देवर अंकित ने भाभी की चूत और गांड दोनों फाड़ी

Desisexkahaniya

Jan 3, 2026 - 17:15
Jan 9, 2026 - 17:12
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देवर अंकित ने भाभी की चूत और गांड दोनों फाड़ी

(पति के बाहर होने पर देवर ने पहले चूत चाटी, फिर गांड में लंड पेला)


प्रिया मेरा नाम है। आत्मविश्वास रखने वाली एक साधारण महिला हूँ मैं। शादी को तीन साल बीत गए हैं। फौज में पति की नौकरी, इसलिए घर पर अक्सर नहीं रहते वो। घर में सास-ससुर के साथ देवर भी रहता है, जिसका नाम अंकित है। उम्र में सबसे छोटा वो, हमेशा चहलकदमी करता रहता है। शुरू में लगा, बस एक बच्चा है। अब धीरे-धीरे उसकी नजरों में बदलाव दिखने लगा है।

जब अंकित मेरी ओर देखता है, ऐसा लगता है मानो उसकी नजरों का रुख बदल गया है। पहले जहाँ वो मुझे भाभी समझता था, अब उसकी निगाहों में एक अलग सवाल है।

एक दिन की बात है, मैं बरामदे में टिकी हुई थी। तभी घर के अंदर फोन बज उठा। जैसे ही मैं उठकर चली, साड़ी का पल्लू ढीला पड़ गया। आवाज सुनकर अंकित भीतर से आया। मेरी ओर देखते ही उसकी नजर ठहर गई। छाती पर उतरती दृष्टि ने सब कुछ बदल दिया। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी तनाव छा गई। मैं समझ चुकी थी, वो अब लड़का नहीं था। आंखों में भाव आग की तरह धधक रहे थे।

 

क्यों मैं चुप रही उस दिन, समझ नहीं पाई। हो सकता है, वो परिवार में से था, जिससे कुछ लगता था। शायद मेरे भीतर भी एक अजीब तरह का सनसनी छाई हुई थी। उसकी खड़ी गाँठ देखकर मेरा दिल घबरा उठा, मचल उठा।

थोड़े समय बाद, महसूस हुआ कि भीतर कुछ डगमगा रहा था।

अगले दिन के बाद अंकित का व्यवहार और भी ज्यादा बदलने लगा। कोई न कोई ऐसी हरकत वो घटिया सी बार-बार करता, जिससे मुझे एहसास हो जाता कि उसका ध्यान सिर्फ मेरी चूत और छाती पर है। कभी मेरे पास बैठ जाता, खुद को इधर-उधर ढकते हुए। कभी रसोई में जानबूझकar मेरे से टकरा जाता, ठहराव भरी नजरों से देखता।

फिर भी मैंने यह खेल जारी रखा।

अचानक वो रसोई में घुसा, जब घर में महफिल थी। मैं अकेले ही बर्तनों के बीच भाप उठते देख रही थी। उसने ड्रामा किया, ऐसे झपका जैसे फिसलने वाला हो। करीब आकर उसने कंधे पर हाथ रखा। उंगलियां धीमे-धीमे छाती तक खिसक गईं। मैं सिर्फ सांस रोके रह गई।

क्या कोई चोट तो नहीं आई? मैंने बाहर से ढीले अंदाज में पूछ लिया, भीतर खौफ धड़क रहा था।

उसके स्पर्श में कहीं खोया हुआ सन्नाटा छिपा था।

कुछ दिन सब हल्का-फुल्का चला, पर मैं समझ गई थी - अंकित किसी छोटी सी खामी का इंतज़ार कर रहा है ताकि फिर से पास घुस आए।

एक दिन अचानक इनवर्टर की बैटरी खत्म हो गई। घर में गर्मी बढ़ गई तो मैं छत पर चली गई, सोने के लिए। ऊपर अंकित पहले से ही लेटा हुआ था। उसके पास मम्मी और बहन भी थीं, तो मुझे कुछ अजीब नहीं लगा।

अँधियारे ने चारों ओर पैर फैला लिए थे, सभी की आँखें बंद। मेरे पेट पर हथेली की गर्मी उतर आई - अंकित की। मैंने खुद को ढीला छोड़ दिया, जवाब नहीं दिया।

उसकी उँगलियों का दबाव मेरी चूचियों पर पड़ते ही मेरे मुँह से एक सीटी-सी सीख निकल पड़ी, फिर भी शब्द कहीं अटक गए।

हल्की सिहरन उठी, जैसे ही अंकित के हाथों ने चूचियों पर दबाव डाला। आंखें बंद थीं, इरादतन। फिर भी सांसें तेज, धड़कनों से आगे बढ़ गईं। छुआवट में झुकाव था, नाजुकता के साथ-साथ एक खींच भी।

शांत रहने पर मैंने जाना, वह बढ़कर आगे बढ़ा। होंठ गाल के पास तक आए, फिर धीरे से छुआ मेरे होंठ।

फिर अचानक आँख खुल गई मेरी।

अंकित के हाथ पसीने से तर हो गए, वह आँखें बंद करके लेट गया। डर उसके माथे पर झुर्रियों में छुपा था। मैं खड़ी रही, नजर उसके चेहरे से नहीं हटी। कभी वह बच्चा-सा लगा, कभी कोई अजनबी जो अपनी आँखों में धुंध लिए घूर रहा था।

उठकर मैं पास के झाड़ में पेशाब करने चली गई। साड़ी ऊपर उठाई, मूत्र छोड़ा, तभी नजर पड़ी कि अंकित अभी भी घूर रहा है। आखों में इच्छा थी, चेहरे पर कुछ और भी था।

लौटकर बिस्तर पर लेटते हुए, मेरी नज़र पड़ी कि अंकित की चटाई धीरे से मेरी तरफ बढ़ गई है।

अब समझ में आया – हारने के लिए तैयार वो कभी नहीं था।

थोड़ी देर बाद, मुझे एहसास हुआ कि वो फिर से मेरी जांघ पर हाथ फेर रहा था। उसकी उंगलियां आगे बढ़ते हुए साड़ी के किनारे को धीमेपन से ऊपर खींचने लगीं। इस बात का अंदाजा मुझे पहले ही था - उसे रोकने से कुछ नहीं बदलने वाला था।

फिर उसने मेरी चूची पर हाथ डाला, धीमे-धीमे दबाव बढ़ाने लगा। सांसें अब और तेज चलने लगीं। मेरे होंठों से एक कराह छूट गई –

“आह… अंकित…”

वो मेरी सांसों की गर्माहट पकड़ लेता है। कान के पास झुककर धीमे से बोलता है।

“भाभी… मुझे आपकी चूचियां पीनी हैं। आप जाग रही हैं ना?”

 

शांत रहा मैं। कोई हाँ नहीं कही, कोई ना भी नहीं बोली।

खामोशी के बिना कुछ कहे, मैंने हाँ कर दी।

हिम्मत जुटाकर अंकित ने मेरा ब्लाउज खोलने की कोशिश की। मैंने आहिस्ता से उसके हाथ की उंगलियां पकड़ लीं, फिर बोली –

“अभी नहीं… कल पी लेना।”

मुस्कान उसके चेहरे से ओझल हो गई, पर मैं समझ चुकी थी - इस आग का अंत नहीं होने वाला था।

अंकित ने मुझे अपने पास खींच लिया, फिर धीरे से मेरे होंठों को छू लिया। उसके स्पर्श में कुछ ऐसा था, जो महीनों से मेरे अंदर गायब था। मेरे पति के बिना, मैं भी एक तरह से बिखरी हुई थी।

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उसके सिर पर हाथ फेरा मैंने, धीरे से करीब खींच लिया।

उसका हाथ जब मेरी पेटिके के अंदर सरका, मेरी सांसें तेज़ हो गईं। उंगलियां नीचे आकर ठहर गईं, मैंने आवाज़ सुनी - धीमी, लड़खड़ाती।

“अपना लंड निकालो।”

मुस्कान उसके चेहरे पर आई, फिर वह बोला।

“आप ही निकाल दो, भाभी।”

उसकी बातों में कुछ हल्का सा पनप रहा था, मानो बचपन की याद आ गई हो।

उसके अंदर हाथ डालते ही मैंने धीमे-धीमे छेड़ना शुरू किया। एक बार पकड़ते ही, वह सीधा खड़ा हो गया। त्वचा के नीचे की गर्मी मेरी उंगलियों तक पहुँच रही थी।

 

मैंने धीरे से पेंटी उतारी, फिर अंकित के ऊपर आकर लेट गई। वह मेरी साड़ी को हल्का सा ऊपर खींचा, अब उसका लंड मेरी चूत पर घिसने लगा।

मेरी गुदा कई महीनों से खाली पड़ी थी। धीरे-धीरे जब वो लंड अंदर घुसा, तो झनझनाहट सी महसूस हुई। फिर वही झनझनाहट किसी डूबने जैसी खुशी में बदल गई।

आँखों में अंकित के सारा होश गायब था।

वह धीमे से मेरी चूत में अपना लंड डालने लगा। हर बार जब वो आगे बढ़ता, मैं सिसकने लगती।

“आह… अंकित… धीरे…”

अंकित के भीतर जोश उफान पर था। उसकी गर्मी मेरे अंदर धीमे-धीमे बहने लगी। मैं उसके सारे दबाव में आ चुकी थी, खुद को सौपे बिना कोई रास्ता नज़र नहीं आया।

 

हर बार जब वह आगे बढ़ता, मैं लड़खड़ा उठता।

लगभग दस मिनट तक वह मेरे अंदर धकेलता रहा, फिर उसने मेरी चूत में ही सब कुछ छोड़ दिया।

ख़ुश थी मैं भी।

पोस्ट हवाओं के बाद मैं धीरे से नीचे आई, पेंटी उठाकर पहनने लगी। अचानक पीछे से कदम की आहट, फिर अंकित की भुजाएँ मेरे कंधों पर, मजबूत गले लगाव में कस गई।

उसने आहिस्ता से कहा, मेरे कान के पास।

“भाभी, अगली बार आपकी गांड मारूंगा।”

 

मुझे हल्की सी मुस्कान आई। फिर मैंने शांत स्वर में बोलना शुरू किया।

“पहले मेरी चूत को अच्छे से चूसना सीखो, फिर गांड की बात करना।”

अगले दिन सुबह को, जैसे ही मैं रसोई में पहुँची, अंकित पीछे से आकर मेरे कमर पर हाथ चलाने लगा।

“भाभी, आज आपकी गांड पेलूंगा।”।

हाँ कहते हुए मेरे होठों पर एक मुस्कान थी।

“ठीक है… लेकिन मम्मी और दीदी को पता न चले।”

 

सुबह वो किचन में आ गया। पीछे से कमर पकड़ ली मेरी, और एक सरसराहट सी दिमाग में भाग गई। उंगलियां धीरे से नीचे फिसलने लगीं। हटाने की कोशिश की मैंने, पर ज़ोर नहीं डाला।

अंकित... किसी की नज़र पड़ जाएगी। मैंने बहुत धीरे-धीरे ये शब्द कहे।

उसकी हंसी के साथ धीमी आवाज़ निकली –

“भाभी, अब आप मेरी हैं। जब मन करेगा, तब चोदूंगा।”

अंदर तक कॉपी हो गया मेरा सारा बवाल, ऐसे शब्दों से भरा था वो एलान।

खाना बनाते समय मैंने उसकी ओर देखा, उधर वह मेरे शरीर पर टिकी नजर से घूर रहा था। हर जगह उसकी निगाहें फिसल रही थीं, खासकर छाती और पिछवाड़े पर। मैंने आगे बढ़ते हुए कमर को हल्के से झुकाया, ऐसा करने पर वह और बेचैन हो गया।

अब तो मैं इस खेल को जीते जाने लगा था।

 

दोपहर के समय मम्मी झपकी लगा रही थीं, वहीं दीदी अपने कमरे में बैठी थी। तभी अचानक अंकित मेरे कमरे में घुस आया। कपड़े ठीक करते हुए मैं अलमारी के पास खड़ी थी।

दरवाज़े के पास खड़ा था वो… आवाज सुनकर मैं मुड़ी, और फिर देखा - उसकी आंखों में वही पुरानी भूख झलक रही थी।

मैं मुस्कुराया, फिर बोला - तुझे क्या हुआ?

पीठ के पीछे से हल्के से खिंचाव महसूस हुआ। अंकित के हाथ कमर पर आए। जोड़तोड़ बंद, वह सटकर खड़ा था।

“भाभी, कल रात आपने कहा था कि चूत चूसूंगा… तो आज मौका दीजिए।”

थोड़ा सा झटका देकर मैंने कहा,

“नहीं, पहले अपनी बहन को निहारना छोड़ दो।”

लालिमा उसके गाल पर फैल गई।

“भाभी… वो बस यूं ही…”

“अच्छा?” मैंने उसके गाल थपथपाते हुए कहा, “अब मैं तुम्हारी हूं, लेकिन उसकी तरफ आंख उठाकर भी देखा तो…”

मैंने साफ़ मना कर दिया, "भाभी, ऐसा नहीं होगा," वहीं उसके हाथ मेरे ब्लाउज पर चढ़ गए।

अब तो उसकी बेचैनी ही मेरे मज़े की वजह बन गई थी।

मैंने उसकी सहायता की, फिर धीरे से ब्लाउज उतार दिया। मेरे स्तन सीधे उसकी ओर थे। वह आगे बढ़ा, मुंह में ले लिया एक को। जब उसकी जीभ निपल पर घूमने लगी, मेरे मुंह से छोटी सी ध्वनि निकल पड़ी।

“अंकित… जोर से चूसो…”

उसने पहली चूची को मुँह में लिया, फिर धीमे से दूसरी की ओर बढ़ गया। मैंने हथेली से उसके बालों पर हल्का स्पर्श किया।

थोड़ी देर के बाद, मैंने उसे पलंग पर घसीटा और ऊपर चढ़ गई।

“आज तुम्हें पूरी तरह से चूसने दूंगी, लेकिन बदले में तुम्हें मेरी चूत को भी अच्छा से चोदना होगा।”

उसके होठों से एक सिसकी-सी आवाज़ निकली - फिर वो बोला, "अभी कुछ सेकंड में पूरा करता हूं।" इतना कहते ही उसके हाथ मेरी पेंटी के किनारों पर थम गए, धीरे से नीचे की ओर खींचे बिना रुके।

लंड बिल्कुल सीधा हो चुका था। पेंटी नीचे करते हुए मैंने चूत को उसके होठों के पास धकेल दिया।

जीभ चलाओ… मैंने कहा।

बिना रुके अंकित ने मेरी चूत में जीभ घुसा दी। महीनों के भूखे की तरह वो हर जगह चाटने लगा। उसकी जीभ अंदर तक पहुँच रही थी, हर कोना छू रही थी। फिर सिसकियां आने लगीं, और ध्वनि दीवारों से टकराकर लौटने लगी।

“आह… अंकित… और अंदर डालो जीभ… हां, वहीं…”

थोड़ी देर वो मेरी चूत चाटता रहा। उसके बाद मैंने उसे खींचकर ऊपर बिठाया, बिस्तर पर गिराया, और उसका लंड पूरा मुंह में ले लिया।

मैंने उसकी सिसकियों को अपना लिया।

“भाभी… आपका मुंह बहुत गर्म है… आह…”

उसका लंड मैंने पूरा चूस लिया, इसके बाद वो मेरे नीचे हो गया।

“अब मैं तुम्हें अपनी चूत में लूंगी।”

उसकी आँखों में झांकते हुए मैंने धीरे से उसका लंड अपनी चूत में उतारना शुरू किया। वो मोटापा मेरे भीतर के हर कोने को छू रहा था।

“आह… अंकित… तुम्हारा लंड बहुत मोटा है…”

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“भाभी, आपकी चूत बहुत गर्म है…”

तब तक हमारा पूरा शरीर नम हो गया था।

मैं तेजी से ऊपर-नीचे हिलने लगी। जैसे ही मैं नीचे आती, वह पूरा भीतर चला जाता।

लगभग पंद्रह मिनट तक सेक्स करने के बाद अंकित ने मेरी ओर देखकर कहा -

“भाभी… अब मैं झड़ने वाला हूं!”

मैंने कहा, "छोड़ दो सब... मेरे भीतर ही छोड़ दो," फिर मैंने गति पकड़ ली।

उसकी गर्मी मेरे भीतर फैल चुकी थी, तभी हम दोनों बिस्तर पर ढह गए।

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मैं संतुष्ट थी।

हथेलियों के बीच उनकी उँगलियाँ फिसलती रहीं, धीमे स्वर में आवाज़ आई।

“भाभी, अब आपकी गांड कब मारूं?”

आँखें उसकी ओर घूमीं, मुस्कान छोटी सी फैली।

“जब तुम और मजबूत हो जाओगे, तब… अभी चूत से ही संतुष्ट रहो!”

खिलखिलाहट छा गई, मैं भी साथ दे दिया।

उस दिन के बाद सब कुछ हलचल में था। मेरे अंदर की गर्माहट अंकित ने छोड़ी थी, धीरे-धीरे वह तेज होती जा रही थी। जब भी वह पास आता, उसकी नजरों में झलकती बेचैनी और शरारत मेरे ढबढबे पर फिड़फिड़ा जाती।

 

मुझे एहसास होने लगा था कि मैं सिर्फ भाभी नहीं रह गई थी, बल्कि उसके दिल पर छा गई थी।

उस दिन वह जब मेरे क़रीब आया, मुझे उसके चेहरे पर कुछ अजीब तनाव नज़र आया।

बालों को हल्के से छूते हुए मैं बोला, "क्या चल रहा है, अंकित?"

थोड़ी देर को खामोशी छा गई। आखिरकार उसने मुंह खोला –

“भाभी, आप मुझे दीदी को देखता हुआ मना करती हो, लेकिन वो भी बहुत सुंदर हैं। कभी-कभी मेरा मन होता है…”

गुस्सा मेरी नसों में आग की तरह फैल उठा।

बाजू पर हाथ डालकर मैंने अचानक कहा – "अंकित!"

“तुम मेरी हो चुके हो। अब तुम्हारी नजरें किसी और पर नहीं जानी चाहिए, चाहे वह प्रीति हो या कोई और।”

थोड़ी देर को उसका हौसला डगमगा गया।

“भाभी, मैं तो बस… माफ कर दो।”

 

उसके मुँह पर चुम्बन देते हुए मैं बोल पड़ा –

“अगर तुम्हारा मन कहीं और गया, तो मैं तुम्हारी चूत के दरवाजे बंद कर दूंगी।”

उसकी बात सुनते ही अंकित के हाथ मेरे छाती पर जम गए।

“नहीं भाभी, ऐसा कभी नहीं होगा। आप ही मेरी सबकुछ हो।”

मुझे उसकी बात सुनकर ऐसा लगा, जैसे कोई भारी बोझ हल्का हो गया हो।

थोड़े दिन बाद, मम्मी-दीदी बाजार चली गईं। घर सुनसान पड़ा था। कमरे में कपड़े बदलते हुए मैं अचानक अंकित को धीमे पैरों से अंदर आते देख लिया।

उसने कहा - "भाभी..." आवाज़ में वो लम्बी साँस थी, जैसे कई साल पुरानी याद तैर रही हो।

उसकी ओर नजर गड़ाए, मैंने धीरे से साड़ी का पल्ला ढीला छोड़ दिया।

उसकी तरफ मुड़कर मैंने पूछ लिया - तुम्हें किस चीज़ की ज़रूरत है?

 

“भाभी, आज आपकी गांड मारनी है। आपने वादा किया था।”

हल्के से मुस्कुरा दिए, जब वो बोला।

“ठीक है, लेकिन पहले तुम्हें मेरी चूत को फिर से चाटना होगा।”

आँखों में एकाएक चमक पैदा हो गई।

अचानक वो मेरे पास आ गया, फिर मुझे पलंग पर धकेल दिया। साड़ी और अंडरवियर नीचे उतारे, बाद में जीभ से मेरी चूत को छेड़ना शुरू कर दिया।

“आह… अंकित… यही… हां…”

मेरी टांगें अलग कर दीं, ताकि उसकी जीभ हर छोर तक जा सके। वो मेरी चूत चाट रहा था, मानो यही आखिरी बार हो।

पानी में लथपथ हो चुकी थी, इसलिए बोल दिया कि अब बस करो।

“अब मेरी गांड के लिए तैयार हो जाओ।”

हवा उसके फेफड़ों में तेजी से आने-जाने लगी।

 

उसके हाथ ने सीधे पैकेट खोला। मैंने जो कहा, वही हुआ।

मैं कमरे में बिस्तर पर घुटनों के बल था। पीछे की तरफ झुका हुआ था। मेरी गांड उसकी ओर खुली हुई थी।

“धीरे करना, अंकित। पहली बार है।”

उसने मेरी गांड पर तेल लगाया, फिर आहिस्ता से अपना लंड अंदर कर दिया।

“आह… अंकित… थोड़ा धीरे…”

दर्द उठता हर धक्के के साथ, फिर भी कहीं अंदर खुशी-सी छिपी थी।

“भाभी, आपकी गांड बहुत टाइट है…”

“हां… बस ऐसे ही… और अंदर…”

तेज़ हलचल के साथ वो आगे बढ़ा, मैं खुद को समेट न सकी। हर सांस के साथ कमरा भर गया मेरी छटपटाहट से।

“आह… अंकित… तुम्हारा लंड… मेरी गांड…”

लगभग पंद्रह मिनट तक वो मेरे साथ सेक्स करता रहा। जैसे ही उसने खत्म करने की बात की, मैंने उसे आगे जारी रखने के लिए कह दिया।

“झड़ जाओ, अंकित… मेरी गांड में ही…”

वह अपनी पूरी तपिश मेरे भीतर उंडेल गया।

 

थकान से लदकर हम दोनों बिस्तर पर जा गिरे। मैं उसकी छाती में सिमटती जा रही थी।

उस दिन के बाद हम दोनों एक-दूसरे के ज़्यादा करीब पहुँच गए। धीरे-धीरे अंकित मेरा सिर्फ देवर नहीं रह गया, वो मेरे लिए कुछ और भी बन गया। इतना कि हमारे बीच का रिश्ता अब महज़ उमंगों से आगे बढ़कर एक अजीब सी जुड़ाव की तरह हो गया।

मैंने तब उसकी ओर मुड़कर कहा,

“अंकित, अब तुम मेरी हो। जब चाहो, मेरी चूत और गांड तुम्हारी है। लेकिन मेरी एक शर्त है।”

उसने सवाल किया, "भाभी, बताओ?"

हमेशा तुम्हारा होना है। भले ही दुनिया उलट जाए।

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