कहीं बैठे-बैठे सफर के बीच में मिल गया एक ऐसा पल।

Desisexkahaniya

Jan 3, 2026 - 17:25
Jan 9, 2026 - 16:35
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कहीं बैठे-बैठे सफर के बीच में मिल गया एक ऐसा पल।

Xxx ट्रेन की कहानी में मैं AC पहली श्रेणी के केबिन में यात्रा कर रही थी। दो चतुर लड़के केबिन में घुसे, फिर मन में इच्छा हुई कि उन्हें अपनी जांघ दिखा दूँ। मेरा नाम निगार चौधरी है। 32 साल की उम्र में मैं एक ऐसी महिला हूँ जिसके चेहरे पर आवाज़ में मादकता है।

पढ़-लिखकर मैं आगे बढ़ी हूँ। पोस्ट ग्रेजुएशन इंग्लिश में किया है, वहाँ से भाषा का बहुत अभ्यास हुआ। घटिया उच्चारण से दूर, बोलने में स्पष्टता झलकती है। कई बार लोग आवाज सुनकर ही रुक जाते हैं। कई बार चेहरा देखकर ध्यान आकर्षित हो जाता है।

फिर से मैं उन पुरुषों की तरफ आकर्षित होने लगती हूँ, जो मुझे पसंद हैं।

कभी-कभी चारों तरफ से मुझे घेर लेते हैं।

कभी-कभी मैं शुरूआत में थोड़ा सा अड़ियल बन जाती हूँ, फिर धीरे-धीरे उन्हें चिढ़ाने की कोशिश करती हूँ। ऐसे में वो घबरा भी जाते हैं, मगर मैं तब तक झूठी नाराज़गी छोड़ देती हूँ।

थोड़े दिन बीत चुके थे। फिर से वह मुझे लिफ्ट पर आमंत्रित करने लगा। साथ घूमने के लिए चलने लगे। हँसते हुए बातचीत खुलकर होने लगी। गलत शब्दों में भी बातें आगे बढ़ गई।

फिर कभी वो दिन आ ही गया, जब मैं सीधे उनके लण्ड पर पहुँच गई।

फिर क्या होता है… वो आदमी बस मेरी गांड में घुस जाता है, मैं सब कुछ भूलकर उसके साथ चूत देने लगती हूँ।

मुझे लगने लगता है कि ये सब करने में मज़ा आता है, इसके बाद मैं अपनी उम्र का हर पल खुलकर जीने लगती हूँ। ऐसे ही एक के बाद दूसरे से, फिर तीसरे से, और धीरे-धीरे चौथे से भी सब कुछ होने लगता है।

मैंने अब तक कितने लड़कों के साथ सेक्स किया है, पता नहीं।

अब मुझे हर तरह के लण्ड से लगाव होने लगा। खोजती रहती हूँ किसी अनजाने लण्ड को।

स्पष्ट तौर पर, शादी से पहले मेरा ढेर सारा सेक्स हो चुका था - अलग-अलग लड़कों के साथ, अलग-अलग जगहों पर।

घर पर भी चुदी, कहीं बाहर के घर में भी। होटल के कमरे में जब दरवाजा बंद हुआ, तब हुई। कार के पीछे सीट पर भी ऐसा हुआ। एक दिन टॉयलेट में भी हो गई बात।

हर लड़के के साथ ऐसा करती, तो मज़ा आ जाता। एक-एक बार नहीं, बार-बार वही काम करने पर भी ऊब नहीं आई। धीरे-धीरे यही आदत बन गई, क्योंकि इसी से चेहरे पर दमक आ गई थी।

शादी के बाद मेरे स्तन और भी बड़े हो गए। अजनबी आदमियों के लिंग छूने का मन करता, वह सोच मन में और गहरा हो उठी थी।.

हाल में भी, कभी-कभी ऐसा होता है कि अगर कोई आकर्षक आदमी नजर आ जाता है, तो मेरे अंदर एक सिहरन-सी दौड़ जाती है। मैं एक बड़ी ऑफिस वाली नौकरी पर तैनात हूँ। यात्रा के दौरान काम करना मेरा रोजमर्रा बन गया है।.

कई बार मुझे मीटिंग के लिए पढ़ोस के शहर जाना होता है। कभी-कभी उड़ान भरती हूँ, कभी ट्रेन में बैठ जाती हूँ। ऐसे ही एक दफा दिल्ली से बैंगलोर के लिए रेल का सफर चुना था मैंने।

मेरी Xxx ट्रेन की कहानी इसी सफर से शुरू होती है। पहला डब्बा, कैलास में आरक्षण हुआ था मेरा - चार बर्थ वाला कोच। नीचे की सीट मिली थी मुझे।

बिस्तर के किनारे बैठते हुए मैंने आसपास देखा।

जैसे ही मैं बैठी, गुलाबी जालीदार बुर्का नीचे आ गया।.

थोड़ी देर में दो युवक मेरे कूपे में घुसे। सामान संभालते हुए वे जगह पर बैठ गए। एक का प्रबंध निचले स्थान का था, तो दूसरे को ऊपर का मिला था।

फिर वो भी धरती पर जा बैठा।

बैठी थी मैं उनके सामने। पहनी हुई थी साड़ी, ऊपर ब्रालेट था। खुले हाथ थे मेरे। घूर रहे थे वो दोनों, ध्यान से। शायद जुबान अटकी हुई थी।

उसकी नजर मेरे सामने की ओर टिकी थी, वो हिस्सा जो अधिक उभरा हुआ था।

सिर्फ निपल्स गायब थे, बाकी सब कुछ सामने आ रहा था।

हालाँकि मुझे अपना शरीर दिखाना पसंद है।

शायद बस कुछ कहने को ही नहीं बचा था।

ख़्वाबों में कहीं गुम सी मुस्कान छलक उठी।

दोनों लड़के काफी सुंदर थे। उनका रंग गोरा था, शारीरिक बनावट पतली-खिंची। ऊंचाई भी ठीकठाक। सच तो यह है - पहली नजर में ही दोनों अच्छे लग गए।

लगा कि अब वो और उनकी लड़की दोनों ज़हन में आने लगे हैं।

बस इतना पूछ लिया मैंने - नीलेश, आखिर कहाँ तक जा रहे हो?

उसकी आवाज़ सुनकर वह हैरान रह गया। कहा - मैडम, हम तो बैंगलोर जा रहे हैं। मैंने दोबारा पूछ लिया - तुम्हारा क्या इरादा है विशाल?

उसने कहा - मैडम, मैं भी वहीं जा रहा हूँ। हम दोनों काफी पुराने दोस्त हैं, एक ही ऑफिस में काम करते हैं, तो आमतौर पर साथ चलते हैं। अचानक आपको हम दोनों के बारे में पता कैसे चला?

सुनो, तुम्हारा नाम वाकई सूची में दर्ज है, है न?

विशाल बोला - हां हां… तुमने सच कहा। अबे, तुम कहाँ तक जा रही हो?

बोली, "तुम्हारे साथ खड़ी रहूँगी।"

खुशी से चेहरे चमक उठे, क्योंकि पता चला मैं भी वहीं जा रही थी। तभी टी टी दिखाई दिए।

उसने टिकट पर नज़र डाली, फिर मुस्कराकर कहा - एक सीट खाली है मैडम, कोई और जोड़ा नहीं आएगा। अगर चाहें तो आपको दूसरी जगह भी बदलवा सकता हूँ।?

मैंने कहा - छोड़ो छोड़ो, ऐसा कुछ भी नहीं है। मैं यहाँ पर ठीक हूँ। वो दोनों मेरे संग हैं, तकलीफ किस बात की?

टी टी विदा होते समय मुस्कुराया, फिर धीरे से चल पड़ा।

नीलेश ने कहा, वाह मैडम, आपने तो सब कुछ बदल डाला। हम दोनों आपके लिए पूरे अजनबी थे। एक-दूसरे को भी नहीं पहचानते। मुझे तो आपका नाम भी मालूम नहीं, फिर भी आपने हमें इतनी आसानी से अपने साथ जोड़ लिया।

कह दिया मैंने - तुम ठीक मेरे जैसे लगते हो, इसलिए चुन लिया तुम्हें अपने पास रखने के लिए।

बोला विशाल, अब तुम मेरी दोस्त बन चुकी हो।

बोला मैं तेरी सखि हूँ, इसके अलावा शादी के बाद तो भाभी भी हूँ। देवर-भाभी का नाता मुझे खासा प्रिय है। ऐसा कहते ही तीनों के चेहरे पर हंसी छा गई।

फिर तीनों में बातचीत खुलने लगी। अब मैं चूचियाँ हिलाते हुए उसके लंड में जोश भरने लगी।.

अचानक उसी पल, नीलेश बैग में हाथ डुबोया। बाहर आई व्हिस्की की बोतल। चुपचाप टेबल पर जगह बन गई उसकी।

दो और गिलास उसके हाथ में आए, तब साइड पर रख दिए गए।

उसने कहा - भाभी जी, क्या तुम हमारे साथ होगी?

एकदम से मैं बोली – ओये, तुम्हारी भाभी हूँ न? फिर मैं क्यों ना साथ दूँ। अपने हाथों से तुम्हें शराब पिलाऊँगी। क्या हुआ अब? मैंने खुद तीन गिलास व्हिस्की तैयार किए। दोनों को धीरे से घूंट चखाया, फिर मैंने भी एक छोटी सी चुस्की ली।

तभी सबकी नज़रें मिलीं, फिर धीरे-धीरे पीने का आनंद घर करने लगा।

शरीर में पहले से जलन थी।

मेरा शरीर धीरे-धीरे गर्म होने लगा, जब मैं उनके साथ शराब पी रहा था।

हर बात से वो मुझसे और ज़्यादा लगते।

फिरकर बोला बड़े स्वर में - मैडम!

बीच में ही रुकवाकर मैंने पूछा - फिर से वही मैडम? अबे, मैडम की जाति में घुस गया क्या? मैं तो तेरी मैडम बिलकुल नहीं हूँ भई। मैं तेरी भाभी हूँ, याद रख। निग़ार भाभी बुला मुझे, चाहे फुद्दीचोदी भाभी भी कह ले।

गुस्से में आकर मैंने जानबूझ कर बदलफ़्ज़ी की।

पहले से पता था, किसी औरत के होठों से निकली बातें किसी आदमी को कैसे पसंद आती हैं।

मुझे ख़्वाहिश थी कि वो शर्म से झुक जाएँ; उनकी इच्छा में और हलचल पैदा कर दूँ।

लक्ष्य पर मेरा तीर सटक गया।

उनके मन ही मन में लड़खड़ाहट शुरू हो गई, जब मैंने कुछ ऐसा कह दिया जिस पर वो बस चुपचाप सहन करते रहे।

अब तो मेरा पल्लू नीचे आ गया, और दोनों स्तन बाहर हो गए।

हवा में तपन घुलने लगी।

उसने पूछा - तुम सबके बीच दोस्ती किस हद तक जाती है?

बड़े आवाज में विशाल ने कहा - हम एक-दूसरे के सामने कभी कुछ छिपाते नहीं। जैसा भी होता है, सब बाहर आ जाता है।

तब मैंने पूछा - फिर लंड को भी छिपाते नहीं होंगे? शायद आपस में दिखा देते होंगे।?

उन दोनों के मुंह पर एक झलक सी छा गई, फिर आखें चमकाकर बोले - हां, अब क्यों नहीं।

मैंने पूछा - अगर सच में ऐसा है, तो फिर तुम बताओ, नीलेश का लड़का कैसा है? वैसे ही नीलेश, तुम भी बता दो, विशाल का आदमी कैसा लगता है?

दोनों का रास्ता अटक गया है।

आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी।

नीलेश ने कहा - सुनो भाभी, हम दोनों का लंड तो कभी साथ में नहीं देखा। हाँ, कॉलेज के ज़माने में हम दोनों एक-एक जैसी लड़कियों के पीछे भागते थे। जिस लड़की को वो चोदता था, मैं भी उसी को चोदता था। जिसके साथ मेरा रिश्ता होता, वो उसके साथ भी हो जाती थी। इसी बीच हमने एक-दूसरे का लंड भी देख लिया। मैं बोली - ठीक है, आज मैं तेरा लंड पकड़कर नीलेश को दिखाऊँगी। फिर नीलेश का लंड पकड़कर तुझे दिखाऊँगी। ऐसे ही तुम दोनों की दोस्ती मजबूत होगी। कहकर मैं उठी, दोनों को चूमा, फिर बीच में बैठ गई।

हाथों ने स्पर्श किया - एक तरफ नीलेश की जांघ, दूसरी ओर विशाल की।!

मेरी उंगलियाँ सावधानी से फिसलती हुई जांघों के ऊपर आराम से टिक गयीं। एक कदम और बढ़ा, तो छू लिया उस जगह को जहाँ धड़कन तेज़ थी। शराब का असर था, सभी के चेहरे पर छाया हुआ। मेरे भीतर कुछ उबल रहा था, लड़खड़ाते ख़्वाबों की तरह, जो अब सच बनना चाहते थे।

नशे में रहना मुझे पसंद है। कभी शराब से चढ़ जाता हूँ, तो कभी इसके बिना ठंड लगने लगती है।

साड़ी बिखर गई। छाती के छोरे बाहर आने को तड़प उठे। उनके धड़ पर हाथ रखते ही, एक-एक छोरा दब गया, होंठों ने गाल छू लिया।

एक आदमी के स्पर्श से मेरे स्तन तुरंत सख्त हो गए। विशाल ने ब्रा का तिकड़ा ढीला कर दिया, मैंने कपड़ा उतारकर धरती पर फेंक दिया।

मेरी माँ ने देखा तो दोनों बहनें उत्साहित हो उठीं… एक ने मेरे स्तन चूसने शुरू किये, दूसरी ने धीरे-धीरे उन्हें छूना व मलना शुरू कर दिया।!

मैंने धीरे से उनके कपड़ों को हटाना शुरू किया।

उसने ऊपर का सामान पहले उतारा, इधर-उधर फेंक दिया। पैंट का बंद ढीला हुआ, धीमे से गिर गई जमीन पर। अब नेकर थी, झटके में खोली, हवा में लहराती दूर जा गिरी।

खड़े-खड़े दोनों के लंड मेरे सामने ऊपर को उठ गए। मोटापे में भारी पड़ रहे थे, नाप से भी कहीं बड़े लग रहे थे।

काफी आकर्षक लगते थे, साफ-सुथरे भी।

लड़कियाँ जैसे भी होती हैं, मुझे बस ग्लेब स्किन वाले ही अच्छे लगते।

उसके दोनों होठों को मैंने ढेर सारी बार प्यार से छुआ, फिर वहीं डूब गई।

आज होगा कई दिन बाद पहली बार जब एक से ज़्यादा लड़के मेरे साथ शारीरिक संबंध बनाएंगे।

सच कहूँ तो, मुझे समझ ही नहीं आया था कि वो गाड़ी चल भी रही थी या जगह पर ठिकाने पड़ी हुई थी। बस, एकदम अपने ख्यालों में उलझी हुई थी मैं।

उन दोनों ने मेरी त्वचा पर हाथ फेरना शुरू कर दिया।

मैंने फिर एक-एक करके दोनों लड़कों के लिंग को मुंह में लिया, धीरे-धीरे चूसते हुए।

विशाल ने मेरी फुद्दी को चाटना शुरू किया, उधर नीलेश मेरी छाती पर मुँह लगाकर चूसने लगा। वह मेरी पीठ से हाथ फेरने लगा, धीमे-धीमे मेरे जानुओं पर तमाचे देने लगा। नीलेश मेरी मोटी जाँघों को छूकर मज़े लेने लगा। विशाल एक साथ मेरी फुद्दी और गांड दोनों को जीभ से चाटने लगा।

किसी वजह से डर लगा कि ये हरामखोर मुझमें अपना लौड़ा घोंप न दे।?

एक बार फिर ख्याल आया, कि अगर पेल मिलता है तो मैं उसे चुन लूंगी।

कभी-कभी मुझे ऐसा करने में भी ख़ुशी आती है।इधर नीलेश ने मेरी जांघों को अलग किया, वहीं सिर्फ एक पल में लंड मेरे ऊपर टिक गया।

अब समझ आया कि ये होने वाला है। मैं खुद तैयार थी, ऐसे में मेरी चूत भी पीछे कहाँ थी।!

उसके अंदर धीमे से घुसते ही मुझे एहसास हुआ कि बस, यही वो पल है। मैंने इतना सुना था, पर जब ऐसा हुआ तो लगा कि सब कुछ ठीक है।.

उसके बाद मैं चिल्लाई - अरे माँ...मैं तो मर गई...जल गई मेरी पूछ। तेरा लंड इतना मोटा है कि कहीं टूट न जाए। नीलेशवे और वो दोनों लड़के मेरी आवाज़ सुनकर और भी बढ़ गए अपने आप में।

अचानक सब कुछ बदल गया… उसने हिम्मत दिखाई, मेरी चूत पर झपटा।!

फिर मैंने विशाल का लड़कपन सहलाना शुरू कर दिया।

एक के बाद एक, दो अलग आदमियों के लिंग मेरे जीवन में खुशी लाने लगे। मैं हर रोज इन दोनों के साथ उस मजे को बाँटने लगी।

फिर वही ख्याल दिमाग में घूमने लगा - असली मज़ा सिर्फ पराए आदमियों से होता है। मैंने धीरे-धीरे अपनी कमर ऊपर-नीचे हिलानी शुरू कर दी, जैसे कोई बेकाबू लड़की हो।

किसी को मतलब नहीं, पर हर लड़की के भावना के अंदर एक तरफ खुलापन हमेशा छिपा रहता है।

ट्रेन के साथ-साथ मेरी चूत में लंड की गति बढ़ रही थी।

खुशी के ठिकाने नहीं थे, हवा में उछल रही थी मैं।

लगता था नहीं कभी होगा ऐसा मौका, पर ट्रेन में दो-दो बार लड़कों ने चुदवाया मुझे।

तभी विशाल ने हाथ उठाया, जिसके बाद नीलेश ने अपना लौड़ा मेरी चूत से धीरे से खींच लिया। फिर विशाल ने अपना घटा मेरे भोसड़े में धसका दिया। अब वह मुझे पूरी ताकत से चोदने लगा, मैंने नीलेश के लंड को मुँह में ले लिया और चूसना शुरू कर दिया।

बड़े साइज़ का लंड भी अपने ढंग पर मस्त लगने लगता है।अलग-अलग आकार के लंड से एहसास बदल जाते हैं।

हर बार एक साथ ही नहीं, पहला शुरू हुआ, फिर दूसरा।

आज पहली बार हुई शादी के बाद में, मैंने एक से ज़्यादा लड़कों के साथ संबंध बनाया।

लोथें मेरी चूत से टूटकर गिर रही थीं।

गरमी में चूत से हलवा तैयार हो रहा था।

मुझे समझ नहीं आया, उस पल मेरे अंदर कितनी ज़बरदस्त गर्मी फैली हुई थी। रुकने का नाम नहीं ले रही थी वो चाहत, न ही लड़खड़ा रहा था वो काँपता हुआ धड़कन।!

मुश्किल से कहीं ऐसा मज़ा आता होगा। शराब का असर तो था ही, पर दिमाग़ में लंड का नशा और भी छा गया था।!

कभी-कभी लगता है, मैं ऐसी क्यों बन गई हूँ? दूसरे आदमियों के लिंग में मन क्यों धड़कता है। जब उत्तेजना बढ़ी, तो बोल पड़ी - जोर से घुसाओ, मादरचोद। हाय… बहुत अच्छा लग रहा है। तेरा लोटा लोहे का सामान जैसा है, बहनचोद! आह, ओऊ, हाँसो, चलते रहो… और भी जोर से चोदो। विशाल ने पत्नी समझकर कहा - हाँ, तू बिल्कुल कुतिया है। तेरी माँ की जुबान निकालूँ… तेरा शरीर बहुत तगड़ा है। तू एक बहुत बड़ी वेश्या है।

नीलेश ने कहा - आज रात तेरी चूत में इतना ज़ोर से मारूंगा कि तू सुबह तक टखने पर न उठ पाए। तेरी गांड में लंड घुसा दूंगा, ऐसा धमाल मचाऊंगा कि तू कभी न भूल पाए। तू निगार, तू बेहया, तू हरामी है। मैं अपना लौड़ा तेरे मुंह में इतना गहरा डालूंगा कि तेरा गला छू जाए। फिर तेरी चूचियों को भी नहीं छोड़ूंगा, उन्हें भी अपने झटकों से हिला दूंगा। वो बोला - अब तो मन कर रहा है मैं तेरी माँ को भी चोद आऊँ। !

मैंने मज़ाक में कह दिया - अगर तुमने मुझे पूरी तरह खुश कर दिया, तो फिर एक दिन मैं तुम दोनों के सामने अपनी माँ को चोदते हुए देखूंगी।

उसकी आँखों में चमक आ गई, जैसे कुछ अद्भुत होने वाला हो।

वो अपनी गांड धीरे से ऊपर उठाकर मेरे होंठों तक ले आया। फिर वहीं से एक-एक बूंद टपकती रही।!

एक साला ऊपर तो दूसरा नीचे, कब जीभ घुमाएगा पता ही नहीं। किसी वक्त गधे की तरह खींचते हैं, किसी वक्त चूत में डाल देते हैं।!

तब जाकर गाड़ी में बैठे-बैठे मेरी चुदाई से पानी टपकने लगा।

खुशी महसूस करने लगी थी, तभी मेरा योनि ढीलापन अनुभव करने लगा।

अब तो दोनों गेंडे के सींग भी टूटकर जमीन पर आ गए।

इसके बाद मैंने खुशी-खुशी दोनों लड़ते हुए लण्ड को पकड़ लिया।

पहले तो मैंने नीलेश के लड़के पर जगह बनाई। इसके बाद विशाल के ऊपर समय बिताया।!

एक के बाद एक, मैंने दोनों का स्वाद चखा।

दोनों के सूत के साथ-साथ पिछवाड़े में भी धमाल हुआ।

बैंगलोर पहुँचने तक ये सिलसिला जारी रहा, लण्ड, चूत व चूची में उलझे हुए।

कुछ समय पहले मैं ट्रेन में था, वहाँ दो ऐसे लड़कों से मुलाकात हुई जिन्हें मैंने कभी नहीं देखा था।उनके साथ बिताया गया वक्त काफी मज़ेदार रहा।अगर आपको इस तरह की घटना पसंद आती है तो अपनी राय कमेंट में या ईमेल के ज़रिए साझा करें।.

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