साली ने ससुराल में चुदाई का मजा दिया
Desisexkahaniya
पति ने साली को बहन के घर में नंगा किया। उसकी कुमारी अवस्था को तोड़ दिया। पूरी रात आदमी ने जबरदस्ती की।
साहिल नाम है मेरा। 36 साल की उम्र हो चुकी है। रहने की जगह दिल्ली है, वहीं एक सीधी-साधी नौकरी भी लगी हुई है। पिछले साल शादी हुई, शिप्रा से, जो कानपुर में रहती है। उसके परिवार में दो बड़ी बहनें हैं - कंचन, उम्र 32, और प्रीति, 28 की। फिर दो छोटी बहनें - कामिनी, 20 साल की, और प्रिया, जो 19 में है। एक छोटा भाई भी है, अरुण, आयु 18 वर्ष, दिल्ली के हॉस्टल में पढ़ाई कर रहा है।
ये कहानी मैं सुनाऊगा, जो पूरी तरह सच है। शिप्रा के साथ शादी से पहले क्या था, फिर बाद में पहली बार कैसे हुआ – ये सब इसमें है। अब तक मेरी किसी लड़की से ऐसी कोई बात नहीं हुई थी।
कंचन, जो शिप्रा की सबसे बड़ी बहन है, की शादी छोटी उम्र में ही सतीश से हो गई थी। रहते वे जयपुर में हैं। एक बेटी है उनकी - आकांक्षा, 13 साल की। अगर बात सौंदर्य की हो, तो कंचन और प्रिया दोनों ही चेहरे में किसी फिल्म सितारे जैसी लगती हैं। हमें घूमने के लिए वे अक्सर बुलाते थे, पर दिल्ली की भागदौड़ में जगह नहीं मिलती थी। इस बार की गर्मियों में, बहन के जिद करने पर, पाँच दिन के लिए छुट्टी ले ली मैंने। जयपुर के लिए चल दिए हम दोनों।
जैसे ही उनके घर पहुँचे, दरवाजे की घंटी बजाते ही कंचन और सतीश बाहर आ गए। शिप्रा को देखकर कंचन ने गले लगाया, मैंने सतीश के साथ हाथ मिलाया। इसी बीच एक मजाक दिमाग में आया। मैंने सतीश से हाथ मिलाकर कंचन की ओर कदम बढ़ाया। वो अचानक लाल हो गई। ये देखकर सतीश बोल पड़ा - "अनुज, छोड़ो न, तुम कंचन से लग जाओ, मैं शिप्रा के पास चलता हूँ। क्या फर्क पड़ता है? दोनों तो एक-दूसरे की साली हैं।" बोलते-बोलते वो शिप्रा की तरफ बढ़ गया।
दृश्य देखकर दोनों को शर्म आ गई। कंचन ने शिप्रा को पकड़कर अंदर खींचा, मुस्कुराते हुए बोली - "अब ज्यादा उछल-कूद हो रही है?" सतीश ठहाका लगाकर बोला - "इसमें हमारा क्या दोष? तुम दोनों में तो झलकती है छोटपन की चपलता।" फिर वह हमें एक छोटे कमरे के पास ले गया, जो उनके कमरे से जुड़ा था। बोला - "यही अब आपका कमरा है। सफर थका चुका होगा। आराम करना चाहिए।"
कंचन ने कहा - “अभी तुम्हारे लिए कुछ खाने का समय आएगा।” उस पल मैंने जवाब दिया - हमने रास्ते में ही भोजन कर लिया, बस चाय का कप ले आना। थोड़ी देर में वो चाय लेकर दरवाज़े पर खड़ी थी। शिप्रा तब तक बाथरूम में थी, मैं अकेला रूम में बैठा था। जैसे ही वो अंदर आई, नज़रें उसी पर टिक गईं। इतनी सुंदर थी कि देखते रहने का मन करता। आगे शिप्रा के होने के कारण ऐसा करना मुश्किल था।
उसके 36-28-36 के आकार पर मेरी नजर थी, वहीं वो शर्म से झुकी रही। कंचन कद में 5’7” की है, गोरी चमड़ी वाली, आँखें बड़ी-बड़ी, गाल सेब जैसे, शरीर में घुटनों तक ताकत है। सतीश का इसके आगे कोई ठिकाना नहीं। सती कद में 5’6” का है, थोड़ा अधिक वजन वाला। दरवाजे से लेकर मेरे पास तक वो आई, मैंने ध्यान उसकी छाती से नहीं हटाया। पास आकर बैठ गई, फिर बोली – “अनुज, चाय पी लो।” मैंने उसकी ओर देखते हुए कहा – “चाय तो पीनी ही है, आजकल दूध कहाँ मिलता है।”
उसने बात समझ ली, घबरा कर कहा – “मुझे जाना होगा, तुम्हें आराम मिले।” फिर वो चली गई, हम लोग धीरे-धीरे शाम तक आराम करते रहे।
गहरी शाम को हम सभी एक साथ बैठे, अलग-अलग बातें होती रहीं, मज़ाक भी छिड़ा। कंचन ने शाम के समय नाइट सूट पहना था, वहीं शिप्रा ने स्कर्ट और टॉप में जुटी थी। बीच बातचीत में मैंने ध्यान दिया - सतीश लगातार मेरी पत्नी की ओर देख रहा था, ऐसे घूरता जैसे कुछ गड़बड़ हो। शिप्रा उसके नज़रों के मतलब समझ गई थी, इसलिए झिझककर आँखें फेर लेती। मैंने उसे ऐसे देखते देखा, तो खुद भी कंचन को ठिठककर देखने लगा। बातें चलती रहीं, और चलते-चलते रात के आठ बज गए।
सतीश ने कहा – “अनुज चलो यार, काफी दिनों बाद मिले हैं, चलो एक-एक पैग लेते हैं।” मैंने कहा – “नहीं यार, तुम पीयो।” क्योंकि मैं नहीं के बराबर पीता था। तो वो शिप्रा की तरफ देखते हुए बोला – “शिप्रा, इजाजत दे दो।” शिप्रा बोली – “मेरी इजाजत की क्या जरूरत है, पी लो दोनों लोग।”
इसको डबल मीनिंग से और शिप्रा के बूब्स की तरफ निगाह गड़ाते हुए सतीश बोला – “ये दूध नहीं है जो इजाजत न लेनी पड़े, इसमें तो इजाजत लेनी पड़ेगी अनुज को और हम तो बिना इजाजत के दूध भी नहीं पी सकते हैं।”
हम तीनों - कंचन, मैं और शिप्रा - उसी पल समझ गए कि सतीश किस बात को लेकर बोल रहा है। अब तक उसने ऐसा कभी नहीं किया था, यह अपने आप में नया था। फिर सतीश ने कंचन की ओर मुड़कर कहा - "आज चलो, सब थोड़ा-थोड़ा पी लें, ताकि जयपुर की याद में कुछ खास भी घुल जाए।" कंचन शराब से दूर रहती थी, इसमें कोई ढील नहीं थी। फिर भी सतीश ने इतना ज़िद की कि वह बैठ ही गई, एक तरह से मजबूर होकर। शायद उसे डर था कि अगर ना कहा तो सतीश से बात बिगड़ जाएगी। इधर शिप्रा ने तो कोई बहाना नहीं बनाया, सीधे हमारे पास आकर जगह ले ली।
सतीश ने दो बोतलें निकालीं - वोडका की एक, रॉयल चैलेंज की एक। कंचन को धोखा देते हुए बोला, "इसमें सिर्फ़ वोडका है, जिसमें नशा बहुत हल्का होता है।" टेबल पर पड़े थे चार ग्लास - दो स्टील के, दो कांच के। चपलता से उसने दोनों स्टील के ग्लास में तीन-चौथाई वोडका डाला। शेष जगह कोल्ड ड्रिंक से भर दिया।
एक पैग उसने मेरे लिए भी बनाई, एक अपने लिए। दोनों ने ग्लास एक सांस में खत्म कर डाला। "इसमें क्या है," कंचन बोली, "लोगों को क्यों पसंद?" शिप्रा मुस्कुराई - “दीदी, बहुत तीखी है ये।” सतीश ने आगे बढ़कर कंचन के हाथ को पकड़ लिया, उसे खींचा अपनी तरफ। एक छाती दबी, वो शिप्रा की ओर टकटकी लगाए बोला, "हमें तो इनमें मजा आता है… पिला दो।" शिप्रा को समझ आ गया, वो उसी से कह रहा था।
इतने में मैंने भी शिप्रा को पकड़कर अपनी गोद की तरफ खींच लिया और उसके दोनों बूब्स को दबाते हुए कंचन की तरफ इशारा किया और बोला – “कड़वा है तो मीठा निकाल दूँ।” कंचन ने सिर झुका लिया। दोनों ही अपने आपको छुड़ाते हुए बड़बड़ाती हुई चली गईं। कंचन बोल रही थी – “दोनों पागल हो गए हैं।” सतीश शिप्रा को जाते हुए देखता रहा और एक आह भरी और बोला – “काश...” मैं समझ गया कि वो क्या कहना चाहता है लेकिन मैं उसे ही सुनाना चाहता था। मैंने बोला – “सतीश, कुछ कहा क्या?” वो बोला – “यार कुछ नहीं ऐसे ही।” और एक और पैग बनाने लगा। मैंने बोला – “यार हमसे क्या छुपाना, बोल तो सही।” वो बोला – “यार बुरा मत मानना।” मैं बोला – “यार बोल तो सही।” वो बोला – “यार शिप्रा बहुत खूबसूरत है, तू बहुत लकी है जो शिप्रा जैसी खूबसूरत बीवी मिली है।”
इस पर मैं और एक्स्ट्रा बोलने की हिम्मत करके बोला – “यार कंचन के सामने शिप्रा कुछ भी नहीं। क्या बदन है, क्या पिछवाड़ा और क्या दूध हैं। मुझसे ज्यादा तो तुम लकी हो।” सतीश तुरंत बोला – “ठीक है तो अपना लक आज बदल लेते हैं। हो तैयार...?” इस पर मैंने कहा – “क्यों नहीं, लेकिन वो लोग मानेंगी क्या?” सतीश बोला – “ट्राई तो करो, थोड़ा ड्रामा तो करेंगी लेकिन क्या उनका दिल नहीं है। उनका दिल भी तो करता होगा नए मजे को, नए अनुभव को।” मैंने बोला – “ओके ट्राई करते हैं।”
अचानक कंचन व शिप्रा डगमगाते हुए भोजन लेकर पहुँच गईं। उन्हें धीरे-धीरे नशा छाने लगा था। बाद में सबने मिलकर खाना खाया। नशे के कारण शिप्रा और कंचन ने ज़्यादा नहीं खाया, फिर अपने कमरे में सोने चली गईं।
हम दोनों ने तसल्ली से खाना खाया और अपने-अपने रूम्स की तरफ जाने लगे तो सतीश बोला – “अनुज, इरादा नहीं है क्या?” मैं बोला – “अभी से? अभी तो 9 ही बजे हैं।” वो बोला – “रात ज्यादा लंबी नहीं लगेगी। कंचन के साथ तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और दिन निकल आएगा।” मैं बोला – “ठीक है, तुम शिप्रा के पास जाओ, मैं कंचन के पास जाता हूँ। लेकिन शिप्रा का ख्याल रखना, ज्यादा बेरहमी मत दिखाना, बहुत नाजुक है।” सतीश बोला – “यार क्यों चिंता करते हो, आज वो मेरी बीवी है और मुझे पता है कि बीवी का ख्याल कैसे रखना है। गुड नाइट।” कहकर गेट बंद कर लिया। मैं भी अपने कमरे में आ गया। लेकिन मुझे सतीश के बिहेव से लग रहा था कि वो आज शिप्रा को बुरी तरह से चोड़ेगा।
खिड़की के पास जाकर मैंने झांकना शुरू किया, सतीश का व्यवहार अजीब लग रहा था। उधर, शायद वो शिप्रा के साथ कुछ ज्यादा कर न दे। अचानक ध्यान गया खिड़की के एक छेद पर, जहाँ से भीतर का नजारा साफ दिख रहा था। अंदर का नजरिया सीधा आंखों से टकराया। बेड के ठीक नीचे सतीश खड़ा था, पूरा नंगा। हाथ में उसका लंड था, काला जैसे कोयला घिसा हो। मेरे से मोटा जरूर था, पर लंबाई में कम। थोड़ी देर में वो अपनी चीज पकड़े बेड पर चढ़ गया। शिप्रा एक ओर मुड़ी हुई थी, एक टाँग मोड़कर, बाईं तरफ मुँह करके लेटी थी।
एक बूब्स बाहर की ओर झाँक रहा था, पैरों के बीच स्कर्ट ऊपर खिसक गई थी। पीछे से सतीश ने स्कर्ट को हल्का सा उठाया, पैंटी का किनारा सामने आ गया। मुँह चुतड़ के पास ले जाकर चूमा। फिर टॉप को ऊपर ठेला, ब्रा का पीछे का हुक खोल दिया। शिप्रा को भुजाओं में समेटकर बैठाया, कपड़ा उतार फेंका। ऊपरी हिस्से पर अब कुछ नहीं था।
सतीष बैठे-बैठे उसके होंठों पर लंबी सांस की तरह चुम्बन ले आया, फिर उसके स्तनों को मुँह में लेकर धीमे दबाव से चूसने लगा। शिप्रा अभी तक नहीं हिली थी। वापस झुकाकर उसे लेटा दिया गया, फिर पीछे की ओर हाथ फेरते हुए उसकी स्कर्ट नीचे खिसक गई। इस बार पैंटी भी उतारी जाने लगी। एकदम खोलते ही शिप्रा घड़ी के सामने नंगी थी, सतीष के शरीर में लहर साफ दिख रही थी। उसके देखते ही वह बहुत तेज भड़क उठा था। मुँह से उसकी योनि को चूमते हुए सतीष सीधे ऊपर चढ़ गया, उसके होंठों को गहराई से दबोच लिया।
उसका हाथ शिप्रा के सिर के नीचे था, दूसरा उसके स्तनों पर। दबाव डालते हुए चूसता गया, मानो कोई आवाज सुनाई न दे। ऐसा लग रहा था जैसे वह जाग भी न जाए, पर ठीक इसी वजह से जाग उठी। दर्द से चेहरा बनाते हुए उसने आँखें खोलीं, धीमे-धीमे घबराहट फैली। सतीश को ऊपर देखकर समझ नहीं आया क्या हो रहा है। छूटने की कोशिश की, लेकिन लड़की थी, नशे में ढली।
फिर भी वो टस से मस नहीं हुई। ज़ोर-ज़ोर से सतीश से बात कर रही थी, पर मैं तो बस देखता रह गया। सतीश भी कुछ कह रहा था, फिर उसने हमारे कमरे की ओर इशारा किया - मानो कह रहा हो कि कंचन और मैं अंदर हैं। अचानक उसने फोन कहीं रख दिया। एकदम से घंटी बजी। समझ आ गया, वो मुझसे बात करवाना चाहता है। धीरे से फोन उठा लिया। सतीश ने कहा – “अनुज, शिप्रा बहुत ज़िद पकड़े हुए है, मानने का नाम नहीं ले रही, तुम्हीं इसे समझाओ।” फिर शिप्रा को फोन थमा दिया।
शिप्रा रोते हुए बोली – “अनुज... सतीश मेरे साथ...” और चुप हो गई। मैंने कहा – “जान कोई बात नहीं, सतीश भी तो हमारे ही घर का मेंबर है। आज तुम्हें एक नया आनंद मिलने वाला है तो तुम नए आनंद का मजा लो।” मैंने झूठ बोलते हुए कहा – “कंचन भी तो मेरे साथ है, वो तो बड़े ही मजे से मेरा साथ दे रही है। उसने तो कुछ नहीं कहा, वो तो तुम्हारी ही बहन है। समझ से काम लो और मजा लो। और मैं सतीश को कह देता हूँ कि तुमको ज्यादा परेशान न करे। फोन उसको दो।” शिप्रा ने फोन सतीश को दे दिया।
मैंने सतीश को बोला – “सतीश, शिप्रा को आज मस्त कर दो। उसका पूरा रस निकालकर पी जाओ। पूरा चूस लो आज उसको। उसको इतना मजा दे कि उसको हमेशा याद रहे। ओके गुड लक।” ये कहकर मैंने फोन रख दिया। अब मैंने देखा कि शिप्रा सतीश का विरोध नहीं कर रही थी। सतीश उसकी दोनों जाँघों को चाटते हुए आगे बढ़ रहा था। शिप्रा का मुँह हमारे रूम की खिड़की की तरफ था और वो अपनी आँखें बंद किए हुए मुँह से लंबी-लंबी साँसें भर रही थी जैसे उसको काफी मजा आ रहा हो। अब सतीश उसकी चूत तक पहुँच चुका था और उसकी चूत को कुत्तों की तरह चाट रहा था। शिप्रा को शायद अब ज्यादा मजा आ रहा था इसलिए उसने थोड़ा सा ऊपर उठते हुए सतीश के सामने सिर हिलाते हुए, जैसे उसे अब चूत को और चाटने को मना कर रही हो, उसकी बाँहों को अपनी बाँहों में पकड़कर अपने ऊपर खींच लिया। सतीश के चेहरे पर एक अजब सी मुस्कान थी। अब उसे लगने लगा था कि शिप्रा अब उसका पूरा साथ देगी एक बीवी की तरह। और मुझे भी अब संतुष्टि थी कि चलो शिप्रा मान गई।
शिप्रा की इजाजत मिलते ही सतीष उस पर झपटा, उसके छाती के कपड़े हटाए, फिर दोनों चुचियों को हाथों में भरकर जोर-जोर से दबाने लगा। वो खुद भी उत्साहित हो चुकी थी, धीरे से हाथ आगे बढ़ाया, सतीष के खड़े काले लंड को पकड़ लिया, फिर ऊपर-नीचे सहलाने लगी। बिना किसी रुकावट के सतीष ने अपना लंड उसकी चूत के ऊपर रख दियa, मुँह के पास जाते ही उसके होंठ चूमे, फिर एक तेज धक्का देकर लंड पूरा अंदर घुस गया।
शिप्रा ने सतीश को धक्का देना शुरू कर दिया, उसका लंबा लंड मेरे से कहीं ज्यादा मोटा था, बस इसलिए शायद तकलीफ हुई। लग रहा था, मानो पहली बार किसी चीज़ का आनंद ले रही हो। फिर अचानक सतीश ने झट से चोदना छोड़ दिया, अपना लंड खींचकर बाहर निकाला, बेड पर से उठने का इशारा किया। जैसे ही वो हटी, वो तुरंत उस जगह लेट गया, अपने ऊपर आने का संकेत देने लगा।
शिप्रा मुस्कुराई, धीरे से ऊपर आई। उसने हाथ कमर के पास रखे, सतीश के लिंग को हथेलियों में लिया। एक चुंबन दिया सिरे पर, फिर बैठ गई उसके ऊपर। छेद पर घाघरा उतारा, ऊपर-नीचे हिलने लगी। मोटे डंडे को अंदर खींचा धीरे-धीरे। सतीश ने उसके स्तन दबाए, मुँह की ओर बढ़े। झुककर वो नजदीक आई, उसने एक को चूस लिया। दूसरे को उँगलियों से घेर लिया। कुछ पल बाद, वही जगह बदल दी। अब वह ऊपर था, तेजी से चलाने लगा। मुँह सीने में धँसा रहा, जैसे सब कुछ निचोड़ लेगा। गति और बढ़ गई। थोड़ी देर में सब शांत। सतीश उसके ऊपर पड़ा रहा।
मन में ख्याल आया, अब बहुत इंतजार कर लिया है। शिप्रा ने कोई शोर मचाया नहीं, जिससे तसल्ली हुई। उसकी झिझक पहले थी, फिर सतीश के साथ उसका व्यवहार ऐसा जैसे वो उसकी पत्नी हो। इससे साफ़ था कि कंचन भी राजी हो जाएगी। अब तो शिप्रा भी मदद करेगी, कंचन को मनाने में। एक नए आनंद का अनुभव उसने पहले ही कर लिया था। सब कुछ सोचकर मैंने पैंट-शर्ट उतारे। बस अंडरगारमेंट्स में बिछौने के पास आकर बैठ गया। वो सीधे लेटी थी। सबसे पहले मैंने उसके होंठों पर छुआ। और चुचियों पर हाथ रखकर धीरे से दबाव डाला।
धीरे-धीरे उसके नाइट सूट के सारे बटन खोल दिए। मेरे सामने अब उसका सुंदर मखमली पेट और काली ब्रा से बाहर झांकता शरीर था। ऐसा लग रहा था कि उसकी चुचियां कभी भी उसकी ब्रा को तोड़कर बाहर आ जाएंगी। अब मैंने बिना देरी किए उसकी नाइट सूट की लोअर का नाड़ा खोलकर नीचे खिसका कर बाहर निकाल दिया। और उसकी पीठ के नीचे हाथ ले जाकर उसकी ब्रा भी खोल दी और ब्रा को एक किनारे रख दिया। मैं उसकी दोनों टाँगों को फैलाकर उसके बीच में बैठ गया और उसकी बाँहों को अपनी बाँहों में लेकर उसकी नाइट सूट की अपर उतार दी। अब वो मेरे सामने उसी अवस्था में थी जैसी कि पैदा हुई थी। उसे देखकर मेरा चेहरा लाल हो गया। मैंने कभी इतनी खूबसूरत लड़की को चोदने के बारे में कभी सोचा भी नहीं था।
मेरे होंठ उसके होंठों पर आए, फिर मैंने जोर से चूस लिया। आज ऐसा करने का मन था कि वो सतीश को तो भूल जाए, लेकिन मेरी बात याद रखे। शुरू में आहिस्ता-आहिस्ता चल रहा था, बाद में तेजी से उसकी छाती को दबाने लगा। जब उसने थोड़ा हिलना चाहा, मैंने सब छोड़ दिया और उसे लेटा दिया।
उसके ऊपर लेट गया मैं। फिर से वही करने लगा - एक चुची को हाथ से जोर से दबाया, दूसरी को मुँह में लेकर चूसा। दर्द से उसके मुँह से निकला ऊंह…ऊं। आँखें बंद किए बोली, "सतीश, बस करो, बहुत दर्द हो रहा है।" मैं रुका नहीं, तो उसने बिना आँख खोले दोनों हाथों से मेरी पीठ पर मारा, ठीक ऐसे जैसे कह रही हो - अब छोड़ दे। इस झटके से मुझमें और आग भर गई। मैंने अपने होंठ उसके होंठों पर रखे, धीरे-धीरे चूसना शुरू किया।
पता नहीं उसे क्या लगा कि उसने झटके के साथ आँखें खोल दीं और जैसे ही मुझे अपने ऊपर देखा अपना मुँह हटा लिया। उसका सारा नशा जैसे गायब हो गया और बोली – “अनुज तुम...?” मैंने शांत रहते हुए जवाब दिया – “मुझे ये हिम्मत तुम्हारे इस रूप ने दी है, तुमने दी है। ऐसे रूप को देखकर तो मुर्दे भी जिंदा हो जाएँ।” वो रोने लगी और छूटने का प्रयास करते हुए बोली – “हटो मेरे ऊपर से, मैं तुम्हारी करतूत के बारे में अभी सतीश को बताती हूँ।” मैंने कहा – “कंचन यार तुम क्यों परेशान हो रही हो। सतीश ने ही मुझे यहाँ भेजा है और तुम तो पागल हो। वो एक-दूसरे के साथ मजा ले रहे हैं और तुम टाइम बर्बाद कर रही हो।” कंचन बोली – “वो दोनों कौन?” मैंने कहा – “शिप्रा और सतीश।”
कंचन ने कहा - "तुम झूठ बोल रहे हो।" मैंने कहा - "अब तय करो, फोन पर सुनोगी या आँखों से देखोगी?" उसने जवाब दिया - "देखूँगी।" फिर मैंने पूछा - "अगर सच निकला तो क्या होगा?" वो बोली - "ठीक है," यानी हामी भरी। मैं उसे वैसे ही ले गया, जैसे कि था। पहले खुद झांककर देख लिया - क्या चल रहा था अंदर। दूसरा चक्कर शुरू हो चुका था। इस बार शिप्रा छाती के बल लेटी थी, सतीश उसकी पीठ पर था। मतलब, इस बार उसके पीछे वाले हिस्से की बारी थी। मैं किनारे हट गया और बोला - "ले, अपने आप देख ले। तुमने एक बार भी नहीं चखा, और वो दूसरे दौर में उतर चुके हैं।"
वो खिड़की के छेद में आँख टिकाकर देखने लगी, फिर अंदर झाँकते ही सबूत मिल गया। मैंने पीठ के नीचे एक हाथ डाला, घुटनों के नीचे दूसरा समेटा, और उसे गोद में उठा लिया। उसके होंठों को चूमते हुए मैं बेड की ओर बढ़ गया। कंचन ने एक शब्द भी नहीं कहा। जैसे ही बेड के पास पहुँचा, मैंने उसे वहीं लिटा दिया, टाँगें सीधी कर दीं।
अभी तक मैंने उसकी चूत नहीं देखी थी। वो बिल्कुल साफ थी - कहीं कोई बाल नहीं। हो सकता है, आज ही साफ़ की हो। कंचन हर चीज में निखराव पसंद करती थी। उसकी चूत का रंग उसके शरीर के रंग जैसा था। शिप्रा गोरी थी, फिर भी उसकी चूत काली थी। मेरा लंड और सतीश का भी ऐसा ही था। इस बात ने मुझे उलझा दिया।
मैंने उसके पैर अलग किए, बीच में जगह बनाकर बैठ गया, फिर उसकी चूत पर होंठ लगा दिए। वो कुछ नहीं बोली, कोई हलचल नहीं की। धीमे-धीमे मैंने जीभ से छेड़ना शुरू किया, अंदर तक जीभ घुसाई। वो बस इतना ही कर पाई - शांत रहना। फिर मैंने एक उंगली उसके अंदर डाल दी, आगे-पीछे चलाने लगा, साथ में जीभ से ऊपर के हिस्से को झटके देकर चाटने लगा। थोड़ा सिर उठाया, नजर कंचन पर गई - उसके होंठ खुले थे, आँखें बंद। तब मुझे एहसास हुआ, बहुत देर नहीं, वो झुक जाएगी। मैंने न उंगली की रफ्तार तेज की, न जीभ की - दोनों को एक साथ तेज कर दिया।
तभी कंचन ने मेरे सिर पर हथेलियाँ रख दीं, फिर वो खुद को झटके से नीचे धकेला। उसके भीतर का दबाव बाहर आने लगा था। मैंने ऊपर देखा, चिंता में भरी नज़र से सवाल किया - “क्या बात है?” जवाब में उसके होंठ हल्के से मुड़े। मैंने महसूस किया, अब वो रुक नहीं रही।
मुँह फिर से उसकी चूत पर लगाया, तभी कंचन बोली – “अनुज, ऊपर आ जा, अब सहा नहीं जा रहा।” मैंने जवाब दिया – “ठीक है कंच,” और धीरे से उसके ऊपर आ गया। अब मैं उसके ऊपर था, वो खुद ही आगे झुकी, अपने होंठ मेरे होंठों से टकरा दिए, फिर जोर से चूसने लगी। महसूस हुआ जैसे बहुत दिनों के बाद प्यास बुझ रही हो।
उसकी पकड़ मेरी पीठ पर इतनी तगड़ी थी कि लग रहा था, कोई जान छुड़ाएगा नहीं। उसके 36” सीने मुझे बहुत पसंद थे, तो मैंने उसके होंठ छोड़े और मुँह उसके सीने पर लगा दिया, गालों को वहाँ घिसने लगा। मजा आ रहा था ऐसे में। फिर एक सीने को दाँतों से हल्का काटना शुरू किया, साथ में दूसरे को हाथों से जोर से दबाया। अब वो आहें भरने लगी, जिससे मेरा उत्साह और बढ़ गया। बोली - “अनुज, तुम बहुत चालाक हो।” मैंने पूछा - “क्यों?” जवाब दिया - “क्योंकि तुमने हमारा सब कुछ देख लिया, पर अपना कुछ नहीं दिखाया।” मैंने कहा - “ले लो, जान, आज तुम मेरी पत्नी हो, ये सब तुम्हारा है, जो चाहो करो।” फिर वो बैठ गई।
उसने अपने दोनों हाथों से मेरी बनियान उतार दी और मेरे अंडरवियर को भी उतार दिया। मेरे लंड को देखकर हाथ में लेते हुए बोली – “अनुज क्या बात है, तुम्हारा लंड तो काफी लंबा है और सतीश के लंड से रंग भी साफ है?” मैंने बोला – “जान तुम्हारी चूत भी तो शिप्रा की चूत से गोरी है और बूब्स भी उससे बड़े और मस्त हैं।” ये सुनकर वो खुश हो गई और अपने होंठों से मेरे लंड के सुपारे को चूमने लगी और बोली – “वूह... क्या नमकीन माल है...” और पूरे लंड को मुँह में लेने का प्रयास करने लगी और बोली – “ये तो पूरा नहीं जा रहा, सतीश का तो पूरा ले लेती हूँ।” मैं बोला – “ये मुँह में पूरा नहीं जाएगा, ये तो तुम्हारी चूत में ही पूरा जाएगा मेरी जान।”
मैंने कहा और उसे नीचे लिटा दिया, फिर उसके पैर कंधों पर डाल लिए। ऐसा करने का मकसद था कि वो मेरे लंड की लंबाई महसूस कर पाए, साथ ही सतीश के साथ उसके सेक्स के अंतर की याद भी ताजा रहे। अब मैंने अपना लंड उसकी चूत के मुंह पर रखा, दोनों कंधों को कसकर पकड़ लिया। आधा लंड धीरे-धीरे अंदर घुसाया, फिर आगे-पीछे की गति शुरू कर दी। 15 से 20 बार झटके लगाए, फिर एक तेज धक्का दिया, साथ ही कंधों को खींचकर अपनी ओर खींचा - इस तरह पूरा लंड अंदर चला गया। कंचन के शरीर में कंपकंपी दौड़ गई, वो आह्ह… स्स्स्स… आह्ह की आवाज निकालने लगी, मानो किसी ने उसके मुंह में तीखी मिर्च ठूंस दी हो। वो मुझसे बोली – “अनुज, थोड़ा पीछे हट जा।”
थोड़ा सा पीछे खींचकर मैंने लंड को रोका, तभी उसकी साँस गहरी हो गई। धीमे झटके दिए, पाँच से सात तक, फिर अचानक तेज धक्का देकर वो चूत की जड़ तक पहुँच गया। "आज तो मार ही डालोगे," कंचन बोली, "अनुज?"
तो मैंने कहा – “कंचन तुमको नहीं मारेंगे लेकिन तुम्हारी चूत को तो आज जान से मार ही डालेंगे। पता नहीं ऐसी चूत फिर मिलेगी कि नहीं।” वो बोली – “फिकर मत करो, अभी तो कई दिन रहोगे। आज मार डालोगे तो बाद में किसको मारोगे?” बातों ही बातों में वो दर्द को भूल गई और मैं उसको लंबे-लंबे शॉट मारने लगा। कंचन अब मुँह से ऊंह... ऊंह्ह्ह की आवाज निकाल रही थी। मैंने उससे जानबूझकर पूछा – “क्या हुआ जान?” वो बोली – “बहुत मजा आ रहा है, ऐसा मजा पहले कभी नहीं आया और जोर-जोर से करो। आज मुझे अपनी बना लो अनुज।” मैं बोला – “थोड़ी देर पहले तो तुम बोल रही थी कि ये क्या बदतमीजी है। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे पास आने की, मुझे छूने की और अब कह रही हो मुझे अपना बना लो।”
कंचन बोली – “मुझे नहीं पता था कि ये तुम सतीश और शिप्रा की सहमति से कर रहे हो वरना हमारा भी तो दिल है। मुझे अगर सतीश की सहमति मिल जाए तो ऐसी अदला-बदली के लिए हमेशा तैयार हूँ और मैं तो समझाती हूँ कि इसमें कुछ बुरा भी नहीं है यदि दोनों ही जोड़े समझदार हों और एक-दूसरे पर विश्वास रखें।” मैं बोला – “हाँ कंचन, जिंदगी का कुछ पता नहीं इसलिए जितना समय मिलता है मजा करो।” वो बोली – “सतीश तुम ठीक कह रहे हो।”
मैंने अपनी स्पीड बढ़ा दी। कंचन भी नीचे से अपने चुतड़ उठा-उठाकर मजा ले रही थी। थोड़ी देर बाद कंचन ने मुझे बुरी तरह से जकड़ लिया – शायद वो झड़ रही थी। और कुछ देर बाद मैं भी झड़ गया और उसके ऊपर ही पड़ा रहा। इसके बाद वो बोली – “चलो शिप्रा और सतीश को चोरी से देखते हैं।” मैंने कहा – “ठीक है।” और उसी हालत में खिड़की के पास जाकर बारी-बारी से उनको सेक्स करते देखते रहे। हमें उनको सेक्स करते देखते मैं बड़ा मजा आ रहा था क्योंकि सतीश और शिप्रा की जोड़ी भी एक-दूसरे के साथ खुलकर मजा ले रहे थे। जब वो सेक्स करके शांत हो गए तो हम फिर से लग गए। मैंने पूरी रात में उसके साथ 03 बार अलग-अलग तरीकों से चुदाई की। और सुबह 04 बजे के करीब हम सभी लोग सो गए।
सुबह करीब आठ बजे कंचन चाय लेकर आई। मैंने चाय को किनारे रखा, फिर वापस अपनी तरफ खींच लिया। इधर उधर झटका देते हुए वो बोली - “अरे, क्या रात भर का पेट नहीं भरा?” मैंने कहा - “तुमसे तो कभी नहीं भरेगा।” धीरे से छुटकारा पाते हुए बोली - “छोड़ो मुझे, दोनों को जगाना है, चाय देनी है।” मैं बोला - “एक किस तो दे जाओ।” वो पास आई, होंठ छू लिए, एक नरम किस दे दी। मैंने कहा - “चलो, मैं भी उनके पास चलता हूँ।” वो रसोई से चाय लाई। दोनों कमरे में घुस गए। चादर गले तक खींचे, दोनों सो रहे थे।
उठो भई सतीश, चाय बन गई है – कंचन ने आवाज दी। सुनते ही शिप्रा धीरे से ऊपर उठ बैठी, चादर उसकी जाँघों तक सरक गई। वह बिल्कुल नंगी थी, उसके स्तन साफ़ दिख रहे थे। उसकी नजर मेरी तरफ हो गई, वो हैरान सा महसूस कर रही थी। मौन छाया रहा, कुछ भी बोल नहीं पाई, झिझक रही थी मेरी ओर देखने से। मैं करीब आ गया और बोला – “सुप्रभात, प्यारी। कैसी गई रात?” कोई जवाब नहीं आया। मैंने देखा, उसके स्तनों पर दाँत के निशान थे, लालिमा फैली हुई थी। हाथ फेरते हुए मैंने कहा – “शायद सतीश ने खूब तकलीफ दी है तुम्हें।”
तभी कंचन बोली, "अब तक तुमने मुझे कम परेशान किया है? जाओ यहाँ से, इस लड़की को चाय पीने दो, अब और परेशान मत करो।" मैं वहीं पास बैठ गया। कंचन ने सतीश को आवाज़ दी – "चाय पी लेना, रख दी है," – फिर वो रसोई की ओर चली गई। सतीश उधर सोता रहा। शिप्रा ने चाय पीनी शुरू कर दी, कुछ कहा नहीं। मैंने उसकी चादर उसकी चूत से हटा दी, धीरे-धीरे उसकी चूत को छूने लगा। वो चाय पीती रही, मैं उसके पास थोड़ा नीचे खिसक गया, बूब्स पर मुँह रखकर एक-एक को चूसता रहा। जब उसने चाय खत्म कर ली, मैंने उसे वहीं लेटा दिया।
खुशी हो गई थी मुझे। पलक झपकते ही पैंट उतारा, घुसा दिया अंदर। वो बोली, "इतनी डीडी के बाद भी पेट नहीं भरा?" मैंने कहा, "अभी तक नहीं, इसीलिए तेरा ले रहा हूँ।" फिर आवाज आने लगी - पच्छ-पच्छ, क्योंकि रातभर के बाद चूत बहती थी। धमाके से सतीश जाग गया, बैठते ही बोला, "अनुज, सुबह सुबह हमारी बीवी को ऐसे?" कुछ न बोला मैं, बस चलता रहा। सतीश बोला, "क्या मैं भी शामिल होऊँ?" मैंने कहा, "आ जा।" जैसे ही पास आया, खड़ा हो गया मैं, बोला, "ले ले अब तू।" सतीश बोला, "अगर तुम मेरा लंड शिप्रा की छेद में ठूंस दो तो और मजा आएगा। बुरा मत मानना।"
मैंने कहा - “ठीक है।” फिर उसकी लंड को पकड़कर सीधा उसकी चूत पर रख दिया। धीरे-धीरे, सतीश ने अपनी लंड भीतर खिसका ली। उसने शिप्रा से घोड़ी जैसी मुद्रा में झुकने को कहा, और तभी वह उसे चोदने लगा। मैं आगे बढ़ा, अपनी लंड उसके मुँह में ठूस दी। अब शिप्रा मेरे मुँह में लंड लेकर चूस रही थी, और चूत में सतीश की लंड से लुफ्त उठा रही थी। ऐसा कुछ देर तक चलता रहा। फिर सतीश ने हमें रुकने का इशारा किया, और मुझे बेड के किनारे जाकर आधे शरीर से नीचे झुक जाने को कहा। मैं वहीं गया, पैर लटका दिए।
शिप्रा को सतीश ने कहा कि मेरे ऊपर बैठ जाओ, अपनी पीठ मेरे लिए खोलकर। वो बस इतना सुना था कि चढ़ गई। मुझे एहसास हो गया, अब ये शुरू होने वाला है। फिर ऐसा ही हुआ। सतीश आगे से, मैं पीछे से - दोनों धमाल मचा रहे थे। शिप्रा के मुंह से आवाजें टपक रही थीं - आह्ह्ह… ऊऊउह्ह… स्स्स्स… मजा छलक रहा था। थोड़ी देर में तीनों ढह गए, बिस्तर पर फैल गए। दोपहर के खाने के बाद, वैसा ही हुआ कंचन के साथ। पांच दिनों में जमकर मजा आया।
क्या बात है, साली-भाभी के साथ आपस में बदलाव वाली कहानी पसंद आई? अपना खयाल लिख दो नीचे... 🌶️
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