नौकरी के रंग माँ बेटी के संग complete

लंबी कहानिया यहा पढे।
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Re: नौकरी के रंग माँ बेटी के संग complete

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उन सबकी शक्लें देखकर मुझे खुद बुरा लगने लगा… हालाँकि मुझे कोई भी काम नहीं था और मैं बस वंदना को टालने के लिए ऐसा कह रहा था… और कहीं न कहीं मेरे दिमाग में रेणुका का अपने पति के साथ अकेले होने का एहसास मुझे बुरा लग रहा था।
मैंने अपने आपको समझाया और सोचा कि मैं बेकार में ही दुखी हो रहा हूँ और अपनी वजह से सबको दुखी कर रहा हूँ। मुझे वंदना के साथ जाना चाहिए और शायद वहाँ जाकर मस्ती के माहौल में मेरा भी दिल बहल जायेगा और जितने भी बुरे विचार मन में आ रहे थे उनसे मुक्ति मिल जाएगी।
मैंने माहौल को बेहतर करने के लिए जोर का ठहाका लगाया- …हा हा हा… अरे भाई इतने सीरियस मत होइए आप सब… मैं तो बस मजाक कर रहा था और वंदना को चिढ़ा रहा था।
मैंने अपने चेहरे के भावों को बदलते हुए कहा।
‘हा हा हा… हा हा हा… … आप भी न समीर जी… आपने तो डरा ही दिया था।’ अरविन्द भैया ने भी जोर का ठहाका लगाया।
सब लोग वंदना की तरफ देख कर जोर जोर से हंसने लगे।
लेकिन रेणुका की आँखों ने मेरी हंसी के पीछे छिपी चिंता और परेशानी को भांप लिया था जिसका एहसास मुझे उसकी आँखों में झांक कर हुआ लेकिन उसने भी उस ठहाकों में पूरा साथ दिया।
वंदना तो थी ही चंचल और शोख़… मेरे मजाक करने और सबके हसने की वजह से उसने मेरी जांघ में जोर से चिकोटी काट ली।
उसकी इस हरकत से मेरे हाथों से चाय का कप मेरे जांघों के ऊपर गिर पड़ा।
‘ओह… वंदना यह क्या किया… तुम्हें ज़रा भी अक्ल नहीं है?’ अचानक से अरविन्द भैया ने वंदना को डांटते हुए कहा।
‘ओफ्फो… यह लड़की कब बड़ी होगी… हमेशा बच्चों की तरह हरकतें करती रहती है।’ अब रेणुका ने भी अरविन्द भैया का साथ दिया।
चाय इतनी भी गर्म नहीं थी और शुक्र था कि चाय मेरे शॉर्ट्स पे गिरी थी… लेकिन शॉर्ट्स भी छोटी थी इसलिए मेरी जाँघों का कुछ भाग भी थोड़ा सा जल गया था।
मैं सोफे से उठ खड़ा हुआ- अरे आप लोग इसे क्यूँ डांट रहे हैं… ये तो बस ऐसे ही गिर गया… और हमने इसका मजाक भी उड़ा दिया इसलिए सजा तो मिलनी ही थी… आप घबराएँ नहीं… चाय गर्म नहीं थी…
मैंने हंसते हुए सबसे कहा।
‘समीर जी आप जल्दी से बाथरूम में जाइये और पानी से धो लीजिये… वरना शायद फफोले उठ जाएँ…’ इस बार रेणुका ने चिंता भरे लफ़्ज़ों में मेरी तरफ देखते हुए कहा।
उसकी आँखों में सचमुच परेशानी साफ़ साफ़ दिख रही थी।
‘हाँ हाँ समीर, जाइये और इसे धो लीजिये…’ अरविन्द भैया ने भी जोर देते हुए कहा।
‘अरे कोई बात नहीं भैया… मैं अपने कमरे पे जा ही रहा हूँ वहीँ साफ़ कर लूँगा और तैयार भी हो जाऊंगा.. अब अगर वंदना के साथ नहीं गया तो पता नहीं और क्या क्या सजाएँ भुगतनी पड़ेंगी।’ मैंने वंदना की तरफ देख कर झूठ मूठ का डरने का नाटक करते हुए कहा।
मेरी बात सुनकर फिर से सब हंसने लगे।
‘ह्म्म्म… बिल्कुल सही कहा आपने.. अब जल्दी से तैयार हो जाइये.. हम पहले ही बहुत लेट हो चुके हैं।’ इस बार वंदना ने शरारत भरे अंदाज़ में मुस्कुराते हुए कहा और हम सबने एक बार फिर से ठहाके लगाये और मैं अपने घर की तरफ निकल पड़ा।
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वैसे तो चाय ठण्डी थी लेकिन इतनी भी ठण्डी नहीं थी, मेरी जाँघों में जलन हो रही थी।
मैं भागकर सीधा अपने बाथरूम में घुसा और पानी का नलका खोलकर अपने जांघों को धोने लगा।
यह अच्छा था कि मैंने शॉर्ट्स के अन्दर जॉकी पहन रखी थी जिसकी वजह से मेरे पप्पू तक चाय की गर्माहट नहीं पहुँची थी वरना पता नहीं क्या होता.. यूँ तो गरमागरम चूतों का दीवान होता है लण्ड, लेकिन अगर शांत अवस्था में कोई गरम चीज़ गिर जाए तो लौड़े की माँ बहन हो जाती है…
खैर, अब मैंने अपना शॉर्ट्स उतार दिया और सिर्फ जॉकी में अपने पैरों और जांघों को धोने लगा।
जब मैं अपने घर में घुसा था तो हड़बड़ाहट की वजह से न तो बाहर का दरवाज़ा बंद किया था न ही बाथरूम का… जिसका अंजाम यह हुआ कि जैसे ही मैं अपनी जाँघों को धोकर मुड़ा, मैं चौंक गया…
सामने वंदना बाथरूम के दरवाज़े पे खड़ी अपनी लाल लाल आँखें लिए हुए मुझे घूर रही थी।
‘अरे तुम कब आईं?’ मैंने उसे देखते ही अपने हाथों से बाथरूम में पड़ा तौलिया खींचा और अपने कमर पे लपेटते हुए उसकी तरफ बढ़ा।
‘बस अभी अभी आई… वो मम्मी ने यह जेल भेजा है…!’ वंदना ने अपनी आँखें चुराते हुए कहा और मुड़ कर बाथरूम के दरवाज़े से सरकती हुई दूसरे कमरे की तरफ बढ़ गई।
‘अरे इसकी कोई जरूरत नहीं है… बस थोड़ी सी जलन है ठीक हो जायेगा।’ मैं भी उसके पीछे पीछे तौलिया लपेटे बढ़ गया।
बाथरूम के ठीक बगल में मेरा सोने का कमरा था, वंदना सर झुकाए बिस्तर के बगल में रखे कुर्सी पर बैठ गई। ऐसा लग रहा था मानो वो अपराध-बोध से शर्मिंदा हुए जा रही थी।
इतनी चंचल और शरारती लड़की को यूँ सर झुकाए देखना मुझे अच्छा नहीं लगा और मैं उसके पास जाकर खड़ा हो गया।
‘अरे वंदना जी… अब इतना भी उदास होने की जरूरत नहीं है। तुमने कोई जान बुझ कर तो चाय नहीं गिराई न.. वो बस ऐसे ही गिर गई, इसमें उदास होने वाली क्या बात है?’ मैंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
मेरी बात सुनकर उसने अपना सर उठाया और जब मेरी नज़र उसकी नज़र से मिली तो मेरा दिल बैठ सा गया। उसकी आँखों में आंसू थे। उसकी हिरनी जैसी बड़ी बड़ी खूबसूरत आँखें आँसुओं से डबडबा गई थीं।
एक पल को मैं हैरान सा हो गया… उसकी आँखों के पानी ने मेरी जलन से मेरा ध्यान हटा दिया था.. अब मुझे बुरा लगने लगा।
‘ओफ्फो… अब इसमें रोने की क्या बात है?’ मैंने उसका चेहरा अपनी दोनों हथेलियों में भरा और उसकी आँखों में आँखें डालकर उसे चुप कराने की कोशिश की।
लेकिन जैसे ही मैंने उसका चेहरा पकड़ कर अपनी तरफ किया, वैसे ही उसकी आँखों ने आँसुओं के दो मोती छलका दिए जो सीधे मेरे हाथों में गिरे।
मैंने जल्दी से अपने हाथों से उसके आँसू पौंछे और उसके माथे पर एक प्यार भरा चुम्बन दे दिया।
‘बेवक़ूफ़… ऐसे छोटी छोटी बात पर कोई रोता है क्या?’ मैंने उसे चुप कराते हुए कहा।
‘मुझे माफ़ कर दीजिये समीर जी… मैंने गुस्से में आपको तकलीफ दे दी।’ वंदना ने रुंधे हुए गले से कहा और एक बार फिर उसकी आँखों से आंसू छलक पड़े।
उफ़… उसकी इस बात पे इतना प्यार आया कि दिल किया उसे गले से लगा कर सारा दर्द अपने अन्दर समेट लूँ… आज वंदना की इस हालत ने मुझे उसकी तरफ खींच लिया था।
‘अब चुप हो जाओ और चलने की तैयारी करो, मैं बस थोड़ी देर में आया!’ इतना कह कर मैंने उसे उठाया और अपने घर जाने के लिए कहा।
‘नहीं, पहले आप कहो कि आपने मुझे माफ़ कर दिया… तभी जाऊँगी मैं वरना मुझे कहीं नहीं जाना…’ अपने आँसू पोंछते हुए उसने अधिकारपूर्ण शब्दों में कहा और मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए।
‘अरे बाबा, तुमने कोई गलती की ही नहीं तो फिर माफ़ी किस बात की? ये सब तो होता रहता है।’ मैंने उसे फिर से समझाते हुए कहा।
‘नहीं, मैं कुछ नहीं जानती.. अगर आपने मुझे माफ़ नहीं किया तो मैं फिर आपसे कभी बात नहीं करूँगी।’ उसने इतनी अदा से कहा कि बस मेरा दिल प्यार से भर गया..
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‘अच्छा बाबा, मैंने आपको माफ़ किया… अब खुश?’ मैंने फिर से उसका चेहरा अपने हथेलियों में लिया और उसकी आँखों में देखते हुए कह दिया।
‘ऐसे नहीं… पहले मुझे यकीन होने दीजिये कि आपने सच में मुझे माफ़ कर दिया…’ उसने फिर से अपनी जिद भरी बातें कही।
‘तो अब तुम्हीं बताओ कि क्या करूँ जिससे तुम्हें यकीन हो जाए…’ मैंने सवाल किया।
‘अगर आपने सच में मुझे माफ़ किया है तो ये जेल मैं खुद आपके जलन वाली जगह पे लगाऊँगी, तभी मुझे यकीन होगा..’ उसने एक ही सांस में मेरी आँखों में आँखें डालकर बिना अपनी पलकें झपकाए कहा।
वंदना की बात सुनकर एक पल के लिए तो मैं स्तब्ध हो गया… ये लड़की क्या कह रही है… कसम से कहता हूँ दोस्तो, अगर मैंने उसकी माँ रेणुका को नहीं चोदा होता तो शायद उसकी इस मांग पर मैं फूले नहीं समाता। इतनी खूबसूरत लड़की और वो चाहती थी कि वो मेरे जाँघों पे जेल क्रीम से मालिश करे… कौन मर्द ये नहीं चाहेगा कि एक बला की खूबसूरत हसीना अपने नाज़ुक नाज़ुक हाथों से उसकी मालिश करे और वो भी जाँघों पे। लेकिन पता नहीं क्यूँ मुझे अचानक से रेणुका का ख़याल आने लगा.. कहीं मैं उसके विश्वास के साथ दगेबाज़ी तो नहीं कर रहा… अगर उसे पता चला तो वो क्या समझेगी.. तरह तरह के सवाल मेरे मन में आने लगे।
‘क्या हुआ… क्या सोचने लगे… देखा ना मुझे पता था कि आपने मुझे माफ़ नहीं किया…’ वंदना ने मेरा ध्यान तोड़ते हुए फिर से रोने वाली शक्ल बना ली।
‘अरे बाबा ऐसा कुछ भी नहीं है… तुम समझने की कोशिश करो, मैं यह जेल खुद ही लगा लूँगा… मैं वादा करता हूँ।’ मैंने उसे समझाते हुए कहा।
‘मुझे कुछ नहीं सुनना.. मैंने कह दिया सो कह दिया…’ उसने जिद पकड़ ली।
अब मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ… मुझे इतना पता था कि अगर उसने मेरी जाँघों को छुआ तो मैं अपने ज़ज्बातों पे काबू नहीं रख नहीं सकूँगा और लण्ड तो आखिर लण्ड ही होता है… वो तो अपना सर उठाएगा ही… हे भगवन, अब आप ही कुछ रास्ता दिखाओ…!!
शायद भगवन ने मेरी सुन ली और एक रास्ता दिखा दिया… हुआ यूँ कि अचानक से बिजली चली गई और पूरे कमरे में अँधेरा छा गया…
हम दोनों एक दूसरे का हाथ थामे चुपचाप खड़े थे… कमरे में सिर्फ हमारी साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
मैंने एक बार फिर से उसे समझाने के लिए उसके हाथों को जोर से पकड़ा और उसके चेहरे के पास अपना चेहरा ले जाकर धीरे से कहा- यह ठीक नहीं है वंदना… मान भी जाओ..देखो हमें देर भी हो रही है… और मैंने कहा न कि मैं दवा लगा लूँगा।
मैंने धीरे से फुसफुसा कर उसके कान में कहा।
मेरे बोलते वक़्त मेरी साँसें गर्म हो चुकी थीं और उसके गालों पे पड़ रही थीं। शायद इससे उसकी आग और भड़क गई और उसने भी उसी तरह फुसफुसाते हुए गर्म साँसों के साथ मेरे कान के पास अपने होंठ लाकर कहा- प्लीज समीर जी… मान जाइये, मेरी खातिर… मुझे लगेगा कि मैंने जो गलती की है उसके बदले आपकी मदद कर रही हूँ… प्लीज !
उसने अपने साँसों की खुशबू मेरे चेहरे पे छोड़ते हुए इतने सेक्सी अंदाज़ में कहा कि मेरे तो रोम रोम सिहर उठे।
आप सबने यह महसूस किया होगा कि जब इंसान वासना की आग में गर्म हो जाता है तो उसकी फुसफुसाहट काम भावना का परिचय देती है, ऐसा ही कुछ मुझे उस वक़्त महसूस हो रहा था।
‘मैं जानती हूँ कि आपको शर्म आ रही है… लेकिन शायद ऊपरवाले ने आपकी इस समस्या का हल भी भेज दिया है.. बिजली चली गई है और पूरा अँधेरा है… अब तो आपको शर्माने की भी कोई जरूरत नहीं है.. और अगर अब भी आप चाहोगे तो मैं अपनी आँखें बंद कर लूँगी… लेकिन दवा लगाए बिना नहीं जाऊँगी।’ अपनी जिद और अपनी मंशा ज़ाहिर करते हुए उसने मुझे पूरी तरह से विवश करते हुए मुझे धीरे से बिस्तर की तरफ धकेलते हुए बिठा दिया।
अँधेरे की वजह से वो कुछ देख नहीं पायेगी, इस बात की संतुष्टि तो थी लेकिन एक और भी डर था कि अँधेरे में उसका हाथ जाँघों से होता हुआ कहीं मेरे भूखे लंड पर गया तो फिर वंदना को चुदने से कोई नहीं बचा पायेगा… और मैं यह चाहता नहीं था क्यूंकि अब तक मेरे दिमाग से रेणुका का ख्याल गया नहीं था… और पिछले 3–4 दिनों से रेणुका को चोदा नहीं था.. अरविन्द भैया की वजह से हमें मौका नहीं मिला था।
और मैं जानता था कि मेरा लंड अगर उसके छूने से जाग गया तो अपना पानी झाड़े बिना नहीं मानेगा।
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इस उहापोह की स्थिति में मैंने एक फैसला किया और बिस्तर से उठ कर रसोई की तरफ गया।
मेरे अचानक यूँ उठने से वंदना को अजीब सा लगा और अँधेरे में ही उसने टटोलते हुए मेरा हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींचा- क्या हुआ… कहाँ जा रहे हैं आप?
वंदना ने चिंता भरे लहजे में पूछा।
‘बस अभी आया… तुम यहीं रुको।’ मैंने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा और रसोई में चला गया।
पहले तो टटोलकर फ़्रिज़ का दरवाज़ा ढूंढा और पानी की बोतल निकाल कर एक ही घूंट में पूरी बोतल खाली कर दी… मेरे सूखते हुए गले को थोड़ी सी राहत मिली।
फिर मैं फ़्रिज़ के ऊपर से जैसे तैसे मोमबत्ती तलाशने लगा और किस्मत से एक मोमबत्ती मिल भी गई, वहीं पास में माचिस भी मिल गई और मैंने मोमबत्ती जला ली।
जलती हुई मोमबत्ती लेकर मैं वापस कमरे में आया और बिस्तर के बगल में रखे मेज पर उसे ठीक से लगा दिया। मोमबत्ती की हल्की सी रोशनी में वंदना का दमकता हुआ चेहरा मेरे दिल पर बिजलियाँ गिराने लगा।
कसम से कह रहा हूँ, उस वक़्त उसे देख कर ऐसा लग रहा था मानो कोई खूबसूरत सी परी सफ़ेद कपड़ों में मेरे सामने मेरा सर्वस्व लेने के लिए खड़ी हो… मैं एक पल को उसे यूँ ही निहारता रहा।
‘अब आइये भी… अब देरी नहीं हो रही क्या?’ वंदना ने शरारत से मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा और मुझे बिस्तर पर आने को कहा।
‘हे ईश्वर, कुछ भूल होने से बचा लेना..’ मैंने मन ही मन भगवान से प्रार्थना की और धीरे से बिस्तर पे बैठ गया।
मैं उस वक़्त सिर्फ एक तौलिये में था सिर्फ अन्दर एक वी कट जॉकी पहनी हुई थी और ऊपर बिल्कुल नंगा था।
वंदना अब भी बिस्तर के बगल में हाथों में जेल लिए खड़ी थी।
उसने मुझे अपने पैरों को ऊपर करके सीधे लेट जाने को कहा, मैं चुपचाप उसकी बात सुनते हुए अपने पैरों को उठा कर बिल्कुल सीधा लेट गया।
उसने मुझे बिस्तर के थोड़ा और अन्दर की तरफ धकेला और फिर मेरे जाँघों के पास मुझसे बिल्कुल सट कर बैठ गई।
वंदना इस तरह बैठी कि उसका चेहरा मेरी टांगों की तरफ था और सामने मोमबत्ती जल रही थी जिस वजह से मुझे बस उसके शरीर के पीछे का हिस्सा रोशनी की वजह से सिर्फ एक आकार की तरह नज़र आ रहा था। मेरे कूल्हे और उसके कूल्हे बिल्कुल चिपके हुए थे जो अनायास ही मुझे गर्मी का एहसास करा रहे थे।
उसके शरीर से इतना चिपकते ही मेरे लंड ने हरकत शुरू कर दी और धीरे धीरे अपना सर उठाने की कोशिश करने लगा, लेकिन मन में द्वन्द चल रहा था इस वजह से मेरा लंड पूरी तरह सख्त न होकर आधा ही सख्त हुआ और बस मेरी ही तरह वो बेचारा भी उहापोह की स्थिति में फुदक कर अपनी बेचैनी का एहसास करवा रहा था।
अब वंदना ने धीरे से मेरे कमर में लिपटे तौलिये को खोलने के लिए अपने हाथ बढ़ाये और तौलिये का एक सिरा पकड़ कर खींचना शुरू किया। मैंने अपना एक हाथ बढ़ा कर उसे रोकने की कोशिश की लेकिन उसने मेरा हाथ हटा दिया और तौलिये को पूरी तरह से कमर से खोल दिया।
अब स्थिति यह थी कि मैं खुले हुए तौलिये के ऊपर बस एक जॉकी में लेटा हुआ था। उसने अपने हाथ मेरे पैरों पे रख दिया और उन्हें फ़ैलाने का इशारा किया.. उफ्फ्फ… उसके नर्म हाथ पड़ते ही मेरे पैर एक बार तो काँप ही गए थे।
ऐसा पहली बार नहीं था जब मैं किसी लड़की के सामने ऐसे हालात में था… लेकिन उन लड़कियों या औरतों को मैं मन से चोदने के लिए तैयार रहता था और इस बार बात कुछ और थी।
मैं वंदना के साथ इस हालत में होकर भी उसे चोदने के बारे में सोच नहीं पा रहा था… अगर रेणुका का ख्याल दिमाग में न होता तो अब तक वंदना मेरी जगह इस हालत में लेती होती और मैं उसकी जाँघों की मालिश कर रहा होता।
खैर, मोमबत्ती की रोशनी में जैसे ही वंदना ने मेरे जाँघों पे पड़े छालों को देखा उसके मुँह से एक सिसकारी निकल गई- हे भगवन… कितना जल गया है! और आप कह रहे थे कि कुछ हुआ ही नहीं?
उसकी आवाज़ में फिर से मुझे रोने वाली करुण ध्वनि का एहसास हुआ।
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‘अरे कुछ नहीं हुआ बाबा.. तुम यूँ ही चिंता कर रही हो!’ मैंने स्थिति को सँभालते हुए कहा और अपनी कमर से ऊपर उठ कर बैठ सा गया।
‘चुपचाप लेटे रहिये… अब मैं आपकी कोई बात नहीं सुनूँगी।’ उसने मेरे मुँह को अपनी हथेली से बंद करते हुए मुझे धीरे से धकेल कर फिर से सुला दिया।
अब मैं चुपचाप लेट गया और इंतज़ार करने लगा कि वो जल्दी से जल्दी दवा लगाये और यहाँ से जाए… वरना पता नहीं मैं क्या कर बैठूं…
वंदना ने अपनी उँगलियों में जेल लिया और मेरे छालों पे धीरे धीरे से उँगलियाँ फेरने लगी। उसकी उँगलियों ने जैसे ही मेरे छालों को छुआ, मुझे थोड़ी सी जलन हुई और मैं सिहर गया।
मेरी सिहरन का एहसास वंदना को हुआ और तुरंत अपना एक हाथ मेरे सीने पे रख दिया और सहलाने लगी जैसा कि हम बच्चों को चुप करने के लिए करते हैं… उसकी उँगलियाँ अब मेरे सीने के बालों को सहला रही थी और दूसरी तरफ दूसरे हाथ कि उँगलियाँ मेरे छालों पे जेल लगा रही थी.. उस जेल में कुछ तो था जिसकी वजह से एक अजीब सी ठंढक का एहसास होने लगा, मुझे सच में आराम मिल रहा था।
लेकिन इस तरह से जाँघों और सीने पे एक साथ नाज़ुक नाज़ुक उँगलियों की हरकत ने अब आग में घी का काम करना शुरू कर दिया। हम दोनों बिल्कुल चुप थे और बस लम्बी लम्बी साँसे ले रहे थे।
उसके हाथों की नजाकत ने अपना रंग दिखाया और मेरे शेर ने अब पूरी तरह से अपना सर उठा लिया.. वी कट जॉकी में जब लंड अपने पूरे शवाब में आ जाता है तो आप सबको भी पता है कि क्या हालत होती है.. मेरे लंड ने भी तम्बू बना दिया और रुक रुक कर फुदकने लगा… यूँ फुदकने की वजह से शायद वंदना का ध्यान मेरे लंड पे जरूर चला गया होगा…
इस बात का एहसास तब हुआ जब वंदना का वो हाथ जो मेरे सीने को सहला रहा था उसका दबाव बढ़ने लगा और जो हाथ जाँघों पे था वो अब धीरे धीरे लंड के करीब जाने लगा।
मैं समझ गया कि अगर उसने एक बार भी मेरे लंड को छू लिया या पकड़ लिया तो मैं अभी उसे पटक कर उसके नाज़ुक चूत में अपना विकराल लंड डाल दूंगा और उसे चोदे बिना नहीं छोडूंगा।
उसकी साँसों की गर्मी और रफ़्तार का एहसास मुझे होने लगा था।
मैंने यह सब रोकने का फैसला किया और अपने सीने पे पड़े उसके हाथ को पकड़ कर उसे टूटे फूटे आवाज़ में रोका।
‘अ अ अब रहने दो… वंदना अ अ अब आराम है मुझे… मैं बाद में फिर से लगा लूँगा।’ मैंने कांपते हुई आवाज़ में कहा।
मेरे इतना कहने पर वो मेरी तरफ मुड़ गई और मेरे ऊपर झुक सी गई… धीरे धीरे उसका मुँह मेरे मुँह के पास आने लगा… लेकिन उसका एक हाथ अब भी मेरी जाँघों पर ही था जो अब भी अपना काम कर रहे थे और मेरे जाँघों को सहला कर मुझे पागल बना रहे थे..
तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी कल्पना मैंने नहीं की थी, उसने बिना कुछ कहे अपने होठों को मेरे होठों पे रख दिया और अपनी आँखें बंद करके एक लम्बा सा चुम्बन करने लगी… उसने मेरे दोनों होठों को अपने होठों में बंद कर लिया चूमने लगी।
मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ… और तभी उसने वो हरकत भी कर दी जिससे मैं डर रहा था.. उसने अपना हाथ मेरे जॉकी के ऊपर से मेरे टन टन कर रहे लंड पे रख दिया और धीरे से दबा दिया।
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हे ईश्वर, यह क्या हो रहा है…
मैंने एक जोर की सांस ली और अपने होंठ उसके होठों से छुड़ा कर उसकी तरफ देखा, वंदना की आँखों में वासना के लाल डोरे साफ़ दिखाई दे रहे थे…
एक दो सेकंड तक हम एक दूसरे को यूँ ही देखते रहे… इस दौरान उसका हाथ स्थिर होकर मेरे लंड पे ही था और मेरा लंड उसके हाथों के नीचे दबा हुआ ठुनक रहा था।
मैं जानता था कि अब रुकना मुश्किल है… लेकिन मैंने फिर भी एक अंतिम प्रयास किया और उठ कर बैठ गया।
मेरे उठने से वंदना को अपनी हरकत का एहसास हुआ और वो झट से उठ कर बाहर की तरफ भाग गई।
मेरा गला सूख गया और मुझे पसीने आ गए, कुछ देर मैं उसी हालत में बैठा रहा और सोचने लगा कि आखिर करूँ तो क्या करूँ… लंड था जो कि अब वंदना के हाथों का स्पर्श पाकर अकड़ गया था और बस उसे चोदना चाहता था लेकिन मुझे रेणुका से बेवफाई का एहसास ऐसा करने से मना कर रहा था।
इस असमंजस की स्थिति ने मुझे पूरी तरह से उलझन में डाल दिया था।
इससे पहले भी मेरे ऐसे एक दो सम्बन्ध रहे थे जिसमे मैं एक ही घर की माँ और बेटी दोनों को बड़े चाव से चोदा था और उनके साथ चुदाई का भरपूर मज़ा लिया था… लेकिन इस बार पता नहीं क्यूँ मैं रेणुका की तरफ कुछ इस तरह से खिंचा चला गया था कि मुझे अब ऐसा लगने लगा था कि अगर मैंने वंदना को चोदा तो यह रेणुका के साथ दगेबाज़ी होगी… लेकिन जो आग आज वंदना लगा गई थी वो शांत भी हो तो कैसे…
इधर मेरा लंड अब भी ठुनक ठुनक कर मुझे यह एहसास दिला रहा था कि चूत मिल रही है तो बस चोद दो… मैंने मोमबत्ती बुझा दी और वहीँ बिस्तर पर लेट कर अपने लंड को बाहर निकल कर मसलने लगा और मुठ मारने लगा…
मुझे पता था कि इस तरह अकड़े हुए लंड को लेकर मैं बाहर नहीं जा सकता था।
मैंने लंड को रगड़ना शुरू किया और रेणुका की हसीं चूचियों और मखमली चूत को याद करने लगा… लेकिन कमबख्त मेरे दिमाग में अब वंदना के हाथों का दबाव याद आने लगा और मुझे इस बात पर बहुत हैरानी हुई कि जब मैंने वंदना की अनदेखी गोल मटोल चूचियों और सुनहरे बालों से भरी प्यारी सी रसदार चूत का ख्याल अपने दिमाग में लाया तो बरबस ही मेरे लंड ने एक ज़ोरदार पिचकारी के साथ ढेर सारा लावा उगल दिया और मैं लम्बी लम्बी साँसे लेता हुआ वहीं बिस्तर पर ढेर हो गया।
करीब दस मिनट तक ऐसे ही रहने के बाद मैं उठा और जल्दी से कपड़े बदलने लगा… लेकिन अब भी मैं यही सोच रहा था कि इतना सब होने के बाद मैं अब वंदना के साथ सहज रह पाऊँगा या नहीं.. और अभी तुरंत उसके साथ उसके दोस्त के घर पर जाना था… उसके साथ कैसे पेश आऊँगा या वो कैसे पेश आएगी.. कैसी बातें होंगी अब हमारे बीच?!
इसी तरह के ख्यालों में डूबा मैं तैयार हो रहा था कि तभी किसी के आने की आहट सुनाई दी और मैंने बाहर झाँका। मैंने देखा कि रेणुका मेरे कमरे की तरफ चली आ रही थी… उसकी आँखों में एक अलग सी चमक थी और वो बहुत खुश लग रही थी.. तब तक बिजली आ चुकी थी और मैं उसके चेहरे के हर भाव को अच्छी तरह से देख पा रहा था।
उसने आते ही मुझे पीछे से जकड़ लिया और मुझसे लिपट गई- क्या बात है समीर बाबू… बड़े हैंड्सम लग रहे हो?’ उसने बड़े ही प्यार से कहा।
उसकी इन्ही अदाओं पे तो मर मिटा था मैं… मैंने उसे पकड़ कर अपने सामने किया और उसे जोर से अपने गले से लगा लिया- आज बड़ा चहक रही हैं आप… क्या बात है… यूँ इतना खुश और इतनी सजी संवरी तो कभी नहीं देखा… कोई ख़ास बात है क्या?उसे अपने सीने में और भी भींचते हुए पूछने लगा।
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