साली नेहा ने छत पर मालिश के बहाने चूत दी

Antarvasnastory

Jan 3, 2026 - 13:38
Jan 9, 2026 - 16:54
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साली नेहा ने छत पर मालिश के बहाने चूत दी

मैं देवेंद्र हूँ, नाम बदल के रखा है। छतरपुर, मध्य प्रदेश का रहने वाला हूँ। उम्र ढाई दर्जन साल के आसपास। कद 5 फुट 9 इंच, गठीला बदन। लंड की लंबाई 6.5 इंच, घेरा तीन इंच का। आज खुद की कहानी सुनाऊंगा - नेहा नाम की साली के साथ पहली बार चुदाई का अनुभव।

एक साल हो गया था शादी के बाद। बीवी का नाम था शिप्रा। तब एक बच्चा हुआ, लड़का। छठी के दिन आई साली, नेहा, नाम बदला है। वो बीस साल की थी, पढ़ती कॉलेज में। गोरी, पतली, अच्छी तरह बनी-थी। बड़े स्तन, मोटी पिंडली। देखते ही मन में ख्याल आया - ऐसे झपट लूँ कि रह जाए सांस अटकी। पहले भी देखा था उसे, मगर इस बार लगा ज्यादा तेज।

मैं उसकी ओर सिर्फ देखता रह गया। पास आकर बोली - “जीजू... जीजू...” मन कहीं डगमगा गया। धीरे से कंधे को छुआ उसने - “जीजू, इतने दूर कहाँ चले गए? क्या कभी किसी लड़की को नहीं देखा?” बोल पड़ा मैं - “तेरे जैसी खूबसूरती वाली कोई नहीं देखी।” एक झलक मुस्कान की, फिर दीदी के पास भाग गई।

रात को छत पर लेटा। 10 मिनट ही हुए थे कि सीढ़ियों से आवाज आई। देखा तो नेहा आ रही थी। बोली – “जीजू, आप यहाँ सो रहे हो? मैंने आपको पूरे घर में ढूँढा।” मैं – “सिर दर्द हो रहा था, थकान भी। सोचा आराम कर लूँ।” वो – “अच्छा, अब सिर दर्द भूल जाओ और मेरे साथ नीचे चलो, सब खाने का इंतजार कर रहे हैं।” मैं – “तुम चलो, मैं आता हूँ।”

वो – “नहीं, आप अभी चलिए।” सिर दर्द सच में था। मैं – “बहुत दर्द है नेहा, कुछ दिख नहीं रहा। तुम चलो।” वो – “रुकिए जीजू, मैं balm लेके आती हूँ।” मैं – “रहने दो, थोड़ा आराम कर लूँ।” वो – “नहीं जीजू, मैं अभी आती हूँ balm लेकर।” कहकर दौड़ती हुई नीचे गई।

थोड़ी देर में नेहा वहाँ आई। उसके हाथ में नव रत्न ऑयल था। बोली, "जीजू, balm नहीं मिली, इसलिए ये ले आई हूँ।" फिर कहने लगी कि सिर उसकी गोद में रख लीजिए, थोड़ी मालिश कर देती हूँ। आराम मिलेगा। मैंने धीरे से हाँ कह दिया। वो पास बैठ गई। मेरा सिर उठाया और अपनी गोद में समेट लिया। भरपूर तेल डालकर मालिश शुरू कर दी। ऐसा लगा, मानो कहीं ऊपर चला गया हूँ।

उसके सवाल पर मैंने धीमे से कहा, "अब अच्छा लग रहा है, नेहा।" वो मेरी पीठ पर हाथ फेर रही थी। फिर मैंने कमर के बगल में हाथ डाल दिए। जवाब का इंतजार शुरू कर दिया, बाहों को बाहर की ओर रखते हुए।

उसने ख़ामोशी तोड़ी नहीं, इसलिये मैंने धीरे से हाथ ऊपर की ओर बढ़ाया। छूते ही उसकी साँसें तेज़ हो गईं, शरीर हिल उठा, पर आवाज़ नहीं आई। चुपचाप हाथ वापस खींच लिए मैंने, फिर बोला - “इतनी देर तक ऊपर नहीं रख सकती, थक जाओगी।”

“आपका सिर दर्द मिट जाए, हमारे हाथ दर्द करेंगे तो फिर आप दबाकर मालिश कर देना।” मैंने कहा – “मालिश करनी है हाथ के ऊपर के नीचे।” मैंने दो तरफा निशाना साधा।

वो कुछ देर सोचने के बाद – “ऊपर की आशा न करना जीजू, पहले दीदी को तो संभाल लो। एक को ही संभालने में तो आपका ये हाल है और ऊपर के मालिश की बात करते हो। दीदी को बोल दूँगी तो हवा टाइट कर देंगी आपकी।”

मैं – “अरे मैं तो मजाक कर रहा हूँ।”

नेहा बोली, "मैं सिर्फ हंस रही हूँ, जीजू," फिर वापस हंस पड़ी। इसके बाद उसने मालिश शुरू कर दी। मैंने पलटकर उसकी पीठ के पीछे हाथ डाला। अब मेरी उंगली धीरे-धीरे ब्रा की डोरी पर चलने लगी। उसने कोई आवाज नहीं निकाली। मेरे हौसले ऊपर चले गए। फिर मैंने डोरी को पकड़कर खींच दिया।

“अरे जीजू क्या कर रहे हो, मेरी ब्रा फट जाएगी।” बोलकर चुप हो गई।

उसके मुँह से ब्रा सुनकर तो मुझे लगा लाइन क्लियर है और बोला – “फट जाएगी तो नई ला दूँगा।” वो बोली – “बहुत महँगा पड़ेगा जीजू, ब्रा फाड़ना घर से बाहर निकलवा देंगे दीदी से।”

मैं – “अरे फटने तो दो पहले, अभी कुछ किया ही नहीं और धमकी देने लगी।”

नेहा – “जीजू कुछ करने की सोचना भी नहीं।”

मैं – “नेहा एक बात बोलूँ, नाराज तो नहीं होगी ना?”

नेहा – “बोलिए तो पहले।”

मैं – “पहले वादा करो कि तुम नाराज नहीं होगी।”

नेहा – “बताइए, नहीं होगी।”

नेहा, तुम मुझे कितनी पसंद हो, यह तो मैंने कह दिया। पर उसके बाद I love you बोलने का साहस कहीं खो गया।

नेहा – “जीजू इसमें नाराज होने की क्या बात है, मुझे भी आप अच्छे लगते हैं। I like you too। अब आप शांति से लेटे रहिए, ज्यादा न बोलिए वरना सिर दर्द और बढ़ जाएगा।”

हाँ, नेहा, तुम ठीक कह रही हो। उसके जवाब पर मन-ही-मन ख़ुशी मिली। यह सोचकर कि कोई वहाँ नहीं है, एक अलग ही उम्मीद दिल में आई।

इस बार मैंने हाथ आगे बढ़ाए, फिर वो उसकी गर्दन पर आ टिके।

नेहा – “हाथ हटाइए जीजू, बहुत गुदगुदी हो रही है और मालिश भी नहीं करते बन रही।”

नीचे की ओर हाथ सरकाते ही मेरे हाथ उसके 32 साइज के चुचे से छू गए, और मैंने झट से ठहर गए। खामोशी छा गई, फिर उसने मेरे हाथों को धीरे से नीचे ले जाकर मालिश शुरू कर दी। मैंने दोबारा हाथ ऊपर उठाया, जान-जानकर चुचे पर रख दिए। कुछ भी नहीं कहने पर मेरा आत्मविश्वास बढ़ गया।

उसके मम्मों पर हाथ फिरने लगा, आहिस्ता-आहिस्ता। मुझे उसकी साँसों की तेज धड़कन महसूस हो रही थी। छाती का उठना-बैठना अब मेरे स्पर्श से बढ़ गया। ऐसा वक्त था, जब गर्म लोहे पर घाव डालने का ख्याल दिमाग में आया।

उसकी गर्दन पकड़कर मैंने उसे झुकाया, फिर मैंने उसके होंठ चूम लिए। शायद वो इतनी तप चुकी थी कि मेरा चूमना सहज ही उसके मुँह में घुल गया। अपने होंठ उसके भीतर पाकर वो चूसने लगी, धीमे से नहीं, बल्कि जोर से। मुझे लगा जैसे ये सच नहीं, बस कोई सपना है - नेहा मुझे किस कर रही है? फिर उसने दांतों से काटा, ऐसे कि मैं ठिठक गया, और होश में आ गया। मैंने फिर उसके सीने की ओर हाथ बढ़ाया, ढूंढते हुए। उसने खुद मेरी मुट्ठी थाम ली, फिर उसे अपने ऊपर जोर से दबा दिया।

नेहा – “जीजू निचोड़ दीजिए इनको, बहुत परेशान करते हैं ये मुझे। आह जीजू और तेज... और तेज... आता... या गया... गया जीजू... आह... माँ...”

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उसकी आवाज़ आते ही शरीर सख्त हो गया, फिर उसने मेरा सिर धकेलकर सलवार के ऊपर से चूत पर हाथ फेरना शुरू कर दिया। मैंने भी कुर्ते को पकड़कर खींचा, ब्रा के ऊपर से उसके स्तन दबाने लगा। थोड़ी देर में जब वो हिल उठी, तभी उसे अपनी हालत का एहसास हुआ। उसने मेरे हाथ झटककर छुड़ाए, उठकर खड़ी हो गई। हालत समेटकर चुपचाप बाहर भाग गई, कुछ न बोले।

खुशी से मेरा दिल इतना भर गया कि कहीं ठिकाना नहीं रहा। सोचने लगा जैसे जागते-जागते कोई सपना हो। वो तो अपनी झड़क के साथ चली गई, मगर मेरा लंड पजामे में समाया नहीं। धीरे से हाथ डालकर मैंने उसे बाहर खींच लिया। और फिर आंखें बंद करके उसे चढ़ाए जाने का ख्याल मन में घूमा… “आह नेहा रानी, ऐसे ही… आह… जीजू के हाथ बस वहीं… हाँ… ऐसे… ओह… छूट गई मैं… आह…”

ऐसे ही सपने देख-देखकर मुठ मारता रहा। और उसने झड़ते टाइम जो आवाज निकाली थी वही सोचकर मैं भी उसी के जैसे आवाज निकालने लगा – “आह नेहा रानी मैं तो गया... आह मैं तो गया... मजा आ गया... आज तो तेरे साथ चुदाई करने में... तेरी तो चूत को फाड़कर आज तो भोसड़ा बना दूँगा... बहुत तड़पाया तूने... आह आह मैं तो गया... ओ मैं तो गया...” करते-करते मैंने आखिरी दो-तीन बार लंड को ऊपर-नीचे किया।

आह, नेहा रानी… मैं तो बस चकमा खा गया। अचानक से होश आया। धीरे-धीरे नजर ऊपर उठी। किसी के पैरों की छाया दिखी। सीढ़ियों पर जल्दी से नीचे उतर रही थी। मन घबरा गया। डर लगा कहीं कोई मुझे देख तो नहीं गया वैसे हालत में। सच कहूँ? रूह काँप उठी।

खोया हुआ था मैं पूरी तरह मुठ मारते हुए, सुन नहीं पाया किसी के कदमों की आवाज़।

कौन था वो? कितनी देर से मुझे घूर रहा था या शायद घूर रही थी - अंधेरे में कुछ समझ नहीं आया। हज़ार सवाल एक साथ उठे, फिर धीरे-धीरे बिखरते गए। सोचते-सोचते आँखें भारी हो गईं, और अपने आप झपक गईं।

आधी खुली आँखों में एक धीमी आवाज घुल गई - "उठिए, चाय पी लीजिए... इतने बड़े आदमी, घोड़े बेचकर सो रहे हैं?" मेरे कान में 'जीजू' पड़ते ही चौंककर उछले। देखा तो नेहा फर्श पर बैठी, मेरे पास। मेरी ओर देखते ही वो झट से नीचे ताकने लगी। फिर बोली, आवाज धीमी-सी, “जाइए, अभी पी लीजिए, वरना चाय ठंडी हो जाएगी,” आँखें टिकी रहीं अपने हाथों पर।

लगता है कि रात उस चुपचाप हरकत पर झेंप गई, जो मैंने खुद को भूलकर की थी।

उसकी ओर घूरे जा रहा था मैं। नहाकर अभी-अभी वापस आई थी वो, और गीले बालों से निकले पानी के कण धीरे-धीरे उसके गले से कंधे तक फिसल रहे थे, मानो कोई मोती बरखा रहा हो। देखते-देखते मैं खोया जा रहा था। तभी एक झटके के साथ नेहा की आवाज गूँजी, जिसने मुझे फिर डरा दियa।

“जीजू चाय पी लीजिए वरना मजा नहीं आएगा... आह ओह ठंडी हो गई कहते रह जाएंगे।”

मुझे उसकी दोहरी बात समझने में ज्यादा वक्त नहीं लगा, फिर बोला – “अच्छा... तब वो रात में आप ही थीं?”

“क्या जीजू इतनी जल्दी तुम से आप बना लिया? इरादा क्या है?”

“जो तुम्हारा है वही हमारा है। ओह जीजू आई माँ मैं तो गई... आह आह...” मैंने भी बोल दिया।

“ओह जीजू आप भी ना बड़े शैतान हैं।”

लोगों, साली नेहा के छत पर मालिश के दौरान हुई गपशप की कहानी कैसी लगी? अपना ख्याल लिखकर बताओ।

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