भैया ने मां व बहन के साथ संबंध बनाए

Jan 2, 2026 - 15:33
Feb 18, 2026 - 19:49
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भैया ने मां व बहन के साथ संबंध बनाए

हमारे घर में सेक्स को लेकर कोई झिझक नहीं है। पापा और बेटी की कहानी में यही सच दिखता है। रात को माँ मेरे कमरे में आकर साथ बिताती हैं। बहन के साथ भी ऐसा ही नाता है मेरा।.

अंकित बोल रहा हूँ, आप सबको नमस्ते। इतने लंबे वक्त बाद कोई कहानी नहीं टच कर पाया मैं। माफी चाहता हूँ, सच कहूँ तो दिमाग थोड़ा भटक गया था।

तुम्हारी तरफ से कई पत्र आए, हर बार नई चुदाई की कहानी चाहिए।

शायद तुमने पिछली कहानी में सुना होगा - एक चुदक्कड़ लड़का हूँ मैं।

केवल एक चूत चाहिए मुझे, सब कुछ तभी ठीक होगा।

इस कहानी का सिरा मेरी माँ शालिनी से जुड़ता है, फिर धीमे-धीमे बड़ी दीदी नेहा की ओर बढ़ता है।

अब मेरी माँ पचास के पार हो चुकी हैं।

लेकिन फिर भी, वो खुद को सँभाले रखती हैं।

अब तक तो आप सभी को पता ही होगा मेरी माँ के शरीर के बारे में, फिर भी एक झलक और दिखा दूँ।

मेरी माँ की छाती और उनका पिछला हिस्सा। वो जब आगे झुकती हैं, सामने खड़ा शख्स देखे तो मन में खयाल आए - उनकी छाती का सारा लवड़ निकाल डालूँ।

उसकी पीठ के पीछे वाला हिस्सा कुछ ऐसा लगता है, जैसे आंखें ठहर जाएँ। फिर बिना सोचे मन भी उछलने लगे।

नेहा दीदी के पास वो सब है जो माँ के पास होता है - फैला हुआ नितंब, उभरी छाती।

अभी तक हमारे घर में तीन लोग रहते हैं - वहाँ मौजूद हूँ मैं, मेरी माँ जिसका कई बार जिक्र होता है, और फिर पापा।

घर में भैया के साथ रहती हैं भाभी, वहीं दीदी परिवार के साथ ससुराल में हैं।

कभी-कभी उनकी माँ सिर्फ साड़ियाँ पहनती हैं, ब्रा या पैंटी कभी नहीं। घर में भी नहीं, बाहर भी नहीं। ऐसा वो कई सालों से कर रही हैं।

किसी को मनाने में ढेर सारी बातें लग जाती हैं, फिर भी वह अलग कपड़ा चुनती है।

अगर मन करे तो माँ की साड़ी ऊपर उठाओ, फिर धीरे से चूत में प्रवेश कर जाओ।

मेरी माँ हर रोज़ दो पुरुषों के साथ शारीरिक संबंध बनाती है।

शाम को जब मम्मी-पापा अकेले रहते हैं, तब वो मेरे पास आ जाती हैं।

उस रात, माँ के कमरे में आने से पहले।.

फिर मैं पापा के कमरे की तरफ बढ़ लिया।

उसकी माँ वहाँ सिर्फ कपड़े उतारकर लेटी हुई थीं।

तीन तकिए माँ की पीठ के नीचे थे, उनकी जांघें अलग होकर फैली थीं।

एक अजीब सी ख़ामोशी के बाद माँ के होंठ धीरे से खुले, पाव रोटी जैसी तप्त गर्मी में उनकी चूत ने लंड को घूरा, "अंदर आ जा," एक सिसकी की तरह ये शब्द फिसले।

पापा बोले, “अंकित के पास जाना है, या यहीं आराम करोगी?”

पापा ने फिर कहा, “कितने दिनों बाद जमकर तुम्हें चोदा है! तुम्हें तो नया लंड मिल रहा है, मुझे कोई दूसरी चूत नहीं मिल रही!”

माँ बोली, “नहीं, मैं अंकित के रूम जा रही हूँ! और तुम्हारे लिए भी किसी दूसरी चूत का इंतजाम कर दूँगी!”

जैसा कि तुम्हें पिछली बातचीत में पता चल गया होगा, घर में सब यह जानते हैं कि दूसरे क्या कर रहे हैं, बस सबसे बड़े भाई को छोड़कर।

तब माँ बिना कपड़ों के मेरे पास चली आईं।

बाहर कदम रखते ही उन्हें मैंने गोद में उठा लिया, फिर कमरे में ले जाकर सुला दिया।

मैंने माँ से कहा, “शालिनी डार्लिंग, आज कुछ ज्यादा चुदी हो!”

माँ बोली, “चुदती तो रोज हूँ! आज कम चुदी, लेकिन बुर, चूची, और गांड को दर्द ज्यादा मिला है!”

मैंने कहा, “शालिनी डार्लिंग, तुम्हारी गांड को देखकर यही मन करता है कि इसमें बांस डालकर फाड़ दूँ! इतनी मोटी, चिकनी, चौड़ी गांड में जब बांस डाला जाए, और तुम चीखो-चिल्लाओ, तो कानों को बड़ा सुकून मिलेगा!”

माँ बोली, “मन है, तो डाल लो! मैं मना नहीं करूँगी! मैं जिससे चुदती हूँ, उसे भरपूर मजा देती हूँ, भले ही मेरी जान चली जाए!”

सुनकर मैंने उनकी उंगलियों को छुआ, फिर धीमे स्वर में बोला - “तुम्हारे साथ इसी तरह प्रेम करना है, जब तक उम्र नहीं ढल जाती।”

माँ बोली, “बेटा, मुझसे वादा करो कि जब तक मैं जिंदा हूँ, तुम मुझे चोदोगे, भले ही मैं उतना मजा न दे पाऊँ!”

मैंने कहा, “हाँ, मैं तुम्हें पूरी जिंदगी चोदूँगा!”

माँ बोली, “सच में, तुम्हें मेरी गांड में बांस डालने का मन करता है?”

मैंने कहा, “मन तो करता है, लेकिन तुम मेरी जान हो! अपनी जान को मैं दर्द कैसे दे सकता हूँ?”

फिर मैंने पूछा, “पापा ने ऐसा क्या किया कि मेरी रंडी माँ की इतनी हालत खराब हो गई?”

माँ ने बताया, “आज मेरी चूची को बहुत बुरी तरह मसला, और गांड में एक मोटी मूली डालकर चूत को पेला!”

मैंने कहा, “तभी तो मेरी डार्लिंग का बुरा हाल था!”

उसके बाद, मम्मी को मेरे पास लेटा दिया।

बिल्कुल साफ-सफेद हम दोनों कपड़ेरहित थे।

माँ बोली, “तुम्हारे पापा चोदते समय सिर्फ अपना मजा देखते हैं, मेरा ख्याल नहीं रखते कि मुझे मजा आ रहा है या नहीं! और मैं भी यही चाहती हूँ कि जो मुझे चोदे, उसे भरपूर मजा मिले! इसलिए दर्द सहते हुए चुदती हूँ। हर कोई सुंदर औरत को चोदना चाहता है!”

मैंने वहीं पल माँ को कुतिया बना दिया, उनके पिछवाड़े को अपनी उंगलियों से खोला। फिर मैंने अपनी जीभ से उस छेद को चाटना शुरू कियa, थोड़ा धीरे से, ऐसे कि उन्हें हल्की राहत मिले।

अब माँ का खाना चटपटे से तैयार होने लगा।

माँ बोली, “बस बेटा, ऐसे ही चाटते रहो!”

मैंने कहा, “मेरी प्यारी रंडी, बेटा नहीं, भतार बोल! तुम घर के अंदर मेरी माँ नहीं, पत्नी हो! तुम्हारे माँग में सिन्दूर डालकर ही चोदना शुरू किया है!”

माँ बोली, “हाँ, मेरे चोदू भतार!”

इसके बाद करीब पंद्रह से बीस मिनट तक मैंने उसके पिछवाड़े को जीभ से चखा।

लड़के को यह सब करते हुए अच्छा लग रहा था, माँ के चेहरे पर वह मुस्कान देखकर।

इस बार मैंने कमर से पकड़कर लंड को धीरे से नहीं, बल्कि तेजी से अंदर धकेल दिया, आधा हिस्सा एकदम से चला गया भीतर।

चीख निकल पड़ी माँ के मुंह से।

कानों में उतर जाती है ये आवाज़।!

इसके बाद धीरे-धीरे मैंने माँ के साथ सेक्स शुरू कर दिया।

लंबाई भर के लिए मेरा सारा हिस्सा उसकी फैली पीठ के बीच घुल गया।

इसके बाद मैंने अपनी लंड को उनकी चूत में तेज़ी से धकेल दिया, पहले गांड से निकालकर।

लंड पूरा अंदर चला गया, माँ के भीतर।

माँ को झुलसा देने वाली ठंडक तब छू गई, जब इतने लंड स्वीकार हो चुके थे।

थोड़ी देर पहले से ही उसके अंदर तनाव था, माँ की योनि ने गीला कर दिया।

फिर मेरा भी बस हो गया, धीरे से माँ की गुद में अपना सब कुछ डाल दिया।

उसके बाद माँ को मेरे ऊपर ही सुला दिया गया।

होंठों पर माँ का स्पर्श था, धीरे-धीरे वो चूसने लगीं।

माँ बोली, “तेरा होंठ मुझे बहुत अच्छा लगता है!”

कुछ मिनट चूसने के बाद माँ बोली, “यदि फिर से पेलना है, तो लंड चूसकर तैयार करूँ?”

मैंने कहा, “नहीं, अब सो जाओ और आराम करो!”

बातों-बातों में आखिरकार नींद आ गई।

आँख खुलते ही ध्यान गया कि मम्मी बिलकुल नंगी होकर मेरे पास पड़ी सो रही थीं।

लगभग छह बजने वाले थे।

इसके बाद नींद आ गई मुझे।

आँख खुलते ही पहला दृश्य था - माँ का सरगरमी से घर संभालना।

आठ बजकर सत्ताईस मिनट पर मैंने फ़ोन की स्क्रीन देखी।

थोड़ी देर बाद, तौलिए से सिर के बाल सुखाते हुए मैं बिस्तर पर लेट गया।

थोड़ी देर के बाद मैं कमरे से बाहर आया। पापा पहले ही बैंक जाने के लिए तैयार थे, वो माँ को आवाज़ दे रहे थे।

अब तो समझ आ गया था, पापा उस दिन भी माँ को कुतिया पोज में लाकर चूत निचोड़े बिना वहाँ से नहीं हटेंगे।

सिर्फ़ ब्लाउज और पेटीकोट पहने, माँ अचानक किचन से बाहर आईं।

उसने पिता के पास जगह ले ली।

ऊपर की ओर से मैं ये सब कुछ देख रहा था।

उस दिन कुछ अजीब सा लगा, जब पापा ने माँ के होंठों पर मुँह लगाया।

थोड़ी देर में पिता ने माँ के ब्लाउज के बटन खोल दिए। फिर उनकी मोटी छाती पर हाथ फेरने लगे। चमकती निप्पल्स को धीरे से दबाया। घुंडियों पर अंगूठे घुमाए।

दर्द उसकी माँ के चेहरे पर समा गया था।

माँ बोली, “आज चूत नहीं पेलेंगे क्या?”

पापा बोले, “नहीं! बहुत दिन हो गया तुम्हारी चूचियों से खेले!”

तब पापा ने अपनी चीज़ बाहर निकाली, मम्मी के हाथ में सौंप दी।

एक समय पर माँ ने उस चीज़ को होंठों में लिया, फिर धीरे-धीरे चूसते हुए सब कुछ अपने भीतर उतार लिया।

उसके बाद पापा का ऑफिस की ओर पैर उठा।

वो जहाँ थीं, वहीं माँ सोने के लिए लेट गईं।

थोड़ी देर के बाद माँ स्नान करने चल पड़ीं।

पास बाथरूम में खड़ा मैंने आवाज दी, "सामने से शालिनी नंगी चलकर आओ।"

बाथरूम से बाहर कदम रखते ही माँ का शरीर ठंडी हवा में चमक उठा।

मैंने कहा, “शालिनी डार्लिंग, आज नंगी ही रहकर सारा काम करना!”

वो समझ गई थी कि मुझे बस उनकी छाती दिखे, धीरे-धीरे हिलती कमर भी।

फिर वह हिलते-ढुलते कदमों से आगे बढ़ने लगी।

बस इतना हुआ कि माँ किचन की ओर पैर उठाए, शरीर से कपड़े गायब। मैं तो वहीं अपने कमरे में जा टिका।

खाना तैयार होते ही माँ ने पुकारा।

खाना हम दोनों ने मिलकर खाया।

बाद में, कमरे की तरफ कदम बढ़ाए।

मैंने माँ से कहा, “जल्दी आना, सुबह से तुम्हें पेला नहीं हूँ!”

थोड़ी देर के बाद माँ कमरे में घुसीं, पकड़ने को तैयार।

माँ को अपने ऊपर लेटाया, फिर उनकी चिकनी तथा चौड़ी गांड पर हाथ फेरने शुरू किए।

माँ बोली, “अंकित, तुम्हारे पापा को नई चूत चाहिए। मुझसे कह रहे थे!”

मैंने कहा, “नेहा दीदी को बुला लो! पापा ने नेहा दीदी को पेला भी नहीं है! एक बाप को बेटी को पेलने का अलग ही मजा आता है, जैसे बेटे को माँ को पेलने में!”

माँ ने कहा, "अच्छा!"

उसके बाद मैंने माँ के गुलाबी होंठ चख लिए।

थोड़ी देर बाद, मैंने माँ को नीचे लिटा दिया। फिर उनकी जांघें धीरे से अलग कीं। इसके बाद मैंने अपना लिंग उनकी योनि में डालना शुरू कियa।

ऊपर-नीचे होती उसकी मोटी चूचियाँ, पेलते समय वो नज़ारा कुछ अलग ही लगता।

एक ही चूची पर मैंने तेज़ आवाज़ में कई बार वार किया।

उत्साह ऐसा था कि माँ भी पीछे नहीं रहीं।

माँ बोली, “फाड़ दे इस चूत को!”

इस बात को सुनते ही मेरी पेंचिंग की रफ्तार और बढ़ गई।

खुशी के मारे मैंने अचानक माँ के गाल पर हाथ उठा दिया।

हल्के से धक्के लगाते हुए मैंने जोश में आकर पानी छोड़ दिया, वो सब माँ की चूत में ही उतर गया।

सिर्फ इतना हुआ कि मैं माँ के पास लेटकर सो गया।

उसकी उँगलियाँ धीरे-धीरे मेरे सिर पर चलने लगीं, माँ का स्पर्श था।

तभी माँ बोली, “नेहा को मैंने पहले ही फोन पर सारी बात बता दी है! वो आज शाम तक आ जाएगी!”

मैंने जवाब दिया, "अच्छा!"

नेहा दीदी के आने का वक्त हो गया था।

बाद में, कपड़े धर लिए और घर से निकल पड़ा।

घर लौटने पर कई घंटे बाद उसने देखा कि माँ अब भी बिना कपड़ों के सो रही हैं।

उठकर मैंने आवाज़ दी, "अब तो कपड़े डाल लेना।"

माँ बोली, “पहले सो लेने दो! रात को तुम बाप-बेटे सोने नहीं देते!”

मैंने तुरंत जवाब दिया, "अच्छा!"

बाद में, कमरे के बाहर की ओर कदम उठा लिए।

फोन बजा, दोस्त की आवाज़ सुनाई दी। बाहर निकल पड़ा, मिलने के लिए रास्ता चुन लिया।

घर पहुँचते ही नज़ारा ये था कि नेहा दीदी अपने बच्चों के साथ आ गई थीं।

उस कहानी में जो थी नेहा दीदी के बारे में, वो अब खत्म हो चुकी।

एक बड़ी बहन को नंगा करके नचाया गया, उसके बाद उसके साथ यौन शोषण किया गया।

बस इतना कहना था। नेहा दीदी की त्वचा भी उबले दूध जैसी साफ़ है।

उनकी चूचियाँ मोटी हैं, बस माँ के समान। दूध आज भी निकलता है जब थोड़ा दबाव डाला जाए।

यानी उनकी चूचियों में से अब तक दूध बहता है।

उसकी कमर धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है, ठीक माँ की तरह।

नेहा दीदी के पास पहुँचकर मैंने पूछा - कहीं कोई दिक्कत तो नहीं हुई?

दीदी बोली, “बस पकड़कर बस अड्डे तक आई, और वहाँ टेंपो रिजर्व करके यहाँ आ गई!”

उसके बाद मैंने नेहा दीदी के एक-एक करके दोनों बच्चों को भोजन दिया।

माँ बनने का सफर नेहा दीदी के लिए खुशियों से भरा है - एक बेटा, एक बेटी।

साड़ी के पल्लू में हल्का कंपन था, दीदी दरवाज़े पर खड़ी थीं।

साड़ी के लाल रंग ने उनकी खूबसूरती को अलग ही चमक दी।

बगल में जगह ली मेरी, दीदी के पास बैठते हुए। माँ की तरफ़ मुड़कर बोला - “उन दोनों बच्चों को किसी और कमरे में भेज दो।”

कैसे-कैसे माँ ने दोनों बच्चों को सुरक्षित बाहर पहुँचा दिया।

उसकी तरफ मुड़कर बोला, "अरे भई, कैसी चल रही है जिंदगी?"

दीदी बोली, “हाल तो ठीक है! बस बेहाल करवाने आई हूँ!”

मैंने धीरे से नेहा दीदी के होंठों को चूसना शुरू किया, उनकी मोटी चूचियों पर हथेली रख दी।

उसके बाद मैंने साड़ी को ऊपर उठाया, और वो मेरी प्यारी भगिनी से कुतिया बन गई।

उसके सफेद और फैले हुए नितंब को देखकर वह बस पलट गया।

थोड़ा दर्द देने का मन बना। जोर से थप्पड़ मारते-मारते चार-पाँच बार में उनकी गांड लाल हो गई।

दीदी गाली देने लगीं और बोली, “मारना है, तो लंड से मार ना!”

सुनते ही मैंने अपनी गाँठ उसकी चूचल पर रखी, फिर ज़ोर से घुसा दिया।

चीख निकल पड़ी दीदी के मुंह से।

इस चीख को सुनते ही मन को शांति मिल गई।

दीदी बोली, “आराम-आराम से चोद ना!”

इसके बाद, धीमे-धीमे मैंने अपनी दीदी के साथ शुरू किया।

मज़ा दीदी को भी छूने लगा, अब उनके मुँह से सिसकियाँ निकल पड़ीं।

उसके बाद वह अपनी योनि से तरल छोड़ चुकी थी।

थोड़ी देर में मैंने भी उसकी जांघों के बीच आराम किया, फिर थकावट में लेटे-लेटे नींद आ गई।

उसके बाद दीदी ने मेरे ही ऊपर सिर टिका लिया।

मैंने दीदी से कहा, “आज रात बुरी तरह चुदोगी!”

दीदी बोली, “हाँ, चुदने ही तो आई हूँ!”

गरमी के अंत में पिताजी घर पहुँचे।

कमरे के अंदर प्रवेश करते हुए माँ ने पूछा, "नेहा, क्या तू तैयार है?"

दीदी बोली, “हाँ, मैं तैयार हूँ!”

माँ बोली, “पैंटी निकालकर जाना!”

दीदी बोली, “आज मैंने पैंटी पहनी ही नहीं है!”

बाद में, मम्मी घर से बाहर हो लीं।

खाने का समय हो गया था, सभी ने रात में पकवान चखे।

माँ मेरे कमरे की तरफ बढ़ी। दीदी ने पापा के कमरे का रुख किया।

खोलते ही सिस्टम, पापा के कमरे में लगा कैमरा चालू हुआ। नज़र गई तो दीदी वहाँ अकेली थीं।

उस दिन, मैंने पत्र माँ के पास रवाना कर दिया।

कमरे में घुसते ही माँ ने पापा को अंदर खींचा। "यह रही," उन्होंने कहा, "अपनी बेटी।" सब कुछ तुम्हारी मर्ज़ी से होगा।

उस पल दीदी की आँखें बंद थीं, धीरे से वो दुल्हन-सी लग रही थीं।

उसके बाद माँ वहाँ से निकल कर आ गईं।

उनके पिता बड़ी बहन के घर जा पहुंचे।

पापा बोले, “क्या करूँ, चुदाई में मैं रिश्ते भूल जाता हूँ!”

अचानक पापा ने सभी कपड़े उतार दिए। “खुलो आँखें,” वे बोले।

उसकी बड़ी बहन की पलकें हिलीं।

उसके पिता ने बड़ी बहन के होंठ चूम लिए।

उसके बाद धीरे-धीरे साड़ी का किनारा छूटता गया।

उस कमरे में खड़ा होकर मैंने दीदी के शरीर को निहारा।

उसके बाद बहन को बिस्तर पर लिटा दिया गया, फिर उनके स्तनों पर हाथ दबाया गया और दूध निकालकर पी लिया गया।

अब दीदी के साँस तेज हो गई।

अचानक मेरी माँ कमरे के अंदर दिखाई दीं।

माँ के साथ मैं भी धीरे-धीरे उस झपकती हलचल पर नज़र टिकाए बैठा।

उसके पापा ने धीरे से दीदी के गाल को छूते हुए अपना मोटा लंड उनके मुँह में घुसा दियa।

धीरे-धीरे दीदी ने लंड को मुँह में लेना शुरू किया।

थोड़ी देर चूसने के बाद पिता ने लिंग बाहर निकाला, फिर उसे दीदी की योनि में डाल दिया। इसके बाद वह एक तेज धक्का लगाकर अंदर घुस गया।

दीदी चीखने लगीं।

पापा मारते रहे, बीच-बीच में दीदी की चीख सुनाई देती।

ऊपर-नीचे हो रही थीं दीदी की मोटी चूचियाँ, हर शॉट पर पापा के। ऐसे लगता था जैसे कुछ सुंदर दिखे।

जब पापा दीदी के साथ शारीरिक संबंध बना रहे थे, तो मुँह से अश्लील शब्द निकाल रहे थे।

थोड़े दिनों तक ऐसा होता रहा, फिर धीरे-धीरे उन्हें भी इसमें खुशी महसूस होने लगी।

अब वो चिल्लाने की बजाय सिसकियाँ भरने लगीं।

तभी पापा ने तेज होकर दीदी की चुत में अपना सारा पानी छोड़ दिया।

थोड़ी देर के बाद, पापा ने दीदी को अपने ऊपर लिटाया। फिर उन्होंने लाइट बंद कर दी।

अब मैंने तो वेबकैम का स्विच ऑफ कर दिया।

इसके बाद माँ के योनि में लिंग डालकर संभोग करने लगा।

थकान थी, मैंने आँखें बंद कर लीं।

सुबह जैसे ही आँख खुली, माँ पहले से ही चहल-पहल में थीं - दीदी के बच्चों के साथ घिरी हुई।

एक बच्चा माँ से कुछ पूछ ही रहा था।

कौन जाने था कि उनकी माँ किसी के साथ हलचल में थी!

जब मैं पापा के कमरे के पास पहुँचा, तो धीरे से झांका - दरवाजा अंदर से हिल रहा था।

पिता अपनी बेटी के साथ गलत काम कर रहे थे, उसकी आवाज़ में डर था।

उसके बाद पिताजी कमजोर होकर बिस्तर पर लेट गए।

दीदी नंगी ही मेरे रूम में आईं और बोली, “पापा जानवरों से भी बुरे चोदते हैं! रात भर मेरे शरीर से खेले हैं!”

दीदी ने अपनी चूची, बुर, और गांड दिखानी शुरू कीं और बोली, “रात भर मेरी गांड में प्लास्टिक का मोटा लंड डालकर रखा था! और चूचियों को ऐसे दबा रहे थे, मानो उखाड़ ही देंगे! पापा दवा खाकर रात भर पेले हैं!”

दीदी बोली, “मैं कभी इतनी बुरी तरह चुदी नहीं हूँ!”

उस बार मैंने तेल निकालकर दीदी के सारे शरीर पर हल्के-हल्के हाथों से घिसा, इससे उन्हें आधा-अधूरा आराम जरूर मिला।

बाहर निकलते ही मुझे पता चला कि पापा ऑफिस निकल गए हैं।

बिना कुछ सोचे मैं माँ के पास पहुँचा। फिर आवाज़ छोड़ी, “तुम्हें दीदी के पास जाना है!”

हम लोग चल पड़े, माँ के साथ। दीदी के घर का रास्ता वैसे ही याद आया।

सुबह होते-होते मेरा किसी पर ध्यान नहीं गया था।

मैंने माँ से कहा, “दीदी को अपना शरीर चखाओ, और तुम भी चखो!”

होंठों पर सिर्फ उसकी माँ का ही ज़ोर था। “इतने दिन बाद,” वो बोली, “आज किसी को चोदूंगी मैं!”

दीदी बोली, “हाँ, चोद लो!”

एक समय पर, माँ ने दीदी के होंठों को अपने मुँह में लिया और पीने लगी।

सांसें तेज हो गई थीं।

मैंने कहा, “शालिनी डार्लिंग, पहले नंगी हो जाओ!”

धीरे-धीरे माँ का सारा लिबास उतर चुका था।

माँ ने दीदी के ऊपर लेटकर उनके स्तनों को छुआ, धीरे-धीरे हाथ फिराया।

मेरी माँ ने दूध से लबालब छातियों को चूसना शुरू किया।

माँ ने फिर से आगे बढ़कर दीदी की चूत की तरफ ध्यान दिया।

एक तरफ माँ ने धीरे से दीदी की जांघों के बीच अपना मुँह रख लिया।

सांसें भारी हो गईं, दीदी के मुंह से आवाज़ निकल पड़ी।

माँ ने धीरे से उंगली आगे बढ़ाई, फिर दीदी के प्राइवेट हिस्से में घुसा दिया।

उस तरफ मेरी सेहत खराब होने लगी थी।

लंबे समय तक हाथों में कुछ ऐसा चल रहा था, जिसे देखकर मन भटक गया।

मैंने माँ से पीछे हटने को कहा, फिर लंड को दीदी की चूत में धकेल दिया।

मैंने दीदी को ज़ोर-ज़ोर से मारना शुरू किया।

हर बार जब मैं हिलता, तभी उसके चेहरे पर खुशी दिखने लगी।

दीदी बोली, “फाड़ दे इस चूत को!”

इस बात को सुनकर मेरी गति और तेज हो गई।

थोड़ी देर में वह पानी डालना बंद कर देती।

थोड़ी देर बाद, उमंग में मैंने पानी छोड़कर माँ के पास ही लेट गए।

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