गांड में लंड लेने व पेलने का नशा
एक भारतीय कम्यूनिस्ट ने अपने जीवन की बात सुनाई। घटना ऐसी थी कि धीरे-धीरे आदत इतनी गहरी हो गई। कभी-कभी लगा कि बचना मुश्किल है। फिर चलता रहा वही ढंग।.
कभी-कभी लोग पीने के चक्कर में फंस जाते हैं। शराब से कुछ का दिमाग खराब रहता है।.
कई बार शराब इतनी गहरी हो जाती है कि बिना घूंट के मन टिकता नहीं। किसी के लिए तो यह इतनी जरूरी हो जाती है कि खुद को भूलकर बस उसी पर टिक जाते हैं। सेहत डगमगाने लगे, फिर भी रुकते नहीं।.
बीमारियाँ शरीर पर हावी हो जाती हैं। संपत्ति कहीं खो जाती है।.
रिश्ते धीरे-धीरे खराब होने लगते हैं, यहाँ तक कि पुराने साथी भी दूर हटने लगते है ।.
फिर भी, उसके बिना गुज़ारा मुश्किल हो जाता है।.
जुआ खेलने में कई बार ऐसा हो जाता है।.
कभी-कभी पसीना बहाकर कमाया पैसा सट्टे में उड़ जाता है।.
पैसा घर से गायब होने लगता है, झगड़े की शुरुआत हो जाती है। गहने अचानक बाजार में दिखने लगते हैं, पत्नी के चेहरे पर सवाल उठ खड़े होते हैं।.
कई बार ऐसा होता है कि लोग अपने पुराने बर्तन भी दुकानदारों को बेच देते हैं।.
फिर भी वो आदत नहीं छूटती, मानो धीरे-धीरे ज़िन्दगी का हिस्सा बन गई हो।.
एक तरह का सवाल होता है, जब आदमी बस गांड मराने पर उतारू हो जाता है।
एक बार जब कोई इस भारतीय समलैंगिक अश्लील कथा में उलझ जाता है, छुटकारा पाना मुश्किल हो जाता है। यह कहानी ठीक इसी चीज़ पर आधारित है।.
गलतफहमी किसी आदमी की नहीं होती, सच्चाई तो ये है।.
कुछ पल के लिए सब कुछ सही लगता है, मगर बाद में सच्चाई सामने आ जाती है।.
इन दोस्तों के साथ अक्ल बिना लड़के ऐसे फंसते हैं कि गुलामी में जान छूट जाए।.
अब जल्दी से कोई और नौजवान मिल जाता है। फिर वो पुरानी आदत उसके सिर चढ़ा दी जाती है।.
एक बार जब वे नई चीज़ हाथ लगा लेते हैं, फिर पुराने दोस्त को धक्का देने में देर नहीं लगाते।.
एक लड़का जो पहले सुंदर था, अब कमर में दर्द के साथ धीमे-धीमे घूमता है।.
किसी के ऊपर लेटना काफी मजेदार होता है। उल्टा पड़े तुम, वो तुम पर सवार है।.
कभी-कभी हमारी पैंट खुद ही ढीली पड़ जाती है। कई मौकों पर वही बेल्ट खुल जाती है, पैंट गिर जाती है। इसके बाद अंडरवियर भी नीचे सरक जाता है। कुछ करने की जरूरत नहीं रहती।.
बिस्तर को जमीन पर फैलाकर, वही आदमी लड़के को उसपर लेटा देता है।.
एक लड़का लगातार मनाने की कोशिश करता रहता है। वह बार-बार अपनी इच्छा जताता है, बिना थमे।.
वो आदमी सुनता नहीं, बल्कि चिल्लाता है - "ओये, अबे तेजी से उल्टा हो!"
पैरों को फैलाने का संकेत देकर वह कहने लगता है।.
अक्सर वो तेल की छोटी बोतल अपने साथ ले आता है। फिर लंड पर धीरे से तेल फैलाता है। कभी-कभी गांड में भी उसे लगा देता है।.
एक तरफ गुदे में लोटा घसीटते हो और साथ में मलाई चुपचाप डाल देते हो - “आराम से, आराम से…”। फिर वही जानवर अंदर धकेलकर बार बार जाँचता, “अब तक तकलीफ नहीं हुई?”
अब तुम पीछे हटते हो। उसके साथ चलना-आना शुरू हो जाता है, फिर बंद कर देता है।.
पसीने से तरबतर होकर वो धमाल मचा रहा है, सांसें फूल रही हैं… लेकिन काम बंद नहीं करता।.
कभी-कभी वो फिर पूछता है - "क्या लग रहा है? थोड़ा सा तो लगेगा… झेल ले, इतना हो चुका, समझ ले!"
थोड़ी देर के बाद धीमे-धीमे मजा आने लगता है। पीठ के नीचे हल्का सा तनाव छूट जाता है, फिर शरीर ढीला पड़ जाता है। ऐसे में बस वहीं फैले रहना अच्छा लगता है। एक ओर से हवा घुलती है, दूसरी ओर से खिंचाव महसूस होता है। इस बीच कई बार मुस्कान भी तैर आती है।.
खेल खत्म होने के बाद वह सुबह का खाना और पानी देता है, फिर आगे की तैयारी शुरू कर देता है।.
मज़ा किसी और काम में होगा, पता नहीं।?
मस्ती तभी छा जाती है, जब किसी की गांड मर रही हो। अगर आपने कभी ऐसा किया है… सच बताइए, क्या मज़ा नहीं आया?
लेकिन ऐसा हमेशा नहीं चलता। कई बार तो मजबूरी में सुडौल लड़के की जगह कोई भद्दा-सा, ऊंचा-मोटा आदमी सामने आ जाता है। फिर वो अपने घटिया ढंग से पेश आता है। और तब गुदा में खराबी छा जाती है। .
अब तो वो पट्ठे पर मक्खन की तहें चढ़ा देता है... मगर हलब्बी लौंडे के गांड में घुसते ही सिसकारी छूट जाती है।.
आठ दिनों तक बट में दर्द रहे तो पैदल चलना असंभव-सा लगता है।.
कुछ दोस्त पल भर में पकड़ लेते हैं। जब आपके चेहरे पर खुशी छायी होती है, वे कह उठते हैं - आज किसी अच्छे ग्रह से झूम कर लौटे हो।.
कौन से लड़के के साथ घूमकर आए हो, इतनी बार पूछना पड़ेगा तुमसे? अब तो दर्द सच में निकल पड़ा है। उठो जरा, चाल में फर्क आ गया है, ध्यान आएगा किसी को भी।.
एक बात सुनो, कुछ दोस्त ऐसे थे जिन्होंने पहली बार किसी मस्त-चिकने, गोरे लड़के को हाथ लगाया।.
वह उत्साह में आकर तुरंत लंड डालने लगा। कुछ ही पल में एक-दूसरे से अलग हो गए।.
कभी-कभी आदमी इतनी जल्दी आगे बढ़ने लगता है कि सब कुछ तोड़कर रख देता है। धीरे-धीरे जब कुछ नहीं निकलता, तो परेशानी घर कर लेती है।.
हो सकता है, उन्हें पढ़ाई कम मिली हो।.
कभी-कभी कुछ साथी बेलन की तरह उठा लेते, मानो घी डालकर पराठा बेल रहे हों।.
दर्द होने लगता था चूतड़ तक, जब वे मसलते।.
किसी के मुँह से लार टपक रही थी। एक के होठ फड़फड़ाए बिना नहीं रहे। कोई तेजी से सांस ले रहा था। किसी की उंगलियां कांप गई थीं। कोई धीरे-धीरे आगे बढ़ा। किसी की आवाज घुटी हुई थी।!
कभी-कभी वो इसी चीज़ में घंटों फँसे रहते।.
उस समय तनाव में थी, कब कोई आगे-पीछे होना शुरू करे।!
कभी-कभी लंड डालते ही गिर पड़ते, बस ऐसा हो जाता।.
खून बह जाता था, जब कुछ दाँत मांस पर गहरे धंस जाते।.
बढ़ने के साथ-साथ चिकनापन धीरे-धीरे खत्म हो गया। अब गुदगुदी पर बाल उभर आए, और नाक के नीचे छोटी मूंछें दिखने लगीं।.
तब तक मेरा लंड काफी बढ़ चुका था।.
बहुत सारी बेकार की हरकतों में मैं खुद शामिल रहा।.
जितने बंदे मुझे मारने को तैयार थे, उस वक्त तक एक भी मुझे मरवाने को तैयार नहीं हुआ।.
जब लंड कोई नहीं देता था, तो मन हुआ करता था पागलपन से। घूमता रहता था बेचैन, यूँही जैसे शराबी ढूंढता रहे एक घूट के लिए।.
एक वक्त था जब मैं हर समय किसी को झगड़ने के लिए ढूंढता रहता, मगर कोई आगे नहीं आता।.
हर लौंडेबाज़ का दिमाग चिकने माशूक लौंडे पर टिका रहता है।.
मुश्किल से कोई जवान आदमी, जो हिम्मत वाला भी है, इतना घबराकर बोल पाएगा – भैया, मुझे मार डालो। कोई उसके पास जाकर ऐसा करने को नहीं कहता।.
हां, उस वक्त कॉलेज में कुछ ऐसे दोस्त मिल गए थे जो मेरी प्यास बुझा देते। वो तो साथ रहते, पर एक बात जरूर कहते - तू इतना मजबूत है, मगर लड़कियों के पीछे भागता है जैसे कोई भूखा हो।.
मेरे चूतड़ को सहलाते हुए बोले, तेरी पुंडेली कितनी अच्छी है। इतना कहकर मेरी जांघों पर हाथ फेरने लगे, गाल चूसने भी लगे। उधर यह भी बड़बड़ाए कि वो लौंडे कितने खुशकिस्मत होंगे, जिन्होंने तुझे माशूकी में पाया होगा।!
हाथ में हथियार लेकर वो उसे घुमाने लगते - इतना मोटा क्यों है?
मजबूरी में उनको भी मारना पड़ता। साले मुझसे ज्यादा बलवान होते, मुझे मारने के चक्कर में खुद घिसट जाते….
कॉलेज के दिनों में, शाम को बस में सफर करते हुए, कई ऐसे आदमी जो चालीस-पचास के आसपास के होते थे - हम उन्हें मजाक में बुड्ढे कहते थे - वो मौका पाकर मेरा लंड पकड़ लेते।.
उनकी टांगों पर हाथ का घमंड चलता रहता। कुर्सी पर बैठे-बैठे अचानक उछल पड़ते, मानो कोई झटका लग गया हो। जब खड़े होना जरूरी होता, तब भी वे देर से उठते। काम धीमा पड़ जाता, कभी-कभी बिगड़ भी जाता।.
मुश्किल हो गया था उनसे दूर रहना।.
कुछ साथियों ने भी इस तरह के हादसे का ज़िक्र किया।.
उसी तरह के पड़ोस में मेरा बचपन बीता।.
उस वक्त मैं स्कूल के बच्चों की कतार में हुआ करता था।.
कभी-कभी वो मेरे साथ पढ़ने वाले मुझ पर हंस देते। मैं उन्हें कहीं जाने के लिए गाड़ी में जगह नहीं देता।.
अब क्या कहूँ… वो सभी तो कुछ गलत नहीं कर रहे थे। दरअसल, मैं ही इतना फीके रंग का, लव-खाए हुए स्वभाव का, उठते-बैठते में अजीब सा आकर्षण लिए धमाल मचाता था - ऐसा कि पढ़ाई के दौरान भी जो भी नजर मारता, अटक जाता।.
कुछ यार बस कह देते, या फिर वो बड़े भाई जो मेरी क्लास से आगे पढ़ते थे, बोलते – ‘अरे वाह, क्या बात है।’
हल्का सा झटका देते, उंगलियों से छूते। कभी धीमे से हंसते, आँख में आँख डालते।.
कई बार कुछ ज्यादा शरारती दोस्त मुंह पर चूम लेते, गुदगुदी करने लगते।.
लड़ने पर उतारू हो जाता था कभी-कभी, मगर किसी के सामने मुस्कान में ही शांति पा लेता।.
चेहरे को साफ़ कर लेता, दूसरे भी वैसे ही कुछ।.
कौन जाने, कुछ लोग शरमा जाते हैं। मुस्कान बिखेरते हुए कई चुप हो जाते हैं।.
कई नमकीले लड़के तो वहाँ थे ही, मगर अजीब बात ये थी कि मेरी ओर कई निगाहें टिकी रहतीं।.
सच तो यह था कि पूरी बस्ती में सिर्फ़ लौंडेबाजों का बोलबाला था। इधर-उधर ऐसे ही मामले चलते रहते थे।.
हर सौ में से तकरीबन अस्सी लौंडों को साफ़-साफ़ खत्म कर दिया जाता था।.
शायद उसे खास तौर पर किसी से लगाव हो।.
हमारे स्कूल में कुछ लड़कों पर नजर रखी जाती थी। कितनी देर छिप सकते थे, यही सवाल था।.
शर्मीला होना मेरे अंदर पहले से था।.
एक बार मैंने कामेश से बात की।.
एक किताबों की दुकान में काम करने वाला आदमी पेंसिल, कॉपियाँ भी रखता था।.
बस दो दुकानें ही थीं मेरे कस्बे में।.
पढ़ाई में मैं हमेशा से अच्छा रहता, कभी-कभी पहले दो में, कभी तीन में।.
थोड़ा सा उसका मन नहीं लग रहा था काम पर।.
शाम को स्कूल से लौटने के बाद वह अपने भाई के पास दुकान में होता।.
जब भाई कहीं बाहर निकल जाते थे, स्कूल से छुट्टी मिल जाती।.
बारिश के मौसम में भी स्कूल के दिनों में वह अपने भाई के काम में जरूरत पड़ने पर हाथ बंटा देता।.
कभी-कभी पार्सल लेने के लिए स्टेशन या बस स्टैंड तक चले जाते।.
कभी-कभी पढ़ाई के लिए समय नहीं बचता था।.
उसका दो मंजिला घर सीधे बाजार में पड़ता था। पढ़ने के लिए अलग से कमरा भी था। किताबों की कमी होने का सवाल ही नहीं उठता था।.
उसकी रफ्तार मुझसे बढ़ी हुई थी, पर असफलता के साथ वहीं खड़ा रह गया।.
एक बड़े परिवार में रहता था मैं, कहीं भी शांति से बैठने को जगह नहीं मिलती थी। पढ़ाई के लिए कोई सही कोना भी उपलब्ध नहीं था।.
घर के काम में मुझे हाथ बंटाना पड़ता था, समय की कोई बाध्यता नहीं।.
कभी-कभी पढ़ाई के बीच में ही उठना पड़ता। चाचा या चाची कुछ कह दें, तो ध्यान भटक जाता। मेहमान आ गए? फिर किताबें वहीं रख देनी पड़तीं।.
इसलिए कभी-कभी पढ़ने के बीच में रुकावट आ जाती।.
कामेश के कमरे की तरफ बढ़ने लगा था, जहाँ सन्नाटा था और वो दुकान के ऊपर दूसरी मंजिल पर अलग-थलग।.
मीठे लहजे में बोलने का उसे अजब शौक था।.
वह बोला, तुम मेरे कमरे में पढ़ने लग जाओ। उसके स्कूल के काम में हाथ बटाने की बात भी आई।.
तैयारी पूरी हो चुकी थी। किसी ने अचानक आकर खड़ा हो गया - उसकी त्वचा फीकी, चेहरा साफ, शरीर मुझसे थोड़ा घना, उम्र लगभग एक या दो साल ज्यादा हो सकती थी।.
शाम ढलते ही मैं उसके कमरे में होता। वहीं बैठकर किताबों में डूबा रहता, घंटों तक।.
कभी-कभी वह उसका होमवर्क करता, फिर खुद का। सवाल तुरंत लगा देता, इसलिए किताबें ज्यादा काम आतीं। ट्यूश भी जाना पड़ता था उसे। मेरे पास ऐसा कुछ नहीं था।.
कई भाई-बहनों के बीच पले हम जैसे किसी ट्यूशन के मोहताज़ ही नहीं थे।.
अचानक से कोई रिश्तेदार मार्गदर्शन दे देता, हालाँकि समझाने की बजाय अधिकतर झलकी देता।.
कभी-कभी चाचा पटकन मुड़कर चाँटा मार देते।.
इसलिए मैं उनसे दूर रहने की कोशिश करता।.
उस वक्त फोटोकॉपी की कोई सुविधा नहीं हुआ करती थी। कामेश के ट्यूशन में पढ़ाने वाले शिक्षक उसे नोट्स दे देते थे। मैं वो नोट्स अपनी कॉपी में लिख लेता।.
थोड़े समय बाद, उसके कमरे में एक अलग लड़का आने लगा।.
नाम उसका नवीन था।.
गाँव से ही था वो। पढ़ाई में तो बिल्कुल पिछड़ा हुआ था।.
फिर भी, उसकी उम्र हम दोनों के मुकाबले थोड़ी ज्यादा थी। शरीर भी मजबूत था उसका।.
उसका कद ऊंचा था। भोजन-पानी में अमीर किसान परिवार का हवाला था।.
उसने पास किया था, नकल जैसी चीजों के बिना, गांव के स्कूल में।.
शायद वो क्लास में सबसे तगड़ा उम्र वाला था।.
एक ऐसा समय था जब उसके मन में कोई सपना नहीं था। दसवीं निकालने के बाद गाँव में रहकर खेती करने का इरादा था, वरना कुछ और हाथ-पाँव मारने का विचार था।.
उसकी तबीयत कभी-कभी एक छोटे स्टॉल पर ठहर जाती।.
उसकी जुबान पर हम दोनों के लिए अलग-अलग मीठे शब्द खेलते रहते।.
हो सकता है उसे पढ़ाई के बीच में ही स्कूल से जाना पड़ा। शायद वो खुद चला गया किसी वजह से।.
तो इस साल उसने निजी फॉर्म का अपना हिस्सा पूरा किया।.
उसकी बातचीत में गर्मजोशी हमेशा झलकती थी। एक नाम के साथ जुड़ाव ऐसा, जैसे रिश्ता और भी गहरा हो जाए।.
थोड़ा झुकी पीठ के साथ उसकी टाँगें मजबूत थीं। मांसल बाहों में नसें तनी हुई थीं, गहरे रंग की छाती फैली हुई थी। कमर से नीचे शरीर चौड़ा हो गया था। जितने बड़े हमारे कूल्हे हैं, उसके उससे भी आगे थे।.
उसकी कद-काठी के सामने मेरा और कामेश का तुलना करना बेकार था। हम दोनों छोटे लगते थे। ऊँचाई में वह लगभग दो गुणा आदमी जैसा था। मिलाप की बात ही नहीं थी।.
हाँ, वो रंगत में ।थोड़ा हल्का जरूर था, मगर खूबसूरत लगता था, साथ ही कद-काठी भी बढ़िया थी।.
थोड़ा झुककर देखो, तभी पता चले कि उसके मोटे होंठों पर सूखे रेशम जैसे बाल पड़े हैं। वो होंठ गहरे, भारी और अंदर तक गीले-गीले लग रहे थे।.
फिर भी उसकी एक आदत थी। हमारे गाल पर हाथ घुमा देता, कभी कामेश को छू लेता। कभी-कभी चूतड़ मल देता। और बस, मुस्कान फैल जाती।.
अचानक एक दिन, कामेश के गाल पर उसने दाँत गड़ा दिए।.
उस समय किताबें ही सबसे ज्यादा बात कर रही थीं। परीक्षा के करीब दिनों में, धूल उठ चुकी थी तैयारियों की। किसी को कुछ खास बताने की भी जरूरत नहीं थी - सब कुछ आँखों-आँखों में झलक रहा था।.
कॉपी में लिखते समय मैं नोट्स तैयार कर लेता।.
उसके साथ-साथ अपना काम भी हो जाता। दोनों दोस्तों को बार-बार याद दिलाने का काम चलता रहता। समझाने में टीचर जैसा अंदाज़ आ जाता।.
कभी-कभी देर होने पर वह घर जाने की बजाय उसी के कमरे में सो जाता।.
उस रात हमने मिलकर टाट को फैलाया।.
मार्च होने से पहले फरवरी आता है।.
अचानक एक पल मैं जाग गया। पास से फुसफुसाहट सुनाई देने लगी। वो दोनों धीमे स्वर में किसी बात पर चर्चा कर रहे थे।.
कामेश ने कहा, सिर्फ़ इतना हो रहा था… उसकी नजर पड़ जाएगी।.
उसकी आंखें बंद हैं… रुक जा। इतना शोर मचाने से वो जल्दी उठ जाएगा।!
फिर मैंने गौर किया, कामेश बड़े-बड़े हवालों में घिसट रहा था।.
एक और लड़का, जिसका नाम नवीन था, धीमे से उसकी पीठ पर हाथ फेर रहा था।.
नवीन ने मजबूर करके कामेश के अंडरवियर को सरका दिया।.
आवाज़ें अब और भी तेज होने लगीं - बस बस करते हुए… फटने लगी कोई चीज़… आह… आह… उसने पूरा ज़ोर डाल दियa आह… ऐसा मत कर।!
अच्छा, सुन… धीरे-धीरे पैर फैला। हिलना-डुलना बंद कर। यार, इतना ही काफी है। ठीक है? अब तो छोड़। थोड़ा और नहीं, बस।.
थोड़ी देर बाद, हवा के तेज़ झोंके गहरी सांसों की तरह महसूस होने लगे।.
थोड़ा सांस लेते हुए नवीन के मुंह से आवाज़ निकली - हूं... हूं... कमाल का।
आवाज़ हुई - पुच… पुच…। फिर से शुरू हो गए वो छोटे-छोटे झटके।
थोड़ी देर के बाद सब शांत हो चला।.
उसके अगले दिन जब मैंने झांका, तो सामने नवीन ऊपर था। कामेश के पीछे से आवाज आ रही थी – धीमी, लयबद्ध, बार-बार टकराहट।.
लंड पूरी तरह भीतर जा रहा था, फिर बाहर आ रहा था। एक-एक करके हलचल चल रही थी।.
कामेश ने पैर फैलाकर जमीन पर लेट गया, धीरे-धीरे लंड को हाथ में लिया। उसकी गांड ऊपर की ओर उठ रही थी, बदन ढीला पड़ा था।.
जैसे ही उसकी नज़र मुझ पर पड़ी, नवीन का शरीर थोड़ा सा झिझक गया… मगर वहाँ खड़ा तो बना रहा।.
उसके बाद उसने अपना लंड निकाला, और वहीं चादर से साफ कर दिया।.
लंबाई उसकी कमर से नीचे तक जा रही थी।.
बस ऐसे ही निकल पड़ा मेरे मुंह से - कितना विशाल है!
नवीन ने मुस्कुराते हुए गालों पर हाथ फिराया। उसके बाद धीमे स्वर में कहा - दिखने में तो बड़ा लगता है, पर अंदर जाते ही मजा आने लगता है, एक बार खुद देख लेना।.
आंखें बंद करके उसने कहा, मुख पर एक अजीब-सा भाव। मानो कोई गहरा स्वाद जीभ पर फैल रहा हो।.
कामेश के चेहरे पर नज़र डालते हुए मैंने पूछा - ऐसा तो नहीं लग रहा।?
कामेश के चेहरे पर एक झलक सी मुस्कान फैल गई। पहले थोड़ी सी हिचकिचाहट रहती थी। अब वो भावना घट गई, बल्कि गायब सी हो गई। ऐसे में जीवन में मज़ा आ जाता है।!
अब मस्ती शुरू हो गई, नवीन ने कहा।.
तुम ये काम कितनी देर से कर रहे हो?
रोज़ मिलने लगा है, कम से कम पाँच या सात दिनों से। पहले तो कभी-कभी ही होता था। बस इतना फर्क आया है नवीन के आने से।!
उठकर दोनों ने कपड़े धारण कर लिए, साथ में तत्परता से आमने-सामने देखा।.
तब मैं ताज़गी महसूस करने लगा, पानी से चेहरा साफ़ किया, फिर धीरे-धीरे घर की ओर बढ़ गया।.
उसके बाद कई दिन तक मैं वहाँ जाना भूल गया।.
मेरी कहानियों में जो हुआ, सिर्फ़ वही बताता हूँ। दोस्तों, झूठ नहीं बोलता। गे सेक्स के बारे में लिखते वक्त सच्चाई सबसे ऊपर रहती है। अनुभव ऐसे ही डालता हूँ, जैसे घटित हुए।.
आगे के हिस्से में, वो अनुभव जारी रहेगा - उसी गे सेक्स कहानी का।.
आपकी बात का हमें इंतज़ार रहेगा।.
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