंगे, और करीब जाकर उसे चुम लिया। उसने कुछ नहीं कहा, आँखें नीची करके खड़ी रही। मैंने कहा, यहाँ जो भी होगा, किसी और को पता नहीं चलेगा, फिर उसे चुमने लगा।.

मैं उसका किस करता रहा, तभी उसने भी मेरा हाथ थाम लिया और किस में शामिल हो गई। धीरे से मैं उसकी गर्दन को छूता हुआ ब्लाउज तक पहुंच गया, बटन खोले, ब्रा उतारी। मेरे हाथ उसके सीने पर आए, दबाव डाला, चूसने लगा - वो सांस रोक, आवाजें निकालने लगी: आह… ह्ह… ओह्ह…इह्ह। उसके सीने बड़े नहीं थे, पर जैसे थे, ठीक लग रहे थे। मैंने निप्पल को दांतों में लिया, खींचा, वो मेरे सिर को पकड़, बालों में हाथ फेरने लगी। कुछ देर ऐसे चूसा, फिर मैंने अपनी पैंट का बटन खोला।.

वह धीरे से नीचे बैठ गई। फिर मेरा लंड बाहर आया तो उसने हाथ में ले लिया, हिलाया, चूसना शुरू कर दिया। ग्ग्ग्ग... गी... गों... गोग। कुछ समय तक वह ऐसे ही चूसती रही, मैं खड़ा-खड़ा देखता रहा। फिर उठी, गैस के पास जगह पर जाकर बैठ गई। मैंने उसकी टांगें ऊपर उठाईं, पैंटी नीचे खींच दी, साड़ी सरकाई और चूत चाटने लगा। चिकनी थी, मानो अभी-अभी बाल मुंडवाए हों। उसे भी चुदाई चाहिए थी, पर औरतें झझक में कभी पीछे नहीं हटतीं।.

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थोड़ी देर मैंने उसकी चूत पर जीभ घुमाई, तब तक वो अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह करती रही, कभी आआआ, कभी ऊऊऊ, कभी हह्ह्ह। बीच में एक गहरी सांस निकली - आह ह ह ह ह्हीईई - फिर चीखी जैसे कुछ टूट रहा हो। मैं उठा, लंड उसके अंदर धंसा दिया। अब झटके लगे शुरू, तेज, गहरे, बार-बार। वो फिसलती आवाज़ों में खो गई - अह्ह्ह्ह, हह्ह्ह, ओह्ह ओह, इह्ह। मैं तेज हो गया, छाती भारी, सांस तेज, ठोकरें बढ़ीं। वो बस बिखरती रही - आह.. ह्ह्ह.. इह्ह.. ऊउइ ..ऊई ..उईईई - एक नाम बना दिया जैसे हर झटके पर।.

थोड़ी देर में मैंने अपना सारा माल उसकी चूत में छोड़ दिया, जैसे ही वह बोली - अंदर ही गिरा दे। फिर मैंने लंड उसके भीतर डाले रखा, खड़ा रहा, मुंह से मुंह जोड़े रहा। कुछ समय पश्चात उसने भोजन तैयार किया, हम दोनों नग्न होकर खाना खाए। भोजन के बाद फिर चुदाई हुई, इसके पश्चात एक महीने तक मैं उसके घर आता-जाता रहा, जब पति नहीं होता था, तब वहाँ चुदाई करता था। 

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