दीदी के घर जीजाजी के मोटे लंड से वर्जिन चूत फड़वाई
(प्रेग्नेंट दीदी की मदद करने गई साली, जीजा ने सील तोड़कर
खूब चोदा)
मैं मेघा हूँ। छह बहनों में से मैं दूजी हूँ। उसके बाद दीदी सुमन की शादी भोपाल में तय हुई थी। एक दिन वो प्रेग्नेंट हो गईं, और मम्मी ने मुझे वहाँ भेज दिया। आगरा मेरा घर है। ऊँचाई 5.5 फीट है मेरी। गोरी चमड़ी है, आँखें नीली। फिगर 34-30-36 है। बूब्स मुलायम, गांड ठीकठाक भरी हुई। लोग कहते हैं, मैं किसी आइटम की तरह लगती हूँ।
स्टेशन पर जीजाजी मेरा इंतजार कर रहे थे। उनकी ऊँचाई, चौड़े कंधे, और मुस्कान ने तुरंत ध्यान खींचा। पहली झलक में ही कुछ अजीब सा लगा। घर पहुँचकर दीदी से गले मिलने के बाद आराम मिला। वहाँ उनका छोटा सा फ्लैट था, बस एक कमरा। बातें होती रहीं, घंटों तक बातचीत जारी रही। ठंड इतनी थी कि कंपकंपी छा गई। तब जीजाजी ने कहा - "आप दोनों कमरे में सो जाओ, मैं बाहर सोफे पर ठिकाना बना लूँगा।"
बदलने को कपड़े चाहिए थे मुझे। दीदी ने अपना ट्राउजर-टीशर्ट थमा दिया। बदलकर मैं लेट गई। वो जल्दी सो गईं। रात के दो बजे जीजाजी ब्लैंकेट में घुस आए – नींद में दीदी समझकर मुझे लिपट गए। एक पैर मेरी जांघ पर, हाथ कमरे के बीच। डर लगा पहले, पर गर्मी महसूस करते ही तनाव ढीला पड़ने लगा। पहली बार किसी आदमी का स्पर्श। चुपचाप लेटी रही मैं। उनका लंड मेरी जांघ से छू रहा था – खड़ा हो चुका था। मेरा भी ताप बढ़ गया, फिर भी न हिली। सुबह जब दीदी टहलने निकलीं, मैं धीरे से सोफे पर सरक गई।
आठ दिन ऐसे बीते। हर रात जीजाजी मुझे दीदी समझकर छेड़ते थे। मैं खुश होती। वो मेरे पीछे घिसटते तो मेरी चूत तर हो जाती।
एक बार जीजाजी ने सोचा कि कहीं घूम आएं। दीदी ने मना कर दिया। मैं फिर भी उनके साथ बाइक पकड़कर चल पड़ी। जैसे ही वे ब्रेक लगाते, मेरे स्तन उनकी पीठ से छू जाते। शुरू में ऐसा लगा जैसे कुछ गलत हो रहा है। धीरे-धीरे वो छुआई अच्छी लगने लगी। मैंने खुद को धक्का देना शुरू किया। वे भी अब बार-बार ब्रेक देने लगे। शरीर गर्म हो उठा। योनि में झनझनाहट छा गई। लेकिन जब दीदी की याद आती, तो सब कुछ रोक लेती।
उस दिन बहन का नौवां महीना चल रहा था। पानी से निकलने के बाद पैर फिसल गया। नहाने के बाद वो छोटी ड्रेस में थीं - ऊपर आधा खुला, पीछे कुछ झांक रहा था। मैंने उन्हें संभाला, तभी भैंवा आवाज़ आई। पति दौड़ते हुए आए, गोद में लेकर कमरे तक ले गए। अब भी बहन बाथरूम में ही थी।
कमर में चोट लगी थी। जीजाजी – “सुमन को भेजता हूँ, क्रीम लगा देगी।” मैंने कहा – “दर्द बहुत है, आप लगा दो।” दीदी ने कहा – “जाओ, लगा दो।”
पीठ के बल लेट गई मैं। जीजाजी ने क्रीम हाथ में ली। कमर पर घिसी, धीरे-धीरे नीचे उतरे। मैंने कहा – “थोड़ा और नीचे तक।” हाथ पहुँचे गांड तक। अब डूबने लगी मैं। शॉर्ट्स सरक गए, ब्लैक पैंटी झांकी। दोनों हाथों ने गांड को दबाया। आवाज़ निकली मेरी बिन बुलाए। चूत से तर होने लगी।
मैंने कहा, "पुरानी तकलीफ़ भी है, उस पर भी ध्यान देना।" बूब्स की तरफ़ झुककर इशारा किया। जीजाजी ने टी-शर्ट नीचे खींची – चूतड़ियाँ साफ़ दिखीं। फिर कपड़ा पूरा उतार दिया। मैं ऊपर से बिल्कुल नंग। अब वो मेरे स्तनों पर हाथ फेरने लगे, चूसने लगे।
फिर अचानक दीदी का स्वर सुनाई पड़ा। दोनों एक-दूसरे से अलग हो गए। मगर तब तक चिंगारी पहले ही भड़क चुकी थी।
अगले दिन सुबह हुई। रविवार था, धूप तेज़ चढ़ रही थी। दीदी पड़ोस में चली गईं, कहते जा रही थीं - “फोन करना जल्दी।” घर में सिर्फ मैं और जीजाजी थे। दरवाजे पर ताला डाल दिया मैंने। छोटी शॉर्ट्स और ढीली टीशर्ट में खड़े होकर बुलाया उन्हें - “आप आएं न, जीजाजी… थोड़ा समय दे दो अपनी साली को।”
जीजाजी को सब समझ आ गया। मुझे उठाया, एक हाथ तनिक नीचे, दूसरा सामने। पलंग पर बिछा दिया। कपड़े अलग होते गए। शरीर खुला। उनका भी सब कुछ बाहर। लंबा, मोटा धड़कता लंड देखा - घबराहट हुई, फिर भी लालसा ने ओढ़ लियa।
उसके साले ने स्तन चूसे, नाभि खींच दी। मैंने पूछा - "इन्हें काटकर खा लोगे?" वह हँस पड़े। इसके बाद योनि पर होंठ - चाटने लगे। मैं झुक गई - "खुलवा दो... रद्दी बना दो।"
साले ने मेरे पैर फैलाए। एक ही झटके में अंदर घुस गया, सील टूट गई, खून बहने लगा। मैं चीख उठी। वो रुका, गले लगाया। जब दर्द कम हुआ तो मैंने कमर ऊपर उठाई। फिर तेज-तेज धक्के लगाए। आधे घंटे तक ऐसे ही चलता रहा। मैं दो बार हिल गई। वो मेरे मुँह में छोड़ दिया।
उस वक्त से लेकर डिलीवरी तक हर पल चलता रहा वो सिलसिला। दीदी के पेट में बच्चा था, मगर मेरी चूत खाली नहीं रही। जीजाजी के हाथों बार-बार फटती रही मेरी गधा। आज भी कभी अवसर मिला, तो घुस गए वो अंदर।
यारों, साली-जीजा के जबरदस्त पल कैसे लगे? अपना ख्याल लिखकर बताओ। 🔥
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