एक आदमी के चार यार उसकी पत्नी के साथ रातभर ऐसा कुछ करते हैं।

Desisexkahaniya

Jan 3, 2026 - 15:28
Jan 8, 2026 - 17:53
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एक आदमी के चार यार उसकी पत्नी के साथ रातभर ऐसा कुछ करते हैं।

अलीशा के नाम से जानी जाती हूँ। उम्र 38 साल की है। रंग फीका सफेद है। शादी हो चुकी है। पटाखे जैसी तेज औरत थी मैं। घर की इबादत भी करती थी। लेकिन मेरे पति हिजड़े हैं। इस वजह से बच्चा नहीं हो पाया। एक दिन उनके चार दोस्त आए थे।.

एक तरफ मेरी आंखें गहरी और चौड़ी हैं, वजन के हिसाब से फिट। ऊंचाई पाँच फुट पाँच इंच ठीक है। बाल धीरे-धीरे कमर तक आते हैं। गांड भारी, गोल, थोड़ी बाहर की ओर झुकी हुई - मिट्टी के कद्दू जैसी दिखती है। .

सिर्फ इतना है कि मैं पूरी तरह चटखारेदार अंदाज़ वाली हूँ। फिर भी, मैं साफ-सुथरे स्वभाव की हूँ, घूघटवाले परिवेश से हूँ।.

वो मेरे पति हैं, जो किसी मजहब के प्रचारक हैं। तभी तो मैं भी अपने धर्म को लेकर इतना सख्त हूँ।.

एक अजनबी आदमी के बारे में सोचना, मेरे लिए आजतक हुआ ही नहीं।.

वो रातें कम ही आई करते थे। सिर्फ इतना ही नहीं, लंबाई में भी बहुत पीछे थे।.

मैं समझ गया था, जब उनके चारों पहलवान यारों के लंड देखे।.

उनके मन में हमेशा कुछ और ही चलता रहता।.

कभी-कभी लगता था, शायद उन्हें मुझसे छूने में डर लगता हो।.

समाज में हर औरत की गोद में चार-पाँच बच्चे तो होते ही हैं।.

हो सकता है, गर्म भोजन की आदत थोड़ी ज्यादा ही प्रभाव डाल रही हो। मांस-मछली के साथ प्याज-लहसुन का अत्यधिक सेवन शायद उत्तेजना बढ़ा देता है।.

समाज की महिलाओं से बातचीत के दौरान वो हमेशा चौंक जाती थीं। एक पुजारी की पत्नी होने के बाद भी बच्चा न होना उन्हें अजीब लगता।.

मैं सोच ही रही थी कि बात कैसे शुरू करूँ। उनके सामने ये बात लाना आसान नहीं था। पति की बात आते-आते अटक जाती। कई बार दिल करता कि कुछ न कहूँ। फिर भी झेलना पड़ रहा था वो सब।

कभी-कभी ऐसा लगता है कि किसी और पुरुष के साथ संबंध बना लूँ, तो खालीपन कम हो जाए।.

मगर पति की सम्मान की वजह से मैं यह नहीं कर पा रही थी।.

ऐसे ही लाचारी के साथ मेरा हर दिन बीत रहा था।.

घर पर मेरे पति के चार यार आए थे, एक बार।.

उस दिन के बाद ही सब कुछ बदल गया।.

चलिए, अब मैं उन चारों का नामकरण कर देती हूँ।.

उनके नामों की बात आए तो, रमेश होगा पहला। सुरेश फिर आएगा इसके ठीक बाद। एक कदम और आगे बढ़ें तो मिलेगा सतीश। अंत में, जैसे कोई छोटा सा झरना, वो है अभिषेक।.

असल में, उनका पूरा नाम मुझे कभी सुनाई ही नहीं दिया।.

ये बात पता चल ही गई थी, क्योंकि जब वे सभी मुझे चोद रहे थे, उस दौरान आपस में इन्हीं नामों से पुकार रहे थे।.

थोड़े समय पहले की बात है। वहाँ मौजूद हर कोई लगभग पैंतालीस साल का दिख रहा था, मगर अभिषेक इनके बीच कम उम्र का लग रहा था।.

चार आदमी मेरे पति के दोस्त थे, मुंबई से आए हुए। उनमें से हर एक अलग मजहब का था, जिसने मुझे सबसे ज्यादा हैरान कर दिया। पति को ऐसे लोगों से घृणा थी, बातचीत तक गलत समझता था वो।.

जब मैंने पूछा, तो उन्होंने कहा कि इनके सामने थोड़े पैसे उधार लिए थे। इसलिए ये आए हैं।.

उन्होंने कहा था, पैसों का बंदोबस्त होने में दो दिन लगेंगे। इसलिए चारों घर पर ठहर जाएंगे, मेहमान बनकर।.

उनके लिए कोई दूसरा रास्ता मौजूद नहीं।.

चारों आदमी हमेशा पान चबाते रहते, उनका रूप अपराधी-सा दिखे। माँसल शरीर था, जिससे ताकत का एहसास होता।.

उसके सामने पति जैसे कोई छोटा लड़का लगते थे।.

उस बार पति को कुछ खर्च के लिए आसपास के शहर जाना पड़ा। इसलिए मैं भी उन दो दिन तक घर पर अकेली ठहर गई, वो दोस्तों के साथ ही थे।.

उस दिन कुछ ऐसा रहा कि हम सब एक-दूसरे के काफी करीब आ गए।.

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दिनभर उनमें से एक किसी बात पर हंस पड़ता। कई बार बाकी भी बिना वजह ठहाके लगा देते। कभी-कभी चुपचाप मुस्कुराहट फैल जाती। ऐसे में कोई न कोई बात छेड़ देता।.

अगली सुबह, जैसा कि हमेशा होता था, मैं सूरज के निकलने से पहले उठ ली। वक्त आ चुका था अपनी इबादत शुरू करने का।.

काले रंग की हिज़ाब उस दिन मेरे सिर पर थी।.

अब मैं नमाज़ पढ़ने के लिए घर से बाहर जाने लगी।.

उसी पल रमेश जी ने मेरी ओर देखकर कहा - भाभी जी, नाराज़ न होना, लेकिन आज तुम काफी आकर्षक दिख रही हो।!

मैं हंस पड़ी.

उसकी आँखें मेरे स्तनों पर टिक गई थीं।.

थोड़ी देर को मुझे अजीब लगने लगा। उसी वक्त छत के ऊपर सतीश जी भी नज़र आए।.

उनके मुँह से निकला - वाकई भाभी, आज तो आप देखते ही बदल गई हैं।.

लज्जा के मारे मैं सिर झुका लेना चाहता था।.

फिर मैं झट से, प्रार्थना छोड़कर, कमरे की ओर बढ़ गई।.

किसी वजह से आज अजनबी आदमियों के बुलाने पर बाद में अच्छा लगा।.

उसकी ऊँचाई से मेरे मन में खुजली-सी उठ गई। छिपी आग धधक उठी।.

दिमाग़ में यह ख्वाहिश भी समा चुकी थी कि बच्चों की इच्छा पूरी हो।

इसके बाद, खाना शुरू किया हमने।.

सुबह के खाने के बाद सुरेश ने बताया, बाज़ार घूमने का प्लान है। वहीं किसी ढाबे पर रुककर भोजन कर लेंगे।.

अचानक मुझे हैरत हो गई, आसपास के हर किसी पर नज़र जा टिकी।.

रमेश जी ने कहा - ये तो बिल्कुल सामान्य बात है भाभी जान… पूरा दिन आज हमें अच्छा वक्त मिलेगा।.

वो बोलते हुए हँस पड़ा, फिर अचानक उसके तीनों साथी भी हँसने लगे।.

कुछ बातें समझ से बाहर हो गई थीं।.

उठकर सीधा रसोई में पहुंच गई। फिर बचे हुए बरतन धोने लगी।.

अचानक से रमेश जी वहाँ पहुँच गए, मेरे पीठ के पीछे खड़े होकर बरतन संभालने लगे।.

साफ़ कर रही थी मैं बर्तन, तभी एकदम पीछे आकर चिपके वो - इतना कि लगा, कुछ मोटा सा छेड़ रहा है मेरी पीठ के नीचे।.

एक चीज़ धीरे-धीरे मेरे कपड़ों के ऊपर से मेरी पिछली तरफ़ आगे बढ़ रही थी। पता चल गया कि रमेश जी अपना हिस्सा मेरी पीठ के नीचे घुसा रहे थे।.

शर्म से मेरा सिर झुक गया। पर्दे में रहने वाली, साफ-सुथरी ज़िंदगी जीने वाली थी मैं। धर्मगुरु की पत्नी होने के नाते ये हालात और भी अजीब लगे।.

फिर भी, अंदर से उसके लंड का हल्का स्पर्श मुझे पसंद आया।.

अचानक मेरे मन में आया - इतना मोटा लंड… काश, सीधा अंदर हो जाए।

उधर दिमाग में ख्याल आया कि ऐसा क्यों हो रहा है मुझसे। ये सभी नास्तिक हैं, फिर भी मैं जो हूँ, पवित्र मानी जाती हूँ। लेकिन सच तो ये था कि रमेश जी के लौड़े का स्पर्श बेहद सुखद लग रहा था।.

उस वक्त मैंने जो कुछ महसूस किया, चेहरे पर आने से रोक लिया।

रमेश जी ने कहा, हम मूवी देखने के लिए अब बेडरूम में जा रहे हैं। तुम भी आ जाओ, साथ में फिल्म देख लो।.

मूवी तो मुझे भी आती है, फिर भी एक साफ-सुथरी औरत का गैर मर्दों के साथ बैठना मुझे सही नहीं लगा।.

बार-बार कहने के बाद वो मुझे अपने बेडरूम में ले गए।.

सीडी में हाथ डालकर सतीश ने उसे चला दिया।.

तभी याल्ला ने ऐसा हंगामा मचा दिया। सामने, टीवी पर अंग्रेज़ी ब्लू फिल्म चल रही थी।.

एक पोस्टर लगा हुआ था सीडी पर। नीचे बैठी एक औरत पर्दे में ढकी थी। चारों ओर घिरे थे चार आदमी। सब बिना कपड़ों के खड़े थे।.

एक पल में ही मन अशांत हो उठा। वहाँ से तुरंत निकलने का मन बन गया।.

अचानक अभिषेक ने मुझे बुलाया, पास आकर बैठ गया।.

फिर मैं तुरंत कमरे की ओर बढ़ गई।.

अचानक पीछे से कदमों की आवाज़ आई। अभिषेक कमरे में घुस आया, मेरे ठीक पीछे।.

पीछे से हाथ फैलाकर उसने मेरे स्तन दबा दिए।.

अचानक से दर्द ने घेर लिया, मैं चीख पड़ी।.

खुशी ने पूरा शरीर भर लिया, बस इतने में ही वहाँ नमी छा गई।.

वो मेरी ओर बढ़ा, मेरे कंधे पकड़ लिए। फिर बिना कुछ कहे गाल पर चार बार हल्के से छू गया।.

फिर वो मुझे उठाकर सीधा घर के पास बने पशुओं वाले कमरे में ले चला, वहाँ ज़मीन पर डाल दिया।.

मैं चारों के साथ होना चाहती थी, फिर भी मैं उठकर भागने लगी। रमेश जल्दी से आए, दरवाज़ा बंद किया। अंदर से ताला लगाया। चाभी अभिषेक को दे दी।.

अभिषेक ने धीरे से कहा, देखो भाभी, हम लोगों के साथ तुम सेक्स का आनंद ले सकती हो… मां बनने की खुशी भी मिल जाएगी। तुम्हारे पति ने तुम्हें यहीं इसलिए छोड़ा है, ताकि तुम हमसे गर्भवती हो जाओ। उसके मुँह से ऐसा सुनकर पहले तो लगा, क्या वाकई मेरा पति ऐसा सोच सकता है।.

कंपकंपी में मेरा पूरा शरीर जैसे बिखर रहा था - डर के मारे, लालच में भी।.

अचानक रमेश जी कमरे में पहुँचे, फिर धीरे से नीली फिल्म का हर सामान वापस ले आए।.

चारागाह में उन्होंने सीधा टीवी जमा सीडी प्लेयर लगा दिए। फिर ब्लू-फिल्म शुरू हो गई।.

उसी पल मेरी नज़र रमेश जी पर पड़ी। वो अपनी शर्ट उतार चुके थे। उनका चौड़ा सीना देखकर मुझमें आग-सी भड़क उठी। इधर अभिषेक मेरे कपड़े ही फाड़ चुका था।.

तब मैं वहाँ खड़ी थी, सिर्फ़ ब्रा और पैंटी में।

बिना कपड़ों के खड़ा होने पर एहसास हुआ, जैसे घर के अंदर ही अंदर मेरे साथ बलात्कार होने वाला हो।.

हवा में खड़ी मैं, अपने हथेलियों में बसा लिए थे वजन भरे स्तन। धीमे-धीमे नज़रों में उतरने लगी थी झलक चुदास की।.

इस बीच, वो चारों हल्के-हल्के कपड़े उतारकर सिर्फ अंगरखे में खड़े थे।.

उनमें से कोई भी पलट कर देख रहा था, मैं धरती पर फैली थी।

अचानक रमेश जी के हाथ मेरे ऊपर पड़े। वो झट से मुझे उठा लिए। चेहरे पर चुंबन बरसाने लगे।.

उसके होंठ मेरे होंठों पर आए, सांस अटक गई।.

अचानक से उसकी जीभ मेरे होंठों के भीतर इधर-उधर सरकने लगी। पल भर को लगा, जैसे सब कुछ अटक सा गया हो - और वो छोटी सी उबड़-खाबड़ गति ऐसे ही चलती रहे, बिना रुके।.

अब तक सिर्फ पहला कदम उठाया गया है।.

अब तो ऐसा लग रहा था कि जीभ के बाद कुछ और भी आएगा। फिर वो लंड भी मेरे मुँह में घुसने वाले थे, इसके बाद मेरी चुत पर उनके लौड़े का हलचल शुरू हो जाएगा। समय धीमा हो गया था। मैं सिर्फ रमेश जी की खुरदुरी जीभ का स्वाद छुपाकर चाट रही थी।.

थोड़ी देर घुमाकर चूमने के बाद रमेश जी ने मेरी ब्रा पर हाथ फेरा। अचानक उन्होंने एक हाथ से भीतर डाला और झटके से खींच छोड़ा।.

ब्रा का स्टैंड अचानक टूट पड़ा, दोनों छाती हवा में लहरा उठी।

उस पल रमेश ने मेरे बाएं स्तन पर चाकू चला दिया।.

उधर अभिषेक ने मेरे दाहिने स्तन पर मुँह रख लिया।.

खड़ी थी मैं, दोनों के सामने बेबस। इधर झटके से मना कर रही थी, उधर हाथ जोड़कर दिखावा भी कर रही थी। छोड़ दो मुझे… माफी माँगती हूँ, यह कह रही थी। पर सबकी सुनवाई बंद थी।.

सतीश ने मुझे चुप रहने को कहा, मेरी ज़िद पर मुंह पर थप्पड़ मार दिया।.

मेरे अंदर का डर इतना बढ़ गया कि आवाज़ निकलनी बंद हो गई।

अचानक रमेश जी ने झट से मेरी पैंटी फाड़कर बहुत दूर फेंक दी।.

अब मेरे कपड़े पूरी तरह गायब हो चुके थे।

हाथ आगे बढ़ाकर अभिषेक ने मेरी जांघों के बीच हथेली फिसलाई, धीरे-धीरे चूत पर हाथ घुमाने लगा। रमेश जी ने अपनी अंडरवियर तनिक खींचकर नीचे उतार दी, और सामने खड़े होकर लंड हिलाने लगे।.

मैंने जब उसका लंड देखा, सांस अटक सी गई। पति के लंड से तीन गुना बड़ा था वो, न जाने किस जानवर का होगा। लंबाई-चौड़ाई दोनों में ऐसा लगा, मानो किसी घोड़े की चाल आ गई हो।.

वो लौड़े को हिलाते हुए बोला - भाभी, आज तुम्हें ये लंबा मोटा घोंप पूरा अपनी साफ चुदाई में उतारना होगा… तभी तुम्हारा पेट सचमुच भरेगा। एक तरफ मैं घबरा गई थी, ऐसे खंभे को छोटी चुदाई में कैसे समाएंगे, दूसरी ओर दिमाग को शांति मिल रही थी, अब वो खालीपन खत्म होगा।.

अचानक मेरी आँखों से आंसू बह निकले, जब उस ऊंचे लड़के ने कदम बढ़ाया।.

फिर भी उनमें से हर किसी के लिए ये बात मायने नहीं रखती।

एक-एक कर उनमें से हर कोई धीरे-धीरे बिना कपड़ों के हो गया।.

हर एक का लंड पिछले से मोटा ही नहीं, थोड़ा ज्यादा लंबा भी।.

मुझे तो अपनी आँखों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था कि मर्द का लंड इतना बड़ा भी हो सकता है.मैंने तो आज तक बस अपने शौहर का ही देखा था जो उन चारों के सामने छोटी सी नुन्नी से ज्यादा कुछ भी नहीं था.

लंबे-लंबे लंड भी पूरे थे चारों के, साथ ही तेज़ लाल सुपारों में आग सी धधक रही थी।.

अभिषेक ने कहा, "सुन, आज तेरी साली को चार असली आदमी पूरी तरह जमकर चोदने वाले हैं।".

मुझे एहसास हुआ, सतीश ने मेरे मुँह में अपना लंड धकेल दिया। उसका हाथ मेरी चूची पर फिरने लगा।.

कुछ ही पल बाद, वह मेरे मुँह में अपना लंड डाल चुका था। फिर आगे-पीछे की गति शुरू हो गई।.

उसका लंड इतना घटिया तरीके से मोटा था कि मेरे होठों के बीच फंस गया। आखिरकार सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा अंदर जा पाया।.

अब वो सुरेश मेरी चूत पर झपटा हुआ था, मानो कोई पागल कुत्ता हो।.

हाथ जब सुरेश के सिर पर पड़ा, तभी सब कुछ बदल गया। मुझे एहसास ही नहीं हुआ कि कब वो मेरी जांघों पर दब गया। धीरे-धीरे बेरहमी में मज़ा आने लगा।.

मेरे अंदर का जोश धीरे-धीरे बढ़ने लगा था। मज़े का एहसास शुरू हो चुका था मेरे लिए।.

अगले हिस्से में, मैं अपनी कहानी सुनाऊँगी - जब मेरी चुत पर बढ़िया मजा आया।.

ज़रूर बताना कि सेक्स कहानी पर तुम्हारा क्या ख्याल है।.

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