भाभी को मालिश करके बुरी तरह से चोदा

Jan 2, 2026 - 15:44
Jan 13, 2026 - 19:46
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भाभी को मालिश करके बुरी तरह से चोदा


मेरे घर के सामने वाली गली में एक युवा भाभी रहती थीं। धीरे-

धीरे बातचीत होने लगी, क्योंकि मन में कुछ ख्याल आए थे।

फिर एक दिन उनके घर जाने का रास्ता बन गया।.

 

अब सुनिए, ये कहानी है एक गाँव की रहने वाली भाभी की। मैं हूँ सचिन, जो आपके साथ इसे बाँट रहा हूँ।.

एक छोटे से गांव में, बहादुरगढ़ के पास हरियाणा में, मेरा घर है। 24 साल की उम्र है मेरी।.

 

अच्छा लगता हूँ नजरों में।.

 

कई महीनों से मैं इस वेबसाइट की कहानियां पढ़ रहा हूँ।.

अब लगा कि क्यों न अपने गाँव की एक दादी के सेक्स अनुभव पर कहानी बनाई जाए।.

 

एक साल पहले की बात है। उस वक्त मैं घर पर बैठा था, ग्रेजुएशन खत्म कर चुका था।.

जब कुछ करने को नहीं मिलता था, तब दोस्तों के साथ बेतरतीब घूमता रहता।.

 

उस घर में, जो मेरे घर के सामने है, एक भाभी रहा करती थीं।.

उनका पूरा अंदाज़ ही कुछ और था।!

 

सफेदी लिए त्वचा, जैसे ताज़ा निकला दूध हो। कमर संकरी, बुलंद छाती, पहाड़ी रास्ते में खड़ी किसी चट्टान की तरह आकर्षण का केंद्र।.

शायद तुम्हें अंदाजा हो, वो कैसी लगी होंगी!

 

उनकी आंखों का भाव मुझे हमेशा स्पर्श कर जाता था।.

मन मचल उठा था, सिर्फ एक झलक में।!

 

पांच साल पहले शादी हुई थी उनकी। बच्चे दो हैं।.

दो बच्चे थे। उम्र में वह आगे थी, जबकि वह पीछे।.

 

मेरा उन बच्चों से अच्छा रिश्ता था। घंटों खेलने में वक्त निकल जाता।.

 

प्रीति है वो, मेरी भाभी। नाम लेकिन बहुत देर से याद आया।.

 

शुरू में, उनके बारे में मेरे मन में कोई खराब धारणा नहीं थी।.

 

एक दिन, बच्चों के साथ खेलते हुए मैं वहीं था। तभी भाभी नहाने के बाद बाहर आईं।.

सच में कैसे लग रही थीं!

 

थोड़ा सा पानी बालों से कपड़ों में भी फैल चुका था।.

मैंने जैसे उन्हें देखा, मेरी नपुंसकता गायब हो गई।.

 

उसकी नजर मुझ पर पड़ी। फिर भी मेरी आंखें उन्हीं को ताकती रहीं।.

 

उसके बाद वो मेरी तरफ मुड़े – क्या चल रहा है?

 

उस पल के बाद चेतना लौटी।.

बस इतना ही, मैंने कहा, अभी बच्चों के साथ खेल रहा हूँ।!

 

फिर भी, उसकी नज़रें लगातार जमीन पर टिकी रहती।.

तभी मैंने नज़र उठाकर देखा, उसकी आँखें मेरे कसे हुए लिंग पर टिकी थीं।!

 

उसे सही करने में मैं हाथ बंटाया।.

अंदर के रास्ते में भाभी पहले ही गुज़र चुकी थीं।.

 

घर पहुँचकर मैं सीधा बाथरूम की ओर चला गया। वहाँ अकेले खड़े होकर मैंने उनके बारे में सोचा। धीरे-धीरे मेरे हाथ ने अपना काम शुरू कर दिया।.

फिर चुपचाप हो गया।.

 

फिर कभी-कभी वहाँ पहुँच ही जाता, बस छोटों के चक्कर में थोड़ी देर गपशप हो जाती।.

 

पानी के लिए बाहर जाना पड़ता है, क्योंकि हम गांव में रहते हैं।.

 

हर बार पानी लेने निकलतीं भाभी, मैं दरवाज़े के बाहर खड़ा हो जाता।.

 

कभी-कभी भाभी मेरी तरफ टेढ़ी आँखों से झांकतीं, फिर हल्का सा मुस्कुराती हुई बगल से गुज़र जातीं।.

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जब से वो घर में आई थीं, काम पड़ने पर तुरंत मेरी तरफ देखने लगीं।.

जब कभी दुकान से सामान चाहिए होता या कहीं घर का काम पड़ जाता, मुझे बुला लेती थीं।.

 

बिना देर किए मैं तुरंत उस काम को पूरा कर लेता।.

इसी तरह मेरा उनके साथ रिश्ता और गहरा होता चला गया।.

 

सुबह होते ही पति काम के लिए निकल पड़ते। सासजी मंदिर की ओर कदम बढ़ा देतीं। बेटी किताबें उठाकर स्कूल की राह ले लेती।.

 

जब पति के पिता ड्यूटी पर रहते, घर में बच्चे के साथ वो अकेली रहती।.

 

दिन बीतते जा रहे थे, ठीक इसी तरह।.

 

कुछ समय बाद, आगे कोई हलचल नजर नहीं आई।.

सर्दी पहले ही आ चुकी थी। मौकों का अभाव सा छाया हुआ था।.

 

एक सुबह भाभी वहाँ पहुँच गईं।.

दुकान पर जाकर कुछ चीज़ों की तलाश थी।.

 

जब मैं दुकान से सामान लाया और उसे देने पहुँचा, तो वहाँ भाभी अकेली ही थीं।.

 

क्या बात है, सभी कहाँ गए?

फिर उन्होंने कहा - किसी परिचित के परिवार में मृत्यु हो गई, इसलिए वहाँ पहुँच गए हैं।!

 

बैठे-बैठे ही मैंने भाभी से गपशप शुरू कर दी।.

एकदम अचानक, स्लैब से एक टाइल ढीली होकर भाभी के पैर पर जा लगी। चोट लगते ही वह नीचे बैठ गईं।.

 

फिसलते हुए कदमों के साथ मैं उन्हें ऊपर उठा लाया, फिर बिस्तर पर आराम से लिटा दिया।.

दर्द से तड़पती भाभी को देखा, तो मुझसे रहा नहीं गया। कह बैठा – पैर ऊपर कर लीजिए, थोड़ी देर घिस देता हूँ।!

 

शुरू में इनकार कियa, हालाँकि बाद में सहमत हो गयीं।.

 

तेल को गर्म किया, फिर मैंने शुरू कर दी पैरों की मालिश।.

 

थोड़ा सा टांग में भरोसा न करने पर भी, सलवार का निचला हिस्सा बस इतना संकरा था कि ऊपर उठने को तैयार नहीं।.

 

भाभी जी, मैंने कहा, ये सलवार उतारकर कुछ दूसरा पहन लीजिएगा। मालिश में तकलीफ़ हो रही है।.

उसके मुँह से निकला - जो काम है, अभी पूरा कर लो।.

 

फिर मैंने भाभी को बाथरूम तक पहुँचाया।.

एक ढीले-ढाले पलाज़ो में वो समा गई, जैसे हवा के साथ चल रही हो।.

 

इसके बाद हाथ सीधे झुके हुए पैरों की ओर बढ़े।.

हाथ कभी उनकी जांघ पर समा जाता।.

फिर भी भाभी कुछ कहने से मना कर दे रही थीं, पूरी तरह ख़ामोश।.

 

पहले मैंने पूछ लिया - भाभी, अब तक थोड़ी राहत मिली?

फिर उसने कहा - हां, थोड़ा सा।!

 

बोलीं, पीठ दुख रही है। उधर भी हाथ चला दो।!

खुशी से मेरा दिल झूम उठा।!

 

तुरंत हां कह दिया मैंने, फिर बोला - आप आराम से लेट जाइए, मैं सब संभाल लूंगा।!

 

उसके बाद वो पेट की तरफ मुड़कर जमीन पर आ गिरी।.

हाथों से छुआ, फिर धीरे-धीरे घुमाव बनने लगे।.

 

फिर मैंने कहा – भाभी, कमीज में ठीक से मलाई नहीं चल पा रही। उतार लीजिए इसे, तभी कमर के हर हिस्से पर दबाव बराबर पड़ेगा।.

 

कमीज बाहर आई, तुरंत। मानो पल से इंतज़ार हो रहा था।.

 

एक बार फिर से हाथों को चलाना शुरू किया।.

 

बीच से उनकी ब्रा की पट्टी नजर आई।.

मैंने कहा, "भाभी, ये ब्रा परेशान कर रही है!"!

फिर बोल पड़े - अब तो हुक साफ कर दे।!

 

ब्रा का हुक खोलते ही उसे नीचे उतार लिया।.

 

फिर भाभी की पीठ पर हाथ फेरते-फेरते कमर तक पहुँच गया।.

 

लंबाई में वह इतना खिंच गया कि अब रुकने का नाम नहीं ले रहा था।.

 

धीरे से हाथ चलाकर मैंने कमर के निचले हिस्से से शुरुआत की।.

हाथ जब कभी उनके स्तन पर छू जाता, भाभी ख़ामोश रहती।.

 

थोड़ी देर में उनकी सांस लेने का अंदाज़ बदल गया।.

 

थोड़ी देर रुककर वह खड़ी हुईं। फिर आवाज़ आई - इनके पैर भी दबा देना।!

बस इतना ही मेरे मन में था।!

 

हाथ से उसकी छाती पर दबाव डाला।.

अब तो भाभी का पसीना छूट रहा था।.

 

उसके बाद मैंने धीरे से भाभी के होंठों को छुआ।.

उसकी भाभी भी हर कदम पर साथ निभा रही थी।.

 

मैंने दस मिनट तक भाभी को चुम्मा देते हुए उनके स्तनों को छेड़ा। इधर, एक हाथ पलाज़ो के नीचे फिसल गया। वहाँ मैंने उनकी योनि को छुआ।.

 

इसके बाद मैंने आहिस्ता से नीचे की ओर बढ़ते हुए उनकी गर्दन पर ध्यान दिया। दूध चूसने का क्रम शुरू कर दिया। एक हाथ से दबाव जारी रखा गया।.

उसका सांस तेज हो गया। मैंने महसूस किया कि वो मेरे सिर को धीरे से नीचे खींच रही थी।.

 

एक के बाद एक मैंने भाभी के दोनों स्तनों पर मुँह लगाया।.

इसके बाद मेरा मुँह धीरे-धीरे उनके पेट की तरफ बढ़ा। नाभि को छूते हुए, मैं पलाज़ो के ऊपर से उनकी चूत पर होठ फेरने लगा।.

 

उसके होंठों से आहट छूट रही थी, गाड़ी की तेज़ आवाज़ में।.

 

फिर मैंने धीरे से उसकी पैंटी के साथ पलाज़ो भी नीचे कर दिया।.

 

गुलाबी रंग की त्वचा पर कोई रोएँ नज़र नहीं आ रहे थे, धीरे-धीरे उसकी चूत साफ़ दिखने लगी।.

 

कल या परसों कुछ ऐसा ही हुआ था, जब भाभी ने झांटे साफ किए।.

 

इसके बाद मैंने भाभी की चूत पर ध्यान दिया, जीभ से गहराई तक छेड़ने लगा।.

 

फिर वो अचानक से पागल-सी हो उठीं, मछली किनारे पड़ी सूखने लगी।.

वो समय था जब मैंने उसकी चुत पर ध्यान दिया।.

 

उसके बाद मैं खड़ा हुआ, सभी कपड़े धीरे से नीचे उतारे।.

 

लंबे समय तक तनाव में रहने के बाद मेरा लंड पूरी तरह सख्त हो गया था। शरीर में दबाव इतना था कि जैसे किसी भी पल नसें टूट जाएँगी।.

 

भाभी के पास जाकर मैंने कहा - चुपचाप मुँह में डालकर चूस लो।!

फिर वो उठीं, मेरे लिए अजीब सा मुस्कायी, धीरे से नीचे हुईं। उनके होंठों ने आगे बढ़कर सब कुछ ढक लिया। ऐसा लगा जैसे कोई मीठी चीज़ हो। गर्मी फैल गई। कुछ पल बाद उनकी सांसें तेज़ हो गईं।.

 

मैंने उसके होंठों पर अपना सिर धकेला, लंबी सांसों के बीच में। छाती तक उतरता हुआ वो डंडा गले में घुटन भर रहा था।.

 

अचानक भाभी ने कहा - इसे और सहा नहीं जा रहा। पानी लेकर आओ, जल्दी होनी चाहिए।!

 

उसे बिस्तर पर लिटाया, कमर के नीचे गद्दे का टुकड़ा सुलभाया। मेरे कंधों पर उनके पैर आए, फिर धीमे-धीमे लंड चूत पर सरकने लगा।.

 

भाभी ने कहा - अरे, तुम समझदारी से काम लो। जल्दी करने में ही बात बनती है।!

एकदम से मैंने पूरा लंड भीतर कर दिया।.

 

भाभी चीख उठी, जब गाँव वाले ने छेड़ा।!

फिर भी मैंने ठहराव नहीं जारी रखा, उलटा पीछे से आगे होता गया।.

उसके मुँह से एक हल्की सी धधक निकल पड़ी।.

 

कहा था मैंने - सुन, वो तो अभी-अभी कह रही थी कि जल्दी करो, अब इतनी खामोशी क्यों?

 

फिर उसके होंठ खुले - आपका लंड मेरे पति के ज़्यादा लंबा, गहरा।!

 

कुछ समय पश्चात् दर्द घटने लगा, फिर वह आराम से मुस्कुराई।.

 

ऊपर से झुकते हुए वो मेरी तरफ़ देखने लगी। हिलती कमर के साथ कहा - तेज़, थोड़ा और तेज़। एक साँस में फिर बोली - ऐसे ही… अच्छा लग रहा है।!

 

भाभी पर मेरा हर धक्का तेज़ी से आगे बढ़ रहा था।.

लगभग पंद्रह मिनट के सेक्स के दौरान भाभी दो बार आई।.

मेरा भी कुछ होने वाला था।.

 

भाभी से मैंने कहा - मुझे एक बच्चा होने वाला है। अब कहाँ जाऊँगी?

उसका कहना था - अंदर ही डाल देना। इतने दिनों से तबीयत बेचैन है इसकी।!

 

मैंने तेजी से कई बार धक्के दिए, और आखिरकार अपना पानी उसकी चुत में डाल दिया।.

 

थकान चढ़ आई थी हम दोनों को, मैं सिर्फ वैसे ही उन पर ढह गया, लंड भीतर रखे।.

 

अब उनके परिवार के आने का समय आ चुका था।.

सबसे पहले मैंने कपड़े धारण किए। फिर भाभी से मिलकर उन्हें गले लगा लिया। इसके बाद शांति से अपने घर वापस आ गया।.

 

जब-जब संभव होता, मैं वही कर देता जिसके बारे में सोचता था।.

 

इतने में ही मैंने उनकी पिटाई कर दी।.

अगली बार जब सेक्स की कहानी आएगी, तो पता चलेगा कि मैंने उनके पिछवाड़े पर कैसे हमला किया।.

इन गाँव की भाभी वाली कहानी पर तुम्हारा क्या ख़्याल है? मुझे ज़रूर डाक से सूचित करो।!

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