एक कॉलेज लड़की की ढीली-ढाली जिंदगी की शुरुआत

Jan 2, 2026 - 20:42
Jan 14, 2026 - 02:45
 0  4
एक कॉलेज लड़की की ढीली-ढाली जिंदगी की शुरुआत

नई छात्रा, अभी तक कुछ नहीं जानती। मैं हूं एक झक्कास बॉडी वाली लड़की। मन में डर, संस्कारों की बाधाओं ने घेर रखा। सेक्स के ख्याल दिमाग में नहीं आते थे। फिर एक रोज़ हॉस्टल में दोस्त बनी। कुछ दिन बाद उसकी भाभी घर से आई।.

यह कहानी सुनें.

ताराक्षी मैं हूं, पहचानने वालों के लिए। उम्र बीस के छठे दशक में है।

उत्तर प्रदेश में मेरा जन्म हुआ था।

लंबाई मेरी पांच फुट तीन इंच के आसपास होती है।

करीब एक साल पहले मैं 52 किलो का था।

मेरा फिगर 34B 30 34 है। ऐसा शरीर है मेरे पास जिसे देख छोटे से बुजुर्ग तक ध्यान खींच लेते हैं।

बाल कंधे छूते हैं, रंग साफ-सुथरा।

अगर कोई पूछे तो कहना पड़ेगा - मेरी शक्ल ऐसी है जैसे किसी मॉडल सी नज़र आती हूं।

अब मैं घर पर रहने लगी हूं। पढ़ाई खत्म हो गई है मेरी।

अभी तक कोई बेटी नहीं मिली मेरी।

घर से बाहर पढ़ाई करवाती हैं माँ, पापा का काम चल रहा है वो भी दूसरे शहर में।

शादी के बाद से मेरी एक दीदी का घर अलग हो गया है।

ज़िन्दगी के बारे में एक कहानी है जो मैं इस नए लड़की के ताज़ा अनुभव में साझा कर रही हूं।

गाँव की गलियों में मेरा बचपन बीता।

मेरा बचपन काफ़ी हंसी-ठिठोली से भरा रहा।

उम्र के उस पड़ाव पर पहुंचते-पहुंचते मेरा शरीर बदलने लगा।

बचपन में पढ़ाई के दौरान ही मेरी छातियाँ B साइज़ की हो चुकी थीं।

खुशकिस्मती से मेरे दोनों निप्पल काफी बड़े हैं, इस बात पर मुझे अच्छा लगता है।

चूत में भी बदलाव आया, धीरे-धीरे बढ़ोतरी हुई।

बस इतना ही था कि मेरी फांकों के किनारे एक-दूसरे से चिपके पड़े थे। वहीं ऊपर मेरी क्लिट आकार में काफी भारी दिख रही थी।

हाल में मुझे ये बात समझ आई कि जब मैं पैर फैलाकर बैठती, तो मेरी ग्रोइन में चिड़चिड़ नहीं होती थी। वहीं, दीदी के पैरों के बीच ऐसा अंतर दिखता था। कभी-कभी कजिन में भी यही फर्क नजर आया।

उस वक्त मैं जिससे सब कुछ बाँटता, वो नाम था मेरी दीदी का।

माँ भी हमसे प्यार से पेश आती, मगर दीदी का तो रिश्ता मेरे संग बहुत गहरा था।

उसके साथ में नींद आती थी, खाना किसी बातचीत के बीच में शुरू हो जाता। पढ़ाई के लिए रास्ते में गपशप चलती रहती। इस तरह की छोटी आदतें हर दिन बारी-बारी से घटित होतीं।

कभी-कभी साल में एक या दो बार डॉट घर आते हैं। कुछ दिन ठहरकर फिर चले जाते हैं।

वो सुबह-सुबह मंदिर जातीं, माथा टेकतीं, फिर भी घर का काम नहीं छोड़तीं। एक बेटी को पढ़ातीं, दूसरी के लिए खाना बनातीं, पल-पल देखभाल में लगी रहतीं।

उस समय हम दोनों बहनें थीं, जिन्हें वे लड़कियों के स्कूल में पढ़ाते रहे। कॉलेज तक भी उनका साथ बना रहा।

बड़ी होने लगी थी मैं, तभी दीदी ने समय आते पैड्स का इस्तेमाल, उंगलियों से छुआवन कैसे करना है, वो सब बताया।

उस दीदी के साथ कोई लड़का नहीं था, मगर वो बहुत आकर्षक थी। हर रात उठाई-बिछाई में एक या दो बार खुद को छूना ज़रूरी समझती थी।

कभी-कभी वो हमारी उस कजिन के साथ आगे बढ़ जाती, फिर दूसरी ओर अपनी पुरानी दोस्त के साथ भी कुछ महीने चलता।

हर बार जब वो कजिन या उसकी दोस्त घर आती, मुझे एक अलग कमरे में जगह मिलती। रातभर वो दोनों छुपकर ऐसा कुछ करतीं जिससे उनकी इच्छाएँ शांत होतीं।

जब माँ को सच्चाई का पता चला, तब भी उनके होंठों से एक शब्द नहीं निकला।

माँ ने तब दीदी की शादी उस इंजीनियर से कर दी, जब वह बीए में फेल हुई।

अब वह दीदी, जीजा के साथ नए देश में रहती है। उसके बच्चे भी वहीं पल रहे हैं।

शादी के बाद दीदी के, मैंने एक लड़कियों के कॉलेज से BA किया। पढ़ाई में इतना डूबी रही कि दिल्ली के एक अच्छे कॉलेज में MA में दाखिला मिल गया।

ख़ुशी से भरी मैं दिल्ली पहुँची थी।

बहुत अच्छा कॉलेज मिला था एक तरफ, वहाँ से दिल्ली का खुला माहौल भी नजर आता था।

अब रहने की जगह मिल चुकी है।

एक दिन मैंने साक्षी को अपना रूममेट पाया।

उसका घर भी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से नगर में था। वह किसी फ़िल्मी हीरोइन से कम नहीं लगती थी। मैं जितना आकर्षक हूँ, उससे कहीं आगे थी वो। उसका रंग-ढंग मेरे मुकाबले ज्यादा गहरा था।

महज कुछ रोज़ों में ही, हम दोनों के रिश्ते में गहरा भरोसा आ गया।

पढ़ाई के दिन शुरू हो चुके थे, हम दोनों इसमें खो गए।

थोड़े समय बाद, साक्षी की भाभी हॉस्टल पहुंची। मिलना था साक्षी से।

एक दिन साक्षी ने मुझे अपनी भाभी से मिलवाया। उनका नाम था नीलू। खैर, वो साक्षी से कहीं ज़्यादा आकर्षक लग रही थीं।

कुछ पल मैं सिर्फ भाभी की ओर घूरती रही।

इसके बाद मैंने भाभी को नमस्ते कहा, फिर दिल्ली के काम में उलझ गई।

चाय के दौरान भाभी ने मज़ाक में ताश की बात छेड़ी। प्लान अगले दिन के लिए तय हुआ, धीरे-धीरे बात आगे बढ़ी।

एक बार मैंने कह दिया, ताश का खेल मुझे समझ नहीं आया।.

थोड़ी देर बाद, साक्षी के साथ भाभी के लगातार कहने पर मैं हाँ कर बैठी।

मुझे ताश के कुछ हिस्से भाभी ने सिखाए, कुछ साक्षी ने। धीरे-धीरे मैं भी उनके साथ बैठकर चलने लगी।

खेलते समय भाभी ने कहा, "चलो, पोकर ऐसा खेलते हैं... कपड़े उतारने वाला।".

इसके बारे में मेरी समझ में कुछ नहीं आया था।.

अब साक्षी ने कहा, हारने वाले को धीरे-धीरे हर कपड़ा उतारना पड़ता है।

मैंने मना कर दिया, धीरे-धीरे खेल पसंद ही नहीं रहा था।.

लेकिन फिर साक्षी तथा भाभी ने मना करते-करते मुझे मना ही लिया।

कौन जाने क्यों, पर मैं भाभी की बातों पर विश्वास कर बैठी।

अक्सर मैं साक्षी के सामने कपड़े बदलते हुए निर्वस्त्र हो जाती, इसलिए उसके आगे ऐसा करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं थी। उधर, वो भी मेरे सामने बिना कपड़ों के रहने में कोई झिझक महसूस नहीं करती थी।

शुरुआत में खेल आस्तिकता से चलने लगा।

खेल में मेरी पकड़ कमजोर थी, इसलिए पहले दौर में हार गई।

कमीज निकालना ही पड़ा मेरे सामने।

भाभी के सामने मुझे अचानक झेंप महसूस होने लगी।

दूसरे चक्कर में साक्षी आगे बढ़ी, मदद करने के लिए। भाभी ने कहा, तुम ऐसे ही करते रहो।

इस बार हारना साक्षी ने अपनी मर्ज़ी से चुना।

गिरते हुए वो कमीज उधेड़कर पटक बैठा।

अगले चरण में साक्षी ने दोबारा मदद की, इस बार खुद को हारते दिखाया।

बार इस पर उसने शलवार नीचे उतारकर किनारे धर दी।

साक्षी के ऊपर सिर्फ ब्रा और अंडरवियर था, मेरे शरीर पर कोई शर्ट नहीं थी।

अगले दौर में साक्षी का साथ खत्म हुआ, तबसे मैं धीरे-धीरे अकेली पड़ती गई।

कुछ दौर बाद मैंने सब कपड़े उतार लिए थे। साक्षी के पास सिर्फ ब्रा और अंडरवियर बचा था। जबकि भाभी पर एक तहमत भी नहीं छोड़ा गया था, मतलब वो हर दौर जीत चुकी थी।

एकदम अचानक भाभी ने कहा - जब तुम दोनों मिलकर भी मुझे एक राउंड में नहीं हरा सकते, तो फिर रातभर मेरे लिए काम करना पड़ेगा।!

साक्षी ने जवाब दिया, मैं मना करने ही वाली थी।

धीरे-धीरे मेरी नज़रें ही उसकी बात का जवाब देने लगीं।.

फिर उसने पूछा - कहीं घबरा तो नहीं गई?

फिर भी मुझे यह बात मानने में दिक्कत हो रही थी।?

उस वक्त मेरा जवाब भी सिर्फ हाँ था।

सुबह तक हर बात माननी पड़ेगी, ऐसा भाभी ने कहा। अगर ये ठीक लगता है तो खेल जारी रहेगा। वरना वापसी होगी कार में बैठकर।

एक-दूसरे की नज़रों में झलकता इशारा समझ आया, भाभी की सुबह होने तक गुलामी स्वीकार कर ली।

दोनों को पहनना पड़ा शॉर्ट स्कर्ट और ऊपर का कपड़ा, भाभी ने जो कहा था।

मैंने आसमानी ब्रा पहनी थी, इसके साथ एक हल्की नीली पैंटी भी। ऊपर की तरफ़ नीले रंग का जींस वाला टॉप था। नीचे, घुटनों तक पहुँचती स्कर्ट पहनी हुई थी, जो भी जींस की बनी थी।

उधर, साक्षी के ऊपर भी वही तरह का लिबास था।

बाथरूम से निकलते हुए भाभी ने नहा लिया। साड़ी के जगह पहन ली एक नीली सलवार सूट। घर के बाहर आ गईं तो दिखीं बिल्कुल बदली हुई।

बाहर निकलने के लिए तैयार हो गई वह, फिर हम सभी तीन धीरे-धीरे नीचे आए। कार में बैठकर सीधे रेस्टोरेंट की ओर चल पड़े हम।

तभी रास्ते में एक दुकान के बाहर ठिठक गए, फिर आगे बढ़े और एक ऐसी जगह पर जा पहुंचे जहां का खाना सबने मिलकर चखा।

अचानक भाभी ने पहले से सोचा हुआ मगर चुपचाप रखा इशारा बनाते हुए आइसक्री मंगवा ली।

तभी, भोजन करने के तुरंत बाद मेरे पेट में झटका सा लगा।

उठकर बाथरूम की ओर बढ़ते हुए मैंने देखा, भाभी ने सवाल किया - कोई बात?

मैंने कहा - सुसु में ज़ोर है।!

तभी भाभी ने कहा - चलो ताराक्षी, अब मैं तुम्हें टॉयलेट ले चलती हूँ। वरना ये चेयर गंदी हो जाएगी।!

रेस्तरान में मौजूद हर शख्स ने ध्यान दिया, जब भाभी ने आवाज़ इतनी ऊंची कर दी।

खाना खाते हुए महिला की ओर देखकर भाभी बोली - अफ्रा! इस लड़की को किडनी में पत्थर हो गया है। पेशाब संभाल नहीं पा रही है। अभी घसीट के ले चलूंगी, वरना यहीं पीछे कर देगी!

खड़े होकर इतने सारे आदमियों के बीच, मैं शर्म से डूब गई। भाभी के शब्द चुभ रहे थे।

अब साक्षी को भाभी के हर क़दम का पता चल चुका था, धीरे-धीरे उसके चेहरे पर मुस्कान आने लगी।

हथेलियों को समेटते हुए वो मेरा हाथ थामे बाथरूम की तरफ खिसक गई।

बाथरूम में सिर्फ़ हम दोनों वहाँ खड़े थे, किस्मत का खेल था शायद।

एक बार पड़ोसन ने मुझसे कमरखास लेने की इच्छा जताई।

जब मैंने इनकार किया, तो भाभी की नज़रें गुस्से से भर उठीं।

भाभी को मौका मिलते ही मैंने आहिस्ता से अपनी पैंट नीचे की।

पेशाब का झटका इतना तेज था कि शर्मिंदगी कुछ कम नहीं लगी।

जब मैं बाथरूम के स्टाल की ओर बढ़ी, तभी भाभी ने रास्ता रोक लिया। उन्होंने कहा - ताराक्षी, पेशाब आ रही है तो ठीक है, बस इधर बाहर ही कर लेना। अंदर वाले कमरों में जाने की छूट नहीं है।!

मेरा पेट तो फटने ही वाला था। भाभी से मैंने कहा, छोड़ दो न… बस, अब और नहीं संभल रहा। कृपया करके जाने दो।!

फिर भी उसने हाँ नहीं कहा।

उसने कहा - अगर पेशाब आ रही है तो बाहर ही कर लेना, वरना मैं तुझे अभी हॉस्टल छोड़ देती हूं।!

इस कदर तेज़ पेशाब आई कि गुस्सा आ गया। भाभी की ओर घूरकर मैंने दोनों हाथों से स्कर्ट पकड़ ली। फिर उसकी नज़रों में झांकते हुए अपनी चड्डी धीमे से नीचे खिसका दिया।

उस दिन, मेरी शैतानी सीधे उन आँखों के सामने खड़ी थी जो हमेशा चुपचाप झाड़ियों के पीछे से देखती रहती थीं।.

थोड़ी सी खिंची हुई मुस्कान उनके चेहरे पर तैर रही थी।

आंखें बंद करके मैंने धीमे से मुस्कुरा दियa, जब भाभी की ओर ताक रही थी।

अब मेरी चड्डी नीचे सरक कर घुटनों तक पहुँच गई थी।

हवा में जैसे कुछ सुनसान सा लगा, तभी मैंने धीरे से स्कर्ट को हथेलियों पर उठा लिया। आँखें झपक गईं, शरीर खुद-ब-खुद नीचे की ओर ढलने लगा। फिर बिना किसी ठोकर के, घुटने जमीन से छू गए।

अचानक, मैं धीमे पैरों से उसकी बुर भाभी के पास पहुँच गया।

नीचे जब मैं हिंदुस्तानी अंदाज़ में बैठ गई, तो मेरी चोटी की दोनों लटें खुलकर भाभी के सामने आ गई।

वो धीमे से हँसती हुई मेरे चेहरे की ओर टकटकी लगाए बैठी थी।

एक लंबी सांस के बाद मैंने पेशाब छोड़ दी।

जैसे ही मूत्र-द्वार खुला, पेशाब धीरे से बहने लगी। आँखें बंद किए, बिना कोई आवाज़ किए, मैंने पेशाब छोड़ दी।

एकदम अचानक, मन लगा कि जैसे कहीं ऊपर, सिर्फ़ स्वर्ग में पहुँच चुकी हूँ।

इतना सुकून मिल रहा था पेशाब करते वक्त कि जैसे सब कुछ भूल गया हो।

पेशाब करते-करते एकदम सब कुछ ठहर सा गया था मेरे अंदर।

उड़ान भरते हुए मैं आसमान के बीच थी।

कभी मैं स्वर्ग में थी। तभी बाथरूम का दरवाज़ा टूटने लगा। अचानक तीन औरतें भीतर घुसी।

उन तीनों को हैरान कर दिया मेरा स्टाल्स के बाहर पेशाब करना।

थोड़ी देर बाद भाभी ने आवाज कम करके कहा - उस गरीब को किडनी की तकलीफ है। पेशाब में तकलीफ झेलती है वो, फिर जब निकल जाता है तो राहत मिलती है उसे!

एक-एक कर सभी तीनों महिला ने मुझसे दुख के पल में साथ दिया।

एक समय के बाद मेरी पेशाब कमजोर पड़ने लगी।

एक कदम में ही नहीं, पर समय के साथ आसमान से ज़मीन पर उतर चुकी थी मैं।

उस पल मेरी नज़र जब उन तीन महिलाओं पर पड़ी, मैं समय की चट्टान पर अटक गई।

क्या करना चाहिए, इस बात का अंदाज़ा ही नहीं लग पा रहा था मुझे।?

थोड़ा-थोड़ा करके पेशाब टपकता जा रहा था, मेरी तबीयत खराब थी।

कभी कभी पेशाब आना बंद हो जाता है।

स्कर्ट को कमर पर समेटे, मैं वहीं बैठी थी। भाभी नज़रों में आईं, तीन और औरतें भी साथ थीं। झाड़ू जैसा बुरा खोल लिए हुए वो।

जब मैं ऐसे ही दो मिनट तक बैठी रही, तभी भाभी आगे आई। उसके हाथ मेरी चड्डी की ओर बढ़ने लगे।

हर कदम पर मैंने धीरे से पैर उठाया, फिर भाभी की चड्ड़ी नीचे लाने में हाथ बटाया।

चड्डी उतारकर भाभी ने मेरी बुर को साफ किया, अपनी जगह पर खड़ा होने दिया।

उसके बाद वो मेरी स्कर्ट नीचे खींचने लगी। इसके तुरंत बाद मुझे बाथरूम के बाहर ले गई।

सब कुछ ऐसे चल रहा था, मानो जैसे दिमाग़ ख़त्म हो गया हो। मैं सिर्फ आगे बढ़ पा रही थी, जैसे कोई ऑटोमेटेड यंत्र होऊँ।

उल्टा मैं भी वही कर रही थी, जो भाभी मेरे से करवा रही थी।

साक्षी के साथ टेबल पर जगह ले ली मैंने, भाभी के साथ आकर।

सब कुछ धीमा हो गया था, मेरे अंदर की आवाजें बंद हो चुकी थीं।

अचानक से वेटर वापस पहुँचा, हाथ में आइसक्रीम का ऑर्डर लिए।

जैसे ही उसने आइसक्रीम टेबल पर रखी, भाभी ने मेरी गीली नीली चड्डी, जिसमें पेशाब थी, उसकी प्लेट में डाल दी। फिर बोली - बाहर फेंक आओ।

चाय की दुकान पर वेटर ने मेरी गंदी अंडरवियर उठा ली। आँखें फैली हुई थीं उसकी, मैं और भाभी को घूरता रहा। बाद में वो कपड़ा सभी के सामने लहराता हुआ चला गया।

गहराती शर्म के सागर में मैं लड़खड़ा रही थी।

आँखों से पानी का बहना शुरू हो गया था मेरे।

सारी मेज़ के नीचे मेरा सिर झुका हुआ था।

हथेलियाँ साक्षी की मेरी जांघ पर आकर टिक गईं, डगमगाती सांसें धीरे-धीरे संभलने लगीं।

थोड़ा समय बाद, मेरी हालत काफी सामान्य हो गई थी।

उधर, आइसक्रीम का अंत हो चुका था।.

बाहर आते ही भाभी ने पीछे की सीट पर जगह दी।

भाभी गाड़ी संभाले हुए थीं, मैं साक्षी के साथ मौन बनकर बैठी रही।

अब शाम का अंधेरा छा गया था, फिर भी पूरी दिल्ली में बत्तियाँ टिमटिमा रही थीं।

कमरे में अचानक एक धीमी आवाज़ आई, भाभी ने स्विच दबाया था। फिर गाने की लय बदल गई, ऐसे में एक हल्का सा झूमना शुरू हो गया।

“अब तभी से मस्ती पकड़ेगी, मेरे छोटे भाई-बहन,” भाभी ने कहा, शीशे में हमारी ओर झाँकते हुए।

फिर हम वो तय किया कि हॉस्टल नहीं, सीधे भाभी के घर जाएंगे।

एक आलीशान फ्लैट में वो अकेले रहती थीं, पति के बाहर देश होने की वजह से।

जैसे ही अंदर कदम रखा, भाभी ने मुड़कर लाइट्स कम कर दीं। फिर सोफे पर बैठने को कहा।

“अब स्ट्रिप करो, दोनों! पूरी तरह!” भाभी ने ऑर्डर दिया।

साक्षी ने कोई झिझक महसूस नहीं की, सीधे अपनी ब्रा उतार ली। फिर पैंटी भी धीरे से नीचे कर दी।

डर के मारे मैंने स्कर्ट और टॉप उतार लिए, हालाँकि पहले झिझक थी।

अब हम दोनों कुछ भी नहीं पहने हुए थे।

साड़ी को धीरे से पलंग पर रखकर वह सिर्फ एक नेट वाली ब्रा और फ्रॉक में दिखीं।

शरीर पर एक सिहरन-सी दौड़ रही थी, मानो कुछ और ही हो रहा हो।

गहरी सांस लेकर भाभी ने शीशी आगे बढ़ा दी। तीनों गिलास में धीमे हलचल के साथ लाल रंग उतरा। "इधर ले," उनकी आवाज़ खिड़की के पर्दे की तरह हल्की सी झूली, "थोड़ा सुकून महसूस करो।"

हमने पी।

जैसे-तैसे वाइन ने सिर चढ़ाया, तो हवा में उमस सी फैल गई।

साक्षी के कमरे से बाहर निकलते ही भाभी ने आवाज़ दी। फिर वह धीरे से उसके पास आई। एक पल में ही उनके होंठ उसके चेहरे पर थे।

उसके होंठों पर साक्षी के होंठ भी ऐसे ही आए।

वो पल मेरी नज़रों से जुड़ा रह गया।

फिर भाभी ने मुझे बुलाया, “आओ ताराक्षी, अपनी मालकिन को खुश करो!”

वो जगह मैं खुद चलकर पहुँची।

उसकी भाभी ने उसके निप्पल्स पर चुटकी ली, फिर हथेली सरका दी उसकी ताज़ा लड़की वाली जगह पर। "इतनी टाइट है तेरी चूत," वो बोली, "आज रात मैं इसे खोल दूँगी।"

पीछे से कदम रखते हुए साक्षी ने मेरी छाती पर हाथ डाल दिया।

तीनों को बिस्तर पर जाकर गिरना पड़ा।

साक्षी की चूत में भाभी ने वाइब्रेटर धकेल दिया, फिर उसे चालू कर दिया।

साक्षी चीखने लगी, “आह भाभी! और जोर से!”

तब वो पल मेरे लिए आया।

कमरे में सन्नाटा था। उसकी उंगलियों ने धीमे से आइटम को सहलाया। बटन दबते ही कंपन शुरू हुआ। मेरी त्वचा पर गर्माहट फैल गई।

मैं तड़प उठी, “ओह गॉड! भाभी, मैं मर जाऊंगी!”

हम दोनों की नींद पूरी रात जागती रही।

एक शाम को भाभी ने हमें साथ में उलझा दिया। वह चुपचाप आई, फिर धीरे-धीरे सब बदल गया। उसने मेरी तरफ इशारा किया, मैं तुम्हारे पास झुक गया। घंटों तक ऐसे ही चलता रहा। कभी वो तुम्हारे अंदर उंगली डालती, तो कभी मेरे होठ तुम्हारे पास जाते। बीच में वो खुद भी टूट जाती, अपनी जीभ तुम दोनों में घुमा देती। कोई कुछ कहता नहीं था, फिर भी सब कुछ हो रहा था।

पहली बार मुझे चूत चखने का मौका मिला – साक्षी की थी, उसके बाद भाभी की आई।

मुझे उनका स्वाद कुछ मीठा-सा ज़च हुआ।

थकान भरी आँखें बंद हुईं, सुबह के आगमन तक।

भाभी ने कहा, “ये सिर्फ शुरुआत है, ताराक्षी। अब तुम मेरी परमानेंट स्लेव हो!”

उस रोज़ के बाद हॉस्टल वापसी पर मेरा सब कुछ अलग हो चुका था।

साक्षी और मैं अब हर रात एक-दूसरे को छूतीं, फिंगरिंग करतीं।

हर शनिवार को भाभी घर आतीं। फिर कुछ ऐसा सिखातीं जिसके बारे में हमें पहले कभी नहीं पता था। बॉन्डेज के बारे में बताया, धीरे-धीरे समझाया। कभी स्पैंकिंग की बात छेड़तीं, तो कभी लोगों के बीच दिखने की चर्चा शुरू कर देतीं।

फिर से घर आई MA खत्म करके, पर वो पल अब मेरे भीतर रहने लगे।

घर पर रहकर अब मैं अपनी हवस संभालती हूं, हालाँकि दिल्ली कभी-कभी जाती हूं साक्षी या फिर भाभी से मिलने।

शादी?

अब तो ऐसा लगता है, मेरी शरीर और ख्वाहिशें सिर्फ मेरी हैं, किसी दूसरे की नज़र से नहीं।

इस नई लड़की की ताज़ा पुसी कहानी आपको कैसी लगी?

ई-मेल के ज़रिए सकारात्मक प्रतिक्रिया भेजी जा सकती है।

धन्यवाद.

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0