पड़ोसन भाभी को बाथरूम में नंगी करके चोदा
Antarvasnastory
लगभग शाम के समय जब भाई की शादी हुई, तभी पहली बार उसकी पत्नी को देखा। मेरी गांड में तेजी से एक सिहरन दौड़ गई। घटना के कुछ देर बाद वो चुपचाप बैठी रही। आखिरकार मैंने धीमे स्वर में बात छेड़ दी।.
अरे यार, ये मेरी पहली बार है जब किसी को अपना सेक्स अनुभव लिखकर बता रहा हूँ। सच कहूं तो हर शब्द सच है।.
मेरी कहानी में लड़का मैं हूँ, वहीं असली लड़की वो हैं जो मेरी भाभी हैं।.
गाँव से निकलकर मुरादाबाद में जॉब करने लगा हूँ।.
हर किसी बार घर पहुँचने का सिलसिला मेरा चलता रहता है।.
एक साल पहले मेरे भाई की शादी हुई थी। हम दोनों भाइयों में से एक मैं हूँ।.
उम्र तेंतीस के पार हो चुकी है। विवाह अब तक नहीं हुआ।.
उस समय हुआ, जब पत्ते गिर रहे थे।.
इस कहानी को आगे बढ़ाने से पहले, मैं तुम्हें अपनी भाभी के बारे में कुछ कहना चाहता हूँ।.
उसकी पत्नी के आठचलीस साल हुए हैं। शरीर ऐसा मोड़ता है जैसे कहीं कोई बेड़ियां तोड़ रहा हो।.
जवानी का अब तक का सबसे तेज़ दौर है। चूचे खुशियों से भरे हुए हैं, वहीं गांड धीरे से आगे की ओर झुकी हुई है।.
उनकी तस्वीर देखकर ऐसा लगता है, मानो कृति सेनन सामने खड़ी हों। शरीर का हर हिस्सा अजब ढंग से आकर्षक है।.
उसके सामने आते ही कुछ ऐसा हुआ, जिससे मैं सहम गया।.
फिर भी, क्योंकि वो मेरी अपनी भाभी हैं, तो मैंने ऐसा सोचना बंद कर दिया।.
एक शाम को, जब सालगिरह मना रहे थे।.
उस साल नवंबर में, जन्मदिन के मौके पर मैं घर वापसी कर रहा था।.
जैसे ही घर के अंदर क़दम रखा, सभी ने मेरी तरफ देखा।.
आंखें घूम रही थीं, भाभी का पता लगाने को।.
बस तभी दरवाज़ा खुला, भाभी बाहर आईं। मेरे होंठों पर एक हल्की मुस्कान थी, उनकी ओर देखकर वह और चमक उठी।.
उन्होंने मेरे लिए चाय के साथ पानी भी रखा।.
इस वक्त तक हर चीज पूरी तरह से ठीक-ठाक दिख रही थी।.
शाम ढलते ही केक के टुकड़े सभी ने किए। खाने के बाद हर कोई आराम के लिए अपने कमरे में लौट पड़ा।.
कमरे में रात के समय मैं बिस्तर पर पड़ा था।.
थोड़ी सर्दी महसूस हो रही थी।.
फिर अचानक वो ही पल आया, जब भाभी कमरे में दाखिल हुईं।.
वह चुपचाप दूध लेकर आईं। फिर कुछ कहे बिना वापस चली गईं।.
बिना देर किए मैंने पूछ लिया - भाभी, आपको कैसा लग रहा है?
बस इतना सवाल था, कोई खास बात नहीं।.
सुबह के वक्त हर कोई आसपास था, इसी बात की वजह से मन में अटकाव-सा था।.
देवर जी को उसकी भाभी ने मीठी आवाज में बताया, सब कुछ ठीक है। फिर भी वह थोड़ी कम खुश रहती है। घर में उसका मन नहीं लगता।.
तब मैंने पूछ लिया - अरे भाभी, ऐसे क्यों घबराई हुई हो?
उन्होंने कहा - कुछ खास नहीं, सिर्फ़ इतना।!
दबाव डाला मैंने, पर चुप्पी ही तोड़ी उसने।.
उसके बाद मैं धीरे से खड़ा हुआ, सामने आकर रुक गया।.
उसके बैठने की जगह मैंने सूचित किया, पलंग पर हो।.
सबसे पहले तो वो हाथ जोड़कर मना कर रही थीं। अचानक उठकर बिस्तर के किनारे बैठ गईं।.
कुछ पलों के लिए गपशप चलती रही।.
काम के बारे में पूछने के बाद उसके मुँह से निकला - क्या कोई लड़की है अबतक?
मैंने कहा - हाँ बनाई है। वो रहस्य छिपा के रखती हैं, मगर पता चल जाता है। कभी-कभी ऐसा लगता है, जैसे सब अपने आप हो रहा हो।.
उनकी भाभी ने कहा - तुम्हारे पास जिंदगी अच्छी है, मस्त रहो।.
कह दिया मैंने - आगे बढ़ो, क्या रोक रहा है?
उदास स्वर में भाभी ने कहा - ज़िंदगी में बस इतना ही दिखता है, रोटी बनाऊंगी, फिर सो जाऊंगी।.
क्या बात है, मैंने पूछा - भाभी, कुछ तो ऐसा जो आप दबाए बैठी हैं?
उन्होंने कहा - नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है। सिर्फ़ तुम्हारे भैया …
फिर अचानक सन्नाटा छा गया।.
मैंने पूछा, "भाभी, कुछ बताएंगी? हो सकता है, मैं कुछ कर पाऊँ।"!
उन्होंने कहा - छोड़ो न, ये तो घरेलू बात है।.
थोड़ी देर में सब कुछ समझ आने लगा, धीरे-धीरे शरीर में तनाव भी बढ़ने लगा।.
एक टी-शर्ट मेरे ऊपर थी, साथ में निचला कपड़ा।.
कभी उसकी नज़र मेरे पैरों की तरफ गई। फिर वो झेंपते हुए मुड़ गई। एक बार फिर वहीं देखने लगी। ऐसा लगा जैसे कुछ समझ नहीं पा रही। ध्यान से घूर रही थी नीचे की ओर।.
उसकी भाभी ने कहा - अब सोने चलो, बातचीत कल होगी।.
कहा मैंने - भाभी, कोई बात हो तो सुनाइए… पक्का मदद करूँगा।.
सांसों में ठिठुरते शब्द आए - चलो, मैं जा रही हूँ। तुम्हारे भाई का इंतजार हो रहा होगा। न जाऊँ तो गुस्सा आ जाएगा उनको।.
बोला मैंने - भाभी, परवाह नहीं रात जागने की। अच्छा लगे तो बात करना, फिर आ जाना कभी।.
शायद भाभी को मेरी बात का मतलब समझ आ गया था। इस बार मेरे शब्दों में कुछ और ही झलक रहा था।.
दूध पीने को कहते हुए भाभी गुड़ नाईट बोलकर चल दी।.
जैसे वो गए, मैंने दूध का घूँट भरा, फिर आंतरिक कपड़ों वाली कहानी पढ़ने बैठ गया।.
पहले से ही मज़ा आता है ऐसी कहानियाँ पढ़कर, जहाँ भाभी को खूब चुदवाया जाता है।.
उस रात मेरे लिए सब कुछ अजीब घट रहा था। धीमे-धीमे चीजें बढ़ने लगीं, बस।.
करीब रात बारह बत्तीस पर, मुझे लगा किसी के कदमों की आवाज है दरवाज़े के बाहर।.
अच्छा, ये तो मैंने कहीं खो दिया था - हमारा घर काफी विशाल है।.
दूसरी मंज़िल पर बस मेरा कमरा है, वहाँ भैया और उनकी पत्नी का भी कमरा है।.
बस इतना ही कर पाया – पलटकर लेट गया।.
अचानक दरवाजा टिक-टिक करके खिसक गया। भाभी अंदर घुसीं, ऊपर से चादर लपेटे हुए।.
थोड़ी सी आवाज में बोली - देवर जी, कहीं सो तो नहीं गए?
सुनो भाभी, क्या नींद पलकों पर नहीं है?
थोड़ी देर पहले भाभी ने कहा - तुम्हारा भैया ज़ोर-ज़ोर से खर्राटे ले रहे हैं। मगर मन में तुम्हारी बात घूम गई। फिर लगा, चलो थोड़ा समय निकालकर बात कर लूँ। वैसे भी नींद अभी ओढ़ी नहीं थी मेरी आँखों पर।.
खड़े-खड़े बात करते देखकर मैंने कह दिया कि बैठ जाएं।.
वह मेरे बिस्तर पर आकर बैठ गया, फिर चादर खींचकर अपने ऊपर डालने लगा।.
जब वो लेटने लगीं और चादर को हटाया, तभी मेरी नजर पड़ी - वो कुछ ऐसी थीं… पारदर्शी नाइटी में भाभी बिलकुल साफ झलक रही थीं। उनके सीने उस कपड़े से आसानी से दिख रहे थे।.
अचानक वह मेरे पास लेट गई। आँखों से आंसू बहने लगे।.
एक दिन भाभी ने कहा - अब तो ज़िंदगी घटिया सी लगने लगी है। जो उम्मीद थी, वो पूरी तरह धरी की धरी रह गई।!
थोड़ा बहुत समझ तो मुझे भी था, हालाँकि वो खुद कहें, यही चाहता था।.
उनका सवाल था - मेरी छवि पर आपकी क्या राय है?
अचानक मुझसे बोल पड़ा - भाभी, आप तो कमाल हैं… इतनी धमाकेदार छवि मैंने जिंदगी में कहीं नहीं देखी।.
उस दिन भाभी ने सिर झुकाकर कहा - इस तारीफ का क्या फायदा। जो काम है, अपने आप हो जाए ऐसा इंतज़ाम तो वो कभी नहीं करते।.
हाथ छूते ही महसूस हुआ - एक सिल्क जैसी चिकनाहट। भाभी की त्वचा बिल्कुल पिघले मक्खन की तरह थी।.
उनकी उंगलियां मेरी हथेली में आते ही, पलकें नीचे गिर गई थीं।.
हाथ पर मेरी उँगलियाँ फिसलने लगीं।.
आँखों में बसी लालसा उसके मुखड़े पर सब कुछ कह रही थी।.
उसकी पीठ पर मेरा हाथ पड़ गया।.
मेरा हाथ छूते ही वो काँप उठीं, मेरे कंधे पर सिमट गईं।.
हवा उनके फेफड़ों में इतनी तेजी से आने जाने लगी, मानो कोई इंजन चल रहा हो।.
लग रहा था, अब ही उसकी गांड फोड़ दूं।.
ख़ुशी से भरा ये पल मैं ऐसे ही बिताना चाहता था।.
लगता था, इस तरह की घड़ी फिर कभी नहीं मिलेगी।.
रुक-रुककर मैंने भाभी की पीठ पर हाथ फिराया।.
हवा की तरह पतली चुनरी में, उंगलियों तक खुजली सी महसूस हुई।.
बहन ने पूछा - छोटे भाई, क्या मैं तुम्हें राहुल कहकर बुलाऊँ? कोई ऐतराज़ तो नहीं?
उस दिन मैंने कहा, तुम्हें भाभी नहीं, प्रिया कहूँगा।.
सिसकती हुई भाभी को मेरे छूने पर अच्छा लग रहा था।.
मानो उनकी आवाज़ में यह बात छिपी हो कि हर पल घुटने टेक दो।.
हवा में खामोशी छा गई, मैंने धीरे से उनके होंठों को छुआ।.
कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। मुझे एहसास हुआ कि उनका ध्यान पूरा मेरे ऊपर था।.
होंठों पर उनका प्यार इतना तीखा था, कि लगा जैसे मुझे निगल जाएँगी।.
मेरे होंठ भाभी के होंठों पर बने रहे।.
उस पल हर चीज़ धुंधली सी हो गई थी। जैसे दिमाग़ ख़ामोश हो गया हो। बस एक तेज़ लहर मन में उठ रही थी। कुछ और याद नहीं।.
तेज़ सांसों का दौर चल रहा था, हम दोनों में।.
कमरे भर में सिर्फ पिच-पिच-पुच की ध्वनि थी। होंठ दबाकर चबाने के शब्द छा गए थे।.
वो करते-करते मेरे ऊपर आ ही गईं। पता नहीं कैसे, धीरे-धीरे उनका दूध मेरे सीने पर बहने लगा।.
मन में ख्याल आया कि कहीं भाभी का दूध बाहर न आकर सीधा मेरे होठों तक पहुँच जाए।.
उसके कान के पास जाकर मैंने कहा - प्रिया, मेरी जान, अब थोड़ा दूध पीना है।.
उस पल भाभी ने धीमे से हिलकर अपने स्तन में से एक मेरे मुँह की ओर बढ़ा दिया। मैंने दूध को चूसते हुए गहराई तक निगलने की कोशिश शुरू कर दी।.
तभी वह मेरा हाथ पकड़ कर, अपने दूसरे स्तन पर रखने लगी।.
फिर मैंने उन्हें पलट दिया, ऊपर से नीचे कर दिया। दोनों छातियों पर हथेलियाँ फैला दीं। घंटों ऐसे ही रहा, बिना रुके।.
थोड़ी देर में हम दोनों बिना कपड़ों के रह गए, मैंने अपना लंबा हाथ में उसकी मुट्ठी में डाल दिया।.
उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था, जब उसने मेरे बच्चे को पकड़ लिया। मानो कोई पसंदीदा चीज़ मिल गई हो जिसे घंटों छेड़ना चाहते रहते हैं।.
जब भाभी नीचे जाने लगीं, तब मुझे एहसास हो गया। मैंने अपनी दिशा बदली, पोज़िशन समायोजित कर ली।.
मेरा मुँह अब उनकी जांघों के बीच था। वो मेरे ऊपर झुकी हुई थीं, होठों से किसी चीज़ को ढूंढ रही थीं।.
मैंने पूछा - एक बार सबसे पहले मुँह में डालना है, वरना गुद में?
उन्होंने कहा - लड़कपन में!
मैंने जल्दी से पोजीशन सेट की। उनकी जांघों के बीच घुसते हुए मैंने इशारा किया। वो काफी पहले से जानती थीं कि क्या करना है। उनके हाथ मेरे लंड पर पहुंचे बिना देर न की। एकदम सीधे, अपनी चूत के अंदर उसे समा लिया। .
उन्होंने हल्का सा हम्म कहा। फिर मुझे चुदाई के लिए कह दिया।.
फिर वहाँ खड़े-खड़े मैंने कमर तोड़ ली।.
मुंह से आह निकल पड़ी, मौत का एहसास हुआ। होंठ दब गए, मीठे दर्द में डूब गईं।.
भाभी ज़ोर-ज़ोर से बोलने लगीं - छोड़ दो मुझे… मुझे प्यास लगी है… घटिया सी इच्छा, फिर भी वो बस यही चाहती। उनके मुँह से निकला - तुम्हें क्या लगता है? बस इतना करो मेरे लिए।.
मैंने भाभी को दस मिनट तक रगड़ा, इसके बाद उनसे पूछे बिना ही उनकी चूत में गुदगुदाहट महसूस करते हुए छलक गया।.
बारिश थमने के बाद हम लोग कुछ वक्त तक सिर्फ इधर-उधर झूलते रहे।.
तभी उसने मुझे पलंग से धक्का देकर नीचे कियa। बोली, कल वापस आऊँगी।.
वो मेरी नज़रों के सामने थे।.
खुशी से भरकर उठ लिया नाइटी को। चादर में लिपटी हुई धीरे से कमरे से बाहर निकल गईं।.
ख़्वाब में वो पल आया, तो बिना कुछ कहे होंठ खिंच गए। धीरे-धीरे हर रोज़ का हिस्सा बन गई वो एक ऐसी चीज़, जिसे दोहराने में कभी थकान नहीं लगी।.
उस दिन के बाद जैसे ही भाभी को कोई सुविधा मिलती… हम एक-दूसरे पर झपट पड़ते।.
मुझे उम्मीद है कि मेरी कहानी पढ़ने के बाद आपको जो भावना आई, वो शेयर करना न भूलें।.
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