नौकरी के रंग माँ बेटी के संग complete

लंबी कहानिया यहा पढे।
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Re: नौकरी के रंग माँ बेटी के संग complete

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ज्योति की बातों का मतलब मैं समझ गया था और मेरे होठों पे भी मुस्कान आ गई- घबराइए नहीं ज्योति जी… हम किसी को भी जबरदस्ती नहीं जगाये रखते… हमेशा दूसरों की चाहत का ख़याल रखते हैं…
मैंने भी अब ज्योति के दोअर्थी बातों का जवाब उसी के अंदाज़ में दिया।
‘हाय राम… अगर आप जैसा जगाने वाला हो तो मैं तो सारी उम्र जागने को तैयार हूँ…’ फिर से उसने शरारती अंदाज़ में कहा और इस बार मुझे ही आँख मार दी।
‘फिर तो हमारी खूब जमेगी…’ इस बार मैंने हल्के से उसे आँख मरते हुए कहा और हम तीनों एक साथ खिलखिला कर हंस पड़े।
खैर अब हम ज्योति के घर से बाहर निकले और उससे विदा ली… बाहर अब भी हल्की हल्की बारिश हो रही थी… ऐसी बारिश मुझे बहुत पसंद है, मेरा मन झूम उठा…
मैंने ज्योति से हाथ मिलाकर बाय कहा और वंदना ने उसे गले से लगा कर!
हम दोनों कार में बैठ गए और धीरे धीरे ज्योति की आँखों से ओझल होते हुए सड़क पर आ गये, हम दोनों के बीच ख़ामोशी थी। हम धीरे धीरे चले जा रहे थे.. अचानक फिर से बारिश तेज़ होने लगी और बिजलियाँ कड़कने लगीं।
बिजलियों की चमक में मेरा ध्यान वंदना के ऊपर गया तो मैंने उसके चेहरे पे डर का भाव देखा जो घर से आते वक़्त भी देखा था।
क्या मुझे वंदना से प्यार हो गया?
एक बात थी दोस्तो, जब हम घर से ज्योति के यहाँ आने के लिए चले थे तब और अब जब लौट रहे थे तब, मेरे और वंदना के बीच सबकुछ बदल सा गया था… क्यूंकि उस वक़्त मैं रेणुका जी के बारे में सोच सोच कर परेशां था और वंदना की तरफ ध्यान ही नहीं लगा पा रहा था, लेकिन वो कहते हैं न कि अक्सर कुछ पलों में जिंदगियाँ बदल जाती हैं… तो वैसा ही कुछ एहसास हो रहा था।
मैं यह नहीं कह रहा कि मुझे प्यार हो गया था.. क्यूंकि मैं यूँ एक नज़र में होने वाले प्यार और कुछ पलों में होने वाले प्यार पे यकीन नहीं करता, लेकिन एक बात जरूर मानता हूँ कि कुछ बदलाव जरूर आ जाते हैं कुछ पलों में…
मेरे होठों पे बरबस ही मुस्कान आ गई और अब मैं चोर नज़रों से अपने पास बैठी उस चंचल शोख़ हसीना के रूप और सौन्दर्य को निहारने लगा…
उसके चेहरे पे उसके बालों की एक लट बार-बार उसे परेशान कर रही थी और वो बार-बार उसे हटाने की कोशिश करे जा रही थी। अपनी धुन में बेखबर और कार में बज रहे हलके से संगीत पे हौले-हौले गुनगुनाती अपने लट को संभालती बाहर हो रही बारिश को निहारती वंदना मुझे अपनी तरफ खींचने लगी थी।
मैं उसे पसंद करने लगा था… और ये सहसा ही हुआ था।
मुझे यकीन होने लगा था कि अगर मैं रेणुका के मोह में इतना न उलझा होता तो शायद ये मेरे पास बैठी ख़ूबसूरत सी लड़की अब तक मेरे बाहुपाश में समां चुकी होती और शायद हम कई बार प्रेम के फूल खिला चुके होते।
यह सोच कर कर मैं मुस्कुराने लगा और धीरे से सड़क के किनारे एक बड़े से पेड़ के नीचे कार रोक दी।
कार रुकते ही वंदन ने मेरी तरफ देखा और फिर बड़े ही प्यार से अपनी आँखें नीचे कर लीं…
उसकी इस अदा ने मुझे घायल ही कर दिया.. मैं अब भी उसे देखे जा रहा था…
कहाँ तो थोड़ी देर पहले तक मैं वंदना को इतना सीरियसली नहीं ले रहा था लेकिन कुछ घंटे साथ में बिताने के बाद ही मैं उसकी तरफ आकर्षित होता जा रहा था…
बाहर तेज़ बारिश की बूंदों की आवाज़ और अन्दर एक गहरी ख़ामोशी…
‘खूबसूरत लड़कियों को देख कर बड़े ही रोमांटिक गज़लें निकल रही थीं जनाब के गले से…’ उस ख़ामोशी को तोड़ती हुई वंदना की आवाज़ मेरे कानों में पहुँची।
जब मैंने ध्यान से देखा तो अपना सर नीचे किये हुए ही बस अपनी कातिलाना निगाहों को तिरछी करके उसने मुझे ताना मारा।
उफ्फ्फ यह अदा… ऐसे अदा तब दिखाई देती है जब आपकी प्रेमिका आपसे इस बात पर नाराज़ हो कि आपने उसके अलावा किसी और की तरफ देखा ही क्यूँ…!! वैसे इस नाराज़गी में ढेर सारा प्यार छुपा होता है…
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‘अच्छा, वहाँ खूबसूरत लड़कियाँ भी थीं… मुझे तो बस एक ही नज़र आ रही थी… और मैंने तो वो ग़ज़ल भी बस उसी के लिए गाया था.’ मैंने भी उसे प्यार से देखते हुए कहा और मुस्कुरा दिया।
‘झूठे… जाइए, कोई बात नहीं करनी मुझे आपसे…’ वंदना ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा और अपना मुँह बना लिया बिल्कुल रूठे हुए बच्चों की तरह।
तभी जोर से बिजली कड़की… बस होना क्या था, चीखती हुई वो हमसे लिपट गई…
‘हा हा हा हा… डरपोक !!’ मैंने हंसते हुए धीरे से उसे अपनी बाहों में कसते हुए कहा।
‘फिर से डरपोक कहा मुझे… अब तो पक्का बात नहीं करुँगी…’ मेरे सीने से अलग होते हुए वंदना अपनी सीट पर जाने लगी।
और तभी मैंने उसे जोर से अपनी तरफ खींचा, अपने सीने से लगा कर इतनी जोर से जकड़ लिया मानो उसे अपने अन्दर समा लेना चाहता हूँ।
यूँ अचानक खींचे जाने से वंदना थोड़ी सी हैरान तो जरूर हुई लेकिन मेरी बाहों के मजबूत पकड़ में वो अपने सम्पूर्ण समर्पण के साथ किसी लता के समान मुझसे लिपट गई और हम दोनों के बीच सिर्फ खामोशियाँ ही रह गईं।
एक तरफ तेज़ बारिश की आवाज़ थी जिसके शोर में कुछ सुनाई नहीं दे रहा था लेकिन कार के अन्दर इतनी ख़ामोशी थी कि हम दोनों की उखड़ती साँसों की आवाज़ हम साफ़ साफ़ सुन पा रहे थे… बारिश की वजह से हवा में फैली नमी के साथ मिलकर वंदना के बदन से उठ रही एक भीनी सी खुशबू सीधे मेरे अन्दर समां रही थी और मदहोश किये जा रही थी।
लगभग 10 मिनट तक हम वैसे ही एक दूसरे की बाँहों में खोये रहे… न उसने कुछ कहा न ही मैंने!
फिर धीरे से मैंने अपनी पकड़ थोड़ी ढीली की लेकिन अब भी वो मेरी बाहों में ही थी, मैंने उसके चेहरे की तरफ देखा… घना अँधेरा था, बाहर भी और कार के अन्दर भी… कुछ साफ़ तो नहीं दिख रहा था लेकिन रुक रुक कर चमकती बिजलियों की रोशनी में उसके थरथराते होंठ और बंद आँखें उस पल को इतना रोमांटिक बना रही थीं कि दिल से यह दुआ आ रही थी कि ये पल यहीं रुक जाएँ!
कुछ पल मैं यूँ ही उसे निहारता रहा… फिर अपने एक हाथ से उसके चेहरे को ऊपर उठाया… उसने अपनी आँखें नहीं खोली।
मैंने धीरे से उसकी दोनों बंद आँखों के ऊपर से ही चूमा और फिर एक बार उसके माथे को चूम लिया।
अगर सच बताऊँ तो ऐसा मेरे साथ पहली बार नहीं हुआ था जब मैं किसी लड़की के साथ ऐसी सिचुएशन में था… लेकिन आज से पहले जब भी ऐसा हुआ था तब मेरे होंठ सबसे पहले सामने वाली लड़की या औरत के होठों से ही मिलते थे और एक जोरदार चुम्बन की प्रक्रिया शुरू करता था मैं… लेकिन आज पता नहीं क्यूँ मैं ऐसी हरकतें कर रहा था मानो मैं प्रेम से अभिभूत होकर अपनी प्रेमिका को स्नेह और दुलार से चूम रहा हूँ।
उसकी आँखों और माथे पर चूमते ही वंदना ने मुझे और जोर से पकड़ लिया और गहरी साँसें लेना शुरू कर दिया… मुझे लगा कि अब वो अपनी आँखें खोलेगी… लेकिन ऐसा नहीं हुआ… मैं अचंभित सा उसे देख रहा था और तभी एक कड़कती बिजली की रोशनी में मुझे उसके दोनों आँखों के किनारे से मोतियों की तरह आँसुओं की बूँदें दिखाई दीं।
मैं समझ गया था कि ये आँसू क्यूँ निकल रहे थे… यह अलग बात है कि मैं वासना और शारीरिक प्रेम का अनुयायी रहा और आज भी हूँ लेकिन उतना ही ज्यादा भावुक भी हूँ और किसी की भावनाओं को समझने की शक्ति भी रखता हूँ…
मैंने वंदना के चेहरे के करीब जाकर उसके कान में धीरे से पूछा- ए पगली… रो क्यूँ रही हो… मेरा छूना बुरा लगा क्या… अपनी बाहों से आजाद कर दूँ क्या?
इतना सुनते ही उसने आँखें खोलीं और मेरी आँखों में झाँका… इस बार तो आँसुओं की झड़ी ही लग गई…
‘समीर… आप मुझसे दूर तो नहीं चले जाओगे ना… क्या हम ऐसे ही रहेंगे जीवन भर… क्या आप ऐसे ही प्यार करते रहेंगे मुझे…’ एक साथ न जाने कितने सवालों से वंदना ने मुझे झकझोर सा दिया और यूँ ही आँखों से बहती अविरल अश्रु धारा लिए मुझे एकटक देखती रही…
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‘जीवन बस एक पल है वंदना… न इसके पीछे कुछ था और न ही इसके आगे कुछ होगा… जो है वो बस यही एक पल है… और इस पल में मैं तुम्हारे साथ हूँ… तुम मेरी बाहों में हो… बस इस पल में जियो और सबकुछ भूल जाओ… कल किसने देखा है…’ मैंने भी अपनी भावनाओं पर काबू करते हुए उसकी आँखों में देखकर कहा।
मेरी बातें सुनकर उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान उभर गई और फिर धीरे धीरे हमारे होंठ एक दूसरे के इतने करीब हो गए कि पता ही नहीं चला कब हमारे होठों ने एक दूसरे को अपने अन्दर समां लिया… हम सब कुछ भूल कर एक दूसरे से चिपक गए और यूँ एक दूसरे के होठों का रसपान करने लगे मानो कभी अलग नहीं होंगे… हमारी साँसें एक दूसरे की साँसों से टकराती और फिर एक दूसरे से मिल जातीं…
यूँ ही वंदना के होंठों को चूसते हुए मैं धीरे-धीरे वंदना के ऊपर ढलता गया और अपनी सीट से हटकर उसकी सीट के साइड में लगे लीवर को खींच कर उसकी सीट को पीछे की तरफ बिल्कुल लिटा सा दिया…
अब वंदना अपनी सीट पर बिल्कुल लेटी हुई थी और मैं उसके ऊपर अधलेटा हुआ था… हमारे होंठ अब भी एक दूसरे के साथ चिपके हुए थे, उसकी बाँहों ने मुझे जोर से जकड़ा हुआ था… और मेरे हाथ अब उसके बदन पर धीरे-धीरे फिसलने लगे… यूँ ही एक दूसरे के साथ चिपके हुए ही मेरे हाथों में उसका दुपट्टा आ गया और मैंने धीरे से उसे खींच कर अलग कर दिया…
लेकिन दुपट्टा खींचना इतना आसान नहीं था… मैं वंदना के ऊपर यूँ औंधा पड़ा हुआ था कि मेरे सीने और उसके उन्नत उभारों के बीच दुपट्टा बुरी तरह से फंस गया था और जब मैंने उसे खींचा तो सहसा ही वन्दना का ध्यान उस तरफ चला गया और उसने मेरे होठों को चूसना छोड़ दिया और अचानक से हमारी निगाहें एक दूसरे से टकरा गईं…
वंदना का दुपट्टा हटते ही उसकी दो खूबसूरत 32 साइज़ की चूचियाँ तेज़ चल रही साँसों की वजह से उभर कर मेरे सीने से कभी सट रही थीं और कभी हट रही थीं…
बड़ा ही कामुक सा दृश्य था वो..
मेरी नज़र सहसा ही उसकी उठती बैठती चूचियों पर टिक गईं। वंदना ने मुझे उसकी चूचियों को निहारते देख लिया और जब मैंने उसकी तरफ देखा तो उसने शर्मा कर मेरे सीने में अपना मुँह छुपा लिया..
यूँ लग रहा था मानो वो मेरी नई नवेली दुल्हन हो और सुहागरात को मैंने उसे पहली बार उसके कामुक बदन को निहारना शुरू किया हो…
मैंने उसे धीरे से खुद से थोड़ा सा अलग किया और झुक कर उसके होठों को एक बार फिर से अपने होठों में भर लिया… उसने भी उतने ही प्यार से मेरे होठों को फिर से चूसना शुरू कर दिया… और इसी बीच मैंने अपने दाहिने हाथ की उँगलियों से उसकी गर्दन और सीने के ऊपर चलाना शुरू किया…
मेरी छुअन ने आग में घी का काम किया और जैसे ही मेरी उँगलियों ने वंदना की चूचियों की घाटी में प्रवेश किया उसने मेरे होठों को जोर से चूसना शुरू किया… मेरी उँगलियाँ अब उसके कुरते के ऊपर से ही उसकी चूचियों की गोलाइयों का जायजा लेने लगीं और मैंने धीरे से अपनी पूरी हथेली को उसकी बाईं चूची पे रख दिया…
वंदना की धड़कनें इतनी बढ़ गईं कि मुझे बारिश के शोर में भी साफ़ साफ़ सुनाई देने लगीं…
मैंने अब अपनी हथेलियों को धीरे-धीरे उसकी चूचियों पे चलाना शुरू किया.. उसकी चूचियाँ इतनी कड़ी थीं मानो मैंने बड़े साइज़ का कोई अमरुद थामा हो.. 32 का साइज़ मेरी हथेलियों में पूरी तरह से फिट बैठ गया था और मैं मज़े से धीरे-धीरे अपना दबाव बढ़ाता गया।
मेरे हर दबाव के साथ हम दोनों का मज़ा दोगुना होता जा रहा था…
अब मैंने अपने बाएँ हाथों को वंदना के सर के नीचे से आज़ाद किया और उसकी दाईं चूची को भी थाम लिया… अब स्थिति यह थी कि मैं वंदना के होठों को खोलकर अपनी जीभ को उसके मुँह में डालकर उसके जीभ से खेल रहा था और अपने दोनों हाथों से उसकी खूबसूरत चूचियों को मसल रहा था…
वंदना के हाथ मेरी पीठ पे थे और वो मेरे शर्ट को अपनी हथेलियों में पकड़ कर खींच रही थी…
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धीरे-धीरे मेरे दायें हाथ ने उसकी चूची को छोड़ दिया और नीचे की तरफ उसके पेट को सहलाने लगा… पेट को थोड़ी देर सहलाने के बाद मेरा हाथ नीचे की तरफ बढ़ चला और मैं उसके जाँघों से लेकर नीचे जहाँ तक हो सके उसकी टांगों को सहलाना शुरू किया।
टांगों से होते हुए जब मेरे हाथ नीचे से ऊपर की तरफ आने लगे तब सहसा ही मेरी उँगलियाँ उसके कुरते के नीचे घुस गईं और और अब मेरी उँगलियों ने उसके चिकने मखमली त्वचा को छुआ…
उफ्फ… कितनी रेशमी थी उसकी त्वचा… मेरी उँगलियाँ खुद बा खुद कुरते के अन्दर फिसलती चली गईं और अब मेरी पूरी हथेली उसके कुरते के अन्दर थी… मैंने बड़े ही प्रेम से उसके मखमली पेट और उसकी नाभि को सहलाया… और धीरे-धीरे उसके कुरते को ऊपर की तरफ खिसकाना शुरू किया… खिसकते खिसकते उसका कुरता इतना ऊपर उठ गया कि अप मेरी उँगलियों से उसकी सिल्की ब्रा टकरा गई…
उसकी ब्रा के सिल्की एहसास ने मेरा जोश और दोगुना कर दिया और अब मैंने कोशिश करनी शुरू कर दी ताकि मेरी पूरी हथेलियों में उसकी चूचियाँ ब्रा सहित आ सके… लेकिन वंदन ने इतना कसा हुआ कुरता पहना हुआ था कि यह मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लगने लगा…
अपनी असफलता से दुखी होकर मैंने वंदना की आँखों में देखा और उसने मेरी मुश्किल को भांप लिया… अब हम दोनों ने एक दूसरे के होठों को आजाद कर दिया था और मैं इस उधेड़बुन में था कि वो खुद अपने कुरते को निकलेगी या फिर मुझे कोई इशारा देगी…
लेकिन वो बस शरारत भरे अंदाज़ में मुस्कुराती रही…
ये शायद उसका मौन निमंत्रण था जिसमें उसकी रजामंदी भी छिपी थी।
मैंने धीरे से उसे अपनी बाँहों का सहारा देते हुए उठाया और बैठा दिया… अब उसकी आँखों में एक टक देखते हुए उसकी कुरती को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर आहिस्ता-आहिस्ता ऊपर की तरफ निकलने लगा।
वंदना ने शरमाते हुए कार के बाहर चारों तरफ झांक कर सुनिश्चित किया कि कहीं कोई देख न रहा हो… और फिर धीरे से अपनी दोनों गुन्दाज बाहें उठा दीं।
जैसे ही कुरती उसके सीने से ऊपर हुई तो उस अँधेरे में भी उसकी सिल्की ब्रा चमकने लगी और उससे भी ज्यादा उसकी हसीन चूचियाँ दूध की तरह सफ़ेद और मखमली एहसास लिए हुए मेरी आँखों में चमकने लगी।
दोनों बाजुओं के ऊपर होने से उसकी चूचियाँ आपस में बिल्कुल सैट गई थीं और तनकर चूचियों की घाटी को और भी गहरा बना रही थी…
मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ और मैंने झुककर उन घाटियों के ऊपर अपने दहकते हुए होंठ रख दिए।
कुरती अब भी वंदना के गले में फंसी हुई थी और जैसे ही मैंने उसकी चोटियों पे चूमा.. उसने एक ज़ोरदार सांस खींच कर झट से लगभग अपने कुरते को फाड़ते हुए निकाल फेंका और मेरे सर को अपनी चूचियों में दबा लिया…
उफ्फ्फ… वो भीनी सी खुशबू… और वो रेशमी एहसास… बयाँ करना मुश्किल है…स
मैंने अपनी दोनों बाहों में उसके चिकने बदन को बिल्कुल समेट सा लिया और उसकी चूचियों पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी।
‘उफ्फ… समीर… मैं पागल हो जाऊँगी… ऐसा मत करो… सीईईई..’ वंदना ने एक कामुक सी सिसकारी लेते हुए धीरे से मेरे कान के निचले भाग को अपने होठों में भरा और कहा…
वासना और उन्माद की लहरें उसकी आवाज़ में साफ़ साफ़ सुनी जा सकती थी।
उसके ऐसा करने से मुझे थोड़ी सी गुदगुदी हुई और मैंने उसकी चूचियों को अपने दांतों से धीरे से काटा, मैंने उन घाटियों को इतना चूमा कि मेरे चूमने की वजह से वहाँ की पूरी त्वचा लाल सी हो गई… और मेरे मुँह से रिश्ते हुए लार की वजह से पूरी घाटी चमचमा उठी…
वंदना पूरे समर्पण के साथ अपनी आँखें बंद किये लम्बी लम्बी साँसें ले रही थी, मैंने धीरे से अपने हाथों को जो उसकी पीठ पर थे उन्हें सहलाते हुए वंदना की ब्रा के हुक के पास ले आया… मेरे होंठ अब भी उसकी चूचियों पर ही थे।
ब्रा का हुक टूट गया
क्रक… एक जानी पहचानी सी आवाज़ हुई… यह आवाज़ मुझे बहुत पसंद है… पता नहीं कितनी बार इस आवाज़ ने मेरे जोश को और दोगुना किया था… अब आप समझ ही गए होंगे क्यूँ…
इस आवाज़ ने यह एहसास दिलाया कि अब मेरी आँखें उन उन्नत विशाल कोमल कठोर यौवन पर्वतों के दर्शन करने वाले हैं जिसके दर्शन करने को इस पृथ्वी के सारे मर्दों की आँखें हर समय तरसती रहती हैं… चाहे ये पर्वत किसी भी आकार के हों, मर्दों की आँखों में ऐसे समां जाते हैं जैसे उन्हें कभी आँखों से ओझल न होने देना चाहते हों…

उस आवाज़ को सिर्फ मेरे कानों ने ही नहीं सुना था… वंदना को भी इस बात का पूरा एहसास हुआ और उसने झट से अपनी आँखें खोल लीं… और नारी सुलभ लज्जा के कारण अपने दोनों हाथों को अपने सीने पे रख कर अपनी चूचियों को ढक लिया।
वंदना की यह हरकत मुझे ये यकीन दिलाने के लिए काफी थे कि यह शायद उसके लिए पहला अनुभव था जब कोई मर्द उसके उभारों को नग्न देखेगा।
मैं उसे देख कर मुस्कुरा उठा और उसके चेहरे को पकड़ कर उसकी आँखों में आँखें डाल कर एक प्रेम से अभिभूत मिन्नत की… इस मिन्नत में कोई आवाज़ नहीं थी… बस खामोशियाँ और आँखों के इशारे…
प्रेम की कोई भाषा नहीं होती… यहाँ भी कुछ ऐसा ही हाल था। हम दोनों की आँखें एक दूसरे से बातें किये जा रहे थे। मेरी मिन्नत को समझने में वंदना को कोई परेशानी नहीं थी फिर भी औरत तो औरत ही होती है, उसने अपनी नज़रें झुका लीं.. मेरे हाथों ने अब भी उसके चेहरे को यूँ ही पकड़े रखा था।
तभी उसने अपने कांपते हुए हाथों को धीरे से अपने सीने से अलग करते हुए मेरे सर को हौले से पकड़ा और अपनी गर्दन ऊपर पीछे की तरफ करते हुए अपने सीने से लगा दिया।
हाथ हटते ही उसकी चूचियाँ मानो उछल कर बाहर आ गई हों… उसकी सिल्की ब्रा अब उसकी चूचियों को आज़ाद करके खुद एक संतरे के छिलके की तरह लटक चुकी थी पर अब भी उसकी बांहों में ही फंसी हुई थी।
आज़ाद होते ही उसकी बेहतरीन चूचियों पर मैंने अपने नाक से हर जगह की खुशबू लेनी शुरू की, पूरी की पूरी चूची इतने मदहोश कर देने वाली खुशबू छोड़ रही थी कि बस जी कर रहा था कि ऐसे ही उसकी पूरी खुशबू को अपनी साँसों में बसा लूँ।
सूंघते-सूंघते मैंने अपने दाँतों से उसकी ब्रा को पकड़ कर बड़े ही फिल्मी अंदाज़ में उसके हाथों से बाहर कर दिया और बेचारी वो सिल्की सी ब्रा सीट के नीचे गिरकर उस खजाने को लुटते हुए देखने लगी जिसे न जाने कितने दिनों से दुनिया की नज़रों से छुपा रखा था उसने।
मेरी नाक ने वंदना को कई ऐसे सिहरन दिए जिसे वंदना दबा कर नहीं रख पा रही थी और वो सिहरन सिसकारियों के रूप में उसके मुँह से बाहर आ रही थी.. उसकी उँगलियाँ मेरे बालों से अठखेलियाँ कर रही थी।
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अब बारी आई उसकी चूचियों के रसपान की… मैंने धीरे-धीरे अपने होठों से उसकी दोनों चूचियों को हर जगह चूमना शुरू किया… अँधेरे की वजह से मैं उन चूचियों को ठीक से देख नहीं पा रहा था और इस बात से मुझे बुरा लग रहा था।
तभी एक बिजली कड़की… और मेरी आँखों ने उन पर्वतों के साक्षात् दर्शन कर लिए… बस एक दो सेकंड सेकेण्ड के लिए ही सही लेकिन बिजली की चमक ने उन खूबसूरत उभारों को इतना उजागर कर दिया कि उत्तेजना में कड़ी उन चूचियों की नसें तक साफ़ दिख गईं और साथ ही उन चूचियों के ठीक मध्य भाग में वो गुलाबी सा घेरा और उस घेरे के ऊपर किशमिश के दाने के आकार की घुंडी…
उफ्फ्फ… मैं बावला हो गया और उस अचानक हुए उजाले में उन घुण्डियों की तरफ निशाना साध कर अपने होठों को टिका दिया.. निशाना बिल्कुल सटीक बैठा था।
अँधेरा अब भी था और बारिश की बूंदें अब भी शोर मचा रही थीं… लेकिन मेरे होठों ने जैसे ही वंदना की चूची की घुंडी को अपने अन्दर समेटा, एक जोरदार सिसकारी के साथ वंदना ने मेरे बालों को बड़े जोर से खींचा… अपने पैरों को बिल्कुल एक साथ जोड़कर यूँ ऐंठने लगी जैसे उसे किसी बिजली के तार ने छू लिया हो।
लम्बी-लम्बी साँसें… और धड़कते हुए दिल की आवाजों के साथ उसने अपने बदन को कदा कर लिया और अपनी कमर के 3-4 झटके दिए… मुझ जैसे अनुभवी खिलाड़ी के लिए यह समझना मुश्किल नहीं था कि मेरे होठों की छुवन ने वंदना को चरमोत्कर्ष पर पहुँचा दिया था और उसकी मुनिया ने अपने रस को धीरे से विसर्जित कर दिया था।
वंदना का पूरा बदन काँप रहा था… मैंने उसकी चूची की घुंडी को अपने पूरे मुँह में होठों के बीच रख लिया और अन्दर से अपनी जीभ की नोक को उस घुंडी पे चलाने लगा।
हमारी पाठिकाएँ इस एहसास को बखूबी जानती होंगी और यह भी जानती होंगी कि ये क्षण पूरे बदन को कितनी गुदगुदी से भर देते हैं… लेकिन इस गुदगुदी में हंसी नहीं निकलती बल्कि पूरे बदन में एक सिहरन सी दौड़ जाती है।
ऐसा ही कुछ वंदना के साथ भी हुआ और उसका बदन झनझना उठा… मैंने अपने जीभ की करामात जारी रखी और अब अपने दूसरे हाथ को वहाँ पहुँचा दिया जहाँ उसे उस वक़्त होना चाहिए था।
उसकी दूसरी चूची को अपने दूसरे हाथ की हथेली में भरते हुए मैंने उन्हें हौले-हौले मसलना शुरू किया।
वंदना भी अभी-अभी स्खलित हुई थी… इसलिए उसने अपने बदन को अब बिल्कुल ढीला कर दिया और अपने आप को मेरे हवाले कर दिया… अब मैंने उसकी पहली चूची को अपने होठों से अलग किया और फिर दूसरी चूची की तरफ बढ़ा।
उसकी दूसरी चूची को मुँह में भरने से वंदना को एक बार फिर से उत्तेजना हुई, मेरे दूसरे हाथ ने अब उसकी वो चूची थाम ली जिसे मैंने चूस चूस कर गीला कर दिया था।
एक तो पहले ही उसकी चूचियाँ चिकनी थीं, ऊपर से मेरे मुँह से निकले रस से सराबोर होकर और भी चिकनी हो गई थीं… मेरी हथेली में भरते ही उसकी चूचियों की चिकनाहट ने वो आनन्द दिया कि मैंने एक बार अपनी हथेली को जोर से भींच कर चूचियों को लगभग कुचल सा दिया।
‘आआह्हह… ..सीईईई ईईस्सस्स…’ बस इतना ही निकल सका उसकी जबान से..
मैंने मज़े से उसकी चूचियों का रसपान जारी रखा और साथ ही साथ मर्दन भी करता रहा।

हम दोनों दीन-दुनिया से बेखबर उस बारिश के शोर में एक दूसरे से लिपटे एक दूसरे के अन्दर समां जाने को बेकरार थे… मेरे हाथों ने अब अपना स्थान बदलना शुरू किया… चूचियों को होठों के हवाले करके अब मेरे हाथ उसके पेट पर चलते-चलते उसकी नाभि को एक बार फिर से छेड़ने लगे… उँगलियों ने जैसे ही नाभि को छुआ तो मेरा ध्यान उसकी तरफ खिंच गया… मैंने वंदना की चूचियों को अपने मुँह से निकला और अपनी जीभ को बाहर निकल कर चूचियों के घाटी के बिल्कुल बीच से होते हुए अपनी छाप छोड़ते-छोड़ते सीधा उसकी नाभि में समां कर रुक गए…
अब यह एक और ऐसी जगह है स्त्रियों के शरीर में जहाँ हलकी सी सरसराहट भी उत्तेजित कर देती है और अगर उस जगह जीभ रख दी जाए तो फिर तो सिहरन से शरीर उन्मादित हो उठता है। मैंने वंदना को वही उन्माद दिया था… अपनी जीभ की नोक को उसकी सुन्दर गहरी नाभि में यूँ चलाने लगा मानो एक छोटी सी कटोरी जिसके अन्दर सिर्फ कोई नुकीली चीज़ ही जा सकती है, वहाँ से कोई शहद चाट कर पी लेना चाहता हूँ…
नाभि को चूम-चूम कर मैं फिर से उसकी चूचियों को मसलने लगा। वंदना के हाथ पहले की तरह ही मेरे बालों से खेल रहे थे…
मेरे हाथों ने एक बार फिर से अपने स्थान परिवर्तन का फैसला किया और अब धीरे-धीरे चूचियों को सहलाते हुए पेट की तरफ बढ़े और फिर मेरी उँगलियाँ वंदना की पटियाला सलवार से टकरा गई… मैं अपनी उँगलियों को आहिस्ते-आहिस्ते कमर की तरफ से उसकी सलवार के अन्दर डाल दिया और लगभग दो उँगलियों से जितना संभव हो सके उतना नीचे की तरफ सरका दिया…
अब मेरी उंगलियों को खेलने के लिए उसकी नाभि और उसकी मुनिया के बीच की सपाट चिकनी सतह मिल गई और उँगलियों ने उस सतह को हौले-हौले सहलाना शुरू किया…
स्त्रियों का यह भाग बहुत ही संवेदनशील होता है… मेरी उँगलियाँ मानो मेरे होठों का मार्गदर्शन कर रही थीं। नाभि को अपने मन मुताबिक़ चूमने के बाद सहसा ही मेरे होंठ नाभि के ठीक नीचे उसी भाग को चूमने लगे… अब मेरे नाक में एक चिर-परिचित महक आने लगी…
जी हाँ… आपका अनुमान बिल्कुल सही है, यह महक वहाँ से आ रही थी जहाँ पहुँचने की लालसा हर एक मर्द में होती है… ‘चूत’ !!
एक मदहोश कर देने वाली महक जिसने हमेशा मुझे मदहोश किया है… आज भी और आज से पहले भी।
वंदना के सपाट पेट और चूत तथा नाभि के बीच के चिकने भाग पर मेरी जीभ खुद बा खुद फिसलने लगी… साथ ही साथ मेरी उँगलियाँ अब बड़े ही मुस्तैदी से वो डोर ढूंढ रहे थे जिसे खींचे बिना स्वर्ग के उस दरवाज़े के दर्शन नहीं हो सकते। ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी मुझे और वंदना के शलवार की डोरी मेरे हाथों में आ गई… मैंने उसके पेडू को चूमते हुए ही डोरी को हल्के से खींचा!
इस बार भी नारी सुलभ लज्जा का प्रदर्शन हुआ और एकदम से वंदना ने अपने हाथों से मेरे हाथों को रोकने का प्रयास किया लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी.. मेरे प्रेम भरे मनुहार ने वंदना के अन्दर अब विरोध करने की शक्ति को क्षीण कर दिया था… थोड़ी सी ना नुकुर के बाद मैंने डोरी को पूरी तरह खोल दिया और एक बार वंदना की तरफ देखा…
वंदना ने अपने हाथों से अपना मुँह ढक लिया… उसकी इस हालत पे मैं वासना भरी मुस्कान के साथ अपने काम में वापस लग गया…
हमें काफी देर हो चुकी थी… उस जगह रुके हुए और अपने प्रेम लीला शुरू किये हुए लगभग डेढ़ घंटे बीत चुके थे… वासना अपनी जगह है और जिम्मेदारियाँ अपनी जगह..
यह एक बात है मेरे अन्दर और यह मैं खुद नहीं कहता, बल्कि मेरे साथ सम्बन्ध बना चुकी हर उस लड़की या स्त्री ने कहा है जिसके हर बात का ध्यान रखा था मैंने।
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Re: नौकरी के रंग माँ बेटी के संग complete

Post by admin_dsk »

इस प्रेम लीला को बीच में रोक तो नहीं सकता था मैं क्यूंकि मैं खुद उन्माद से मरा जा रहा था.. अब देर करना उचित नहीं था.. वैसे भी हम एक छोटे से शहर में सुनसान सड़क पर थे।
अब मैंने झुक कर फिर से वंदना की नाभि से होते हुए अपनी जीभ की नोक को नीचे की तरफ सरकाना शुरू किया और साथ-साथ अपनी उँगलियों को उसकी सलवार और उसकी सिल्की पैंटी में फंसा कर हौले-हौले सरकाना शुरू किया… जैसे-जैसे उसकी शलवार पैंटी के साथ सरकती जा रही थी वैसे-वैसे मेरे होठ खाली हो रहे भाग पर अपनी छाप छोड़ रहे थे… और जितना मेरे होंठ चूत रानी के करीब पहुँच रहे थे उतना ही वंदना का शरीर काँप रहा था… उसका बदन आग की तरह तप रहा था, अगर उस वक़्त थर्मामीटर होता तो उसके बदन से सटाते ही उसका पारा उसे तोड़ कर बाहर आ जाता!
और अब अंततः मेरे होटों ने कुछ नरम रेशमी सा महसूस किया… यह रेशमी चीज़ और कुछ नहीं, वंदना के चूत पे उगे हुए रोयें थे… मैं एक बार को थोड़ा चौंका जरूर था।
वंदना की उम्र लगभग 18 साल से ज्यादा हो चली थी और इस उम्र में चूत के ऊपर रोयें नहीं होते बल्कि वो सख्त होकर झांट का रूप ले लेते हैं… लेकिन वंदना की चूत पर अब भी वो बाल बिल्कुल रोयें की तरह ही थे जो मेरे होठों और मेरे नाक पे गुदगुदी कर रहे थे।
अब लगभग मैंने उसकी चूत को पूरी तरह से नंगी कर दिया था… एक बार फिर वंदना ने आखिरी बार अपने सर्वस्व को छुपाने की नाकाम कोशिश की। उसने अपने दोनों हाथों को अपनी कोमल चूत पर रख लिया और उसे पूरी तरह से ढक लिया।
यह स्वाभाविक था…
मैंने उसके दोनों हाथों पे बारी-बारी से चुम्बन लिया और फिर अपने हाथों से पकड़ कर उसके हाथों को अलग किया। थोड़ी सी जद्दोजेहद के बाद मैंने उसकी मुनिया को पुर्णतः आज़ाद कर लिया और अपने होटों को उसकी संतरे के फांकों के सामान बंद चूत के ऊपर रख दिया…
उसके दोनों हाथ मेरे दोनों हाथों में थे… जैसे ही मैंने उसकी चूत पर अपने होंठ रखे उसने अपने हाथों को खींचना शुरू किया, लेकिन मैंने अपनी पकड़ बनाये रखी और उसकी चूत पे चुम्बनों की बरसात कर दी…
वंदना तो एक बार पहले ही झड़ चुकी थी और उसकी चूत से निकले हुए काम रस का साक्षात्कार मेरे होठों से भी हुआ था… उसकी चिपचिपाहट मेरे होठों पे लग चुकी थी लेकिन मेरे चुम्बनों की बरसात ने उसकी चूत को एक बार फिर से इतना उत्तेजित कर दिया कि चुदाई से पहले निकलने वाली रस से अब उसकी चूत सराबोर हो चुकी थी।
अब मैंने धीरे से उसके हाथों को छोड़ दिया क्यूंकि मैं जानता था की अब वो कोई विरोध नहीं करेगी… ऐसा ही हुआ और उसके हाथ अब मेरे सर को अपनी चूत पे दबाने लगे… मैंने अपनी उँगलियों से उसकी चूत के बंद दरवाज़े को थोड़ा सा फैला दिया और इस बार अपनी जीभ पूरी तरह से बाहर निकाल कर सीधा उसकी चूत के मुहाने तक घुसा दिया।
‘आऐईईईइ…’ एक किलकारी गूंजी उस शोर में और काम रस की दो तीन बूँदें सीधे मेरे जीभ पे गिरी… अब अगर मैं थोड़ी देर और ऐसे ही उसकी चूत को चाटता तो वो फिर से झड़ जाती और मैं ऐसा नहीं चाहता था… अबकी बार मैं उसे अपने लंड की चोट के साथ झाड़ना चाहता था।
पहली बार में लड़की अपने चूत को ज्यादा देर तक नहीं चटवा पाती है, यह मेरा अनुभव है लेकिन एक दो बार के बाद अगर चूत को सही तरीके से चाटा और चूसा गया हो तो फिर चूत को इसमें असीम आनन्द मिलता है और फिर तो चूत की मालकिनों को ऐसा चस्का लगता है कि बस पूछो ही मत… उनका बस चले तो सारी रात अपनी चूत को अपने प्रेमी से चुसवाती रहें और जीभ से उसकी चुदाई करवाती रहें!
समय की नजाकत को देखते हुए अब देर करना उचित नहीं था… लेकिन यह क्या… वंदना के हुस्न में मैं ऐसा खोया कि उसे तो पूरी तरह से नंगी कर दिया लेकिन खुद अब भी पूरे कपड़ों में था मैं…
मैं अपने आप पर हंस पड़ा… मैंने अब भी उसकी चूत को नहीं छोड़ा था और अपने जीभ से हौले-हौले उसकी चूत को छेड़ रहा था… मेरी हर हरकत वंदना को और भी पागल बना रही थी और वो जल बिन मछली की तरह तड़प रही थी।
मैं अब उससे थोड़ा अलग हुआ और जल्दी से अपने शर्ट के बटन खोलने लगा।
मेरे यूँ अचानक हटने से वंदना की आँखें बरबस ही खुल गईं और उसने अपना एक हाथ अपनी चूत पर रख कर अपने चूत के दाने को सहलाना शुरू किया… हालाँकि मुझे उससे इस बात की उम्मीद नहीं थी, मैं सोच रहा था की वो अब भी शायद थोड़ी झिझक समेटे यूँ ही अपने बदन को हिलाकर अपनी बेचैनी ज़ाहिर करेगी लेकिन शायद इस उत्तेजना को संभालना उसके लिए कठिन था।
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