बीवी की शादीशुदा बड़ी साली ममता दीदी की चुदाई

Jan 2, 2026 - 14:01
Jan 13, 2026 - 19:45
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बीवी की शादीशुदा बड़ी साली ममता दीदी की चुदाई


(तौलिया लपेटकर निकली साली को पत्नी समझकर मसला,

फिर रात भर खूब चोदा)

नमस्ते, मैं डॉक्टर आकाश हूँ। लखनऊ में काम करता हूँ, उम्र बत्तीस साल है। शादी कविता से हुई है, तीन साल पहले। उसकी उम्र तीस साल है, शरीर संतुलित - छाती 34 इंच की, कमर 30 इंच की, कूल्हे 36 इंच के। गोरी त्वचा, लंबे बाल, आँखों में अपनी छाप छोड़ देने वाली चमक। हर रोज़ सेक्स होता है, कभी-कभी एक बार, कभी दो बार। कविता पूरा साथ देती है, आवाज़ें निकालती है, शरीर हिलाती है। इस बात का एहसास हमेशा रहता है कि ज़िंदगी में तालमेल है।

कुछ महीने पहले की बात है। छुट्टियों में ममता दीदी, जो कविता की बड़ी बहन हैं, हमारे घर लखनऊ आई थीं। चार साल बड़ी हैं कविता से, और शादीशुदा भी हैं। उनका फिगर कविता जैसा ही है - गोरी त्वचा, गोल मुखड़ा, तने हुए स्तन, बस गांड थोड़ी अधिक आकार की है। दीदी नाम से ही पुकारता था मैं, संबंध इतना निकट था जैसे भाई-बहन का। ऐसा व्यवहार रहा कि कभी बुरी नजर से नहीं देखा। बातें हंसी में ही रहती थीं, ज्यादा कुछ नहीं।

रात के समय मैं क्लिनिक से घर पहुँचा। नौकरानी ने बताया कि मैडम शावर ले रही हैं। मैंने ऊपर जाकर कपड़े बदल लिए। अब जब ध्वनि खत्म हो गई, तो दिमाग में ख्याल आया - कविता को चौंका दूँ। दरवाजे के पास खड़ा हो गया, छुपकर।

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तौलिया लिपटे बाहर आईं तो मैंने पीछे से पकड़ लिया। हाथ सीधे सीने के ऊपर पहुँचे। कपड़ा खींच दिया, गर्दन पर होंठ घिसने लगे। चीख निकली – “ये क्या? क्या चल रहा है?” आवाज़ सुनते ही पता चल गया… अरे, ये तो ममता दीदी हैं!

मैं हक्का-टक्का रह गया - "माफ़ कीजिए दीदी… मुझे लगा कविता है!" वो कुछ जवाब नहीं दिए, सिर्फ़ तौलिया ओढ़कर कमरे की तरफ़ चल दी। मुझे झेंप महसूस हुई। डर सताने लगा - अगर कविता को पता चल गया तो? पर दीदी के छाती का दबाव हथेलियों में था, उनका नंगा, गोरा शरीर आँखों के सामने घूम रहा था। लंड ऊपर उठ गया।

उस रात खाना सबने साथ में खाया। मेरी नजरें कहीं और टिकी रहीं। दीदी कुछ खास नहीं बोलीं, बस सामान्य ढंग से बातचीत होती रही। इस तरह दो दिन गुज़र गए। तीसरी रात कविता के साथ पलंग पर उलझा हुआ था, पर दिमाग में दीदी की छवि घूम रही थी। कविता के होठों से निकली आवाज़ से एक झपकना-सा हुआ। फिर वो धीमे से बोली – “इतना ऊँचे हो रहे हो, दीदी सुन लेंगी!” मैंने जवाब दिया – “अब तक कुछ सुनाई दे रहा है?” वो मुस्कुराई, फिर बोली – “और क्या, दीदी भी तो कभी कभी ऐसे ही चीखती हैं… शायद मेरे से ज़्यादा ज़ोर से!”

लंड मुझे सुनकर तन गया। तभी मैंने तेजी से धक्के दिए, ऐसा लगा जैसे अब वहाँ भीतर हूँ। आधे घंटे के बजाय थोड़े ही देर में उमड़ गया।

उस दिन के बाद से दीदी को छूने का विचार आने लगा। शाम को हम दुकान पर गए। मैं तकनीक से जैसे-तैसे स्पर्श कर लेता। किसी शर्ट पर नजर पड़ी, तो दीदी बोल उठीं - "हर चीज़ को हाथ लगा देते हो, हर चीज़ ठीक लगती है।" मुख पर शरारत की झलक थी। मेरा सीना अचानक धक-धक कर उठा।

घर लौटते वक्त दीदी ने पूछा – "अब बियर तो पिलाओगे?" मैंने छह खरीद लीं। अंदर होते ही सभी ने शुरू कर दी। कविता टॉप और शॉर्ट्स में थी, ब्रा नहीं पहनी थी। दीदी सिर्फ नाइटी में, छाती का हल्का उठाव साफ़ झलक रहा था। माहौल धीमे से गर्म हो चला था।

खाना उठाने को कविता आई, तभी दीदी बोल उठीं – "सिगरेट?" मैंने जवाब दिया – "ऊपर चलते हैं।" छत पर पहुँचकर सिगरेट एक-दूसरे के साथ बाँटी। मैं हँसते हुए बोला – "इस बार स्वाद और भी तेज हो गया, तुम्हारे होंठों का।" दीदी ने मेरी जाँघ पर नाखून से निशान छोड़ दिया।

तस्वीरें फोन पर दिखाई दीं। सटा मेरा हाथ। छुआ तो कुछ भी नहीं बोली दीदी। हौसला जुटाकर उसके स्तनों पर हाथ रखा। मुस्कुराहट आई उसकी। समझ गया, अब कुछ और हो सकता है। नाइटी के अंदर हाथ सरका दिया, तने हुए स्तन दबाए। वो चुपचाप आँखें बंद करके लुत्फ उठाने लगी।

कमरे की रोशनी धीमी थी। कपड़े एक-एक करके सरक गए। सिलवटदार कपड़ा ढीला हुआ, तो छाती बाहर आई। मैंने निपल्स को जीभ से घुमाया, फिर दबोच लिया। कपड़े पैरों में अटके। नमी साफ दिखी। उंगलियाँ भीतर घुसीं, धीरे-धीरे चलीं। वो बोली, "अब और?" मैंने कहा, "यही जगह काम चलेगा।" वो झुकी, गोद में आ गई। मेरा लंड हवा में था। उसने मुंह में ले लिया। मैंने उसकी चूत को जीभ से खोजा।

एक और घोड़ी तैयार की। लंड उभारकर धीमे से अंदर गया। चूत थोड़ी खुली हुई, मगर नई खुशी का एहसास अलग था। पंद्रह मिनट तक झोंका। वो बोली – "इतना अच्छा चोदते हो… पूरा उखाड़ दो… जोर से धकेलो… कविता की चीखें सुनकर मन में तनाव उठ रहा था!" मैंने चूत में सब कुछ उड़ेल दिया।

तड़के तीन बार संभोग हुआ। हर बार दीदी ने बिना झिझक तालमेल बिठाया। पांच बजे कविता के पास वह लेट गया।

अगले दिन से दीदी के साथ शुरू हुआ संबंधों का खेल। कभी छत पर धूप में, कहीं रसोई में जल्दी-जल्दी। कविता को इस बात का पता चल गया। एक शाम वो भी आ घुली – तीनों एक साथ। फिर बुलाई गई दीदी की बड़ी बहन अनुपमा – उनके आगे सब पीछे रह गए। एक साथ जुड़ने का अनुभव कुछ और ही बन गया।

अगर कहानी पसंद आई हो, तो बताना मत भूलना। किसी की बड़ी साली के साथ शादी के बाद क्या हुआ, वो तुमने अभी पढ़ा। रिएक्शन जरूर लिख देना।



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