भाभी ने अकेले में नंगी होकर पहली चुदाई करवाई
Desisexkahaniya
एक दिन लगभग अंधेरा छाया था। मैंने खिड़की के पास खड़े होकर चुपचाप घटना को याद किया। भाभी के साथ वो रात कई बार आँखों के सामने आती है। हर पल धीमे-धीमे दिमाग में बजता है। शाम के बाद जब सब सो गए, तब हमने एक-दूसरे को छुआ। कोई बात नहीं हुई, फिर भी सब कुछ समझ में आ गया। हवा में कंपन सा उठा था। ऐसे लग रहा था जैसे सांसें भी ठहर गई हों। दीवारों ने कुछ नहीं कहा, पर सब कुछ देख लिया होगा। अब भी वो आवाजें कानों में गूंजती हैं।
एकदम अचानक पत्नी के यहाँ बेटा हुआ। गांव पहुँचा मैं, पर वापसी की टिकट न मिली। फिर एक दलाल के जरिए बुकिंग करवाई। उसने जो ट्रेन पकड़वाई, वो ढाई बजे रात को दिल्ली पहुँचने वाली थी। अंत में सोचा, फर्क क्या पड़ता है, टिकट तो मिल गई है। फिर तैयारी की धीमे-धीमे। उसी पल माँ को फोन किया - कल सुबह चार बजे घर पर होऊँगा।
एकदम अचानक मम्मी ने कहा - सुबह-सुबह उठने के लिए मुझे गोली पर भरोसा रखना पड़ता है।?
फिर मैंने सोचा कि आखिर करूँ क्या। इसलिए बड़ी भाभी को फोन किया। उधर से आवाज़ आई तो बोला - भाभी, मेरी ट्रेन तीन बजे सुबह पहुँचेगी। अगर जाग पाओगी, तो क्या मैं तुम्हारे यहाँ आ जाऊँ?
उसने कहा - ठीक है, अब मैं खड़ी होती हूं।
अब मैंने कह दिया, चलो ठीक है। उसके बाद मम्मी से बात कर ली - जाऊंगा भाभी के पास, वहीं रुक जाऊंगा। मम्मी ने जवाब दिया, अच्छा जाओ, आराम से सो जाना। फिर मैंने फिर से कहा, ठीक है।
शाम को जब मैं ट्रेन में बैठा, पत्नी आँखें सुखाए खिड़की से बाहर देख रही थी।
रुक जाओ कुछ समय के लिए। तुम्हारे बच्चे भी यहीं टिकेंगे। कुछ दिन गुज़रने पर मैं खुद आऊंगा तुम्हें लेने।
अचानक उसने कहा, चलो बस अब मैं तुम्हें स्टेशन तक ले चलती हूं।
अच्छा, मैंने कह दिया। वो मुझे स्टेशन पर उतारकर लौट गई। ट्रेन में जगह ढूंढकर बैठ गया। अब चल पड़ी गाड़ी। ध्यान गया तो पत्नी आंखों में आंसू लिए खड़ी थी। फोन उठाकर बोला -
रोने से क्या होगा, अब तो वह बीमार पड़ जाएगी।
अचानक आधी रात को नींद आई, पहले अलार्म सेट कर लिया था। सुबह ट्रेन ठीक समय पर दिल्ली स्टेशन पर रुकी, मैं बाहर उतरा - फिर वहीं से भाभी को फ़ोन लगाया।
अब मैं स्टेशन पर हूं, भाभी। आधे घंटे में पहुंच जाऊंगा।
फिर भाभी ने कहा - अच्छा, बस घंटी बजा देना। मैं दरवाज़ा खोल दूंगी।
अच्छा, मैंने कहा।
थोड़ी देर बाद मैं पहुंच ही गया। घेरा हुआ अंधेरा था। सवेरे के चार भी नहीं बजे थे। अचानक दरवाजा खुला, भाभी ने खोला था। वो सिर्फ ब्लाउज और पेटीको में थी। मेरे मन में कोई गलत बात नहीं आई।
ऊपर आने से पहले, गेट बंद कर लेना - यही तो भाभी ने कहा।
ऊपर जाते वक्त मैंने नजर डाली, तो पेटीकोट उसकी गांड में कहीं अटका हुआ था। ऐसे में मेरे मन में सवाल उठा। फिर मैं भी ऊपर पहुंचा, और तभी पता चला चाय बनने के लिए गैस पर रख दी गई थी।
कह दिया मैंने - छोड़ दे इसे, तुझे फ़िक्र क्यों सता रही है?
फिर वह बोली - तुम सच में पागल हो जाओगे क्या?
अचानक तुम आ गए, चाय का घूँट तो भर लो। वो अभी भी पेटीकोट और ब्लाउज में दिख रही थी। मेरी नज़रें इधर-उधर घूमने लगीं। चाय हमने साथ छींटी, फिर मैं अंदर जा बैठा। बर्तन धोकर वो भी अंदर आ गई।
उसने पूछा, क्या बल्देवपुर में सब सही चल रहा है?
ठीक है, मैंने जवाब दिया, सब कुछ सही चल रहा है भाभी।
उसके बाद मैं बोल पड़ा - बच्चा कहीं नजर आ रहा है?
फिर उसने कहा - सभी नानी के घर पहुँच चुके हैं।
ठीक है, मैंने कहा।
इसके बाद मैंने कहा - थोड़ी जगह दे दो, फर्श पर ही लेट जाऊंगा।
फिर उसके मुँह से निकला - यार, तुम्हें दिमाग चल गया है क्या? इतनी सर्दी में जमीन पर सोओगे?
अचानक मैं हाँ में सिर हिला दिया, धुंधला-सा दिमाग हो गया था। बाद में वही चादर तान के हम बिस्तर पर लेट गए। आखिरकार आंखों पर झपकी भारी पड़ नहीं रही थी। फिर मैंने इधर मुंह किया, उसने उधर मुंह किया, एक जैसी चादर तले शरीर ढक लिए। मेरी नींद पहले ही कहीं खो चुकी थी। ऐसे में ऊपर से भाभी के अजीब अंदाज भी चढ़ रहे थे।
मेरा लंड आहिस्ता-आहिस्ता ऊपर उठने लगा। भाभी ने मेरी ओर मुख करते हुए पलटन लिया, ऊपर से रजाई एक तरफ सरक गई। उनके बड़े स्तन मेरे सामने थे, धीमे-धीमे हिल रहे थे। मैं संभाल नहीं पा रहा था अब। एक छोटी खांसी निकल पड़ी, भाभी जाग गईं, बोली-
रात के समय बहनोई ने पूछा – क्या बात है, आँखें खुली रह गई हैं?
फिर मैंने बोला - कुछ तरह की अजीब खटपट सी हो रही है।
उसकी नज़र अचानक रजाई के ऊपर पड़ी। वो बोली - ये क्या चीज़ है? तुम्हें झटके लग रहे हैं क्या?
फिर मैंने कहा - जी हां।
थोड़ा सा मुस्कुराते हुए उसने कहा - सोने की कोशिश करना, नींद खुद-ब-खुद आ जाएगी।
वो दूसरी ओर मुड़कर लेट गई। गर्मी महसूस होने लगी मुझे। रजाई को कुछ हद तक हटाया, तब नजर आया कि भाभी का पेटीकोट ऊपर चढ़ चुका था, जांघों तक। उसमें उनकी सफेद जांघ अलग ढंग से झलक रही थी। धीरे-धीरे मेरा लौड़ा और तख्त हो गया। बाद में हिम्मत इकट्ठा कर ली मैंने।
ओह, याद आया, मेरे भैया का तो छह साल पहले इंतक़ाल हो गया था। मतलब अब भाभी विधवा हैं। फिर क्रमश: मैंने हौसला जुटाकर अपना एक पैर उनकी खुली जांघ पर डाल दिया। ऐसा लगा मानो कुछ गर्म और मुलायम चीज़ से टकराया होऊं। उसी बीच मूत्र की आदत होने लगी, तो ख्याल आया - शौचालय जाकर निकाल देना चाहिए।
अचानक मैंने रजाई को पलटकर फेंक दिया। अपने ऊपर उठे हुए लंड को समेटा। बाथरूम की ओर चल पड़ा मूतने के लिए। इधर भाभी झट से उछलकर खड़ी हो गई। मुँह खोला और आवाज़ निकली।
भाभी ने पूछा - तुम्हें कहाँ जाना है?
फिर मैंने कहा, अभी पहुँच रहा हूँ भाभी, मूत्र त्याग करके।
फिर उसने कहा – समझ में आया।
बाद में मैं पेशाब करके वापस आया। फिर मैंने भाभी से कहा – नीचे बिस्तर डाल दूँ?
फिर उसने पूछा - क्यों?
सुबह के समय मैंने बताया, इस पेंट के साथ आराम से नींद नहीं आ रही।
फिर उसने कहा: नीचे कुछ न बिछाओ, पेंट उतारकर सीधे लेट जाना।
मैंने धीरे से पेंट उतारी, ऊपर के सभी कपड़े भी निकाल डाले। अब मेरे पास सिर्फ कच्छा ही था। तय हो चुका था - आज जो होगा, भाभी को छूए बिना वापस नहीं जाऊंगा। इधर-उधर झांकता हुआ मैं रजाई के पास लेट गया। कुछ देर बाद भाभी की हलचल रुक गई, मानो गहरी नींद में डूब गई हो। मैंने आहिस्ता से अपनी टांग उनकी खुली जांघ पर रख दी। उनके मुंह से एक शब्द नहीं निकला।
एक हाथ आहिस्ता से उसके पेट पर रखा मैंने, छूना शुरू किया बिना किसी जल्दबाजी के। कोई प्रतिक्रिया नहीं आई भाभी की ओर से, एकदम चुपचाप। उस खामोशी ने डाला हौसला मेरे अंदर, और झट से रजाई हटा दी मैंने। भाभी ऊपर उठी खड़ी होकर। अब उनके मुंह से निकलने लगे शब्द -
भाभी: क्या हुआ?
मैंने पूछा - ये सब तुम क्यों कर रही हो, भाभी?
फिर वही अनजान भाव लिए पूछती है - मैं क्या कर रही हूँ?
उसकी निगाह सीधे मेरे ऊपर उठे हुए लंड पर टिक गई।
बोला मैंने - तुम पर क्या बीत गई है?
फिर वह मेरे पास आई, आँखें लाल करके बोली - छह साल हो गए तुम्हारे भाई के जाने के बाद। मैं अभी युवा हूँ। मेरे दिमाग में भी ख्याल उठते हैं।
बस इतना कहकर वो अपना ब्लाउज ढीला करने लगी, धीरे-धीरे सारे कपड़े ऊपर से उतार दिए। उसकी गोरी त्वचा पर मोटे चूचे देख मैं सहम गया, बस फिर कुछ नहीं सोचा। उसे बिस्तर पर जमा दिया, मुँह से चूचों को छूने लगा। वो हल्की-हल्की आवाजें निकालने लगी, सांस तेज हो गई। फिर मैंने पेटीकोट के अंदर हाथ घुमाया। कोई कपड़ा नहीं था वहां, तो एक उंगली आराम से उसकी चूत में चली गई।
हवा में सिसकियाँ तेज हो गईं। पलक झपकते चूचे छूट गए, पेटीकोट फर्श पर आ गया। सामने खड़ी थी गोरी, मेरी भाभी, लपेट में कुछ नहीं। फिर मैं नीचे झुका, उसकी चूत पर जीभ घुमाई। आग लग गई उसके शरीर में, सांसें तेज, आवाजें बढ़ीं। एक झटके में मुझे जमीन पर डाल दिया, कच्छा खींचकर दूर फेंक दिया। अब मैं भी था बिल्कुल नंगा।
उसने मुझे बिस्तर पर लिटा दिया, फिर बिना कुछ कहे मेरे लिंग को चूसना शुरू कर दिया। मैं तब बहुत ऊपर महसूस कर रहा था। धीरे-धीरे उसकी गति बढ़ने लगी, अब वो और जोश से काम ले रही थी। मेरा लिंग बार-बार उसके मुंह में जा रहा था, फिर बाहर आ रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे सब कुछ घूम रहा हो। कुछ देर ऐसे चलने के बाद, मैंने आवाज़ निकाली -
बाहर जा रहा हूँ मैं।
फिर बोला वो: मेरे होंठों पर ही समाप्त कर देना।
मैंने पिचकारी सीधा उसके मुँह में डाल दी। जो वो हर बूंद निगल गई।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0