एक कॉलेज लड़की की ढीली-ढाली जिंदगी की शुरुआत

Jan 2, 2026 - 13:42
Jan 13, 2026 - 19:45
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एक कॉलेज लड़की की ढीली-ढाली जिंदगी की शुरुआत

नई ्रा, अभ तक  नहीं नती। मैं ूं एक झक ॉडी ाली लड़की। मन ें डर, संस्कारों की    रखा। सेक्स के  िमा ें नहीं आते थे। िर एक ़ हॉस्टल में दो बनी।  िन  उसकी भाभी घर े आई।.

यह कहानी सुनें.

ताराक्षी मैं ूं, पहचनन ालों के ि उम  के छठ दशक ें है।

उततर प्रद ें  जन हु ा।

 मेरी ां फुट  इंच  आसप हो ै।

कर एक  पहले मैं 52 किलो  ा।

मेरा फिगर 34B 30 34 है। ऐस शर है े पा ि  छोे से बु्ग तक  ीं े हैं।

बाल कंधे े हैं, रंग -थरा।

अगर को   कहन पड़ेा - मे शक्ल ऐसी है े किी मॉडल सी नज आती हूं।

अब मैं घर पर रहन लग ूं। पढ़ाई खत्म हो गई है ी।

अभी तक ोई  नहीं ि ी।

घर  हर पढ़ा करव ैं माँ, पापा  ाम चल रहा है   सर शहर में।

   े मेरी एक दीदी का घर अलग हो गय ै।

ज़ि्दगी के ारे में एक कहानी ै जो ैं इस नए लड  ़ा अनभव ें  कर रही हूं।

गाँव  गलिों में  बचपन ा।

मेरा बचपन ़ी ी-ि  भर रहा।

उम के उस पड़ा पर पहुंचते-पहुंचते मेरा शर बदलने लगा।

बचपन में पढ़ा   ही मेरी ियाँ B साइज़ की हो ी थीं।

शकिस्मत े मेरे दोनों निप्पल ी बड़े हैं, इस  पर मुझे अच लगता है।

चूत ें भी बदलाव आया, े- बढ़ोतरी हु

बस इतन   ि मेरी फांकों  ि एक-सर  िपक पड़े थे। वहीं ऊपर मेरी क्लिट आक ें काफी  ि रही थी।

 में े ये  समझ आई कि जब मैं  फैलाकर ठती, तो मेरी ्रोइन ें िि नहीं होती थी। वहीं, दीदी के ैरों के  ऐस तर दिखता था। कभी-कभ कजि ें  यह फर नजर आया।

उस वक मैं िसस सब कु ाँटता,  ाम  ेरी दीदी ा।

माँ भी हमस ार से  आती, मगर दी ा तो ि्ता मेरे  बह गहर ा।

उसके साथ ें ीं आती थी, खा ि तचीत   ें   ाता। पढ़ा के लि ्ते ें गपशप चलत रहती। इस तरह   आदतें हर ि ी-  घटि ीं।

कभी-कभी साल में एक या ो बार  घर आत ैं। कुछ दिन ठहरकर ि चल  ैं।

 बह-बह मंिर ातीं, माथा कतीं, ि  घर   नहीं ीं। एक बेटी को पढ़ातीं, सर े लि  बनीं, पल-पल खभ ें लग रहतीं।

उस समय हम दोनों बहनें ीं, िन्ें  लडिों े स्कूल ें पढ़ा रहे। कॉलेज तक  उनक  बन रहा।

बड़ी हो लग  ैं, तभी दीदी ने समय आते पैड्स  इस, गलियों से आवन  करन ै,  सब बताया।

उस दीदी के  कोई लडा नहीं था, मगर वो बह आकरषक थी। हर रात उठ-ि ें एक  ो बार  को   समझती थी।

कभी-कभी वो हमारी उस कजिन   आग बढ ी, ि सर ओर अपनी  ोस् े सा भी कु मह चलता।

हर  जब वो कजिन  उसक  घर आती, मुझे एक अलग कमरे में जगह मिलती। रातभर  ों पकर ऐस  करतीं िसस उनक इचँ शांत ीं।

जब माँ को सच ा पता चला, तब  उनके होंों से एक शब नहीं िकला।

माँ ने तब दीदी की शादी उस इंजीनियर से कर दी, जब वह  ें  

अब वह दीदी, जीजा के साथ नए देश में रहती है। उसक बच  वहीं पल रह ैं।

शादी के बाद  े, मैंने एक लड़किों  ॉलेज से BA किया। पढ़ा में इतन  रह ि दिल्ली े एक अचे कॉलेज में MA में ि ि गया।

़ु  भरी मैं दिल्ली पहुँी थी।

बहुत अचा कॉलेज िा था एक तरफ, वहाँ से दिल्ली का    नजर आत ा।

अब रहन  जगह ि ी है।

एक ि मैंे साक्षी को अपन मम ा।

उसक घर भी उततर रद के एक छोटे से नगर ें था। वह ि ़ि्मी ीरोइन से कम नहीं लगत ी। ैं जितन आकरषक ूँ, उसस कहीं आगे थी वो। उसका - मेरे बले ज्यादा गहरा था।

महज कुछ ़ों में ी, हम दोनों के ि ें गहर भर  गया।

पढ़ा के ि ुरू हो े थे, हम दोनों इसमें  गए

़े समय बाद, साक्षी की भाभी हॉस्टल पहुंी। मिलन ा साक्षी से।

एक ि साक्षी ने मुे अपनी भाभी से िलवाया। उनका नाम ा नीलू। , ो साक्षी से कहीं ज़्यादा आकरषक लग रही थीं।

 पल मैं ि भाभी की ओर रती रही।

इसक  मैंे भाभी को नमस्ते कहा, ि दिल्ली के काम में उलझ गई।

 के  भाभी  मज़ाक ें ताश की  ़ी। प्लान अगल ि  ि तय , े-  आग बढ़ी।

एक  मैं कह िा, ताश ा खे मु समझ नहीं आया।.

थोड़ी देर , साक्षी के    लगार कहने पर मैं ाँ कर ी।

मुझे ताश   िस्   िखा,   े। ीरे-े मैं ी उनके साथ ठकर चलने लगी।

खेलते समय भाभी ने कहा, "चलो, पोकर ऐसा खेलत ैं... कपड़े उतरन ा।".

इसक े में मे समझ में कु नहीं आय ा।.

अब साक्षी ने कहा, हारन   े- हर कपड़ा उतारना पड़ता है।

मैंे मना कर िया, े-े खे पस ी नहीं रहा था।.

ि ि साक्षी तथा भाभी ने मन करते-करते मुझे मना ी लिया।

कौ े क्ों, पर मैं भाभी की बातों पर ि कर ी।

अकसर मैं साक्षी के सामने कपड़े बदलते हुए निवस हो जाती, इसलि उसके आग ऐस करन ें   िकत नहीं ी। उधर, ो भी मेरे सामने िना कपड़ों  रहने में कोई िझक महस नहीं करती थी।

शुरुआत ें  आसिकत  चलन लगा।

 में मे पकड कमज थी, इसलि पहल ौर में हार गई

कमीज िलन ी पड़ा  मने।

भाभी े सामने मु अचनक ें महस  लगी।

सर चककर में साक्षी आग बढ़ी, मदद करने के ि। भाभी ने कहा, ुम ऐसे ही करत रहो।

इस बार रना साक्षी  अपन मर्ज़ी  ा।

िरते हु ो कमीज उधकर पटक ा।

अगल चरण में साक्षी ने ारा मदद की, इस ार   रत िा।

बार इस पर उसने शलवार े उतारकर कि धर दी।

साक्षी  ऊपर सिर्फ ब्रा और डरवियर था, मे शर पर  शर्ट नहीं थी।

अगल ौर में साक्षी का  खत्म हु, तबस ैं े- अक पड़ती गई।

कुछ ौर  मैंने सब कपड़े उत ि थे। साक्षी  ास िर्फ ब्रा और डरवियर बचा था। जबकि भाभी पर एक तहमत भी नहीं ़ा गया था, मतलब वो हर ौर  ी थी।

एकदम अचनक भाभी  कहा - जब तुम दोनों मिलकर भी मुे एक राउंड ें नहीं हरा सकते, तो ि तभर मेरे लि  करना पड़ेगा।!

  जव िा, मैं मना करने ी वाली थी।

े-े मे नजें  उसक  का जव े लगीं।.

ि उसन ा - कहीं घबरा तो नहीं गई?

िर ी मु यह बात नन ें िक्कत  रही थी।?

उस वक मे जव भी ि हाँ ा।

सुबह तक हर  माननी पड़ेगी, ऐस   कहा। अगर ये  लगता है तो  ारी रहा। वरना वापसी ोगी  ें ठकर

एक-दूसरे की नजों में झलकत इशारा समझ आया,   बह ोने तक ुलाी स्वीकार कर ली।

दोनों को पहनन पड़ा शॉर्ट स्कर्ट और ऊपर का कपड़ा,    कह ा।

मैं आसमी ब्रा पहन ी, इसक  एक हल ीली पैंटी ी। ऊपर  तरफ ीले  ा जींस ा टॉप ा। नीे, टनों तक पहुँचती स्कर्ट पहनी  ी, जो  ीं की बनी थी।

उधर, साक्षी  ऊपर भी वह तरह  िास ा।

बाथरूम  िकलत   े नहा िा। साड़ी  जगह पहन ली एक ी सलवार  घर े बाहर  गई  िीं ि बदल 

बाहर निकलने के ि ार हो गई वह, ि हम सभी तीन े-े नीचे आए। कार ें ठकर सीे रेस्टोरेंट की ओर चल पड़े हम

तभी रास् ें एक   हर िठक गए, िर आग बढ़े और एक ऐस जगह पर ा पहुंचे जहां ा खाना सबन िलकर चखा।

अचनक भाभी ने पहल    मगर पच रख इश बन  आइसक्री मंगव ी।

तभी, जन करने के  बाद मेरे पे ें झटक ा लगा।

उठकर बाथरूम की ओर बढ़ते  ैं ा, भाभी ने सव किया -  ?

मैं कहा - सुसु ें ज़ोर ै।!

तभी भाभी  कहा - चलो ताराक्षी, अब ैं तुम्ें यल  चलत ूँ। वरन े चेयर गं  एगी।!

तर ें  हर शख   िा, जब भाभी  आवाज़ इतन  कर दी।

खाना खा  महिला  ओर खकर ी बोली - अफ्रा! इस लड़की को किडनी में पतथर हो गया है। ाब ाल नहीं पा रही है। अभ घस े ले चलूंी, वरना यहीं  कर ेगी!

खड़े होकर इतने  आदमिों के बीच, मैं शर   गई। भाभी के शब  रह े।

अब साक्षी ो भाभी के हर दम  पत चल चुा था, े- उसक हर पर मुस्का आन लगी।

हथिों  समटत  ो मेरा हाथ ामे बाथरूम  तरफ िसक गई।

बाथरूम में ि़ हम दोनों वहाँ खड़े थे, िमत    यद

एक  पड़ोसन ने मुझस कमरखास   इच जत

जब मैं इनक िा, तो भाभी की नज़रें  े भर उठीं।

भाभी को  िलत  ैं आहि  अपन ैं  ी।

पेशाब  झटक इतन  था ि शरिंदग  कम नहीं लगी।

जब मैं बाथरूम के स्टाल की ओर बढ़ी, तभी भाभी ने रा ोक लिा। उनों कहा - ताराक्षी, पेशाब  रही है तो ीक ै, बस इधर बाहर ी कर लेा। अंदर ाले कमरों में े की  नहीं ै।!

मेरा ेट  फटन   ा। भाभी  ैंने कहा, ़ दो न… बस, अब और नहीं भल रहा। कृपय करके जा ो।!

ि भी उसन ाँ नहीं कहा।

उसन कहा - अगर पेशाब  रही है तो बाहर  कर ा, वरन ैं तु अभी हॉस्टल  ी हूं।!

इस कदर ेज़ पेशाब आई कि   गया। भाभी की ओर रकर मैंे दोनों हाथों से कर पकड़ ी। ि उसक नजों में ांकते हुए अपनी चड्डी धी े नीचे िसक िया।

उस ि, मेरी   उन ों  मन खड़ी   हम पच झा़िों के पीछे से खत रहती थीं।.

़ी  िं  मुस्का उनक हर पर ैर रही थी।

आंखें ंद करके मैं े से ्कुरा दियa, जब   ओर  रह ी।

अब मेरी चड्डी  सरक कर घुटनों तक पहुँ गई थी।

हवा में ैसे कु नसान सा लगा, तभ ैं   कर  हथिों पर उठा िा। आँखें झपक गईं, शर -ब-ुद नीचे  ओर ढलन लगा। ि बि ि कर े, टन जम   गए

अचनक, ैं धीमे ैरों  उसकी बुर भाभी के ास पहुँ गया।

नीचे जब ैं िंुस् ़ में बैठ गई, तो मेरी ी की दोनों लटें खुलकर भाभी के सामने  गई

 ीमे से हँसत  मेरे चेहरे की ओर टकटक लग ी थी।

एक ी सांस  ाद ैं  ़ दी।

 ी मूत्र-द्वार खुा, पेशाब   बहने लगी। आँखें बंद िए, ि  आव ि, मैंे पेशाब  ी।

एकदम अचनक, मन लगा कि ैसे कहीं ऊपर, ि ्वर्ग में पहुँच ी हूँ।

इतन  मि रह ा पेशाब करते वक्त ि  सब   गया हो।

पेशाब करते-करत एकदम सब कु ठहर  गया था  दर

उड़ा भरत  मैं आसम   थी।

कभी मैं स्वर्ग में थी। तभी बाथरूम का दरवाज़ा टन लगा। अचनक  औरतें तर ी।

उन ों   कर िा मेा स्टाल्स के बाहर पेशाब करना।

़ी   भाभी ने आव कम करक कहा - उस गरीब को किडनी  तकल ै। पेाब में तकल लती है ो, ि जब िकल ाता है तो हत मिलती है उसे!

एक-एक कर सभी तीनों महिा ने मुझस   पल ें सा दिा।

एक समय   मेरी पेशाब कमज पड़ने लगी।

एक कदम में  नहीं, पर समय े सा आसम से  पर उतर   ैं।

उस पल  नज जब उन तीन महि पर पड़ी, मैं समय की चट पर अटक गई।

 करन ाहि, इस   ़ा ी नहीं लग ा रहा था मुे।?

़ा-़ा करके पेशाब टपकत ा रहा था,  तबयत खर ी।

कभ कभी पेशाब आन  हो  ै।

स्कर्ट को कमर पर समेटे, मैं वहीं बै ी। भाभी नजों ें आईं, तीन और औरतें ी सा ीं। ़ू ा बु  ि हु ो।

जब मैं ऐस   िनट तक बैठी रही, तभी भाभी आगे आई उसक  मेरी चड्डी  ओर बढ़ने लगे।

हर कदम पर मैंने  े पै उठाा, ि भाभी की चड्ड़ी  े में  बटा।

चड्डी उतारकर  े मेरी बुर को साफ किया, अपन जगह पर खड़ा  िया।

उसक  ो मेरी स्कर्ट नीचे ींचन लगी। इसक ुरं  मुझे बाथरूम के बाहर ले गई

सब कु ऐस चल रहा था, मा े दिमाग़ ्म हो गय ो। ैं ि आग बढ  रही थी,   ऑट  ँ।

उल ैं भी वह कर रह ी, जो ी मेरे से करवा रही थी।

ाक् े साथ टेबल पर जगह   ैंे, ी के साथ आकर

सब  ीमा  गय ा, ेरे दर  आवें ंद ो चुकी थीं।

अचनक े वेटर पस पहुँा,  ें आइसक्रीम का ऑर्डर लि

  उसने आइसक्रीम टेबल पर रखी, भाभी ने मेरी गीी नीली चड्डी, िसमें  ी, उसक  ें डाल दी। ि बोी - ाहर फेंक आओ

   पर वेटर े मेरी गंदी डरवियर उठ ी। ें   ीं उसकी, मैं और भाभी को रता रहा। ाद ें  कपड़ा सभ  मन लहराता हु चला गया।

गहराती शर्म के गर में ैं लडखड़ा रही थी।

आँखों से   बहन   गया था े।

ारी ़ के नीचे  ि झुका  था।

हथिाँ साक्षी ी मेरी जांघ पर आकर िक गईं, डगमगी सांें धीरे-धीरे भलने लगीं।

थोड़ा समय ाद, मे लत काफी ान् हो गई थी।

उधर, आइसक्रीम   हो ा था।.

हर आते ही भाभी ने पी ी सीट पर जगह ी।

 ़ी सं  ीं, ैं ाक्षी   मौ बनकर बैठी रही।

अब  का   गया था, ि  ी दिल्ली ें बतिाँ िमटिा रही थीं।

कमर ें अचनक एक  आव आई, भाभी ने ि दबाया ा। ि े की लय बदल गई, ऐस ें एक हल्का सा मन   गया।

“अब तभ  मस पकड़ेगी, मेरे े भा-बहन,” भाी ने कहा,  ें हमा ओर ाँकते हुए।

ि हम  तय ि ि हॉस्टल नहीं, े भाभी के घर े।

एक आल ैट ें ो अकेले रहती थीं, पति के हर देश   वजह े।

 ी अंदर कदम रखा, भाभी ने कर लाइट्स कम कर ीं। ि सोफे पर बैठन  कहा।

“अब स्ट्रिप करो, दोनों! पूरी तरह!” भाभी ने ऑर्डर दिया।

साक्षी ने  िझक महस नहीं ी, े अपनी ब्रा उत ी। ि पैंटी  ीरे   कर दी।

डर के मा ैंने स्कर्ट और टॉप उतार ि, ाँि पहल िझक ी।

अब हम दोनों   नहीं पहन  थे।

़ी  ीरे से पल पर रखकर वह िर्फ एक  वाली ब्रा और  में िीं।

शर पर एक िहरन-ी दौ़ रही थी,   और   रह ो।

गहर ां कर भाभी ने  आग बढ़ा ी। तीनों गिलास ें  हलचल    रं उतरा। "इधर ले," उनक आव ि़की  पर  तरह हली सी ी, "़ा  महस करो।"

हमने पी।

े-े वाइन  ि चढ़ाा, तो हवा में उमस  ैल गई

साक्षी के कमरे से बाहर िकलत    आव़ दी। ि वह   उसक  आई एक पल ें  उनक ों उसक हर पर े।

उसक ोंों पर साक्षी के हों  ऐस  आए

 पल मे नजों  ़ा रह गया।

फिर भाभी ने मुझे बुलाया, “आओ ताराक्षी, अपनी मालकिन को खुश करो!”

 जगह मैं  चलकर पहुँी।

उसकी भाभी ने उसके निप्पल्स पर चुटकी ली, फिर हथ सरक  उसक ़ा लड़की  जगह पर। "इतनी टाइट है तेरी चूत,"  ी, "आज रात मैं इसे खोल ूँगी।"

े से कदम रखत  ाक्षी ने मेरी छा पर   िया।

तीनों ो बितर पर कर िरन पड़ा।

   ें भाभी ने वाइब्रेटर धकेल िा, ि उसे चालू कर िा।

साक्षी चीखने लगी, “आह भाभी! और जोर से!”

तब  पल मेरे ि आया।

कमरे में सनाटा ा। उसक गलिों  े से आइटम को सहलाया। बटन दबत  पन    वच पर गरहट  गई

मैं तड़प उठी, “ओह गॉड! भाभी, मैं मर जाऊंगी!”

हम ों  ीं ूरी ात गत रही।

एक  ो भाभी ने हमें  ें उलझा दिा। वह चुपच आई, फि े- सब बदल गया। उसन  तरफ इश िा, ैं    गया। ों तक ऐस  चलत रहा। कभ   दर गल लती,  कभ     े।  ें ो खुद   ी, अपन   दोनों ें  ी। को  कहत नहीं ा, िर भी सब   रह ा।

पहली बार े चूत चखन   िा – साक्षी की ी, उसक  भाभी की आई

े उनका   मीठा-  

थक भर ें  ं, सुबह  आगमन तक।

भाभी ने कहा, “ये सिर्फ शुरुआत है, ताराक्षी। अब तुम मेरी परमानेंट स्लेव हो!”

उस   ाद हॉस्टल पस पर मे सब  अलग  ा था।

साक्षी और मैं अब हर रात एक-दूसरे को छूतीं, फिंगरिंग करतीं।

हर शनिवा को  घर आतीं। ि  ऐसा सिखातीं जिसके बा ें हमें पहल कभ नहीं पत ा। ॉन्डेज   ें बता, े- समझा। कभी स्पैंकिंग   ीं,  कभी लोों के  िखन  चर  कर ीं।

िर े घर आई MA खत्म करके, पर  पल अब ेरे तर रहन लगे।

घर पर रहकर अब ैं अपनी हवस लती हूं, ालाँकि िी कभी-कभी  ूं साक्षी  ि ी से मिलने।

शादी?

अब  ऐस लगत ै, मे शर और िें सिर्  ैं, िसी सरे की नज  नहीं।

इस नई लड  ़ा पुसी कही आपको कैसी लगी?

-  ि सकारात्मक रतििा भेजी ा सकती है।

धन्यवाद.

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