निरंकुश वासना की दौड़
Desisexkahaniya
एक फ्री Xxx डिजायर कहानी में पति ने पत्नी को उसकी इच्छाओं पर आगे बढ़ने का मौका दिया। ऐसे में वह खुद भी कुछ नया तलाशने लगी। धीरे-धीरे उसने अपने आप को एक अलग रास्ते पर ढाल लिया। बदले में उसने अपने पति के लिए एक नई चूत का इंतजाम कर दिया।.
माधुरी सिंह ‘मदहोश’ की ओर से हर उस शख़्स को अन्दाज़-ए-इश्क़, जो इन्टीमेट लिखावट से आगे बढ़कर महसूस करता है।
बहुत से पढ़नेवालों ने कहा था, तो अब मैं यह कहानी लिख रही हूं।.
उम्मीद है, ये डिजायर कहानी तुम्हें अच्छी लगेगी - बस वैसे ही जैसी मेरी पिछली कहानियाँ थीं। इस बार भी, मैं तुम्हारा भरोसा नहीं तोड़ना चाहती।
मैंने सभी को अपनी बात सुनानी शुरू की।
यह आग कब बुझेगी
तुम्हें शायद याद होगा, नीलम मेरी बहन की तरह थी। एक शादी में पुष्कर पहुंची वो। घटना के बाद उसकी आँखों में कुछ नया तेज था। कभी न देखा हुआ अनुभव छा गया था उसके चेहरे पर। एक ऐसे लड़के से मिली थी जिसकी उम्र कम थी। उस रात उसने जिंदगी के इस पल को अपने ढंग से जिया।
फिर कभी मनचाहा हो तो वो अपने जीजा-ननद के साथ ऐसा कर लेती है, बस।
कुछ दिन पहले मैंने अपनी एक बचपन की दोस्त नीलम को गली में चलते देखा।.
मैंने पूछ ही लिया, सहजता से - बहुत महीने बीत गए तुमसे मिले बिना। अब तक कोई ऐसी बात तो हुई होगी जो कहने लायक हो?
उसके चेहरे पर शर्म साफ़ झलकी, मगर फिर आवाज़ निकली - यार, कहना क्या चाहती हूँ, पुष्कर में मेरी गांड इतनी ज़बरदस्त तरीके से चढ़ी कि उसके बाद एक साल में तीन और नए लंड मिल गए।
एकदम अचानक, मैं सोचने लगा कि इंट्रेज़न के पढ़ने वालों को फिर से कुछ उत्तेजक कहानी का स्वाद मिलने वाला है।.
मैंने पूछ ही लिया - अब बताओ, इस बार मेरी बन्नो कौन सा नया फूल लेकर आई है?
रसिक पाठको, सुनिए नीलम की कहानी - बस इतना ही, वो खुद कहती है।!
उसने शुरू किया - अरे मधु, तू जानती है न, ननदोइया के साथ फिर से बात होने के बाद जब मेरे आदमी ने मुझे छुआ, तो मैंने उनके हाथ पकड़ लिए। फिर मैंने उन्हें बताया कि पिछले 48 घंटे में तीन अजनबियों के साथ मेरा हश्र क्या रहा।
तब मैंने जवाब दिया - हां, अभी क्या?
उसने शुरू किया - तब उन्हें हैरानी हुई, शादी के पंद्रह साल बाद मेरी चूत एक नए लंड के लिए इतनी बेकरार हो गई, और संयोग से मुझे अचानक तीन नए लंडों का भी स्वाद मिल गया। अब तू खुद जानता है, जब मैंने चूत नहीं दी तो वे उत्तेजित होकर गुस्से में आ गए, और मेरी गांड जबरन मार डाली।
ठीक है, चलो सुनते हैं - तुम्हारा क्या कहना है?
वह बताने लगी:
लंबे समय तक तीन पुरुषों के साथ बिताए घंटों ने मेरी हर इच्छा को धीरे-धीरे शांत कर दिया।
थोड़े दिनों तक मैं ऐसी हो गई जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो।.
इतने में भी पसीना आए, पर पति के साथ बिस्तर में जाने की सोच मन में दस दिन तक डर लगे।.
फिर अचानक शरीर में जोश वापस जाग उठा। धीरे-धीरे खयाल आने लगे एक और लंबे लंड के। महसूस हुआ, चूत फिर किसी ताज़ा मर्द के हथियार की तलाश में है।
धीमे-धीमे हर रोज़ का सिलसिला चलता रहा। सुनील अपना फर्ज़ समझकर पीछे नहीं हटा, मेरे साथ बिस्तर में उलझता रहा। मैंने भी जो आगे आया, उसे सहा। हर छुअन एक खालीपन छोड़ जाती थी।.
पति कमजोर नहीं हो रहा था, ऐसा कुछ नहीं था कि वह मुझे संतुष्ट नहीं कर पा रहा था, फिर भी मुझे दूसरे आदमी के लंड का स्वाद चढ़ गया।
लंड के नए होने से मज़ा अलग तरह का आता है। धीरे-धीरे पति के साथ संबंध में कुछ कमी सी लगने लगी।
अब पति के साथ वो मस्ती गायब-सी हो गई थी।
आँखें हमेशा उस तरह के आदमी को तलाशती रहीं, जो मेरी चूत को घिसकर वही अहसास ला सके। जैसा पहले कभी जीतू ने दिया था, या फिर मेरे जीजा ने। कभी-कभी ननदोई के साथ भी ऐसा हुआ था।
एक अजनबी के साथ रिश्ते के बाद मुझे लगा, कितनी औरतें होंगी जिन्होंने सालों तक सिर्फ पति के साथ छुआछूत की, फिर किसी बाहर वाले को छूने का मौका पाया।?
कुछ औरतें तो शायद ऐसी भी होंगी जिन्होंने सारी उम्र में बस एक ही आदमी के साथ सेक्स किया हो।
शायद उन्हें कभी न मिला हो - अजनबी के संपर्क में आई वो झकझोर देने वाली खुशी, किसी और के शरीर का स्पर्श जो पूरे तन-मन में गूँज उठे।
लगता है कभी-कभी हर औरत को एक बार वो अजीब सुख महसूस करना चाहिए। जैसे किसी अजनबी आदमी की गोद में लेटे, उसके शरीर के नीचे दबी हो। अपने भीतर उसके ताज़ा धड़ को महसूस करते हुए।
एक बात अभी भी छूटी है। जैसे ही कोई औरत नए लंड का स्वाद चख लेती है, फिर कम ही रह जाती हैं वो जो आगे किसी दूसरे मर्द के साथ संबंध बनाने की इच्छा को रोक पाएँ। उनका शरीर, उनका मन, उनका खयाल - सब मिलकर उन्हें धकेलता रहता है कि किसी और के साथ ये तालमेल बढ़ाएँ… वरना उनके भीतर एक अधूरापन सा लगा रहता है।
एक दिन मैंने पति से बात की, कहा - इतने समय बाद फिर इच्छा हो रही है, जैसे कुछ नया चाहिए हो।
जैसे तुम्हें पता है, सुनील कितना आगे का सोचने वाला है। उसके मन की चौड़ाई सुनकर वहीं झलबला उठा।
वह मेरी ओर देखकर धीमे से बोला - तुझे क्या चाहिए? उसके हाथ अपने लंड पर थे। जैसे मेरी इच्छाओं को टटोल रहा हो।?
मैंने कहा, चलो कहीं घूमने निकलते हैं - वापसी पर कुछ अलग लंबे स्टिक्स भी ले आएँ, जैसे पहले करते थे।
उसने पूछा, आगे किधर जाएंगे हम?
मैंने कहा, चलो गोवा चलते हैं। वहां का माहौल ऐसा है कि सज्जन पुरुष या महिला दोनों के अंदर कुछ नया जाग उठता है। गोवा में हवा में भी एक तरह का झंकार होता है। पहुंचते ही शरीर के हर कोने में इच्छा की लहर दौड़ जाती है। खुद को ढीला छोड़ दो, तो महसूस होने लगता है - जैसे यही तो जीवन का असली मकसद है।
कई संत भारत में रहकर इंद्रियों पर काबू रखने की बात कहते हैं।
क्या कभी किसी ने सोचा, इन चीज़ों का मतलब क्या है - आंखें, नाक, कान, जीभ, और फिर स्तन, चुतड़, लंड? जब भगवान ने यह सब बनाया, तो शायद कुछ खास वजह थी।?
जब इनपे काबू ज़रूरी था, तो प्रभु कुछ ऐसा बना सकता था कि औरत-मर्द को किसी और के साथ शारीरिक संबंध बनाने की चाहत ही न हो। घटना एक ही साथी के साथ बार-बार आए, पहली बार जैसा अहसास, हर बार वही झनझनाहट, वही ख़ुशी मिले।
समय कितना भी बीत जाए, वही लंड, वैसी ही चूत - ऊब दूर-दूर तक नहीं।
इच्छाओं पर लगाम लगाना, सवाल यही है - क्या यह भगवान के तरीके में खलल डालता है?
हर प्राणी के लिए भगवान ने एक समय तय किया, जब वे मिलकर शावकों को जन्म दें। सिर्फ मनुष्य को ऐसा अवसर क्यों मिला कि जब चाहे उस प्राकृतिक, मगर दिव्य आनंद का अनुभव कर सके? इस ख़ुशी को बनाए रखने के लिए, उसे हर संभव तरीका सोचने की समझ भी दी गई।
गोवा जाने की बात करते ही पति बोले - पिछली बार तो तू सिर्फ़ मस्ती करके लौटी थी, तेरी गर्म चूत ने तीन-चार नए लंड खींच लिए थे। अब बारी मेरी है, मुझे भी किसी नई चूत में धमाका करना है!
मैंने जवाब दिया - बेशक मिलेगी, इस बार तुम्हारे लिए भी कोई नया साथी ढूंढेंगे।!
मेरा हवसभरा दिमाग सुनील को हौसला देते ही उधर मुड़ गया।
एक दिन कोई बातचीत में निखिल के बारे में पता चला। वह सुनील का जानकार है। मुंबई में उसका घर है।.
एक बार ट्रेन में मेरे पति और वो मित्र साथ यात्रा कर रहे थे। उस दौरान मैं उनके दाहिने किनारे पर बैठी हुई थी, जबकि वो बाईं तरफ थे। फिर भी, उसने पति के कंधे के ऊपर से हाथ आगे बढ़ाया। कई बार कोशिश की - मेरे बाएं स्तन को छू ले।
एक वक्त था जब मैं सचमुच कुछ नहीं जानती थी। कुछ हल्का अजीब लगा था, फिर भी मैंने आत्मविश्वास से यह सोचकर टाल दिया कि गलत समझ रही हूँ। पति के सामने इस बारे में कभी बात करने का ख्याल तक नहीं आया।.
अब हालात बदल गए थे। मैं हर आदमी की हरकतें देखने लगी थी, साथ ही उसकी नज़रों में छिपी भावनाएं भी। किसकी आंखों में घटिया इच्छाएं झलक रही थीं, कौन सच में सम्मान जता रहा था, कौ ऐसा तो नजर डाल रहा था जैसे मौका पाकर तुरंत बलात्कार कर दे।
उस पल मुझे लगा - वो दोस्त सबसे कमज़ोर कड़ी हो सकता था।
मैं पहले उसका लंड लेती हूँ, इस तरह एक तरफ का काम हो जाता है। अगर मौका मिले, तो सुनील को संध्या की चूत दिलवा कर सब कुछ संभाल लेती हूँ।
सिर्फ यह ख़्याल आते ही मैंने सुनील को निखिल के घर पर ठहराया, जो मुंबई में था, और गोवा जाने के लिए तैयार कर दिया।
मुंबई हमारी पहुँच उस सूची के मुताबिक हुई, जो पहले से तय थी।.
उसकी पत्नी संध्या ने, जो बहुत सुंदर थी, हमें घर में आते ही गले लगा लिया।
आज मैंने ध्यान दिया, निखिल की आंखों में क्या छुपा है। हर छोटी हलचल पर नज़र टिकाए रखी मैं।
फिर से वही हुआ, जैसे पहले कभी देखा था।.
हर बार मौका पड़ता, निखिल कुछ न कुछ बहाना ढूंढकर मेरे स्पर्श की इच्छा जताता। कभी बगल में घिसककर खड़ा हो जाता, कभी पास बैठ जाता ऐसे कि टकराहट हो। कोई चीज़ देते वक्त अवश्य ही हाथ लगा देता। हर उपाय से वह स्पर्श के सुख में डूबा रहता।
कौन जानता था, उसकी आँखों में छिपी इच्छाएँ फिर से हिल उठीं, बस एक अलग मुस्कान देखकर।
बार इस पल मैंने उसकी हरकतों पर ध्यान नहीं डाला, बजाय अपनी गहरी मुस्कान से उसे खींच लिया।
उसे मेरा संकेत मिलते ही उसका दिमाग भी काम करने लगा। अब वह मौकों को खींचकर लाने लगा, जहां एकांत में मुझसे बात हो सके। कभी-कभी तो वह इश्क की राह में थोड़ा आगे बढ़ने की कोशिश भी करता।
हर बार जब संध्या के पास से गुजरती, मैं धीरे से उसको छूने लगी। कभी-कभी ऐसा करने का मन ही नहीं होता था, फिर भी कुछ न कुछ तो कर ही देती।
रात होते-होते भी वो शांति नहीं मिली।
उसने अचानक पूछ लिया - ओये नीलम, इतनी खुश क्यों रहती हो, कोई वजह है?
मेरी जान, मैंने कहा, ऐसा इसलिए है क्योंकि जवानी अभी सिर चढ़कर बोल रही है।
उसकी आँखें फैल गईं, धीरे से बोली - इतनी उम्र के बाद, पचास के करीब, और शादी के इतने साल बाद... क्या वाकई जोश बचता है? ज़िंदगी में तो कुछ खास नहीं रहा, सब कुछ एक जैसा लगता है, कोई झटका नहीं, कोई अजब डर नहीं, बस चलता जा रहा है सब।
उसने सवाल किया - बताओ तो सही, आप दोनों क्या करते हो कि इतने खुश रहते हो? मेरी टीचर बनकर कुछ समझा दो। ज़िंदगी में फिर से मज़ा आ जाए, ठिठोली घर कर जाए, यही चाहती हूं मैं।!
शायद ये बात सच थी कि मेरी योजना कामयाब हो सकती थी। संध्या उस ज़िद पर अब डगमगा रही थी जो एक औरत को सिर्फ़ एक आदमी के लिए बाँधे रखती है। वो पतिव्रता होने के नाटक से ऊब चुकी थी। ऐसे में, नई खुशियों की ओर झुकाव भी कोई अजनबी बात नहीं थी।
दिल की धड़कनें तेज हो गई थीं, फिर भी मैंने साहस जुटाया। पुष्कर की वो घटना उसे समझानी शुरू की, बिना कुछ छिपाए। हर छोटी बात बताई, जैसे आग में घी की बौछार। कहानी खत्म हुई तो सन्नाटा छा गया।
आवाज़ सुनते ही उसके मुंह से सिसकियाँ छूटने लगीं। हाथ बार-बार चूत पर जा रहा था। दबाव डालकर शांत करना चाहती थी, पर नहीं हो रहा था। तपिश रुक नहीं रही थी।
अब मुझे पता चल गया था - उसे उतरने की जल्दी थी।.
तब मौका समझकर मैंने हिम्मत जुटाई। धीरे से उसे अपनी ओर खींचा। फिर बाहों में बंधा लिया। मेरे गर्म होठ, जैसे शहद से भीगे हों, उसके नरम-से, थोड़े ठंढे, रसभरे होठों पर आ टिके।
दोनों के होंठ धीरे-धीरे एक-दूसरे से जुड़ने लगे।
उसका बायाँ स्तन मेरी दाहिनी हथेली के नीचे आया। फिर हल्के-हल्के छुआई शुरू हुई। दबाव धीमे-धीमे बढ़ने लगा।
हवा सी चुभन पैदा हो गई, उसने शर्ट के ऊपरी दो बटन ढीले कर दिए ताकि मेरी उंगलियां अंदर सरक सकें।
उसकी ब्रा का हुक मेरे हाथ ने खोल डाला। फिर मैंने उसके बूब्स पर हथेलियाँ सरका दीं, धीमे-धीमे दबाव बढ़ाया।
वह खुद को इच्छाओं की धारा में तैरता छोड़ चली। स्कर्ट के नीचे से पैंटी उतारकर, भावुक होकर मेरा हाथ अपनी गीली जगह पर ले गई।
उसकी चूत से टपका रस मेरी बीच की उंगली पर लग गया। मैंने धीमे से उसकी साफ़ झांटों के बीच उंगली घुमाई। छीलकर रखा था सब कुछ, त्वचा नरम थी। भगांकुर पर दबाव डाला, हल्के-हल्के स्पर्श से।
थोड़ी सी हलचल पर वह कांप गया।
इसके बाद मेरी मध्यमा उंगली उसकी योनि में सरक गई। धीरे-धीरे अंदर तथा बाहर होने लगी वह।
कहते हुए वो बड़बड़ाया - नीलम, दो उंगलियां अंदर करो।!
उसकी चूत में मैंने दोनों हाथ की बीच वाली उंगलियां धीरे से अंदर की तरफ खिसका दिया।
उसके शरीर में एक स्पंदन-सा आया, फिर वह पूरी तरह शांत हो गई।
एक शाम, मेरे पति के दोस्त की पत्नी संध्या - जो हमेशा चुपचाप रहती थी - अचानक एक ऐसी औरत के साथ उलझ गई जिसकी आँखों में बस एक ही चीज़ थी।
उसके गिरते ही मैंने उसे समेटा, थकी हुई साँसें धीरे-धीरे सहलाने लगीं।
थोड़ी देर में होश आया। कपड़ों को सँभाला। मेरे चेहरे पर नज़र पड़ी, मुस्कान छलक गई। फिर धीमे से बात फिर से शुरू हुई - तुम्हारा क्या ख़्याल है…
उसके मुंह से शब्द निकलने से पहले ही, मैंने उसके होठों पर उंगली रख दी। फिर धीमे स्वर में कहा - अब कोई खामी नहीं रहनी चाहिए। नीलम तुम नहीं, बल्कि नीू तू कहना।!
उसने हामी भरते हुए कहा - यार नीलू, 15 साल बाद ऐसा क्या घट गया कि तुझे एक नहीं, तीन अजनबियों के साथ जुड़ने का मन किया, और सुनील को भी राजी कर लिया?
शाम को मैंने उससे कहा - अगर जानना ही है तो सुन। ऐसा होता है, विवाह के बाद पाँच साल तक का समय मीठा रहता है। इस दौरान दोनों, पति और पत्नी, एक-दूसरे के शरीर का पूरा आनंद लेते हैं। कभी भी, दिन या रात, मौका मिलते ही वे सेक्स करते हैं।
एक पल में ही ये पाँच साल गुजर जाते हैं।.
फिर अगले पांच साल बीत जाते हैं, सेक्स आदत बन जाता है - ठीक उसी तरह जब पेट खाली होता है तभी खाना खाया जाता है। शरीर की जरूरत पड़ने पर चुदाई हो जाती है, लेकिन धीरे-धीरे रोमांस गायब होने लगता है। जोश कमजोर पड़ने लगता है, और एक-दूसरे को खुश करने की भावना धुंधली पड़ जाती है।
एक दशक बाद कई पुरुषों में ऐसा होने लगता है कि फिर भी उन्हें अपनी पत्नी के साथ संभोग करने की इच्छा नहीं रहती, भले ही उनका लिंग ऊपर आ जाए। कई बार वे खुद को संतुष्ट करना ज्यादा चुनते हैं। उसी तरह कई महिलाओं की स्थिति भी ऐसी हो जाती है कि वे हाथ से या डिल्डो के जरिए अपनी जरूरत पूरी कर लेती हैं।
थोड़ी देर के लिए मन बहलाने के लिए कई लोग कहानियाँ पढ़ते हैं, फिल्में देखते हं, गपशप करते हैं। उबाऊ रिश्ते में झलक लाने के लिए ऐसा करना सामान्य है। फिर भी, जिस चमक का अहसास पहले होता था, वो धुंधला पड़ने लगता है। एक ही चेहरा, वही ढंग, वही आदतें - नया कुछ नजर नहीं आता। खुशी का वो ठिकाना, जो शादी के शुरूआती दिनों में था, गायब-सा हो जाता है।
इस वक्त किसी के होने की खाहिश दिल में सबसे ज्यादा उभरती है, चाहे वह पुरुष हो या फिर स्त्री।
दस साल तक मैंने कुछ नहीं किया, फिर एक अजीब खालीपन महसूस होने लगा। धीरे-धीरे पांच साल और बीत गए, इस बार झेलकर। लेकिन जब मौका आया, तो मैंने उस लड़के के पास जाना तय कर लिया। पति की राय भी साथ थी, तो मैं वहाँ चली गई। बाकी घटनाओं के बारे में तो मैंने तुम्हें पहले ही सब कुछ सुना दिया है।
उसने कहा, "नीलू, सच में तुम बहुत अच्छी हो!"!
अगर आपको ये कहानी का हिस्सा अच्छा लगा, तो ख़ुशी होती है। इसमें जो भावनाएँ थीं, उम्मीद है वो आप तक पहुँची होंगी।
अगले हिस्से में तो ये दिखेगा कि कैसे नीलम, जिसे बहुत अनुभव है, संध्या की वो चाहत पूरी कर देती है जो लंद के नए रूप की थी।
अगर तुम्हारे पास कोई बात है फ्री Xxx डिजायर स्टोरी के बारे में, तो मुझे वो ज़रूर बताना।.
बस हाय-हेलो भरे संदेशों पर मैं तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देती। कोई चैट करने या मिलने की इच्छा जताए, तो भी चुप रहूँगी।
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